रविवार, 1 फ़रवरी 2026

ब्रह्मप्रकाश.. शुभा

आजकल भाषा साथ नहीं दे रही लेकिन हिम्मत बांध कर साथी ब्रह्मप्रकाश को याद कर रही हूं .वे ज्ञान-विज्ञान आन्दोलन में दिन-रात काम करने वाले साथी थे और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.विज्ञान मंच , साक्षरता अभियान, नाटक आन्दोलन, चमत्कारों का पर्दाफ़ाश यानि अंधविश्वास उन्मूलन , नवपाठक और लाईब्रेरी आन्दोलन में सक्रिय थे.जैसाकि होता है एक प्रतिबद्ध और निस्वार्थ आदमी आन्दोलन के हर काम को दिल लगाकर करता है.आन्दोलन के उतार-चढ़ाव के साथ उसकी ज़रूरत के हिसाब से अपने को ढालने की ख़ूबी से वे सम्पन्न थे.इस ज़रूरत को प्राथमिकता देना और व्यक्तिगत प्रतिभा का झन्डा न फ़हराना यह ख़ूबी उनके व्यक्तित्व में समाई हुई थी.बहुत समय वे भारी आर्थिक विपन्नता में रहे पर हमेशा ज़िन्दादिल ,हाजिरजवाब और कामकाज के लिये तत्पर व्यक्ति की तरह ही सबके बीच सक्रिय दिखाई देते .अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ काम करते हुए वे "चमत्कार" यानि "जादू" करके दिखाते थे और फिर उसके पीछे की ट्रिक बताते हुए ढोंगी बाबाओं और अंधविश्वास पर चोट करते थे .उन्होंने हरियाणा और राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की सैंकड़ों प्रस्तुतियां दीं.वे बहुत अच्छे अभिनेता थे और अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रयोग वे इन प्रस्तुतियों में भी करते थे. चमत्कारों का पर्दाफ़ाश करने के सन्दर्भ में वे राष्ट्रीय स्तर के स्रोत व्यक्ति थे.

काश ! हम उन्हें पूरे समय अभिनय के लिये रंगमंच उपलब्ध करवा पाते!  

एक बार रोहतक में मोटेराम का सत्याग्रह का मंचन किया गया हबीब तन्वीर मुख्य अतिथि थे.ब्रह्मप्रकाश इस नाटक में बनारस के एक फेरी वाले की छोटी सी भूमिका निभा रहे थे. वे रंगमंच पर बग़ल में सरकन्डे का स्टैन्ड और  सर पर एक बड़ा सा छबड़ा (टोकरा)  लिये हुए रंगमंच पर आए आकर उन्होंने आराम से बग़ल से स्टैन्ड निकाल कर ज़मीन पर रखा टोकरा उतारते हुए उसके नीचे ईडी बनाकर रखा अंगोछा कन्धे पर डाला और टोकरे को उस पर जमाया  इसी समय  हबीब साहब के मुंह से एक प्रशंसात्मक ध्वनि निकली .अभी तक ब्रह्मप्रकाश जी ने एक भी संवाद नहीं बोला था.मैं तन्वीर साहब के साथ ही बैठी थी वे मेरी और झुक कर फ़ुसफ़ुसाए कमाल आर्टिस्ट !बाद में उन्होंने मुझसे नाम पूछा ब्रह्मप्रकाश से मिलने की इच्छा जताई और कम-से कम दो बार कहा इसके मंच पर आते ही दृश्य जम गया फेरी वालों का बाज़ार आथेन्टिक हो गया.
ब्रह्मप्रकाश अच्छे अभिनेता थे और श्रम से सने ख़ुशदिल मनुष्य की तरह सारपूर्ण दिखाई पड़ते थे.उनके बेटे अरविन्द ने बाकायदा नाटक का प्रशिक्षण लिया है और अच्छा अभिनेता और निर्देशक है.  साथी ब्रह्मप्रकाश स्मृति में हमेशा जीवन्त रहेंगे.

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

एजुकेशन

Higher Secondary part 1
Feb,1965..638
Higher Secondary part.11,March 1966
Pre Medical Examination of April,1967
First Professional Exam MBBS ..Dec,1968


Second Professional Exam..May,1970
Social and Preventive Medicine..December, 1970
Final MBBS exam Dec.1971
Master of Surgery
September, 1977

पुरानी यादें



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पुरानी
यादें
दर्जी राम लुभाया जी
बहुत बंडियाँ कच्छे
जाट  स्कूल रोहतक

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Dr G. S. Sekhon --My Teacher
टीचर्स डे के बहाने
प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका सूरजमुखी ने प्रभावित किया अपने खुशमिजाज व्यवहार से । हाई स्कूल के वक्त मेरे आदर्श टीचर रहे हैडमास्टर हरनंद राय जी और श्री देवी सिंह फिजिक्स के अध्यापक बहुत कुछ सीखने को मिला किताबी पढ़ाई के अलावा। प्री मेडिकल में कालेज के वक्त श्री हरिचंद हुड्डा । मेडिकल कालेज में प्रथम स्तर पर डॉ आई बी सिंह एनाटोमी विभाग से second profession  के दौरान डॉ वासुदेवा एसपीएम विभाग और third प्रोफेशन में डॉ पी एस मैनी और डॉ उर्मिल कपूर gynae विभाग ने बहुत कुछ सिखाया। एम् एस सर्जरी के वक्त डॉ सूबेदार सिंह और डॉ जी एस सेखों ने मेरे जीवन को मानवीय बनाने में धीमे धीमे बहुत सी चीजें सिखाई। वक्त की कीमत और टाइम schedule की अहमियत । सिम्पलिसिटी। डॉ सेखों कहा करते "A good human being is always a good doctor ,but, not the vice versa .। गदूद के ऑपरेशन के टिप्स। आदि आदि। अपने विद्यार्थियों से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। जनतांत्रिक प्रणाली से टीम के साथ काम करना आसान नहीं होता । शायद ही ऐसा कोई मौका होगा की राउंड के वक्त जूनियर्स पर गुस्सा किया हो या किसी नर्स पर डाँट लगाई हो। खास बात जो सामने आयी वो थी की इस प्रणाली से ओपीडी और दाखिल हुए मरीजों का सबसे ज्यादा विश्वास जीत पाते थे। सीखना सीखाना bilateral process बनता है तो टीचर और स्टूडेंट का बहुत अलग रिस्ता बनता है । अपने सभी शिक्षकों को याद करते हुए और उन विद्यार्थियों को भी याद करते हुए जिनसे भी बहुत कुछ सीखा।
रणबीर

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दूसरी से पांचवी क्लास जाट प्राइमरी स्कूल रोहतक से पास की। मास्टर जी फतेह सिंह दलाल शुरू में फिर साथ में सूरजमुखी बहिनजी, बाद में मास्टर जी दलजीत सिंह राठी  भी गुरुजन थे।
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Some of us still remember the torturing days of strike in Medical College Rohtak for 98 days in the year 1977. The dividion on strikers and non strikers was on extreeme caste based .PGIMS Suffered a lot in post strike period. More or less the same type of caste dirty play is active on the campus again . We should be careful about this . Our main and real issues then take back seat .

The time we went on the longest strike in the medical colleges' history(1978)!! Ved Pal Mehla

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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

