शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

एजुकेशन

Higher Secondary part 1
Feb,1965..638
Higher Secondary part.11,March 1966
Pre Medical Examination of April,1967
First Professional Exam MBBS ..Dec,1968


Second Professional Exam..May,1970
Social and Preventive Medicine..December, 1970
Final MBBS exam Dec.1971
Master of Surgery
September, 1977

पुरानी यादें



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पुरानी
यादें
दर्जी राम लुभाया जी
बहुत बंडियाँ कच्छे
जाट  स्कूल रोहतक

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Dr G. S. Sekhon --My Teacher
टीचर्स डे के बहाने
प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका सूरजमुखी ने प्रभावित किया अपने खुशमिजाज व्यवहार से । हाई स्कूल के वक्त मेरे आदर्श टीचर रहे हैडमास्टर हरनंद राय जी और श्री देवी सिंह फिजिक्स के अध्यापक बहुत कुछ सीखने को मिला किताबी पढ़ाई के अलावा। प्री मेडिकल में कालेज के वक्त श्री हरिचंद हुड्डा । मेडिकल कालेज में प्रथम स्तर पर डॉ आई बी सिंह एनाटोमी विभाग से second profession  के दौरान डॉ वासुदेवा एसपीएम विभाग और third प्रोफेशन में डॉ पी एस मैनी और डॉ उर्मिल कपूर gynae विभाग ने बहुत कुछ सिखाया। एम् एस सर्जरी के वक्त डॉ सूबेदार सिंह और डॉ जी एस सेखों ने मेरे जीवन को मानवीय बनाने में धीमे धीमे बहुत सी चीजें सिखाई। वक्त की कीमत और टाइम schedule की अहमियत । सिम्पलिसिटी। डॉ सेखों कहा करते "A good human being is always a good doctor ,but, not the vice versa .। गदूद के ऑपरेशन के टिप्स। आदि आदि। अपने विद्यार्थियों से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। जनतांत्रिक प्रणाली से टीम के साथ काम करना आसान नहीं होता । शायद ही ऐसा कोई मौका होगा की राउंड के वक्त जूनियर्स पर गुस्सा किया हो या किसी नर्स पर डाँट लगाई हो। खास बात जो सामने आयी वो थी की इस प्रणाली से ओपीडी और दाखिल हुए मरीजों का सबसे ज्यादा विश्वास जीत पाते थे। सीखना सीखाना bilateral process बनता है तो टीचर और स्टूडेंट का बहुत अलग रिस्ता बनता है । अपने सभी शिक्षकों को याद करते हुए और उन विद्यार्थियों को भी याद करते हुए जिनसे भी बहुत कुछ सीखा।
रणबीर

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दूसरी से पांचवी क्लास जाट प्राइमरी स्कूल रोहतक से पास की। मास्टर जी फतेह सिंह दलाल शुरू में फिर साथ में सूरजमुखी बहिनजी, बाद में मास्टर जी दलजीत सिंह राठी  भी गुरुजन थे।
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Some of us still remember the torturing days of strike in Medical College Rohtak for 98 days in the year 1977. The dividion on strikers and non strikers was on extreeme caste based .PGIMS Suffered a lot in post strike period. More or less the same type of caste dirty play is active on the campus again . We should be careful about this . Our main and real issues then take back seat .

The time we went on the longest strike in the medical colleges' history(1978)!! Ved Pal Mehla

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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

