गुरुवार, 17 जुलाई 2025

पुरानी यादें

पुरानी यादें 
24 -25 साल पहले की बात है । नार्थ जोन सर्जन कांफ्रेंस जम्मू में आयोजित की गई थी । रोहतक से 25-30 डॉक्टर थे । एक दिन सभी का मन वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा का बना। मैने मना किया तो सभी ने अनुरोध किया कि चलें । हम चल दिये । 
       अर्ध कन्वारी से कुछ पहले 4-5 महिलाएं और 5-6 पुरुष परेशान से दिखाई दे रहे थे। हमारे में से किसी ने पूछा-क्या बात है क्या हुआ। 
बताया- उनके एक बुजुर्ग पेशाब करने बैठे थे और वे नीचे खाई में लुढ़क गए हैं । उन्हें देखने गए हैं। 
       हमने भी बुजुर्ग को ढूंढने की इच्छा बनाई और 5-6 डॉक्टर हम नीचे उतरते चले गए । 150 गज के करीब नीचे उतरने के बाद हमने आवाज लगाई कि क्या बुजुर्ग मिल गए। और नीचे से आवाज आई- हाँ मिल गए। हमने पूछा- कैसी तबियत है? जवाब आया- ठीक हैं। उप्पर रास्ते में खड़े लोगों ने सुना तो कुछ जय माता की बोलते चले गए।
         हमने फिर पूछा कि हम डॉक्टर हैं कोई चोट है तो हम आ जाते हैं मदद करने । बताओ कहाँ पर हो।
फिर आवाज आई थोड़ी धीमी - वो तो चल बसे । इतनी देर में हम भी वहां पहुंच गए थे। पूछा- पहले ठीक क्यों कहा ? जवाब था कि ऊपर वाले रिश्तेदारों में से किसी को सदमा न लग जाये इसलिए । 
        कुछ लोगों को तो लगा कि माता ने उस बुजुर्ग को बचा लिया। मगर सच्चाई यही थी कि माता उस बुजुर्ग को नहीं बचा पाई। 
      मैने सभी डॉक्टर सहयोगियों से पूछा -- यदि बुजुर्ग जिंदा होते और चोटिल होते तो हम क्या फर्स्ट एड कर सकते थे । सब ने अपने अपने ढंग से बात रखी। मैने फिर कहा- बिना इमरजेंसी किट के शायद हम ज्यादा फर्स्ट एड करने की हालत में नहीं होते।
         हम सबने तय किया कि जब इस तरह के ग्रुप में कहीं जाएंगे तो इमरजेंसी किट जरूर साथ लेकर चलेंगे । 
बाकियों का तो पता नहीं मैने एक किट जरूर बना ली । 
तीन साल बाद वही कांफ्रेंस पी जी आई चंडीगढ़ में थी। कालेज की बस में गए थे हम सब । वापसी पर अम्बाला पहुंचने से पहले हमारे सामने ट्रैक्टर सड़क के किनारे पलट गया। हमने गाड़ी रुकवाई ।
    ड्राइवर ट्रैक्टर के पहिये के नीचे दबा था । हमने सबने मिलकर उसको निकाला और देखा तो वह शॉक में था । मैं ने इमरजेंसी किट से उसे मेफेंटीन इंजेक्शन दिया और एक वोवरान का inj दिया । कुछ संम्भल गया मरीज । हमने उसे अपनी गाड़ी में लिटाया और उसे अम्बाला सिविल अस्पताल में दाखिल करवाया । इलाज शुरू हुआ तो मरीज और इम्प्रूव हुआ ।
   3 साल तक लगता था यह किट खामखा उठाये फिरता हूँ मगर उस रोज लगा कि खामखा नहीं उठाई किट ।
शायद जो डॉक्टर साथी इन दोनों मौकों पर थे उनको याद हों ये दोनों घटनाएं ।
रणबीर दहिया
9812139001
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डॉ सुरेश शर्मा - पानीपत की चौथी लड़ाई 
डा सूरजभान
राजेश अत्रेय
डा शंकर इसराना
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पुरानी यादें --मेरे बॉस डॉ सेखों 
1976 -1977 का दौर 
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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आज किशनपुरा चौपाल में सुश्री उर्मिला जी भूतपूर्व सरपंच गांगटान और साक्षरता आंदोलन की अग्रणी कार्यकर्ता से मुलाकात हुई। पुरानी यादें उस दौर की सांझा की। बहुत अच्छा लगा । उनके साथ दो महिलाएं अपने स्वाथ्य के बारे परामर्श करने आई थी।
