भगतसिंह तू जिंदा है,
*****************
,,, मुनेश त्यागी
भगतसिंह तू जिंदा है,
हर इंकलाब के नारे में,
हर एक लहू के कतरे में,
सूरज की सारी किरणों में,
हवा के सारे झोंकों में,
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है
हां,भगतसिंह तू जिंदा है।
साइमन गो बैक के नारों में,
किताबों की इबारत में,
ऐसेंम्बली में फैंके पर्चों में,
मैं नास्तिक क्यों के विचारों में,
भगवान से किये सवालों में,
हर एक लहू के कतरे में,
हर इंकलाब के नारे में
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है,
हां, भगतसिंह तू जिंदा है।
जेबों में भरी किताबों में,
समाजवाद के नारों में,
अछूत समस्या से निदानों में,
साम्प्रदायिकता के इलाजों में,
खेतों में और खलिहानों में,
हर एक लहू के कतरे में,
हर इंकलाब के नारे में,
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है,
हां, भगतसिंह तू जिंदा है।
आजादी के सब नारों में,
अपनी कही हुई बातों में,
किसानों में, मजदूरों में,
लिखे हुए अपने लेखों में,
हर एक लहू के कतरे में,
हर इंकलाब के नारे में,
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है,
हां ,भगतसिंह तू जिंदा है।
जंजीरों में, हथकडियों में
इंकलाब की सब लडियों में,
अभियानों में, अरमानों में
जमीन और असमानों में,
हर एक लहू के कतरे में,
हार इंकलाब के नारों में,
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है,
हां, भगतसिंह तू जिंदा है .
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें