आजकल भाषा साथ नहीं दे रही लेकिन हिम्मत बांध कर साथी ब्रह्मप्रकाश को याद कर रही हूं .वे ज्ञान-विज्ञान आन्दोलन में दिन-रात काम करने वाले साथी थे और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.विज्ञान मंच , साक्षरता अभियान, नाटक आन्दोलन, चमत्कारों का पर्दाफ़ाश यानि अंधविश्वास उन्मूलन , नवपाठक और लाईब्रेरी आन्दोलन में सक्रिय थे.जैसाकि होता है एक प्रतिबद्ध और निस्वार्थ आदमी आन्दोलन के हर काम को दिल लगाकर करता है.आन्दोलन के उतार-चढ़ाव के साथ उसकी ज़रूरत के हिसाब से अपने को ढालने की ख़ूबी से वे सम्पन्न थे.इस ज़रूरत को प्राथमिकता देना और व्यक्तिगत प्रतिभा का झन्डा न फ़हराना यह ख़ूबी उनके व्यक्तित्व में समाई हुई थी.बहुत समय वे भारी आर्थिक विपन्नता में रहे पर हमेशा ज़िन्दादिल ,हाजिरजवाब और कामकाज के लिये तत्पर व्यक्ति की तरह ही सबके बीच सक्रिय दिखाई देते .अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ काम करते हुए वे "चमत्कार" यानि "जादू" करके दिखाते थे और फिर उसके पीछे की ट्रिक बताते हुए ढोंगी बाबाओं और अंधविश्वास पर चोट करते थे .उन्होंने हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की सैंकड़ों प्रस्तुतियां दीं.वे बहुत अच्छे अभिनेता थे और अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रयोग वे इन प्रस्तुतियों में भी करते थे. चमत्कारों का पर्दाफ़ाश करने के सन्दर्भ में वे राष्ट्रीय स्तर के स्रोत व्यक्ति थे.
काश ! हम उन्हें पूरे समय अभिनय के लिये रंगमंच उपलब्ध करवा पाते!
एक बार रोहतक में मोटेराम का सत्याग्रह का मंचन किया गया हबीब तन्वीर मुख्य अतिथि थे.ब्रह्मप्रकाश इस नाटक में बनारस के एक फेरी वाले की छोटी सी भूमिका निभा रहे थे. वे रंगमंच पर बग़ल में सरकन्डे का स्टैन्ड और सर पर एक बड़ा सा छबड़ा (टोकरा) लिये हुए रंगमंच पर आए आकर उन्होंने आराम से बग़ल से स्टैन्ड निकाल कर ज़मीन पर रखा टोकरा उतारते हुए उसके नीचे ईडी बनाकर रखा अंगोछा कन्धे पर डाला और टोकरे को उस पर जमाया इसी समय हबीब साहब के मुंह से एक प्रशंसात्मक ध्वनि निकली .अभी तक ब्रह्मप्रकाश जी ने एक भी संवाद नहीं बोला था.मैं तन्वीर साहब के साथ ही बैठी थी वे मेरी और झुक कर फ़ुसफ़ुसाए कमाल आर्टिस्ट !बाद में उन्होंने मुझसे नाम पूछा ब्रह्मप्रकाश से मिलने की इच्छा जताई और कम-से कम दो बार कहा इसके मंच पर आते ही दृश्य जम गया फेरी वालों का बाज़ार आथेन्टिक हो गया.
ब्रह्मप्रकाश अच्छे अभिनेता थे और श्रम से सने ख़ुशदिल मनुष्य की तरह सारपूर्ण दिखाई पड़ते थे.उनके बेटे अरविन्द ने बाकायदा नाटक का प्रशिक्षण लिया है और अच्छा अभिनेता और निर्देशक है. साथी ब्रह्मप्रकाश स्मृति में हमेशा जीवन्त रहेंगे.