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2014 अगस्त में रिटायरमेंट के टाइम पूरी यूनिट के डॉक्टर एक साथ अपनी पुरानी यादें, पुराने दुख सुख के दिन जो यूनिट में गुजरे थे उन्हें अपने अपने ढंग से याद कर रहे थे। एक सीनियर एस आर ने बताया कि एक बार एक unkown मरीज एक्सीडेंट के साथ आया । उसके पेट में चोट थी। उसको ऑपरेट करने की जरूरत थी मगर उसके ग्रुप का खून ब्लड बैंक में नहीं था । बताया कि सर आपका o पॉजिटिव ब्लड है जो पॉजिटिव दूसरे सभी ग्रुप्स को दिया जा सकता है। आप ब्लड बैंक गए वहां एक यूनिट ब्लड unkown मरीज के लिए दिया और वापिस आकर उसका आपरेशन किया। मरीज बचा लिया गया। 
मैने बहुत कोशिश की पुरानी याद को याद करने की । मगर जब डेट आदि बताई तो मुझे भी यकीन हुआ कि ऐसा कुछ हुआ था। 
और भी कई ना भुलाई जाने वाली पुरानी यादें साझा की गई। अब थोड़ा उम्र का असर होने लगा है तो सोचा सांझा कर लूँ सभी के साथ। मौके पर लिया गया फैंसला यदि एक ज्यान को भी बचा पाता है एक डॉक्टर के जीवन में तो एक एहसास और विश्वास बढ़ता है डॉक्टर का।
मेरे साथ के हमसफ़र सभी डॉक्टरों को याद करते हुए | मुझे गर्व है अपनी यूनिट के उन सभी डॉक्टरों पर जो मरीजों की सेवा में लग्न हैं। 
डॉ रणबीर
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'पानीपत की चौथी लड़ाई' साक्षरता आंदोलन की 1992 की रैली।
***पुरानी यादें***
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Dr O.P.Grewal
पन्द्राह साल हो लिए वे चले गए हमनै छोड़कै।।
उनहत्तर साल बिताए ज्ञान विज्ञान मैं जी तोड़कै।।
डॉ ओम प्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान की जनरल बॉडी मीटिंग में हिस्सेदारी करने का मौका मिला। बहुत सी पुरानी यादें भी ताजा हो गई। डॉ ग्रेवाल के व्यक्तित्व बारे कहने को शब्द नहीं हैं मेरे पास। बहुत ही उत्साहवर्धक मीटिंग रही।
6.6.1937.....24.1.2006
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पुरानी यादें---
मंत्री खुर्सीद अहमद जी :
खेल प्रतियोगिता इनाम वितरण समारोह मेडिकल कॉलेज रोहतक सन 1971 के आस पास ।
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डा• कृष्णा सांगवान,डा• सरोज मुदगिल,डा• सुखबीर सांगवान,डा• रणबीर सिंह दहिया,डा• रणबीर हुड्डा,डा• श्रीराम सिवाच ,डा• मुकेश इन्दौरा ,डा• कोहली।
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पुरानी यादें -- डॉ विकाश कथूरिया, डॉ विकास अग्रवाल, डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ सुनील , डॉ पूजा , डॉ कुलदीप, डॉ राजू राजन, डॉ दीपांशु और सभी कॉलीग्स -- आप सबको सलाम ।
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सिरसली स्वर्गीय संतोष के पोते की शादी में -20 अप्रैल, 2022.पुरानी यादें ताजा हो गई। चम्पा सिंह जी भी मिले।
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आज नित्यानंद स्कूल गया सप्तरंग के प्रोग्राम में तो प्रोफेसर जय सिंह मलिक का फोटो नजर आया। देखकर पुरानी यादें ताजा हो गई। बहुत ही नेक दिल इंसान और दोस्त ।
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में। 

