मेरा नाम है कबाड़ी
लेखक..सुभाष
अरविन्द स्टेशन के सामने पत्थर पर बैठा बीड़ी के सुट्टे लगा रहा था। कमर के पीछे प्लास्टिक का बड़ा थैला। थैले में खाली बोतलें और थोड़ा बहुत दूसरा कचरा। कई बार जेल हो आया। हालाँकि आश्रम को भी जेल ही कहता है। कई साल पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक गाँव से भाग आया था। परिवार में 7 बहन-भाई। पिता छोटे-मोटे सामान की फेरी लगाता है। पिता को शराब की लत थी। पिता शाम को शराब पीकर आता और बच्चों की पिटाई करता।
बचपन से स्कूल का मुँह नहीं देखा। एक कमरे का मकान। गली में सोना पड़ता था। अपने जैसे और बच्चों के साथ खेलता। पैरों में चप्पल नहीं। फटी बनियान और एक कच्छी। बीड़ी पीने की लत 10-11 साल की उम्र में ही लग गई। इधर-उधर बैठे बच्चे अपने-अपने घर-परिवार की चर्चा करते। घर के हालात पर बात करते। एक-दूसरे की पिटाई का जिक्र होता। आज परिवार में कौन पिटा। एक दिन कुछ दोस्तों के साथ घर से भाग आया। पकड़ा गया और जेल (आश्रम) में डाल दिया गया। फिर गाँव से आकर कोई छुड़वा कर ले गया। लेकिन गाँव में क्या करे? स्कूल में जाने के लिए कपड़े और पैसे नहीं थे। घर में फिर वही मार-पिटाई का सिलसिला। खाने के लाले। बाप शराबी। फिर गाँव से निकल लिया। गाँव में भी गली में सोना पड़ता था। यहाँ भी फुटपाथ पर सोना पड़ता है।
अरविन्द बड़े रौब से कहता है, "पुलिस से तो अपनी यारी है। कई बार पकड़ कर जेल में बंद किया। फिर छोड दिया। 70-80 रुपये कमाता हूँ। सारे अपनी मर्जी से खर्च कर लेता हूँ। मेरे पास सामान के नाम पर कुछ नहीं। कभी माँग कर खा लेता हूँ। कभी पैसे से खा लेता हूँ।" अरविन्द को कई-कई दिन नहाने की जरूरत नहीं है। वह कहता है- "सर्दियाँ तो बिना नहाए ही निकल जाती हैं। गर्मियों में स्टेशन पर कभी-कभी दिन में नहा लेता हूँ।"
"अपना घर याद नही आता?" इस सवाल के जवाब में वह कहता है- "था ही क्या घर में? न समय पर खाना मिलता था, न सोने की जगह। पिटाई मुफ्त में।"
नशे की बात चली तो थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसने बताया, "कभी-कभी शराब की बोतलों में थोड़ी बहुत शराब भी मिल जाती है। पी लेता हूँ। पर शराब का आदी नहीं हूँ।" देर शाम को कई बार अरविन्द शराबियों के अड्डे के पास बैठ जाता है कि खाली बोतल मिल जाएँगी थोड़ी बहुत किसी बोतल में शराब भी मिल जाए। बहुत बार ऐसा भी हुआ कि शराबियों ने उसकी पिटाई भी की। उनको शक था कि चोरी की फिराक में बैठा है। पिटना, अपमान सहना, गालियाँ खाना उसे असहज नह करता। उसे कोई अपना भी तो नहीं लगता। अपने लगते हैं तो उसके साथ
कूड़ा बीनने वाले। बस वही अपने हैं. उन्हीं के साथ बैठना। उन्हीं के साथ बातें करना और उन्हीं के साथ कहीं भी सो जाना।
उसने बताया- "शाम को हम सारे बच्चे स्टेशन पर मिल लेते हैं। अपनी-अपनी कमाई का हिसाब लगाते हैं। किसी की 60 रुपये तो किसी की 80 रुपये। स्टेशन के पास अपनी-अपनी जगह तय कर रखी है सोने के लिए। रात को सीमेंट का खाली कट्टा या प्लास्टिक की थैली बिछाकर सभी लाइन में सो जाते हैं। वे कहीं भी सो जाते हैं। उन्हें कुछ भी खो जाने का डर नहीं है। कुछ पास हो तभी तो गुम होगा। इस सवाल के जवाब में कि रात को मच्छर काटते होगें? वह कहता है "नींद में मच्छरों को जहाँ काटते हैं वहीं मसल कर मार देता हैं। हाँ बारिश के दिनों में रात को काफी दिक्कत होती है। कई बार सोने की जगह ही नहीं मिलती।"
जब अरविन्द से बातचीत हो रही थी. तभी वहाँ दो-तीन बच्चे और आ जाते हैं। ऐसा लगा कि सारे अरविन्द के भाई ही होंगे। उसने बताया कि सब अलग-अलग प्रदेश के हैं। अलग-अलग प्रदेश का मतलब था कि उत्तर प्रदेश के ही अलग-अलग शहरों के बच्चे थे।
कुछ के पैरों में फटे हुए जूते थे, जो उनके पैरों के साइज से बड़े थे। किसी ने कबाड़ में फेंक दिए होंगे। ऐसे फेंके हुए जूते अरविन्द जैसे बच्चों के काम आ जाते हैं। शादी-ब्याह के दौरान बाहर फेंका हुआ खाना भी मिल जाता है। अरविन्द के पास कोई हुनर नहीं है। केवल कूड़ा-कचरा बीनना आता है। यह हुनर में नहीं गिना जाता। अरविन्द की एक इंसान के रूप में भी गिनती नहीं होती है। उसका न तो कहीं राशन कार्ड में नाम है और न ही उसके पास कोई पहचान का दस्तावेज है।
"पढ़ने का मन नहीं किया?" इस सवाल पर अरविन्द ने मुझे घूरा। ऐसा लगा मानों मैं उसके साथ मजाक कर रहा था। उसने कोई जवाब नहीं दिया। "कितनी बार जेल गए?" "कई बार। एक बार पूरा दिन स्टेशन पर बैठाए रखा। स्टेशन की सफाई भी की। तब जाकर छोड़ा।"
जब वह गलियों में घूमता है तो बहुत सारी नज़रें उसे घूरती हैं। कई बार उसके कानों में ऐसी आवाजें सुनाई पड़ती हैं कि सावधान रहना ये चोर हैं, मौका लगते ही कुछ भी उठा ले जाएँगे। पर उसे अब ज्यादा बुरा नहीं लगता। इस तरह की आवाजें सुनने का आदी हो गया है अरविन्द । कई बार तो उसके बोरे की तलाशी भी ली गई। बोरे में से चोरी का सामान तो नहीं निकला। हाँ, हमारा फेंका हुआ गंद जरूर निकला।
अब बात आती है, सरकार की योजनाओं की। अरविन्द जैसे बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिलेगा? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अरविन्द जैसे लाखों बच्चे हैं जो बिना किसी पहचान के घूम रहे हैं। सवाल है आख़िर अरविन्द जैसे बच्चे हैं कौन? इनके मौलिक अधिकार कहाँ हैं? इनके लिए काम करने वाले सरकारी संस्थान कहाँ हैं? क्यों इन संस्थानों की नजर अरविन्द जैसे बच्चों पर नहीं पड़ती? इन सवालों से बेखबर अरविन्द अपना प्लास्टिक का बोरा उठा कर अपने काम में जुट जाता है।
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