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पुरानी यादें --
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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पुरानी यादें
24 -25 साल पहले की बात है । नार्थ जोन सर्जन कांफ्रेंस जम्मू में आयोजित की गई थी । रोहतक से 25-30 डॉक्टर थे । एक दिन सभी का मन वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा का बना। मैने मना किया तो सभी ने अनुरोध किया कि चलें । हम चल दिये ।
       अर्ध कन्वारी से कुछ पहले 4-5 महिलाएं और 5-6 पुरुष परेशान से दिखाई दे रहे थे। हमारे में से किसी ने पूछा-क्या बात है क्या हुआ।
बताया- उनके एक बुजुर्ग पेशाब करने बैठे थे और वे नीचे खाई में लुढ़क गए हैं । उन्हें देखने गए हैं।
       हमने भी बुजुर्ग को ढूंढने की इच्छा बनाई और 5-6 डॉक्टर हम नीचे उतरते चले गए । 150 गज के करीब नीचे उतरने के बाद हमने आवाज लगाई कि क्या बुजुर्ग मिल गए। और नीचे से आवाज आई- हाँ मिल गए। हमने पूछा- कैसी तबियत है? जवाब आया- ठीक हैं। उप्पर रास्ते में खड़े लोगों ने सुना तो कुछ जय माता की बोलते चले गए।
         हमने फिर पूछा कि हम डॉक्टर हैं कोई चोट है तो हम आ जाते हैं मदद करने । बताओ कहाँ पर हो।
फिर आवाज आई थोड़ी धीमी - वो तो चल बसे । इतनी देर में हम भी वहां पहुंच गए थे। पूछा- पहले ठीक क्यों कहा ? जवाब था कि ऊपर वाले रिश्तेदारों में से किसी को सदमा न लग जाये इसलिए ।
        कुछ लोगों को तो लगा कि माता ने उस बुजुर्ग को बचा लिया। मगर सच्चाई यही थी कि माता उस बुजुर्ग को नहीं बचा पाई।
      मैने सभी डॉक्टर सहयोगियों से पूछा -- यदि बुजुर्ग जिंदा होते और चोटिल होते तो हम क्या फर्स्ट एड कर सकते थे । सब ने अपने अपने ढंग से बात रखी। मैने फिर कहा- बिना इमरजेंसी किट के शायद हम ज्यादा फर्स्ट एड करने की हालत में नहीं होते।
         हम सबने तय किया कि जब इस तरह के ग्रुप में कहीं जाएंगे तो इमरजेंसी किट जरूर साथ लेकर चलेंगे ।
बाकियों का तो पता नहीं मैने एक किट जरूर बना ली ।
तीन साल बाद वही कांफ्रेंस पी जी आई चंडीगढ़ में थी। कालेज की बस में गए थे हम सब । वापसी पर अम्बाला पहुंचने से पहले हमारे सामने ट्रैक्टर सड़क के किनारे पलट गया। हमने गाड़ी रुकवाई ।
    ड्राइवर ट्रैक्टर के पहिये के नीचे दबा था । हमने सबने मिलकर उसको निकाला और देखा तो वह शॉक में था । मैं ने इमरजेंसी किट से उसे मेफेंटीन इंजेक्शन दिया और एक वोवरान का inj दिया । कुछ संम्भल गया मरीज । हमने उसे अपनी गाड़ी में लिटाया और उसे अम्बाला सिविल अस्पताल में दाखिल करवाया । इलाज शुरू हुआ तो मरीज और इम्प्रूव हुआ ।
   3 साल तक लगता था यह किट खामखा उठाये फिरता हूँ मगर उस रोज लगा कि खामखा नहीं उठाई किट ।
शायद जो डॉक्टर साथी इन दोनों मौकों पर थे उनको याद हों ये दोनों घटनाएं ।
रणबीर दहिया
9812139001
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डॉ सुरेश शर्मा - पानीपत की चौथी लड़ाई
डा सूरजभान
राजेश अत्रेय
डा शंकर इसराना
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पुरानी यादें --मेरे बॉस डॉ सेखों
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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आज किशनपुरा चौपाल में सुश्री उर्मिला जी भूतपूर्व सरपंच गांगटान और साक्षरता आंदोलन की अग्रणी कार्यकर्ता से मुलाकात हुई। पुरानी यादें उस दौर की सांझा की। बहुत अच्छा लगा । उनके साथ दो महिलाएं अपने स्वाथ्य के बारे परामर्श करने आई थी।
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2014 अगस्त में रिटायरमेंट के टाइम पूरी यूनिट के डॉक्टर एक साथ अपनी पुरानी यादें, पुराने दुख सुख के दिन जो यूनिट में गुजरे थे उन्हें अपने अपने ढंग से याद कर रहे थे। एक सीनियर एस आर ने बताया कि एक बार एक unkown मरीज एक्सीडेंट के साथ आया । उसके पेट में चोट थी। उसको ऑपरेट करने की जरूरत थी मगर उसके ग्रुप का खून ब्लड बैंक में नहीं था । बताया कि सर आपका o पॉजिटिव ब्लड है जो पॉजिटिव दूसरे सभी ग्रुप्स को दिया जा सकता है। आप ब्लड बैंक गए वहां एक यूनिट ब्लड unkown मरीज के लिए दिया और वापिस आकर उसका आपरेशन किया। मरीज बचा लिया गया।
मैने बहुत कोशिश की पुरानी याद को याद करने की । मगर जब डेट आदि बताई तो मुझे भी यकीन हुआ कि ऐसा कुछ हुआ था।
और भी कई ना भुलाई जाने वाली पुरानी यादें साझा की गई। अब थोड़ा उम्र का असर होने लगा है तो सोचा सांझा कर लूँ सभी के साथ। मौके पर लिया गया फैंसला यदि एक ज्यान को भी बचा पाता है एक डॉक्टर के जीवन में तो एक एहसास और विश्वास बढ़ता है डॉक्टर का।
मेरे साथ के हमसफ़र सभी डॉक्टरों को याद करते हुए | मुझे गर्व है अपनी यूनिट के उन सभी डॉक्टरों पर जो मरीजों की सेवा में लग्न हैं।
डॉ रणबीर
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'पानीपत की चौथी लड़ाई' साक्षरता आंदोलन की 1992 की रैली।
***पुरानी यादें***
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Dr O.P.Grewal
पन्द्राह साल हो लिए वे चले गए हमनै छोड़कै।।
उनहत्तर साल बिताए ज्ञान विज्ञान मैं जी तोड़कै।।
डॉ ओम प्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान की जनरल बॉडी मीटिंग में हिस्सेदारी करने का मौका मिला। बहुत सी पुरानी यादें भी ताजा हो गई। डॉ ग्रेवाल के व्यक्तित्व बारे कहने को शब्द नहीं हैं मेरे पास। बहुत ही उत्साहवर्धक मीटिंग रही।
6.6.1937.....24.1.2006
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पुरानी यादें---
मंत्री खुर्सीद अहमद जी :
खेल प्रतियोगिता इनाम वितरण समारोह मेडिकल कॉलेज रोहतक सन 1971 के आस पास ।
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डा• कृष्णा सांगवान,डा• सरोज मुदगिल,डा• सुखबीर सांगवान,डा• रणबीर सिंह दहिया,डा• रणबीर हुड्डा,डा• श्रीराम सिवाच ,डा• मुकेश इन्दौरा ,डा• कोहली।
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पुरानी यादें -- डॉ विकाश कथूरिया, डॉ विकास अग्रवाल, डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ सुनील , डॉ पूजा , डॉ कुलदीप, डॉ राजू राजन, डॉ दीपांशु और सभी कॉलीग्स -- आप सबको सलाम ।
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सिरसली स्वर्गीय संतोष के पोते की शादी में -20 अप्रैल, 2022.पुरानी यादें ताजा हो गई। चम्पा सिंह जी भी मिले।
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आज नित्यानंद स्कूल गया सप्तरंग के प्रोग्राम में तो प्रोफेसर जय सिंह मलिक का फोटो नजर आया। देखकर पुरानी यादें ताजा हो गई। बहुत ही नेक दिल इंसान और दोस्त ।
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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आज बहुत दिनों बाद एनोटमी विभाग के लेक्चर थिएटर  वन में 2 घण्टे के लिए जाने का मौका मिला । 1967 कि यादें ताजा हो गई । पुरानी यादें ; पुराने अध्यापक : डॉ इंदरजीत दीवान, डॉ इंद्रबीर सिंह , डॉ छिबर, डॉ गांधी, डॉ राठी याद आ गए। 67 बैच के साथी भी दिमाग में घूम गए । सुशील खुराना, आर एन कालरा, अशोक भाटिया, दयासागर गोयल, हरीश भंडारी , रमेश मित्तल, ईश्वर नासिर, रीटा गुलाटी, कर्मजीत कौर, कृष्णा सहरावत , स्वर्ण लता, विमला कादयान आदि आदि।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
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795 पिल्लर(टिकरी बॉर्डर) पर जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा 1 साल किसानों के लिए फ्री हेल्थ कैम्प का आयोजन । आज वहां से गुजरने का मौका मिला  तो पुरानी यादें ताजा हो गयी तो यह वीडियो बना लिया।
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भुली बिसरी यादें
सन 1956 की बात है की मेरे पिताजी चौधरी जागे राम सिरसा से बतोर इंस्पेक्टर एग्रीकल्चर की पोस्ट से  बतौर फार्म मैनेजर सरकारी एग्रीकल्चर फार्म रोहतक में तबादला हो कर आए। यह फार्म 100 एकड़ जमीन में बना सरकारी एग्रीकल्चर फार्म था , जिसमें हर तरह की खेती की जाती थी । चार जोड़ी हट्टे कट्टे बैल थे जो खेती करने में  बहुत कारगर रूप से इस्तेमाल किए जाते थे ।  पिताजी 1966 तक यहां पर रहे और यहीं से रिटायर हो गए।  आने वाले दिनों में यह फार्म नहीं रहा और जमीन कुछ बेच दी गई कुछ पर सरकारी दफ्तर खुलते गए और सरकारी अफसरों के रहने के लिये कोठियां और मकान बनते गए। सिरफ़ एग्रीकल्चर फार्म का मेन गेट बचा है जो कमिश्नर के  रेजिडेंस और दफ्तर दोनों यहां हैं, तक जाता है बाकि एग्रो मॉल इसकी जमीन में बना और कई कॉलोनी भी बन गई । बहुत से मकान हैं । दो पीपल के पेड़ आज भी पहचाने जा सकते हैं जो हमारे घर के सामने मौजूद थे। भूली बिसरी यादें हैं पूरे फॉर्म में घूमते थे। पिताजी बहुत सख्त मिजाज थे और फार्म के खेत से चूसने के लिए गन्ने भी नहीं लाने देते थे। बोहर वालों के खेतों से लेकर आते थे।  और चीजों का तो मतलब ही नहीं । यहीं से मैं बिल्कुल साथ लगता जाट स्कूल है वहां पर पढ़ने जाने लगा । पहले प्राइमरी स्कूल में पढ़ा  और फिर हाई स्कूल में छठी क्लास से हायर सेकेंडरी किया । बहुत सी यादें हैं उस दौर की जिन्हें याद करना इतना आसान नहीं है आज एक बार  कोशिश है उन पुरानी यादों को याद करने की।
प्राइमरी स्कूल में पहले एक ही टीचर थे मास्टर फतेह सिंह दलाल। तीसरी में हुए तो सूरजमुखी बहिनजी ने भी ज्वाइन कर लिया। पांचवी तक पहुंचे तो मास्टर दलजीत सिंह राठी जी भी क्लास लेने लगे।
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भूली बिसरी यादें
1978 में मेडिकल रोहतक में 98 दिन की हड़ताल हुई..उन दिनों चौधरी हरद्वारी लाल वाईस चांसलर थे। मेरे जीवन में बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई यह हड़ताल।
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वार्ड  6-- भूली बिसरी यादें
एक बार की बात की झरौट के बुजुर्ग अपनी घरवाली को लेकर आये । उसकी एक टांग में गैंग्रीन हो गई बायीं या दायीं याद नहीं। हमने सभी concerned विभागों की राय ली और यह तय हुआ कि amputation करनी होगी । ताऊ को समझाया। कटने की बात सुनकर दोनों घबरा गए । ताऊ मेरे कमरे में आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मैने बिठाया और उसकी और देखा। " काटनी ए पड़ैगी डॉ साहब। और कोए राह कोण्या इसकी ज्यान नै खतरा करदेगी या गैंग्रीन -- मैंने जवाब दिया बहुत धीमे से। ताऊ बोल्या-- न्यों कहवै सैं अक गुड़गांव मैं शीतला माता की धोक मारकै ठीक होज्यां हैं। मैंने कहा-- मेरी जानकारी में नहीं। ताऊ-- एक बार जाना चाहवैं सैं। फेर आपके डॉ न्यों बोले-- LAMA होज्या । छुट्टी कोण्या देवें । और फिर हमारे वार्ड में दाखिला नहीं हो सकता। चाहूँ सू आप के वार्ड मैं इलाज करवाना। मैने कहा एक शर्त है-- जै इसकी टांग धोक मारकै ठीक होज्या तो भी लियाईये और नहीं ठीक हो तो भी। ठीक होगी तो मैं बाकी के इसे मरीज भी वहीं गुड़गांव भेज दिया करूंगा और ठीक न हो तो आप ये सारी बात एक पर्चे में लिखकर बांटना कि वहां मेरी घरवाली ठीक नहीं हुई। हम ने discharge on request कर दिया । दो दिन बाद वापिस आ गया । महिला की हालत ज्यादा खराब हुई थी। खैर amputation ortho विभाग  के सहयोग से की और महिला ठीक होकर चली गयी । बुजुर्ग जाने से पहले आया कमरे में और कहने लगा-- पर्चा छापना चाहूँ सूँ फेर गांव वाले कह रहे हैं शीतला माता
के खिलाफ पर्चा। बहोत दबाव सै मेरे पै डॉ साहब । पैरों की तरफ हाथ किये । मैने बुजुर्ग को छाती से लगा लिया और आशीर्वाद देने को कहा।
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भुली बिसरी यादें -- मेडिकल कालेज वार्षिक खेल आयोजन--2012
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
जनवरी 2017
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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