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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आज बहुत दिनों बाद एनोटमी विभाग के लेक्चर थिएटर  वन में 2 घण्टे के लिए जाने का मौका मिला । 1967 कि यादें ताजा हो गई । पुरानी यादें ; पुराने अध्यापक : डॉ इंदरजीत दीवान, डॉ इंद्रबीर सिंह , डॉ छिबर, डॉ गांधी, डॉ राठी याद आ गए। 67 बैच के साथी भी दिमाग में घूम गए । सुशील खुराना, आर एन कालरा, अशोक भाटिया, दयासागर गोयल, हरीश भंडारी , रमेश मित्तल, ईश्वर नासिर, रीटा गुलाटी, कर्मजीत कौर, कृष्णा सहरावत , स्वर्ण लता, विमला कादयान आदि आदि।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
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795 पिल्लर(टिकरी बॉर्डर) पर जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा 1 साल किसानों के लिए फ्री हेल्थ कैम्प का आयोजन । आज वहां से गुजरने का मौका मिला  तो पुरानी यादें ताजा हो गयी तो यह वीडियो बना लिया।
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भुली बिसरी यादें 
सन 1956 की बात है की मेरे पिताजी चौधरी जागे राम सिरसा से बतोर इंस्पेक्टर एग्रीकल्चर की पोस्ट से  बतौर फार्म मैनेजर सरकारी एग्रीकल्चर फार्म रोहतक में तबादला हो कर आए। यह फार्म 100 एकड़ जमीन में बना सरकारी एग्रीकल्चर फार्म था , जिसमें हर तरह की खेती की जाती थी । चार जोड़ी हट्टे कट्टे बैल थे जो खेती करने में  बहुत कारगर रूप से इस्तेमाल किए जाते थे ।  पिताजी 1966 तक यहां पर रहे और यहीं से रिटायर हो गए।  आने वाले दिनों में यह फार्म नहीं रहा और जमीन कुछ बेच दी गई कुछ पर सरकारी दफ्तर खुलते गए और सरकारी अफसरों के रहने के लिये कोठियां और मकान बनते गए। सिरफ़ एग्रीकल्चर फार्म का मेन गेट बचा है जो कमिश्नर के  रेजिडेंस और दफ्तर दोनों यहां हैं, तक जाता है बाकि एग्रो मॉल इसकी जमीन में बना और कई कॉलोनी भी बन गई । बहुत से मकान हैं । दो पीपल के पेड़ आज भी पहचाने जा सकते हैं जो हमारे घर के सामने मौजूद थे। भूली बिसरी यादें हैं पूरे फॉर्म में घूमते थे। पिताजी बहुत सख्त मिजाज थे और फार्म के खेत से चूसने के लिए गन्ने भी नहीं लाने देते थे। बोहर वालों के खेतों से लेकर आते थे।  और चीजों का तो मतलब ही नहीं । यहीं से मैं बिल्कुल साथ लगता जाट स्कूल है वहां पर पढ़ने जाने लगा । पहले प्राइमरी स्कूल में पढ़ा  और फिर हाई स्कूल में छठी क्लास से हायर सेकेंडरी किया । बहुत सी यादें हैं उस दौर की जिन्हें याद करना इतना आसान नहीं है आज एक बार  कोशिश है उन पुरानी यादों को याद करने की। 
प्राइमरी स्कूल में पहले एक ही टीचर थे मास्टर फतेह सिंह दलाल। तीसरी में हुए तो सूरजमुखी बहिनजी ने भी ज्वाइन कर लिया। पांचवी तक पहुंचे तो मास्टर दलजीत सिंह राठी जी भी क्लास लेने लगे।
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भूली बिसरी यादें 
1978 में मेडिकल रोहतक में 98 दिन की हड़ताल हुई..उन दिनों चौधरी हरद्वारी लाल वाईस चांसलर थे। मेरे जीवन में बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई यह हड़ताल।
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वार्ड  6-- भूली बिसरी यादें 
एक बार की बात की झरौट के बुजुर्ग अपनी घरवाली को लेकर आये । उसकी एक टांग में गैंग्रीन हो गई बायीं या दायीं याद नहीं। हमने सभी concerned विभागों की राय ली और यह तय हुआ कि amputation करनी होगी । ताऊ को समझाया। कटने की बात सुनकर दोनों घबरा गए । ताऊ मेरे कमरे में आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मैने बिठाया और उसकी और देखा। " काटनी ए पड़ैगी डॉ साहब। और कोए राह कोण्या इसकी ज्यान नै खतरा करदेगी या गैंग्रीन -- मैंने जवाब दिया बहुत धीमे से। ताऊ बोल्या-- न्यों कहवै सैं अक गुड़गांव मैं शीतला माता की धोक मारकै ठीक होज्यां हैं। मैंने कहा-- मेरी जानकारी में नहीं। ताऊ-- एक बार जाना चाहवैं सैं। फेर आपके डॉ न्यों बोले-- LAMA होज्या । छुट्टी कोण्या देवें । और फिर हमारे वार्ड में दाखिला नहीं हो सकता। चाहूँ सू आप के वार्ड मैं इलाज करवाना। मैने कहा एक शर्त है-- जै इसकी टांग धोक मारकै ठीक होज्या तो भी लियाईये और नहीं ठीक हो तो भी। ठीक होगी तो मैं बाकी के इसे मरीज भी वहीं गुड़गांव भेज दिया करूंगा और ठीक न हो तो आप ये सारी बात एक पर्चे में लिखकर बांटना कि वहां मेरी घरवाली ठीक नहीं हुई। हम ने discharge on request कर दिया । दो दिन बाद वापिस आ गया । महिला की हालत ज्यादा खराब हुई थी। खैर amputation ortho विभाग  के सहयोग से की और महिला ठीक होकर चली गयी । बुजुर्ग जाने से पहले आया कमरे में और कहने लगा-- पर्चा छापना चाहूँ सूँ फेर गांव वाले कह रहे हैं शीतला माता 
 के खिलाफ पर्चा। बहोत दबाव सै मेरे पै डॉ साहब । पैरों की तरफ हाथ किये । मैने बुजुर्ग को छाती से लगा लिया और आशीर्वाद देने को कहा।
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भुली बिसरी यादें -- मेडिकल कालेज वार्षिक खेल आयोजन--2012
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में। 