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पुरानी यादें --
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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पुरानी यादें
24 -25 साल पहले की बात है । नार्थ जोन सर्जन कांफ्रेंस जम्मू में आयोजित की गई थी । रोहतक से 25-30 डॉक्टर थे । एक दिन सभी का मन वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा का बना। मैने मना किया तो सभी ने अनुरोध किया कि चलें । हम चल दिये ।
       अर्ध कन्वारी से कुछ पहले 4-5 महिलाएं और 5-6 पुरुष परेशान से दिखाई दे रहे थे। हमारे में से किसी ने पूछा-क्या बात है क्या हुआ।
बताया- उनके एक बुजुर्ग पेशाब करने बैठे थे और वे नीचे खाई में लुढ़क गए हैं । उन्हें देखने गए हैं।
       हमने भी बुजुर्ग को ढूंढने की इच्छा बनाई और 5-6 डॉक्टर हम नीचे उतरते चले गए । 150 गज के करीब नीचे उतरने के बाद हमने आवाज लगाई कि क्या बुजुर्ग मिल गए। और नीचे से आवाज आई- हाँ मिल गए। हमने पूछा- कैसी तबियत है? जवाब आया- ठीक हैं। उप्पर रास्ते में खड़े लोगों ने सुना तो कुछ जय माता की बोलते चले गए।
         हमने फिर पूछा कि हम डॉक्टर हैं कोई चोट है तो हम आ जाते हैं मदद करने । बताओ कहाँ पर हो।
फिर आवाज आई थोड़ी धीमी - वो तो चल बसे । इतनी देर में हम भी वहां पहुंच गए थे। पूछा- पहले ठीक क्यों कहा ? जवाब था कि ऊपर वाले रिश्तेदारों में से किसी को सदमा न लग जाये इसलिए ।
        कुछ लोगों को तो लगा कि माता ने उस बुजुर्ग को बचा लिया। मगर सच्चाई यही थी कि माता उस बुजुर्ग को नहीं बचा पाई।
      मैने सभी डॉक्टर सहयोगियों से पूछा -- यदि बुजुर्ग जिंदा होते और चोटिल होते तो हम क्या फर्स्ट एड कर सकते थे । सब ने अपने अपने ढंग से बात रखी। मैने फिर कहा- बिना इमरजेंसी किट के शायद हम ज्यादा फर्स्ट एड करने की हालत में नहीं होते।
         हम सबने तय किया कि जब इस तरह के ग्रुप में कहीं जाएंगे तो इमरजेंसी किट जरूर साथ लेकर चलेंगे ।
बाकियों का तो पता नहीं मैने एक किट जरूर बना ली ।
तीन साल बाद वही कांफ्रेंस पी जी आई चंडीगढ़ में थी। कालेज की बस में गए थे हम सब । वापसी पर अम्बाला पहुंचने से पहले हमारे सामने ट्रैक्टर सड़क के किनारे पलट गया। हमने गाड़ी रुकवाई ।
    ड्राइवर ट्रैक्टर के पहिये के नीचे दबा था । हमने सबने मिलकर उसको निकाला और देखा तो वह शॉक में था । मैं ने इमरजेंसी किट से उसे मेफेंटीन इंजेक्शन दिया और एक वोवरान का inj दिया । कुछ संम्भल गया मरीज । हमने उसे अपनी गाड़ी में लिटाया और उसे अम्बाला सिविल अस्पताल में दाखिल करवाया । इलाज शुरू हुआ तो मरीज और इम्प्रूव हुआ ।
   3 साल तक लगता था यह किट खामखा उठाये फिरता हूँ मगर उस रोज लगा कि खामखा नहीं उठाई किट ।
शायद जो डॉक्टर साथी इन दोनों मौकों पर थे उनको याद हों ये दोनों घटनाएं ।
रणबीर दहिया
9812139001
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डॉ सुरेश शर्मा - पानीपत की चौथी लड़ाई
डा सूरजभान
राजेश अत्रेय
डा शंकर इसराना
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पुरानी यादें --मेरे बॉस डॉ सेखों
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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आज किशनपुरा चौपाल में सुश्री उर्मिला जी भूतपूर्व सरपंच गांगटान और साक्षरता आंदोलन की अग्रणी कार्यकर्ता से मुलाकात हुई। पुरानी यादें उस दौर की सांझा की। बहुत अच्छा लगा । उनके साथ दो महिलाएं अपने स्वाथ्य के बारे परामर्श करने आई थी।