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पुरानी
यादें
दर्जी राम लुभाया जी
बहुत बंडियाँ कच्छे
जाट  स्कूल रोहतक

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Dr G. S. Sekhon --My Teacher
टीचर्स डे के बहाने
प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका सूरजमुखी ने प्रभावित किया अपने खुशमिजाज व्यवहार से । हाई स्कूल के वक्त मेरे आदर्श टीचर रहे हैडमास्टर हरनंद राय जी और श्री देवी सिंह फिजिक्स के अध्यापक बहुत कुछ सीखने को मिला किताबी पढ़ाई के अलावा। प्री मेडिकल में कालेज के वक्त श्री हरिचंद हुड्डा । मेडिकल कालेज में प्रथम स्तर पर डॉ आई बी सिंह एनाटोमी विभाग से second profession  के दौरान डॉ वासुदेवा एसपीएम विभाग और third प्रोफेशन में डॉ पी एस मैनी और डॉ उर्मिल कपूर gynae विभाग ने बहुत कुछ सिखाया। एम् एस सर्जरी के वक्त डॉ सूबेदार सिंह और डॉ जी एस सेखों ने मेरे जीवन को मानवीय बनाने में धीमे धीमे बहुत सी चीजें सिखाई। वक्त की कीमत और टाइम schedule की अहमियत । सिम्पलिसिटी। डॉ सेखों कहा करते "A good human being is always a good doctor ,but, not the vice versa .। गदूद के ऑपरेशन के टिप्स। आदि आदि। अपने विद्यार्थियों से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। जनतांत्रिक प्रणाली से टीम के साथ काम करना आसान नहीं होता । शायद ही ऐसा कोई मौका होगा की राउंड के वक्त जूनियर्स पर गुस्सा किया हो या किसी नर्स पर डाँट लगाई हो। खास बात जो सामने आयी वो थी की इस प्रणाली से ओपीडी और दाखिल हुए मरीजों का सबसे ज्यादा विश्वास जीत पाते थे। सीखना सीखाना bilateral process बनता है तो टीचर और स्टूडेंट का बहुत अलग रिस्ता बनता है । अपने सभी शिक्षकों को याद करते हुए और उन विद्यार्थियों को भी याद करते हुए जिनसे भी बहुत कुछ सीखा।
रणबीर

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दूसरी से पांचवी क्लास जाट प्राइमरी स्कूल रोहतक से पास की। मास्टर जी फतेह सिंह दलाल शुरू में फिर साथ में सूरजमुखी बहिनजी, बाद में मास्टर जी दलजीत सिंह राठी  भी गुरुजन थे।
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Some of us still remember the torturing days of strike in Medical College Rohtak for 98 days in the year 1977. The dividion on strikers and non strikers was on extreeme caste based .PGIMS Suffered a lot in post strike period. More or less the same type of caste dirty play is active on the campus again . We should be careful about this . Our main and real issues then take back seat .

The time we went on the longest strike in the medical colleges' history(1978)!! Ved Pal Mehla

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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