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
जनवरी 2017
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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023

पूंडरी

 भुली बिसरी यादें 

पूंडरी की कुछ यादें हैं 

बहुत बड़ा मकान था । ग्राउंड था आधा एकड़ का। एक बहुत बड़ा हाल था । 300-400 गज पर पूर्व  की तरफ मैन रोड थी उसके दूसरी और बड़ा तैलाब था। शुरू में ही बहुत बड़ी ड्यौढ़ी थी।

पूंडरी से पिताजी का सिरसा तबादला हो गया 1956 में। मॉडल स्कूल में  दाखिला लिया पहली जमात में और दुसरी में हुआ तो सिरसा से रोहतक का तबादला हो गया।

सिरसा में डाक खाने वाली गली में किराए के मकान में रहते थे । बिमला बहिन, सन्तोष बहिन, निर्मला बहिन । कमला बहिनजी और शकुंतला बहिन जी की शादी हो चुकी थी। 

डाक खाने में कार्यरत कर्म चारी का लड़का था राधे श्याम उससे मेरी दोस्ती थी। डाक खाने के पूर्व की ओर एक बहुत बड़ा ग्राउंड था और उसके दूसरी तरफ जेल थी। सरदार प्रीतम सिंह बेलदार थे जो घर भी कई बार आते थे। तहसीलदार थे चौधरी बदलू राम उनके परिवार से भी मिलना जुलना था। घर के पश्चिम की तरफ मेन रोड थी जिसे डबवाली रोड कहा जाता था। 

    सिरसा से रोहतक एक ट्रक में समान लादकर रोहतक पहुंचे। सरदार प्रीतम सिंह बेलदार हमारे साथ आये थे। बदलू राम जी का लड़का भी बहुत बार घर आता था। 

तीनों बहने गर्ल्स स्कूल में पढ़ने जाती थी। 

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

Family नया बास

 Family

माता जी हँसकौर इनके पिता जी
मौसी छनकौर
मौसी ज्ञानकौर इनके पिता जी
मामा -जोधसिंह -इनके पिता जी
--मुखत्यारा, भरत सिंह, किताबो, ब्रह्मो
मामा -बजे सिंह मूर्ति कौसल्या
मामा बलबीर सिंह मोहिंदर
मामा करतार सिंह --
मामा दिलबाग सिंह यशपाल, राजेश
मामा प्रताप सिंह .रविंदर
जरा पूरा करके भेजना परिवार का परिचय यशपाल जी।
पिताजी चौधरी जागे राम
चाचा ओमप्रकाश--- प्रेम , सतबीर, रामबीर
चाचा सुरजे--महिंदर
चाचा दिवाना कृष्ण
चाचा चन्दर  सुरेश, धर्मबीर
NAYA BAS

