गुरुवार, 7 नवंबर 2019

प्रारम्भिक राजनीतिक गतिविधियाँ

प्रारम्भिक राजनीतिक गतिविधियाँ
मार्क्स 16 वर्ष की आयु में बोन विश्वविद्यालय में दाखि़ल हुए, और 1836 में अपने पिता की इच्छानुसार कानून की पढ़ाई करने के लिए बर्लिन विश्वविद्यालय चले गये, पर ऐसा लगता नहीं कि उन्होंने अपनी पढ़ाई पर अधिक ध्यान दिया हो। उनका मन दर्शनशास्त्रा में अधिक लगता था और यद्यपि उनके माता-पिता तो निराश हुए पर विश्व को निस्सन्देह इससे बहुत लाभ मिला कि युवा मार्क्स दर्शनशास्त्रा के एक उत्साही अध्येता बन गये और बर्लिन की यंग हीगेलियन्ज़ की जमात में शामिल हो गये। वहाँ उनका परिचय कहीं अधिक वरिष्ठ लोगों जैसे ब्रूनो बावेर और एफ कोपेन्स से हुआ जिन्होंने जल्दी ही इस युवा अध्येता की प्रतिभा को पहचान लियाऋ यद्यपि आगे चलकर उनके मार्क्स से बहुत ही आधारभूत मतभेद होने वाले थे। उस समय भी मार्क्स की ज्ञान की प्यास असीम थी और उनकी काम करने और आत्मलोचना की क्षमता, और किसी भी दार्शनिक इतिहास सम्बन्धी प्रश्नों के समाधान की दिशा में सारे ही तथ्यों पर बारीकी से ध्यान देने की उनकी क्षमता अद्भुत थी। 1841 में मार्क्स ने अपनी
डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर ली और विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्रा के प्रवक्ता के रूप में जमने की योजना बनाने लगे पर अपने मित्रा बावेर, जो वहीं एक अराजकीय प्रवक्ता थे और अधिकारियों द्वारा आये दिन प्रताड़ित किये जाते थे, के अनुभव से मार्क्स ने समझ लिया कि वे ऐसी अवस्थिति में टिक नहीं पायेंगे। उसी वर्ष राइनिश बुर्जुआ वर्ग ने एक नया विपक्षी अख़बार राइनिश ज़ाइटुंग प्रारम्भ किया और यद्यपि मार्क्स की आयु उस समय मात्रा 24 वर्ष थी, उन्हें अख़बार का सम्पादक नियुक्त किया गया। उनके सम्पादन का दौर सेंसरशिप के विरुद्ध एक अनवरत संघर्ष रहा। एंगेल्स के शब्दों में, फ्मगर सेंसरशिप राइनिश ज़ाइटुंग से छुटकारा नहीं पा सकी। मार्क्स की लोगों को प्रभावित करने और अपने पक्ष में कर सकने की अद्भुत क्षमता यहाँ भी भलीभाँति दिखायी दी। सेंसर ने अनेक ऐसे अंश प्रकाशित हो जाने दिये जिनसे बर्लिन के अधिकारीगण अप्रसन्न हो गये। सेंसरकर्ता न सिर्फ फटकारे जाते रहे बल्कि लगातार बदले भी जाते रहे, पर कोई अन्तर नहीं पड़ा और अन्ततः सरकार ने इस सरदर्द से छुटकारा पाने का सबसे अच्छा और सुनिश्चित तरीका अपनाया। राइनिश ज़ाइटुंग का पूरी तरह दमन कर दिया गया। उसी समय मार्क्स को तथाकथित भौतिक हितों को लेकर विवाद, जंगलात की चोरियों, मुक्त व्यापार, संरक्षण जैसे मुद्दों को लेकर हुए विवादों पर जिस उलझन का सामना करना पड़ा उससे उन्हें आर्थिक प्रश्नों का अध्ययन करने की पहली प्रेरणा मिली।

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