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पुरानी यादें --
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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पुरानी यादें
24 -25 साल पहले की बात है । नार्थ जोन सर्जन कांफ्रेंस जम्मू में आयोजित की गई थी । रोहतक से 25-30 डॉक्टर थे । एक दिन सभी का मन वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा का बना। मैने मना किया तो सभी ने अनुरोध किया कि चलें । हम चल दिये ।
       अर्ध कन्वारी से कुछ पहले 4-5 महिलाएं और 5-6 पुरुष परेशान से दिखाई दे रहे थे। हमारे में से किसी ने पूछा-क्या बात है क्या हुआ।
बताया- उनके एक बुजुर्ग पेशाब करने बैठे थे और वे नीचे खाई में लुढ़क गए हैं । उन्हें देखने गए हैं।
       हमने भी बुजुर्ग को ढूंढने की इच्छा बनाई और 5-6 डॉक्टर हम नीचे उतरते चले गए । 150 गज के करीब नीचे उतरने के बाद हमने आवाज लगाई कि क्या बुजुर्ग मिल गए। और नीचे से आवाज आई- हाँ मिल गए। हमने पूछा- कैसी तबियत है? जवाब आया- ठीक हैं। उप्पर रास्ते में खड़े लोगों ने सुना तो कुछ जय माता की बोलते चले गए।
         हमने फिर पूछा कि हम डॉक्टर हैं कोई चोट है तो हम आ जाते हैं मदद करने । बताओ कहाँ पर हो।
फिर आवाज आई थोड़ी धीमी - वो तो चल बसे । इतनी देर में हम भी वहां पहुंच गए थे। पूछा- पहले ठीक क्यों कहा ? जवाब था कि ऊपर वाले रिश्तेदारों में से किसी को सदमा न लग जाये इसलिए ।
        कुछ लोगों को तो लगा कि माता ने उस बुजुर्ग को बचा लिया। मगर सच्चाई यही थी कि माता उस बुजुर्ग को नहीं बचा पाई।
      मैने सभी डॉक्टर सहयोगियों से पूछा -- यदि बुजुर्ग जिंदा होते और चोटिल होते तो हम क्या फर्स्ट एड कर सकते थे । सब ने अपने अपने ढंग से बात रखी। मैने फिर कहा- बिना इमरजेंसी किट के शायद हम ज्यादा फर्स्ट एड करने की हालत में नहीं होते।
         हम सबने तय किया कि जब इस तरह के ग्रुप में कहीं जाएंगे तो इमरजेंसी किट जरूर साथ लेकर चलेंगे ।
बाकियों का तो पता नहीं मैने एक किट जरूर बना ली ।
तीन साल बाद वही कांफ्रेंस पी जी आई चंडीगढ़ में थी। कालेज की बस में गए थे हम सब । वापसी पर अम्बाला पहुंचने से पहले हमारे सामने ट्रैक्टर सड़क के किनारे पलट गया। हमने गाड़ी रुकवाई ।
    ड्राइवर ट्रैक्टर के पहिये के नीचे दबा था । हमने सबने मिलकर उसको निकाला और देखा तो वह शॉक में था । मैं ने इमरजेंसी किट से उसे मेफेंटीन इंजेक्शन दिया और एक वोवरान का inj दिया । कुछ संम्भल गया मरीज । हमने उसे अपनी गाड़ी में लिटाया और उसे अम्बाला सिविल अस्पताल में दाखिल करवाया । इलाज शुरू हुआ तो मरीज और इम्प्रूव हुआ ।
   3 साल तक लगता था यह किट खामखा उठाये फिरता हूँ मगर उस रोज लगा कि खामखा नहीं उठाई किट ।
शायद जो डॉक्टर साथी इन दोनों मौकों पर थे उनको याद हों ये दोनों घटनाएं ।
रणबीर दहिया
9812139001
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डॉ सुरेश शर्मा - पानीपत की चौथी लड़ाई
डा सूरजभान
राजेश अत्रेय
डा शंकर इसराना
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पुरानी यादें --मेरे बॉस डॉ सेखों
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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आज किशनपुरा चौपाल में सुश्री उर्मिला जी भूतपूर्व सरपंच गांगटान और साक्षरता आंदोलन की अग्रणी कार्यकर्ता से मुलाकात हुई। पुरानी यादें उस दौर की सांझा की। बहुत अच्छा लगा । उनके साथ दो महिलाएं अपने स्वाथ्य के बारे परामर्श करने आई थी।
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2014 अगस्त में रिटायरमेंट के टाइम पूरी यूनिट के डॉक्टर एक साथ अपनी पुरानी यादें, पुराने दुख सुख के दिन जो यूनिट में गुजरे थे उन्हें अपने अपने ढंग से याद कर रहे थे। एक सीनियर एस आर ने बताया कि एक बार एक unkown मरीज एक्सीडेंट के साथ आया । उसके पेट में चोट थी। उसको ऑपरेट करने की जरूरत थी मगर उसके ग्रुप का खून ब्लड बैंक में नहीं था । बताया कि सर आपका o पॉजिटिव ब्लड है जो पॉजिटिव दूसरे सभी ग्रुप्स को दिया जा सकता है। आप ब्लड बैंक गए वहां एक यूनिट ब्लड unkown मरीज के लिए दिया और वापिस आकर उसका आपरेशन किया। मरीज बचा लिया गया।
मैने बहुत कोशिश की पुरानी याद को याद करने की । मगर जब डेट आदि बताई तो मुझे भी यकीन हुआ कि ऐसा कुछ हुआ था।
और भी कई ना भुलाई जाने वाली पुरानी यादें साझा की गई। अब थोड़ा उम्र का असर होने लगा है तो सोचा सांझा कर लूँ सभी के साथ। मौके पर लिया गया फैंसला यदि एक ज्यान को भी बचा पाता है एक डॉक्टर के जीवन में तो एक एहसास और विश्वास बढ़ता है डॉक्टर का।
मेरे साथ के हमसफ़र सभी डॉक्टरों को याद करते हुए | मुझे गर्व है अपनी यूनिट के उन सभी डॉक्टरों पर जो मरीजों की सेवा में लग्न हैं।
डॉ रणबीर
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'पानीपत की चौथी लड़ाई' साक्षरता आंदोलन की 1992 की रैली।
***पुरानी यादें***
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Dr O.P.Grewal
पन्द्राह साल हो लिए वे चले गए हमनै छोड़कै।।
उनहत्तर साल बिताए ज्ञान विज्ञान मैं जी तोड़कै।।
डॉ ओम प्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान की जनरल बॉडी मीटिंग में हिस्सेदारी करने का मौका मिला। बहुत सी पुरानी यादें भी ताजा हो गई। डॉ ग्रेवाल के व्यक्तित्व बारे कहने को शब्द नहीं हैं मेरे पास। बहुत ही उत्साहवर्धक मीटिंग रही।
6.6.1937.....24.1.2006
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पुरानी यादें---
मंत्री खुर्सीद अहमद जी :
खेल प्रतियोगिता इनाम वितरण समारोह मेडिकल कॉलेज रोहतक सन 1971 के आस पास ।
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डा• कृष्णा सांगवान,डा• सरोज मुदगिल,डा• सुखबीर सांगवान,डा• रणबीर सिंह दहिया,डा• रणबीर हुड्डा,डा• श्रीराम सिवाच ,डा• मुकेश इन्दौरा ,डा• कोहली।
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पुरानी यादें -- डॉ विकाश कथूरिया, डॉ विकास अग्रवाल, डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ सुनील , डॉ पूजा , डॉ कुलदीप, डॉ राजू राजन, डॉ दीपांशु और सभी कॉलीग्स -- आप सबको सलाम ।
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सिरसली स्वर्गीय संतोष के पोते की शादी में -20 अप्रैल, 2022.पुरानी यादें ताजा हो गई। चम्पा सिंह जी भी मिले।
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आज नित्यानंद स्कूल गया सप्तरंग के प्रोग्राम में तो प्रोफेसर जय सिंह मलिक का फोटो नजर आया। देखकर पुरानी यादें ताजा हो गई। बहुत ही नेक दिल इंसान और दोस्त ।
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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आज बहुत दिनों बाद एनोटमी विभाग के लेक्चर थिएटर  वन में 2 घण्टे के लिए जाने का मौका मिला । 1967 कि यादें ताजा हो गई । पुरानी यादें ; पुराने अध्यापक : डॉ इंदरजीत दीवान, डॉ इंद्रबीर सिंह , डॉ छिबर, डॉ गांधी, डॉ राठी याद आ गए। 67 बैच के साथी भी दिमाग में घूम गए । सुशील खुराना, आर एन कालरा, अशोक भाटिया, दयासागर गोयल, हरीश भंडारी , रमेश मित्तल, ईश्वर नासिर, रीटा गुलाटी, कर्मजीत कौर, कृष्णा सहरावत , स्वर्ण लता, विमला कादयान आदि आदि।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
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795 पिल्लर(टिकरी बॉर्डर) पर जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा 1 साल किसानों के लिए फ्री हेल्थ कैम्प का आयोजन । आज वहां से गुजरने का मौका मिला  तो पुरानी यादें ताजा हो गयी तो यह वीडियो बना लिया।
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भुली बिसरी यादें
सन 1956 की बात है की मेरे पिताजी चौधरी जागे राम सिरसा से बतोर इंस्पेक्टर एग्रीकल्चर की पोस्ट से  बतौर फार्म मैनेजर सरकारी एग्रीकल्चर फार्म रोहतक में तबादला हो कर आए। यह फार्म 100 एकड़ जमीन में बना सरकारी एग्रीकल्चर फार्म था , जिसमें हर तरह की खेती की जाती थी । चार जोड़ी हट्टे कट्टे बैल थे जो खेती करने में  बहुत कारगर रूप से इस्तेमाल किए जाते थे ।  पिताजी 1966 तक यहां पर रहे और यहीं से रिटायर हो गए।  आने वाले दिनों में यह फार्म नहीं रहा और जमीन कुछ बेच दी गई कुछ पर सरकारी दफ्तर खुलते गए और सरकारी अफसरों के रहने के लिये कोठियां और मकान बनते गए। सिरफ़ एग्रीकल्चर फार्म का मेन गेट बचा है जो कमिश्नर के  रेजिडेंस और दफ्तर दोनों यहां हैं, तक जाता है बाकि एग्रो मॉल इसकी जमीन में बना और कई कॉलोनी भी बन गई । बहुत से मकान हैं । दो पीपल के पेड़ आज भी पहचाने जा सकते हैं जो हमारे घर के सामने मौजूद थे। भूली बिसरी यादें हैं पूरे फॉर्म में घूमते थे। पिताजी बहुत सख्त मिजाज थे और फार्म के खेत से चूसने के लिए गन्ने भी नहीं लाने देते थे। बोहर वालों के खेतों से लेकर आते थे।  और चीजों का तो मतलब ही नहीं । यहीं से मैं बिल्कुल साथ लगता जाट स्कूल है वहां पर पढ़ने जाने लगा । पहले प्राइमरी स्कूल में पढ़ा  और फिर हाई स्कूल में छठी क्लास से हायर सेकेंडरी किया । बहुत सी यादें हैं उस दौर की जिन्हें याद करना इतना आसान नहीं है आज एक बार  कोशिश है उन पुरानी यादों को याद करने की।
प्राइमरी स्कूल में पहले एक ही टीचर थे मास्टर फतेह सिंह दलाल। तीसरी में हुए तो सूरजमुखी बहिनजी ने भी ज्वाइन कर लिया। पांचवी तक पहुंचे तो मास्टर दलजीत सिंह राठी जी भी क्लास लेने लगे।
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भूली बिसरी यादें
1978 में मेडिकल रोहतक में 98 दिन की हड़ताल हुई..उन दिनों चौधरी हरद्वारी लाल वाईस चांसलर थे। मेरे जीवन में बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई यह हड़ताल।
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वार्ड  6-- भूली बिसरी यादें
एक बार की बात की झरौट के बुजुर्ग अपनी घरवाली को लेकर आये । उसकी एक टांग में गैंग्रीन हो गई बायीं या दायीं याद नहीं। हमने सभी concerned विभागों की राय ली और यह तय हुआ कि amputation करनी होगी । ताऊ को समझाया। कटने की बात सुनकर दोनों घबरा गए । ताऊ मेरे कमरे में आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मैने बिठाया और उसकी और देखा। " काटनी ए पड़ैगी डॉ साहब। और कोए राह कोण्या इसकी ज्यान नै खतरा करदेगी या गैंग्रीन -- मैंने जवाब दिया बहुत धीमे से। ताऊ बोल्या-- न्यों कहवै सैं अक गुड़गांव मैं शीतला माता की धोक मारकै ठीक होज्यां हैं। मैंने कहा-- मेरी जानकारी में नहीं। ताऊ-- एक बार जाना चाहवैं सैं। फेर आपके डॉ न्यों बोले-- LAMA होज्या । छुट्टी कोण्या देवें । और फिर हमारे वार्ड में दाखिला नहीं हो सकता। चाहूँ सू आप के वार्ड मैं इलाज करवाना। मैने कहा एक शर्त है-- जै इसकी टांग धोक मारकै ठीक होज्या तो भी लियाईये और नहीं ठीक हो तो भी। ठीक होगी तो मैं बाकी के इसे मरीज भी वहीं गुड़गांव भेज दिया करूंगा और ठीक न हो तो आप ये सारी बात एक पर्चे में लिखकर बांटना कि वहां मेरी घरवाली ठीक नहीं हुई। हम ने discharge on request कर दिया । दो दिन बाद वापिस आ गया । महिला की हालत ज्यादा खराब हुई थी। खैर amputation ortho विभाग  के सहयोग से की और महिला ठीक होकर चली गयी । बुजुर्ग जाने से पहले आया कमरे में और कहने लगा-- पर्चा छापना चाहूँ सूँ फेर गांव वाले कह रहे हैं शीतला माता
के खिलाफ पर्चा। बहोत दबाव सै मेरे पै डॉ साहब । पैरों की तरफ हाथ किये । मैने बुजुर्ग को छाती से लगा लिया और आशीर्वाद देने को कहा।
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भुली बिसरी यादें -- मेडिकल कालेज वार्षिक खेल आयोजन--2012
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
जनवरी 2017
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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

कविताएं**

जिस्म में ताकत है हमारे यारो

सीनों में विरासत है हमारे यारो

फितरत में बगावत है हमारे यारो

समकतो.

काम में हिफाजत है हमारे यारो

पता तुम में हिमाकत है हमारे यारो

तुमसे ही आहत हैं हम हमारे यारो
****
याद तुम्हारी-साफगोई आती है यारो बेझिझकता तुम्हारा कद बढ़ाती है यारो तुम्हारी सलाह दिल में समाती है यारा समाज की उलभने सुलभाती है यारा
*****
आर्थिक मन्दी
आर्थिक मन्दी के दौर ने सताया हमको 
जेब ढीली कर दी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए 
आई टी के कई योद्धा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल भाता नाथा जिसको 
उसी से भीख मांगनी पड़ रही उनको 
पड़ सकता दिल पर बुरा असर बताया चिकित्सकों ने हाल में ऐसा भी फरमाया दिल के दौरे से कैसे आज बचा जाऐगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहुंचाएगा'
*****
छबके
छबके मारने ना आते तो आज तूं कामयाब नहीं 
बिना सिफारिस कहां नौकरी पूरा होवे ख्वाब नहीं 
छल कपट बिना होवे मानस का आज गुजारा ना 
बिना माला घालें कई हजार की नेता का सहारा ना 
भीतर काला बाहर सफेद‌ यो मुखौटा पहन लिया 
जिसके भीतर सफेद उसने ये कहर सहन किया 
सब कुछ बहग्या आज किसपै कोये यकीन करे
थोड़े घने बचे उनको ये सिस्टम घणा गमगीन करे 
बिना संघर्ष नहीं गुजारा रणबीर यो जान लियो 
मानवता एक दिन जीतैगी बात इतनी मान लियो ।।
*****
चरागे शाम
चरागे शाम ये जलाने का मौका आया यारो गरीब का घर बसाने का मौका आया यारो 
मंदी का दौर संकट है बेरोजगारी का देखो 
ये एकता पूरी दिखाने का मौका आया यारो 
अमीरी का भार गरीबों पे बढ़ाया जा रहा क्यों अपना विरोध जताने का मौका आया यारो 
अब तक लूटा जिन्होंने मानवता को दोस्तो उसकी नींद उड़ाने का मौका आया यारो 
इश्क और पशुता में फर्क क्या होता है यही 
अब दुनिया की बताने का मौका आया यारो 

*****
नीतियों के वार
तुमने किया हर बार नीतियों से वार ये 
जख्में दिल दिये हैं हमको बार बार ये 
नए अंदाज और नए तरीके हैं तुम्हारे 
पहले तो धीभी थी तेज हुई रफ्तार ये
सच न बताओ उसके काले कारनामों 
पर जल्दी पर्दा डालो कहती सरकार ये 
किसान की सब्सिडी पे डाका डाल रहे हैं 
आत्म हत्या कर रहा है उजड़ी बहार ये
रणबीर अब और क्या क्या गिनवाऊं मैं
पता है सारा इनको बनते हैं होशियार ये

*****
इंकलाब
मुझे इकलाब का मौसम लगा है तेरी आंखों में 
विश्वास है आगाज है और घटा है तेरी आंखों में 
न क्यों रस्क हो उस पर मुझे जिसने पैदा किया 
मुझे यह लगने लगा कुछ जुदा है तेरी आंखों में 
तेरा साथ बहुत कुछ आज मायने रखता है यारो 
मेरे मकसद का एक आसरा दिखे तेरी आंखों में
नजर भर देख लेने से उमंगे झूम जाती हैं यारो 
आहवान का खास सिलसिला है तेरी आखों में 
रणबीर देख रहे हैं इन्कलाब जिंदाबाद का नारा 
सुबह और शाम कैसे झलकता है तेरी आंखों में.