जोध सिंह के पिता जीयाराम
जोध सिंह के बच्चे किताब कौर, भरम कौर, फूलवती, मुख्त्यार सिंह
सौतेली माँ - भरत सिंह, सार्तो
भारत सिंह के बच्चे जय सिंह, सोमबीर, सुरेंद्र, बाला देवी, दर्शना
मुख्त्यार सिंह के बच्चे जगबीर, सुरेश, राकेश, सरोज, सीमा
जय सिंह के बच्चे रिंकू, रीनू
सोमबीर के बच्चे रवि, अंजलि, मनीषा
जगबीर के बच्चे शादिकांत, हीना
सुरेश के बच्चे साजन, शिवानी
रिंकू के बच्चे लक्ष्य, नैतिक
नीरज के बच्चे कृतिका, नवजात शिशु
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हंसकौर, छणकौर, रत्न के पिता देशराम
ज्ञानकौर, बाजे सिंह, बलबीर सिंह, करतार सिंह, दिलबाग सिंह, प्रताप सिंह के पिता कनियालाल
राममूर्ति देवी, बिमला, निर्मला, कौशल्या, बबली के पिता बाजे सिंह
राजेंद्र, महेंद्र, नरेंद्र, संतोष, सुदेश, बबीता के पिता बलबीर सिंह
वीरेंद्र, विनोद, सुनीता के पिता करतार सिंह
यशपाल, राजेश के पिता दिलबाग सिंह
रविंदर, उषा के पिता प्रताप सिंह
राजेंद्र के बच्चे अनुज, सोनिया, अनु
महेंद्र के बच्चे नीरज, नीना
नरेंद्र के बच्चे अरुण, आरजू
बीरेंद्र के बच्चे राहुल, अंशु
यशपाल के बच्चे समीक्षा, कीर्ति, अजय
राजेश के बच्चे शिखा, आकाश
रविंदर के बच्चे नंदिनी, गजेंद्र
माता हँसकौर के पिता जी देशराम
पिता जी के मामा बराही में थे।
उन्होंने ही पिता जी को पढ़ाया
मामा थे जमना
उनके बेटे थे रामफल
रामफल जी के बेटे सोमेश उनके साथ फोटो खिंचवाया। बराही गांव के जोहड़ के फोटो लिए थे।
24 जनवरी को शालू राजू की मैरिज अन्निवेरसरी थी।