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2014 अगस्त में रिटायरमेंट के टाइम पूरी यूनिट के डॉक्टर एक साथ अपनी पुरानी यादें, पुराने दुख सुख के दिन जो यूनिट में गुजरे थे उन्हें अपने अपने ढंग से याद कर रहे थे। एक सीनियर एस आर ने बताया कि एक बार एक unkown मरीज एक्सीडेंट के साथ आया । उसके पेट में चोट थी। उसको ऑपरेट करने की जरूरत थी मगर उसके ग्रुप का खून ब्लड बैंक में नहीं था । बताया कि सर आपका o पॉजिटिव ब्लड है जो पॉजिटिव दूसरे सभी ग्रुप्स को दिया जा सकता है। आप ब्लड बैंक गए वहां एक यूनिट ब्लड unkown मरीज के लिए दिया और वापिस आकर उसका आपरेशन किया। मरीज बचा लिया गया।
मैने बहुत कोशिश की पुरानी याद को याद करने की । मगर जब डेट आदि बताई तो मुझे भी यकीन हुआ कि ऐसा कुछ हुआ था।
और भी कई ना भुलाई जाने वाली पुरानी यादें साझा की गई। अब थोड़ा उम्र का असर होने लगा है तो सोचा सांझा कर लूँ सभी के साथ। मौके पर लिया गया फैंसला यदि एक ज्यान को भी बचा पाता है एक डॉक्टर के जीवन में तो एक एहसास और विश्वास बढ़ता है डॉक्टर का।
मेरे साथ के हमसफ़र सभी डॉक्टरों को याद करते हुए | मुझे गर्व है अपनी यूनिट के उन सभी डॉक्टरों पर जो मरीजों की सेवा में लग्न हैं।
डॉ रणबीर
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'पानीपत की चौथी लड़ाई' साक्षरता आंदोलन की 1992 की रैली।
***पुरानी यादें***
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Dr O.P.Grewal
पन्द्राह साल हो लिए वे चले गए हमनै छोड़कै।।
उनहत्तर साल बिताए ज्ञान विज्ञान मैं जी तोड़कै।।
डॉ ओम प्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान की जनरल बॉडी मीटिंग में हिस्सेदारी करने का मौका मिला। बहुत सी पुरानी यादें भी ताजा हो गई। डॉ ग्रेवाल के व्यक्तित्व बारे कहने को शब्द नहीं हैं मेरे पास। बहुत ही उत्साहवर्धक मीटिंग रही।
6.6.1937.....24.1.2006
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पुरानी यादें---
मंत्री खुर्सीद अहमद जी :
खेल प्रतियोगिता इनाम वितरण समारोह मेडिकल कॉलेज रोहतक सन 1971 के आस पास ।
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डा• कृष्णा सांगवान,डा• सरोज मुदगिल,डा• सुखबीर सांगवान,डा• रणबीर सिंह दहिया,डा• रणबीर हुड्डा,डा• श्रीराम सिवाच ,डा• मुकेश इन्दौरा ,डा• कोहली।
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पुरानी यादें -- डॉ विकाश कथूरिया, डॉ विकास अग्रवाल, डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ सुनील , डॉ पूजा , डॉ कुलदीप, डॉ राजू राजन, डॉ दीपांशु और सभी कॉलीग्स -- आप सबको सलाम ।
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सिरसली स्वर्गीय संतोष के पोते की शादी में -20 अप्रैल, 2022.पुरानी यादें ताजा हो गई। चम्पा सिंह जी भी मिले।
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आज नित्यानंद स्कूल गया सप्तरंग के प्रोग्राम में तो प्रोफेसर जय सिंह मलिक का फोटो नजर आया। देखकर पुरानी यादें ताजा हो गई। बहुत ही नेक दिल इंसान और दोस्त ।
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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आज बहुत दिनों बाद एनोटमी विभाग के लेक्चर थिएटर  वन में 2 घण्टे के लिए जाने का मौका मिला । 1967 कि यादें ताजा हो गई । पुरानी यादें ; पुराने अध्यापक : डॉ इंदरजीत दीवान, डॉ इंद्रबीर सिंह , डॉ छिबर, डॉ गांधी, डॉ राठी याद आ गए। 67 बैच के साथी भी दिमाग में घूम गए । सुशील खुराना, आर एन कालरा, अशोक भाटिया, दयासागर गोयल, हरीश भंडारी , रमेश मित्तल, ईश्वर नासिर, रीटा गुलाटी, कर्मजीत कौर, कृष्णा सहरावत , स्वर्ण लता, विमला कादयान आदि आदि।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