16.1.2009.
***
लालच में तेरा सब कुछ खो गया बंदे 
अकेलेपन का ठूंठ हरा हो गया बंदे 
अब दोस्तों को ढूंढ़ोगे यहां तुम यारो 
जिगरी था दोस्त तुम्हारा वो गया बंदे 
दया त्याग मानवता सब भुला दिए हैं 
उसे कैसे भुला दोगे जो चला गया बन्दे 
उसका वास्ता मत देना मक्कारो हमें 
वह भी तुम्हारे ही घर में सो गया बंदे 
गरीब हंस बोल लेता कभी कभी रोता 
वो आसुंओं से तेरा चेहरा धो गया बंदे
****
बच्चे तरुण युवा लड़‌की रह पायें वो गांव कहाँ 
गाँव में बसेवा नहीं तो बताओ हम जायें कहां 
गांव नहीं गांव रहे ना शहर ही बन पाए गांव 
पहला उजड़ गया है नया नजर न आये गांव एक दूजे के कन्धों पर पैर रखते जा रहे देखो 
मानवता खोती जा रही काले बादल छा रहे देखो 
पैसा मंजिल बन गया बाजार यहां आया देखो 
खाओ पियो मौज करो नशा कैसा छाया देखो 
तुम्हें गैरो से कब फुरसत हम ग़म से न खाली 
हमारी चाहत छोड़ के गैरों से दोस्ती निभाली 
चलो आज की दुनिया में हमऑउट डेट हुए हमोर बंद दरवाजे हैं तुम्हारे खुले सब गेट हुए

******
यह तो कभी सोचा ही नहीं था 
दुश्मन से लड़ते लड़ते एक दिन 
हम खुद आपस में भिड़ जायेंगे 
हमारी कमजोरी या चाल उनकी 
क्या हम असलियत समझ पायेंगे 
सोचना बैठ कर ठण्डे दिमाग से 
कब कदम से कदम मिलायेंगे
****
"अमरीका के बारे में
 जानते हो?  
 साफ-सफाई है
 ऊंची ऊंची इमारते हैं
बिजली कभी गुल नहीं होती 
काम करवाने का पैसा 
देना नही पड़ता है 
बहुत उन्नतशील है अमरीका 
पशुओं को गेहूं  खिलाता है 
फिर  पशुओं को खुद खाता है
छोटी मच्छलियों को पालता है
 फिर उन्हें बड़ी मच्छलियों को
 खिलाता है हंसते हंसते 
जब इससे भी काम नहीं चलता 
तो आतंक फैलाता है या फिर 
फैलवाता है 
युद्ध करता है युद्ध करवाता है 
हथियार दोनों को बेचता है
अमरीका 
उसे क्या  मां की कोख खाली 
होती है तो हो चाहे वह 
इस पार की मां है या उस पार की 
जैसे अब पाकिस्तान और 
 हिन्दुस्तान दोनों को बेच रहा है 
अपने हथियार अमरीका, 
अपने परांठे सेक रहा है 
अब पाकिस्तान हिन्दु‌स्तान 
लड़ें या न लड़ें उसने तो अपने 
हथियारों का सौदा कर ही लिया 
इसकी चाल समझना है मुश्किल
दिमाग हो तो समझें चाल हम
इसे तो गिरवी रख दिया हमने
अपने परम परमेश्वर भगवान 
के पास
आस्था सवाल नहीं चाहती
सोचना नहीं चाहती
मगर अपने तौर पर सोचना
एक न एक दिन पड़ेगा हम सबको
उस दिन अमरीका के बारे में 
बहुत जान चुके होंगे हम।

******
      दूसरी दुनिया संभव है
सड़कों पर मजदूर आए थे
दूर दूर से पूरे भारत देश के
साथ ही बुद्धिजीवी भी आए थे
कोई इंजीनियर कोई डॉक्टर
कोई कोई समाज शास्त्री
'सब रंगों का था समावेश 
भारत देश हमारा देश '
' बिना महिला सहयोग के
हमारा विकास अधूरा है '
' साक्षरता हम वंचितों का
एक पैना हथियार है '
इन सब नारों की गूंज
सुनाई दी रांची शहर में
एक नई दुनिया की बात 
कई तरह से की गई वहां
जहां गरीब अमीर की
जात गौत और नात की
नाबराबरी लिंग अनुपात की
जहां ऊंच और नीच की 
जहां ज्ञान के बंटवारे की
बात बीमारी के इलाज की
असमानताएं खत्म होती
जायें
मानव मानव को न चूसे 
जिस दुनिया में वह दुनिया
संभव है
हम सब की एकता के दम
इसे लड़कर हासिल किया
जा सकता है
लगता बड़ा आसान है 
मगर उतना ही मुश्किल
काम है यह.. कैसे
अमीर ने जाल फैलाया
परम्परा का इज्जत का 
जात पात और धर्म का
प्राचीन संस्कृति का
इस या उस मजहब का
और बांट कर रख दिया 
इस चाल को जिस दिन 
हम समझ गए तो
फिर दूसरी दुनिया का
सपना हमारा जल्दी 
बहुत ही जल्दी 
पूरा होगा जरूर
20.12.08
रांची

******
पिछले कुछ साल से 
मौसम का मिजाज बदलता 
जा रहा है
इसका सबसे अधिक असर 
किसानों पर पड़ रहा है
सूखे के लंबे दौर
लगातार बाढ़, कम होती
यह अनियमित वर्षा 
भयानक ओलावृष्टि होना
टिड्डियां का अचानक हमला
किसानों की कमर तोड़ दी है
हालांकि सामुदायिक प्रयास 
रास्ता दिखा सकते हैं
मगर....
उनकी रक्षा के लिए सरकारी
समर्थन और संरक्षण बहुत
जरूरी है
इससे किसान बचेगा तो
उद्योग बचेगा
उद्योग बचेगा तो
भारत महान बचेगा....

********
*दो बेरोजगार (पति -पत्नी)*
 बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सटीक समीक्षा करना।  
बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सही तरफदारी करना। 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के 
प्रति मन से करुणा  दिखाना । 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति 
असल में आंसू बहाना ।

मगर बहुत मुश्किल है 
मेरी जिंदगी जीना। 
स्कूल से आगे बढ़कर 
फिर कॉलेज में जाना होगा 
इसके सपने 
 बहुत बार देखे थे मैंने । 
कौन से कॉलेज में दाखिला हो 
कई बार सोचा था मैंने यह भी। 
एक साल पहले सोचना शुरू किया  कि 
पहले दिन का पहनावा 
क्या होगा 
मेरा कालेज में ? 
हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी। 
सोचा क्या साइकिल पर ही मुझे 
कॉलेज जाना होगा हर रोज? 
या फिर घरवाले सेकंड हैंड 
स्कूटर का जुगाड़ कर देंगे। 

घर की हालत जुगाड़बाजी 
करने की भी कहां थी। 
यह बात नहीं मेरे भेजे के 
अंदर घुस रही थी। 
इसी उधेड़बुन में पूरा का पूरा दिन 
जुगाड़ बाजी के चक्कर में गुजर जाता। 
आखिर एक दिन 5 लोग आए थे 
हमारे घर में। 
उनकी बहुत आवभगत हुई थी। 
उन लोगों ने मेरे से भी पूछा- -
'बेटी कौन सी क्लास पास की है?' 
दूसरा सवाल था उनका -'कितने नंबर आए' 
मैंने धीमी से अपने नंबर बता दिए थे। 
उनकी नजरें मुझे घूरती 
सी महसूस हुई 
जैसे बकरे को उसके 
मारने से पहले कसाई 
उसे अपनी नजरों में से 
निकाल कर देखता है, 
उसी तरह का माहौल सा लगा मुझे । 
और इसके बाद कसाई 
बकरे को हलाल कर ही देता है। 
मुझे क्या पता था कि मेरा भी 
हलाल होने का वक्त आ गया है। 
और एक महीने के बाद ही 
मेरी शादी कर दी गई । 
एक और बेरोजगार के साथ ।

 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने क्या 
आप सोच सकते हो कि कैसे होंगे? 
हमने भी सोचने की कोशिश की थी 
खूब आगे का रास्ता देखने की। 

पर मैं नहीं देख पाई क्योंकि 
अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई 
नहीं दे रहा था । 
उनकी 2 एकड़ से भी कम जमीन थी। 
'भूखे घर की आ गई।' 
'हम क्या करें?' 
'यह दिन देखने के लिए क्या
 छोरे को जन्म दिया था?'
 दाएं बाएं से परिवार वालों से 
यह सब सुनने को मिलता था। 
तब पता लगा कि सपने 
और हकीकत में कितना 
फर्क होता है। 
प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी 
सब अतीत की बातें थीं। 
घर भी तंग से बस दो ही कमरे थे । 
साथ में भैंस व बछिया का भी 
सहवास 24 घंटे का। 
समझ  सकता है कोई भी 
के दो कमरों में छह सात 
सदस्यों के परिवार का 
कैसे गुजारा होता है? 
कहां फुर्सत होती है एक दूसरे के लिए । 
चोरों की तरह मुलाकात होती हैं 
अपने ही घर में। 
बस जीवन तो घिसट रहा है हमारा। 
एक दिन सोचा इस नरक से 
कैसे छुटकारा मिले? 
मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत 
कहां। 
घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत 
और तान्ने । 
यही तो जिंदगी है हमारे जैसे 
करोड़ों युवक और युवतियों की 
भारत में। 
कभी-कभी जीवन लीला को 
खत्म करने का मन करता है । 
फिर ख्याल आता है कि 
इससे क्या होगा? 
किससे होगा? 
यही तो सवाल है सबसे बड़ा
 कि सही रास्ता क्या है?
दो चार दिन का रोना धोना
फिर खेल खत्म
और यह सिलसिला यूं ही 
चलता रहेगा
इस अंधेरे को कैसे खत्म  किया 
जाये?
कैसे रोशनी की किरण 
हम तक भी पहुंच सके
यही तो यक्ष प्रश्न है
बहुत बार सोचा 
कई बार सोचा है
मगर रास्ता नजर नहीं आता 
हमें 
बस इसी कामोकश में जीवन
किसी तरह गुजर रहा है हमारा
जीवन सरक रहा है हमारा
 रणबीर