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

एंगेल्स से मुलाकात

एंगेल्स से मुलाकात
राइनिश ज़ाइटुंग के दमन के पश्चात मार्क्स और उनकी पत्नी पेरिस चले गये। वहाँ मार्क्स ने कुछ समय के लिए प्न्सिशे ज़ारबुख़ेर डायचे में और बाद
में पेरिस वोर्वेर्ट्स में काम किया। पहले अख़बार में काम करते समय मार्क्स
प्ऱफेडरिक एंगेल्स से परिचित हुए और तभी से दोनों अनन्यतम व्यक्तिगत,
राजनीतिक और साहित्यिक मित्रा बन गये। इसी समय तक मार्क्स अपनी
भौतिकवादी अवधारणाओं की आधारभूत शुरुआत कर चुके थे जिनकी चर्चा हम
आगे चलकर करेंगे। इस शुरुआत तक मार्क्स मुख्यतया दर्शनशास्त्रा के माध्यम से
पहुँचे थे।
दूसरी ओर एंगेल्स, जो कि एक लम्बे समय तक आधुनिक उद्योग की
जन्मभूमि इंग्लैण्ड में रह चुके थे, समान निष्कर्षों पर इंग्लैण्ड के औद्योगिक
जीवन की व्यावहारिक परिस्थितियों के अध्ययन से पहुँचे थे। इस तरह दोनों
एक-दूसरे के पूरक थे और दोनों ने मिलकर वह कर दिखाया जो अकेले के लिए
असम्भव न भी हो तो कहीं अधिक कठिन तो अवश्य ही होता। अब से वे दोनों
लगभग प्रतिदिन ही सम्पर्क में बने रहे, चाहे व्यक्तिगत रूप से या पत्रों के माध्यम
से, और उनके ये साहित्यिक सम्बन्ध कितने रोचक और घनिष्ठ थे, यह कुछ वर्ष
पूर्व जर्मनी में बेबेल और बर्नस्टीन द्वारा चार खण्डों में प्रकाशित उनके पत्रों से
पता चल जाता है।
मार्क्स ने अपने सम्मिलित काम के सै(ान्तिक पक्ष के अध्ययन
और शोध पर ध्यान केन्द्रित किया तो वहीं एंगेल्स ने अपनी उफर्जा अपने
सै(ान्तिक निष्कर्षों के व्यावहारिक उपयोग, और विशेष रूप से आगे चलकर
अपने विचारों के प्रचार और अपने विरोधियों से विचारधारात्मक संघर्ष पर
लगायी। परन्तु ख़ुद एंगेल्स ने इस बात की पुष्टि की है कि उनके द्वारा लिखे गये
प्रत्येक शब्द और उनके द्वारा अपनायी गयी हर नीति पर वे दोनों पहले आपस
में चर्चा करते थे।
उनकी भौतिकवादी द्वन्द्वात्मक पद्धति 
के माध्यम से होता है। इस दर्शन का नियम है कि नूतन का बीज पुरातन में ही
विद्यमान होता है और जैसे-जैसे यह बीज विकसित होता है, प्रारम्भ में दोनों के
बीच का अन्तर सिप़र्फ मात्रात्मक होता है पर जब यह अन्तर एक निश्चित स्तर
तक पहुँच जाता है तो दोनों के बीच एक निर्णायक विभाजन होता है और अन्तर
गुणात्मक हो जाता है। यह नियम समस्त जैविक और निर्जीव प्रकृति पर लागू
होता है, और शायद कुछ उदाहरणों से इसे स्पष्ट करना समीचीन होगा। केमिस्ट्री
में हम लोग कार्बन यौगिकों की कई श्रृंखलाओं से परिचित हैं जो एक-दूसरे से
मात्रा कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या की दृष्टि से भिन्न होती हैं।
अगर हम उदाहरण के लिए मार्श गैस को लें तो इसे हम ब्भ्4 से अभिव्यक्त
करते हैं। अगर हम इसमें किन्हीं भी परिस्थितियों में कार्बन ;ब्द्ध या हाइड्रोजन
;भ्द्ध जोड़ें तो हमें मात्रा मार्श गैस और कार्बन या हाइड्रोजन का मिश्रण मिलता
है। और ये तब तक चलता रहेगा जब तक कि हम इसमें कार्बन के एक और
हाइड्रोजन के दो परमाणुओं के अनुपात में कोई विशिष्ट मात्रा न जोड़ दें जब
कि इस यौगिक की पूरी प्रकृति ही बदल जाती है और हमें नये गुणधर्मों से युक्त
एक नयी ही गैस ऐसीटिलीन मिलती है यह प्रक्रिया इसी प्रकार आगे बढ़ती
रहती है। मात्रा गुण में परिवर्तित हो गयी है। अब भौतिकी से एक सरल-सा
उदाहरण लेते हैं। पानी को उफष्मा देने से यह और गरम, और गरम होता जाता
है परन्तु एक निश्चित बिन्दु तक अन्तर मात्रा ताप के परिमाण का रहता है गहराई
में देखें तो ठण्डा पानी और गरम पानी एक ही द्रव होते हैं, पर जब दी गयी
उफष्मा एक निश्चित स्तर, 100ह्थ् या 212ह्थ् पर पहुँचती है तो पानी एकाएक
ही एक नये पदार्थ - भाप - में बदल जाता है, एक ऐसी गैस में जिसके गुणधर्म
पानी से नितान्त भिन्न हैं। मात्रा गुण में परिवर्तित हो गयी है। अब एक उदाहरण
इतिहास से लेते हैं। जब तक श्रमिक ज़मीन से बँधा था समाज भी भूदास व्यवस्था
के स्तर पर था। परन्तु उत्पादन और वाणिज्य के विकास के साथ-साथ ही यह
भी उत्तरोत्तर अधिक आवश्यक होता गया कि कुछ क्षेत्रों में श्रमिकों की मुक्त
उपलब्धता सुनिश्चित की जाये और यह तभी सम्भव हो सकता था जब मज़दूरों
या भावी मज़दूरों को उन स्थानों की यात्रा करने की स्वतन्त्राता हो जहाँ रोज़गार
के अवसर उपलब्ध हों।
साथ ही जैसे-जैसे कृषि के पुराने रूप और तरीव़फे पुराने
या भूस्वामियों के लिए अलाभप्रद होते गये वैसे-वैसे ही उन्होंने अपने भूमिदासों
को आवागमन की स्वतन्त्राता देना प्रारम्भ कर दिया या पिफर उनके बँधुआ श्रम का
अपने मौद्रिक भुगतानों या लगान के भुगतान के रूप में प्रयोग करना प्रारम्भ कर
दिया। इस तरह क्रमशः समाज में भूदासत्व के उन्मूलन के लिए परिस्थितियाँ
विकसित होती गयीं और जब यह विकास एक निश्चित अवस्था तक पहुँच गया
तो भूदासत्व स्वतन्त्रा निजी उत्पादन से विस्थापित हो गया। कुछ मामलों में यह
परिवर्तन बहुत अधिक हिंसा का परिणाम था जबकि कुछ अन्य मामलों में
अपेक्षतया कम हिंसा से ही काम चल गया। कुछ मामलों में परिवर्तन काप़फी तेज़ी
से तो कुछ अन्य मामलों में धीमे-धीमे हुआ। परन्तु सभी मामलों में यह एक
क्रान्तिकारी परिवर्तन था - एक नयी सामाजिक व्यवस्था ने पुरानी का स्थान ले
लिया क्योंकि नयी परिस्थितियों में परिवर्तन अनिवार्य हो गया था।
स्थानाभाव के कारण हम यहाँ सारे विज्ञानों और जीवन के सारे अनुभवों के
उदाहरण नहीं दे सकते। मार्क्स और एंगेल्स ने हीगेल के दर्शन से अध्ययन के
इन नियमों और प(तियों को अपनाया था। पर जहाँ वे हीगेल की द्वन्द्वात्मक
प(ति से दृढ़ता से जुड़े रहे वहीं उन्होंने उसकी भाववादी सै(ान्तिक अधिरचना
को अस्वीकार कर दिया।
अन्य सभी भाववादी दार्शनिक सम्प्रदायों की ही तरह
हीगेलियन दर्शन भी यह मानकर चलता है कि विचार वास्तविक परिस्थितियों के
बिम्ब नहीं होते, अपितु उनकी अपनी स्वतन्त्रा सत्ता होती है, और उनके विकास
पर ही अन्य सभी वस्तुओं का विकास आधारित होता है। मार्क्स और एंगेल्स ने
इस धारणा को नकार दिया। उन्होंने वास्तविक परिस्थितियों से स्वतन्त्रा व असम्ब(
विचार और विचारधारा की अवधारणा के स्थान पर भौतिकवाद, वस्तुगत विश्व,
प्रकृति, और इतिहास को सारे विकास का आधार बताया। 1845 में प्रकाशित
अपनी पुस्तक द होली प़फैमिली में उन्होंने इस नये द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को
अभिव्यक्ति देने के साथ ही साथ परम्परावादी बुर्जुआ हीगेलियनों द्वारा हीगेल के
दर्शन के अनुप्रयोग का खण्डन भी किया। आगे चलकर उन दोनों ने उसी विषय
पर एक और पुस्तक भी लिखी जो कि यद्यपि प्रकाशित नहीं हुई, परन्तु पिफर
भी जो उन्हें अपने विचारों को और भी स्पष्ट करने और अपनी भौतिकवादी
अवधारणाओं पर और भी बेहतर पकड़ बनाने में सहायक हुई।
इसी बीच मार्क्स पेरिस में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के अध्ययन और प्रशाई
सरकार के विरु( गम्भीर विचारधारात्मक संघर्ष में लगे रहे। प्रशाई सरकार ने
इसका बदला मार्क्स को पेरिस से निष्कासित करवाके लिया। मार्क्स तब ब्रसेल्स
चले गये, जहाँ वे जब-तब डायचे ब्रस्सेलेर ज़ाइटुंग में लिखते रहे।
1846 की मुक्त व्यापार कांग्रेस में उन्होंने मुक्त व्यापार के बारे में एक भाषण
दिया जो बाद में एक पैम्प़फलेट के रूप में प्रकाशित हुआ, और 1847 में उन्होंने
प्रूधों की पुस्तक दरिद्रता का दर्शन के जवाब में प्ऱफांसीसी भाषा में दर्शन की
दरिद्रता लिखी। इस पुस्तक में मार्क्स ने हेगेल के द्वन्द्ववाद को अपने और एंगेल्स
के क्रान्तिकारी भौतिकवादी रूप में प्रयुक्त करते हुए सामाजिक विकास नियमों
को उजागर करने के साथ ही वैज्ञानिक समाजवाद के मूल तत्वों को भी विकसित
किया है।