*******
आपात स्थिति के आज हालत बने
फासीवाद से कब हमारी मुलाकात बने
और कोई चारा बचा नहीं लगता यारो
संभलो इससे पहले कि दिन रात बने।
मगर फासीवाद से लड़ना आसान कहां 
पहले समझें इसको फिर कोई बात बने।
बोले विरोध में तो एन आई ए आए
घर पर फिर संकट के हालत बने।
*******
गधे की तरह काम करवाया 
हाथ में चालीस रुपया पकड़ाया
पूरा दिन और इतने कम पैसे 
मजदूर ने मालिक से फरमाया
ठीक किया तुमने न्याय मांगा है
मैनेजर ने तुरत मैनेजर बुलवाया
पैसे वापिस लो इसी वक्त और
इसे 'घास डालो' का फरमान सुनाया
*******
मंदी के दौर में भी एक नया दौर लाएंगे।।  
आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटाएंगे।। 
नएपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है 
इंसानियत बाजार में हर एक होता जा रहा है  
परचम इंसानियत का हम फिर फैहराएंगे।। 
भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है 
छिपा अपनी कमजोरी कर झूठा सॉन्ग रहा है 
जनता करे कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचाएंगे।। 
हाशिए पर फैंके गए जो उनका जमाना आएगा 
अपना हक पाने को नागरिक समाज बनाएगा 
बढ़े कदम नए साल में आगे बढ़ते जाएंगे।। 
नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है 
जात-पात गोत नात क्यों अपने रंग दिखाता है 
नए दौर की आशा से निराशा से लड़ पाएंगे।।
*******
किसी के कान में कही गई बात 
हजारों मील दूर तक सुनाई पड़ती है 
धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले 
गलत मत बोल कोई सुन न ले 
लेकिन फिर भी हर कोई सुन लेता है 
और वही राज की बात घूमती घूमती 
फिर आपके कानों में आ पड़ती है 
आप हैरान होते हैं कि यह कैसे हुआ 
इसे कहते हैं गॉशिप  या कहे चुगली 
जो आपसे गॉशिप करता है वह 
आपके बारे में भी गॉसिप करेगा।

*****
हरियाणा विकास
मॉडल बना है ये विकास में 
हरियाणा नम्बर वन हो रहा
कैसे बस कुछ ना पूछो भाई
पिछलों को सबको धो रहा
सब ही निडर घूम रहे हैं यहाँ
ये भ्रष्टाचार यहाँ से खो रहा 
शिक्षा ने उचाईयां छू ली हैं
बहुत उम्दा और कीमती है
जिसका भार गरीब ढो रहा
सेहत मान और पहलवान 
दुनिया में किया है गुनगान
भले अनीमिया और ज्यादा
गर्भवती औरत को डुबो रहा
हरियाणा नम्बर वन हो रहा 
फसल के दाम सबसे ज्यादा
मिलते हैं निठ्ठले किसान को
जमीन बेचो फायदा उठाओ
ये मंत्र दिया है हर इंसान को 
फिर भी क्यों किसान रो रहा
यह कोई नहीं जानता है कि
पिछले पांच साल के अन्दर
हमने विश्व बैंक से कितना 
लोन लिया है बताये तो कोई
बीएड कालेज धड़ाधड़ खुले
फीसें मनमर्जी की ली गयी
शिक्षक और छात्र भी बैठ के
कक्षा में रोज मजे से सो रहा

****
जिस्म में ताकत है हमारे यारो

सीनों में विरासत है हमारे यारो

फितरत में बगावत है हमारे यारो

समकतो.

काम में हिफाजत है हमारे यारो

पता तुम में हिमाकत है हमारे यारो

तुमसे ही आहत हैं हम हमारे यारो
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याद तुम्हारी-साफगोई आती है यारो बेझिझकता तुम्हारा कद बढ़ाती है यारो तुम्हारी सलाह दिल में समाती है यारा समाज की उलभने सुलभाती है यारा
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आर्थिक मन्दी
आर्थिक मन्दी के दौर ने सताया हमको 
जेब ढीली कर दी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए 
आई टी के कई योद्धा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल भाता नाथा जिसको 
उसी से भीख मांगनी पड़ रही उनको 
पड़ सकता दिल पर बुरा असर बताया चिकित्सकों ने हाल में ऐसा भी फरमाया दिल के दौरे से कैसे आज बचा जाऐगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहुंचाएगा'
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छबके
छबके मारने ना आते तो आज तूं कामयाब नहीं 
बिना सिफारिस कहां नौकरी पूरा होवे ख्वाब नहीं 
छल कपट बिना होवे मानस का आज गुजारा ना 
बिना माला घालें कई हजार की नेता का सहारा ना 
भीतर काला बाहर सफेद‌ यो मुखौटा पहन लिया 
जिसके भीतर सफेद उसने ये कहर सहन किया 
सब कुछ बहग्या आज किसपै कोये यकीन करे
थोड़े घने बचे उनको ये सिस्टम घणा गमगीन करे 
बिना संघर्ष नहीं गुजारा रणबीर यो जान लियो 
मानवता एक दिन जीतैगी बात इतनी मान लियो ।।
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चरागे शाम
चरागे शाम ये जलाने का मौका आया यारो गरीब का घर बसाने का मौका आया यारो मंदी का दौर संकट है बेरोजगारी का देखो ये एकता पूरी दिखाने का मौका आया यारो 
ऐस का भार गरीबों पर बढ़ाया जा रहा क्यों अपना विरोध जताने का मौका आया यारो अब तक लूटा जिन्होंने मानवता को दोस्तो उसकी नींद उड़ाने का मौका आया यारो इश्क और पशुता में फर्क क्या होता है यही अब दुनिया की बताने का मौका आया यारो 

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नीतियों के वार
तुमने किया हर बार नीतियों से वार ये 
जख्में दिल दिये हैं हमको बार बार ये 
नए अंदाज और नए तरीके हैं तुम्हारे 
पहले तो धीभी थी तेज हुई रफ्तार ये।।
सत्यम बताओ उसके काले कारनामों पर जल्दी पर्दा डालो तुम कहती सरकार ये ।।
किसान की सब्सिडी पर डाका डाल रहे हैं आत्म हत्या कर रहा है उजड़ी बहार ये
रणबीर अब और क्या क्या गिनवाऊं मैं
पता है सारा इनको बनते हैं होशियार ये।।

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इंकलाब

मुझे इकलाब का मौसम लगा है तेरी आंखों में 
विश्वास है आगाज है और घटा है तेरी आंखों में 
न क्यों रस्क हो उस पर मुझे जिसने पैदा किया 
मुझे यह लगाने लगा कुछ जुदा है तेरी आंखों में 
तेरा साथ बहुत कुछ आज मायने रखता है यारो 
मेरे मकसद का एक आसरा दिखे तेरी आंखों मे 
नजर भर देख लेने से उमंगे झूम जाती हैं यारो 
आहवान का खास सिलसिला है तेरी आखों में 
रणबीर देख रहे हैं इन्कलाब जिंदाबाद का नारा 
सुबह और शाम कैसे झलकता है तेरी आंखों में.

16.1.2009.
***
लालच में तेरा सब कुछ रखो गया बंदे अकेलेपन का ठूंठ हरा हो गया बंदे 
अब दोस्तों को ढूंढ़ोगे यहां तुम यारो 
जिगरी था वो दोस्त तुम्हारा गया बंदे 
दया त्याग भानवता सब भुला दिए हैं 
उसे कैसे भुला दोगे जो चला गया बन्दे उसका वास्ता मत देना मक्कारो हमें 
वह भी तुम्हारे ही घर में सो गया बंदे 
गरीब हंस बोल लेता कभी कभी रोता 
वो आसुंओं से तेरा चेहरा धो गया बंदे।
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बच्चे तरुण युवा लड़‌की रह पायें वो गांव कहाँ 
गाँव में बसेवा नहीं तो बताओ हम जायें कहां 
गांव नहीं गांव रहे ना शहर ही बन पाए गांव 
पहला उजड़ गया है नया नजर न आये गांव एक दूजे के कन्धों पर पैर रखते जा रहे देखो 
मानवता खोती जा रही काले बादल छाते  जा रहे देखो 
पैसा मंजिल बन गया बाजार यहां आया देखो 
खाओ पियो मौज करो नशा कैसा छाया देखो 
तुम्हें गैरो से कब फुरसत हरु ग़म से न खाली 
हमारी चाहत छोड़ के गैरौ से दोस्ती निभाली 
चलो आज की दुनिया में हमऑउट डेट हुए हमोर बंद दरवाजे हैं तुम्हारे खुले सब गेट हुए

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यह तो कभी सोचा ही नहीं था 
दुश्मन से लड़ते लड़ते एक दिन 
हम खुद आपस में भिड़ जायेंगे 
हमारी कमजोरी या चाल उनकी 
क्या हम असलियत समझ पायेंगे 
सोचना बैठ कर ठण्डे दिमाग से 
कब कदम से कदम मिलायेंगे
****
"अमरीका के बारे में

 जानते हो?  
 साफ-सफाई है
 ऊंची ऊंची इमारते हैं
बिजली कभी गुरु रही होती 
काम करवाने का पैसा 
देना नही पड़ता है 
बहुत उन्नतशील है अमरीका 
पशुओं को गेहूं  खिलाता है 
फिर  पशुओं को खुद खाता है
छोटी मच्छलियों को पालता है
 फिर उन्हें बड़ी मच्छलियों को
 खिलाता है हंसते हंसते 
जब इससे भी काम नहीं चलता 
तो आतंक फैलाता है या फिर 
फैलवाता है 
युद्ध करता है युद्ध करवाता है 
हथियार दोनों को बेचता है
अमरीका 
उसे क्या  मां की कोख खाली 
होती है तो हो चाहे वह 
इस पार की मां है या उस पार की 
जैसे अब पाकिस्तान और 
 हिन्दुस्तान दोनों को बेच रहा है 
अपने हथियार अमरीका, 
अपने परांठे सेक रहा है 
अब पाकिस्तान हिन्दु‌स्तान 
लड़ें या न लड़ें उसने तो अपने 
हथियारों का सौदा कर ही लिया 
इसकी चाल समझना है मुश्किल
दिमाग हो तो समझें चाल हम
इसे तो गिरवी रख दिया हमने
अपने परम परमेश्वर भगवान 
के पास
आस्था सवाल नहीं चाहती
सोचना नहीं चाहती
मगर अपने तौर पर सोचना
एक न एक दिन पड़ेगा हम सबको
उस दिन अमरीका के बारे में 
बहुत जान चुके होंगे हम।

******
दूसरी दुनिया संभव है
सड़कों पर मजदूर आए थे
दूर दूर से पूरे भारत देश के
साथ ही बुद्धिजीवी भी आए थे
कोई इंजीनियर की डॉक्टर
कोई कोई समाज शास्त्री
'सब रंगीन का समावेश 
भारत देश हमारा देश '
' बिना महिला सहयोग के
हमारा विकास अधूरा है '
' साक्षरता हम वंचितों का
एक पैना हथियार है '
इन सब नारों की गूंज
सुनाई दी रांची शहर में
एक नई दुनिया की बात 
कार्यवतरह से की गई वहां
जहां गरीब अमीर की
जात गौत और नात की
नाबराबरी लिंग अनुपात की
जहां ऊंच और नीच की 
जहां ज्ञान के बंटवारे की
खान बीमारी के इलाज की
असमानताएं खत्म होती
जायें
मानव मानव की न चूसे 
जिस दुनिया में वह दुनिया
संभव है
हम सब की एकता के दम
इसे लड़कर हासिल किया
जा सकता है
लगता बड़ा आसान है 
मगर उतना ही मुश्किल
काम है यह.. कैसे
अमीर ने जाल फैलाया
परम्परा का इज्जत का 
जात पात और धर्म का
प्राचीन संस्कृति का
इस या उस मजहब का
और बांट कर रख दिया 
इस चाल को जिस दिन 
हम समझ गए तो
फिर दूसरी दुनिया का
सपना हमारा जल्दी 
बहुत ही जल्दी 
पूरा होगा जरूर
20.12.08
रांची

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पिछले चार पांच साल से 
मौसम का मिजाज बदलता 
जा रहा है
इसका सबसे अधिक असर 
किसानों पर पड़ रहा है
सूखे के लंबे दौर
लगातार बाढ़, कम होती
यह अनियमित वर्षा 
भयानक ओलावृष्टि होना
टिड्डियां का अचानक हमला
किसानों की कमर तोड़ दी है
हालांकि सामुदायिक प्रयास 
रास्ता दिखा सकते हैं
मगर....
उनकी रक्षा के लिए सरकारी
समर्थन और संरक्षण बहुत
जरूरी है
इससे किसान बचेगा तो
उद्योग बचेगा
उद्योग बचेगा तो
भारत महान बचेगा....

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*दो बेरोजगार (पति -पत्नी)
 बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सटीक समीक्षा करना।  
बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सही तरफदारी करना। 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के 
प्रति मन से करुणा  दिखाना । 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति 
असल में आंसू बहाना ।

मगर बहुत मुश्किल है 
मेरी जिंदगी जीना। 
स्कूल से आगे बढ़कर 
फिर कॉलेज में जाना होगा 
इसके सपने 
 बहुत बार देखे थे मैंने । 
कौन से कॉलेज में दाखिला हो 
कई बार सोचा था मैंने यह भी। 
एक साल पहले सोचना शुरू किया  कि 
पहले दिन का पहनावा 
क्या होगा 
मेरा कालेज में ? 
हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी। 
सोचा क्या साइकिल पर ही मुझे 
कॉलेज जाना होगा हर रोज? 
या फिर घरवाले सेकंड हैंड 
स्कूटर का जुगाड़ कर देंगे। 

घर की हालत जुगाड़बाजी 
करने की भी कहां थी। 
यह बात नहीं मेरे भेजे के 
अंदर घुस रही थी। 
इसी उधेड़बुन में पूरा का पूरा दिन 
जुगाड़ बाजी के चक्कर में गुजर जाता। 
आखिर एक दिन 5 लोग आए थे 
हमारे घर में। 
उनकी बहुत आवभगत हुई थी। 
उन लोगों ने मेरे से भी पूछा- -
'बेटी कौन सी क्लास पास की है?' 
दूसरा सवाल था उनका -'कितने नंबर आए' 
मैंने धीमी से अपने नंबर बता दिए थे। 
उनकी नजरें मुझे घूरती 
सी महसूस हुई 
जैसे बकरे को उसके 
मारने से पहले कसाई 
उसे अपनी नजरों में से 
निकाल कर देखता है, 
उसी तरह का माहौल सा लगा मुझे । 
और इसके बाद कसाई 
बकरे को हलाल कर ही देता है। 
मुझे क्या पता था कि मेरा भी 
हलाल होने का वक्त आ गया है। 
और एक महीने के बाद ही 
मेरी शादी कर दी गई । 
एक और बेरोजगार के साथ ।

 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने क्या 
आप सोच सकते हो कि कैसे होंगे? 
हमने भी सोचने की कोशिश की थी 
खूब आगे का रास्ता देखने की। 

पर मैं नहीं देख पाई क्योंकि 
अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई 
नहीं दे रहा था । 
उनकी 2 एकड़ से भी कम जमीन थी। 
'भूखे घर की आ गई।' 
'हम क्या करें?' 
'यह दिन देखने के लिए क्या
 छोरे को जन्म दिया था?'
 दाएं बाएं से परिवार वालों से 
यह सब सुनने को मिलता था। 
तब पता लगा कि सपने 
और हकीकत में कितना 
फर्क होता है। 
प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी 
सब अतीत की बातें थीं। 
घर भी तंग से बस दो ही कमरे थे । 
साथ में भैंस व बछिया का भी 
सहवास 24 घंटे का। 
समझ  सकता है कोई भी 
के दो कमरों में छह सात 
सदस्यों के परिवार का 
कैसे गुजारा होता है? 
कहां फुर्सत होती है एक दूसरे के लिए । 
चोरों की तरह मुलाकात होती हैं 
अपने ही घर में। 
बस जीवन तो घिसट रहा है हमारा। 
एक दिन सोचा इस नरक से 
कैसे छुटकारा मिले? 
मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत 
कहां। 
घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत 
और तान्ने । 
यही तो जिंदगी है हमारे जैसे 
करोड़ों युवक और युवतियों की 
भारत में। 
कभी-कभी जीवन लीला को 
खत्म करने का मन करता है । 
फिर ख्याल आता है कि 
इससे क्या होगा? 
किससे होगा? 
यही तो सवाल है सबसे बड़ा
 कि सही रास्ता क्या है?
दो चार दिन का रोना धोना
फिर खेल खत्म
और यह सिलसिला यूं ही 
चलता रहेगा
इस अंधेरे को कैसे खत्म  किया 
जाये?
कैसे रोशनी की किरण 
हम तक भी पहुंच सके
यही तो यक्ष प्रश्न है
बहुत बार सोचा 
कई बार सोचा है
मगर रास्ता नजर नहीं आता 
हमें 
बस इसी कामोकश में जीवन
किसी तरह गुजर रहा है हमारा
जीवन सरक रहा है हमारा
 रणबीर

*******
आपात स्थिति के आज हालत बने
फासीवाद से कब हमारी मुलाकात बने
और कोई चारा बचा नहीं लगता यारो
संभलो इससे पहले कि दिन रात बने।
मगर फासीवाद से लड़ना आसान कहां 
पहले समझें इसको फिर कोई बात बने।
बोले विरोध में तो एन आई ए आए
घर पर फिर संकट के हालत बने।
*******
गधे की तरह काम करवाया 
हाथ में चालीस रुपया पकड़ाया
पूरा दिन और इतने कम पैसे 
मजदूर ने मालिक से फरमाया
ठीक किया तुमने न्याय मांगा है
मैनेजर ने तुरत मैनेजर बुलवाया
पैसे वापिस लो इसी वक्त और
इसे 'घास डालो' का फरमान सुनाया
*******
मंदी के दौर में भी एक नया दौर लाएंगे।।  
आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटाएंगे।। 
नएपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है 
इंसानियत बाजार में हर एक होता जा रहा है  
परचम इंसानियत का हम फिर फैहराएंगे।। 
भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है 
छिपा अपनी कमजोरी कर झूठा सॉन्ग रहा है 
जनता करे कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचाएंगे।। 
हाशिए पर फैंके गए जो उनका जमाना आएगा 
अपना हक पाने को नागरिक समाज बनाएगा 
बढ़े कदम नए साल में आगे बढ़ते जाएंगे।। 
नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है 
जात-पात गोत नात क्यों अपने रंग दिखाता है 
नए दौर की आशा से निराशा से लड़ पाएंगे।।
*******
किसी के कान में कही गई बात 
हजारों मील दूर तक सुनाई पड़ती है 
धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले 
गलत मत बोल कोई सुन न ले 
लेकिन फिर भी हर कोई सुन लेता है 
और वही राज की बात घूमती घूमती 
फिर आपके कानों में आ पड़ती है 
आप हैरान होते हैं कि यह कैसे हुआ 
इसे कहते हैं गॉशिप  या कहे चुगली 
जो आपसे गॉशिप करता है वह 
आपके बारे में भी गॉसिप करेगा।

*****
हरियाणा विकास
मॉडल बना है ये विकास में 
हरियाणा नम्बर वन हो रहा
कैसे बस कुछ ना पूछो भाई
पिछलों को सबको धो रहा
सब ही निडर घूम रहे हैं यहाँ
ये भ्रष्टाचार यहाँ से खो रहा 
शिक्षा ने उचाईयां छू ली हैं
बहुत उम्दा और कीमती है
जिसका भार गरीब ढो रहा
सेहत मान और पहलवान 
दुनिया में किया है गुनगान
भले अनीमिया और ज्यादा
गर्भवती औरत को डुबो रहा
हरियाणा नम्बर वन हो रहा 
फसल के दाम सबसे ज्यादा
मिलते हैं निठ्ठले किसान को
जमीन बेचो फायदा उठाओ
ये मंत्र दिया है हर इंसान को 
फिर भी क्यों किसान रो रहा
यह कोई नहीं जानता है कि
पिछले पांच साल के अन्दर
हमने विश्व बैंक से कितना 
लोन लिया है बताये तो कोई
बीएड कालेज धड़ाधड़ खुले
फीसें मनमर्जी की ली गयी
शिक्षक और छात्र भी बैठ के
कक्षा में रोज मजे से सो रहा
*****