विवाह

विवाह
लगभग उसी समय मार्क्स ने अपनी सखी और बचपन और युवावस्था की साथी, जेनी वोन वेस्टपफालेन से शादी कर ली जो कि ख़ुद भी बहुत ही बुद्धिमती और सुशिक्षित महिला थीं। मार्क्स को उनसे बेहतर जीवनसाथी मिल ही नहीं सकता था। विवाह के दिन से अपनी मृत्यु के दिन तक वे अपने पति के सारे सुख-दुख, सारी आशाओं-आकांक्षाओं की सहभागी रहीं। वे दोनों एक-दूसरे के लिए समर्पित थे। मेहरिंग के कथनानुसार इस घोर नास्तिक और कम्युनिस्ट के एक कट्टर विरोधी ने भी इस विवाह को ईश्वर द्वारा नियोजित बताया था।

प्रारम्भिक राजनीतिक गतिविधियाँ

प्रारम्भिक राजनीतिक गतिविधियाँ
मार्क्स 16 वर्ष की आयु में बोन विश्वविद्यालय में दाखि़ल हुए, और 1836 में अपने पिता की इच्छानुसार कानून की पढ़ाई करने के लिए बर्लिन विश्वविद्यालय चले गये, पर ऐसा लगता नहीं कि उन्होंने अपनी पढ़ाई पर अधिक ध्यान दिया हो। उनका मन दर्शनशास्त्रा में अधिक लगता था और यद्यपि उनके माता-पिता तो निराश हुए पर विश्व को निस्सन्देह इससे बहुत लाभ मिला कि युवा मार्क्स दर्शनशास्त्रा के एक उत्साही अध्येता बन गये और बर्लिन की यंग हीगेलियन्ज़ की जमात में शामिल हो गये। वहाँ उनका परिचय कहीं अधिक वरिष्ठ लोगों जैसे ब्रूनो बावेर और एफ कोपेन्स से हुआ जिन्होंने जल्दी ही इस युवा अध्येता की प्रतिभा को पहचान लियाऋ यद्यपि आगे चलकर उनके मार्क्स से बहुत ही आधारभूत मतभेद होने वाले थे। उस समय भी मार्क्स की ज्ञान की प्यास असीम थी और उनकी काम करने और आत्मलोचना की क्षमता, और किसी भी दार्शनिक इतिहास सम्बन्धी प्रश्नों के समाधान की दिशा में सारे ही तथ्यों पर बारीकी से ध्यान देने की उनकी क्षमता अद्भुत थी। 1841 में मार्क्स ने अपनी
डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर ली और विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्रा के प्रवक्ता के रूप में जमने की योजना बनाने लगे पर अपने मित्रा बावेर, जो वहीं एक अराजकीय प्रवक्ता थे और अधिकारियों द्वारा आये दिन प्रताड़ित किये जाते थे, के अनुभव से मार्क्स ने समझ लिया कि वे ऐसी अवस्थिति में टिक नहीं पायेंगे। उसी वर्ष राइनिश बुर्जुआ वर्ग ने एक नया विपक्षी अख़बार राइनिश ज़ाइटुंग प्रारम्भ किया और यद्यपि मार्क्स की आयु उस समय मात्रा 24 वर्ष थी, उन्हें अख़बार का सम्पादक नियुक्त किया गया। उनके सम्पादन का दौर सेंसरशिप के विरुद्ध एक अनवरत संघर्ष रहा। एंगेल्स के शब्दों में, फ्मगर सेंसरशिप राइनिश ज़ाइटुंग से छुटकारा नहीं पा सकी। मार्क्स की लोगों को प्रभावित करने और अपने पक्ष में कर सकने की अद्भुत क्षमता यहाँ भी भलीभाँति दिखायी दी। सेंसर ने अनेक ऐसे अंश प्रकाशित हो जाने दिये जिनसे बर्लिन के अधिकारीगण अप्रसन्न हो गये। सेंसरकर्ता न सिर्फ फटकारे जाते रहे बल्कि लगातार बदले भी जाते रहे, पर कोई अन्तर नहीं पड़ा और अन्ततः सरकार ने इस सरदर्द से छुटकारा पाने का सबसे अच्छा और सुनिश्चित तरीका अपनाया। राइनिश ज़ाइटुंग का पूरी तरह दमन कर दिया गया। उसी समय मार्क्स को तथाकथित भौतिक हितों को लेकर विवाद, जंगलात की चोरियों, मुक्त व्यापार, संरक्षण जैसे मुद्दों को लेकर हुए विवादों पर जिस उलझन का सामना करना पड़ा उससे उन्हें आर्थिक प्रश्नों का अध्ययन करने की पहली प्रेरणा मिली।