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

भगत सिंह तूं जिंदा है

भगतसिंह तू जिंदा है,
*****************

   ,,, मुनेश त्यागी 

भगतसिंह तू जिंदा है, 
हर इंकलाब के नारे में, 
हर एक लहू के कतरे में, 
सूरज की सारी किरणों में, 
हवा  के  सारे  झोंकों  में, 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है 
हां,भगतसिंह तू जिंदा है।

साइमन गो बैक के नारों में, 
किताबों  की इबारत  में, 
ऐसेंम्बली में फैंके पर्चों में, 
मैं नास्तिक क्यों के विचारों में, 
भगवान से किये सवालों में,
हर एक लहू के  कतरे में, 
हर इंकलाब  के  नारे  में 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां, भगतसिंह तू जिंदा है।

जेबों में भरी किताबों में, 
समाजवाद  के  नारों  में, 
अछूत समस्या से निदानों में, 
साम्प्रदायिकता के इलाजों में, 
खेतों में  और खलिहानों में, 
हर एक लहू के  कतरे  में, 
हर इंकलाब  के  नारे  में, 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां, भगतसिंह तू जिंदा है।

आजादी के सब नारों में, 
अपनी कही हुई बातों में, 
किसानों  में, मजदूरों  में, 
लिखे हुए अपने लेखों में, 
हर एक लहू के कतरे में, 
हर इंकलाब के  नारे  में,
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां ,भगतसिंह तू जिंदा है।

जंजीरों में, हथकडियों  में
इंकलाब की सब लडियों में, 
अभियानों में, अरमानों में 
जमीन और असमानों में, 
हर एक लहू के कतरे  में, 
हार इंकलाब के नारों  में, 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां, भगतसिंह तू जिंदा है .

मेरा नाम कबाड़ी

मेरा नाम है कबाड़ी
लेखक..सुभाष
अरविन्द स्टेशन के सामने पत्थर पर बैठा बीड़ी के सुट्टे लगा रहा था। कमर के पीछे प्लास्टिक का बड़ा थैला। थैले में खाली बोतलें और थोड़ा बहुत दूसरा कचरा। कई बार जेल हो आया। हालाँकि आश्रम को भी जेल ही कहता है। कई साल पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक गाँव से भाग आया था। परिवार में 7 बहन-भाई। पिता छोटे-मोटे सामान की फेरी लगाता है। पिता को शराब की लत थी। पिता शाम को शराब पीकर आता और बच्चों की पिटाई करता।
बचपन से स्कूल का मुँह नहीं देखा। एक कमरे का मकान। गली में सोना पड़ता था। अपने जैसे और बच्चों के साथ खेलता। पैरों में चप्पल नहीं। फटी बनियान और एक कच्छी। बीड़ी पीने की लत 10-11 साल की उम्र में ही लग गई। इधर-उधर बैठे बच्चे अपने-अपने घर-परिवार की चर्चा करते। घर के हालात पर बात करते। एक-दूसरे की पिटाई का जिक्र होता। आज परिवार में कौन पिटा। एक दिन कुछ दोस्तों के साथ घर से भाग आया। पकड़ा गया और जेल (आश्रम) में डाल दिया गया। फिर गाँव से आकर कोई छुड़वा कर ले गया। लेकिन गाँव में क्या करे? स्कूल में जाने के लिए कपड़े और पैसे नहीं थे। घर में फिर वही मार-पिटाई का सिलसिला। खाने के लाले। बाप शराबी। फिर गाँव से निकल लिया। गाँव में भी गली में सोना पड़ता था। यहाँ भी फुटपाथ पर सोना पड़ता है।

अरविन्द बड़े रौब से कहता है, "पुलिस से तो अपनी यारी है। कई बार पकड़ कर जेल में बंद किया। फिर छोड दिया। 70-80 रुपये कमाता हूँ। सारे अपनी मर्जी से खर्च कर लेता हूँ। मेरे पास सामान के नाम पर कुछ नहीं। कभी माँग कर खा लेता हूँ। कभी पैसे से खा लेता हूँ।" अरविन्द को कई-कई दिन नहाने की जरूरत नहीं है। वह कहता है- "सर्दियाँ तो बिना नहाए ही निकल जाती हैं। गर्मियों में स्टेशन पर कभी-कभी दिन में नहा लेता हूँ।"

"अपना घर याद नही आता?" इस सवाल के जवाब में वह कहता है- "था ही क्या घर में? न समय पर खाना मिलता था, न सोने की जगह। पिटाई मुफ्त में।"

नशे की बात चली तो थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसने बताया, "कभी-कभी शराब की बोतलों में थोड़ी बहुत शराब भी मिल जाती है। पी लेता हूँ। पर शराब का आदी नहीं हूँ।" देर शाम को कई बार अरविन्द शराबियों के अड्डे के पास बैठ जाता है कि खाली बोतल मिल जाएँगी थोड़ी बहुत किसी बोतल में शराब भी मिल जाए। बहुत बार ऐसा भी हुआ कि शराबियों ने उसकी पिटाई भी की। उनको शक था कि चोरी की फिराक में बैठा है। पिटना, अपमान सहना, गालियाँ खाना उसे असहज नह करता। उसे कोई अपना भी तो नहीं लगता। अपने लगते हैं तो उसके साथ
कूड़ा बीनने वाले। बस वही अपने हैं. उन्हीं के साथ बैठना। उन्हीं के साथ बातें करना और उन्हीं के साथ कहीं भी सो जाना।

उसने बताया- "शाम को हम सारे बच्चे स्टेशन पर मिल लेते हैं। अपनी-अपनी कमाई का हिसाब लगाते हैं। किसी की 60 रुपये तो किसी की 80 रुपये। स्टेशन के पास अपनी-अपनी जगह तय कर रखी है सोने के लिए। रात को सीमेंट का खाली कट्टा या प्लास्टिक की थैली बिछाकर सभी लाइन में सो जाते हैं। वे कहीं भी सो जाते हैं। उन्हें कुछ भी खो जाने का डर नहीं है। कुछ पास हो तभी तो गुम होगा। इस सवाल के जवाब में कि रात को मच्छर काटते होगें? वह कहता है "नींद में मच्छरों को जहाँ काटते हैं वहीं मसल कर मार देता हैं। हाँ बारिश के दिनों में रात को काफी दिक्कत होती है। कई बार सोने की जगह ही नहीं मिलती।"

जब अरविन्द से बातचीत हो रही थी. तभी वहाँ दो-तीन बच्चे और आ जाते हैं। ऐसा लगा कि सारे अरविन्द के भाई ही होंगे। उसने बताया कि सब अलग-अलग प्रदेश के हैं। अलग-अलग प्रदेश का मतलब था कि उत्तर प्रदेश के ही अलग-अलग शहरों के बच्चे थे।
कुछ के पैरों में फटे हुए जूते थे, जो उनके पैरों के साइज से बड़े थे। किसी ने कबाड़ में फेंक दिए होंगे। ऐसे फेंके हुए जूते अरविन्द जैसे बच्चों के काम आ जाते हैं। शादी-ब्याह के दौरान बाहर फेंका हुआ खाना भी मिल जाता है। अरविन्द के पास कोई हुनर नहीं है। केवल कूड़ा-कचरा बीनना आता है। यह हुनर में नहीं गिना जाता। अरविन्द की एक इंसान के रूप में भी गिनती नहीं होती है। उसका न तो कहीं राशन कार्ड में नाम है और न ही उसके पास कोई पहचान का दस्तावेज है।

"पढ़ने का मन नहीं किया?" इस सवाल पर अरविन्द ने मुझे घूरा। ऐसा लगा मानों मैं उसके साथ मजाक कर रहा था। उसने कोई जवाब नहीं दिया। "कितनी बार जेल गए?" "कई बार। एक बार पूरा दिन स्टेशन पर बैठाए रखा। स्टेशन की सफाई भी की। तब जाकर छोड़ा।"

जब वह गलियों में घूमता है तो बहुत सारी नज़रें उसे घूरती हैं। कई बार उसके कानों में ऐसी आवाजें सुनाई पड़ती हैं कि सावधान रहना ये चोर हैं, मौका लगते ही कुछ भी उठा ले जाएँगे। पर उसे अब ज्यादा बुरा नहीं लगता। इस तरह की आवाजें सुनने का आदी हो गया है अरविन्द । कई बार तो उसके बोरे की तलाशी भी ली गई। बोरे में से चोरी का सामान तो नहीं निकला। हाँ, हमारा फेंका हुआ गंद जरूर निकला।

अब बात आती है, सरकार की योजनाओं की। अरविन्द जैसे बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिलेगा? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अरविन्द जैसे लाखों बच्चे हैं जो बिना किसी पहचान के घूम रहे हैं। सवाल है आख़िर अरविन्द जैसे बच्चे हैं कौन? इनके मौलिक अधिकार कहाँ हैं? इनके लिए काम करने वाले सरकारी संस्थान कहाँ हैं? क्यों इन संस्थानों की नजर अरविन्द जैसे बच्चों पर नहीं पड़ती? इन सवालों से बेखबर अरविन्द अपना प्लास्टिक का बोरा उठा कर अपने काम में जुट जाता है।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

हमले

देश में आधुनिक मुफ्त और वैज्ञानिक शिक्षा पर हमले किए जा रहे
सांप्रदायिक ताकतों द्वारा शिक्षा में भगवाकरण के पाठ ये धका रहे
तार्किक और वैज्ञानिक सोच का विकास बाधित किया जा रहा देखो
पिछले कई सालों से बिन बात स्कूलों पर ताले ये पूछो क्यों लटका रहे
निजी विद्यालयों को बढ़ावा पूरे देश में आज देता है दिखाई भाई
खास लोगों को इनमें करके आज भरती शिक्षा पे खास रंग चढ़ा रहे
संविधान में सबको शिक्षा मुफ्त मिले यह पैगाम दिया बताते देखो
जान पूछ के संविधान की चालाकी से धज्जियां आज क्यों उड़ा रहे
पाठशालाओं की बंदी की मुहिम तुरंत ही बंद करवाई जाए देखो
सभी स्कूलों में समस्त विषयों के निपुण शिक्षकों की नियुक्तियां चाह रहे 
विश्वविद्यालय परिसरों को भगवाकरण की मुहिम से बचाना होगा
शिक्षा के निजीकरण की मुहिम को तुरंत रोको मांग रणबीर हम उठा रहे