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795 पिल्लर(टिकरी बॉर्डर) पर जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा 1 साल किसानों के लिए फ्री हेल्थ कैम्प का आयोजन । आज वहां से गुजरने का मौका मिला  तो पुरानी यादें ताजा हो गयी तो यह वीडियो बना लिया।
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भुली बिसरी यादें
सन 1956 की बात है की मेरे पिताजी चौधरी जागे राम सिरसा से बतोर इंस्पेक्टर एग्रीकल्चर की पोस्ट से  बतौर फार्म मैनेजर सरकारी एग्रीकल्चर फार्म रोहतक में तबादला हो कर आए। यह फार्म 100 एकड़ जमीन में बना सरकारी एग्रीकल्चर फार्म था , जिसमें हर तरह की खेती की जाती थी । चार जोड़ी हट्टे कट्टे बैल थे जो खेती करने में  बहुत कारगर रूप से इस्तेमाल किए जाते थे ।  पिताजी 1966 तक यहां पर रहे और यहीं से रिटायर हो गए।  आने वाले दिनों में यह फार्म नहीं रहा और जमीन कुछ बेच दी गई कुछ पर सरकारी दफ्तर खुलते गए और सरकारी अफसरों के रहने के लिये कोठियां और मकान बनते गए। सिरफ़ एग्रीकल्चर फार्म का मेन गेट बचा है जो कमिश्नर के  रेजिडेंस और दफ्तर दोनों यहां हैं, तक जाता है बाकि एग्रो मॉल इसकी जमीन में बना और कई कॉलोनी भी बन गई । बहुत से मकान हैं । दो पीपल के पेड़ आज भी पहचाने जा सकते हैं जो हमारे घर के सामने मौजूद थे। भूली बिसरी यादें हैं पूरे फॉर्म में घूमते थे। पिताजी बहुत सख्त मिजाज थे और फार्म के खेत से चूसने के लिए गन्ने भी नहीं लाने देते थे। बोहर वालों के खेतों से लेकर आते थे।  और चीजों का तो मतलब ही नहीं । यहीं से मैं बिल्कुल साथ लगता जाट स्कूल है वहां पर पढ़ने जाने लगा । पहले प्राइमरी स्कूल में पढ़ा  और फिर हाई स्कूल में छठी क्लास से हायर सेकेंडरी किया । बहुत सी यादें हैं उस दौर की जिन्हें याद करना इतना आसान नहीं है आज एक बार  कोशिश है उन पुरानी यादों को याद करने की।
प्राइमरी स्कूल में पहले एक ही टीचर थे मास्टर फतेह सिंह दलाल। तीसरी में हुए तो सूरजमुखी बहिनजी ने भी ज्वाइन कर लिया। पांचवी तक पहुंचे तो मास्टर दलजीत सिंह राठी जी भी क्लास लेने लगे।
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भूली बिसरी यादें
1978 में मेडिकल रोहतक में 98 दिन की हड़ताल हुई..उन दिनों चौधरी हरद्वारी लाल वाईस चांसलर थे। मेरे जीवन में बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई यह हड़ताल।
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वार्ड  6-- भूली बिसरी यादें
एक बार की बात की झरौट के बुजुर्ग अपनी घरवाली को लेकर आये । उसकी एक टांग में गैंग्रीन हो गई बायीं या दायीं याद नहीं। हमने सभी concerned विभागों की राय ली और यह तय हुआ कि amputation करनी होगी । ताऊ को समझाया। कटने की बात सुनकर दोनों घबरा गए । ताऊ मेरे कमरे में आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मैने बिठाया और उसकी और देखा। " काटनी ए पड़ैगी डॉ साहब। और कोए राह कोण्या इसकी ज्यान नै खतरा करदेगी या गैंग्रीन -- मैंने जवाब दिया बहुत धीमे से। ताऊ बोल्या-- न्यों कहवै सैं अक गुड़गांव मैं शीतला माता की धोक मारकै ठीक होज्यां हैं। मैंने कहा-- मेरी जानकारी में नहीं। ताऊ-- एक बार जाना चाहवैं सैं। फेर आपके डॉ न्यों बोले-- LAMA होज्या । छुट्टी कोण्या देवें । और फिर हमारे वार्ड में दाखिला नहीं हो सकता। चाहूँ सू आप के वार्ड मैं इलाज करवाना। मैने कहा एक शर्त है-- जै इसकी टांग धोक मारकै ठीक होज्या तो भी लियाईये और नहीं ठीक हो तो भी। ठीक होगी तो मैं बाकी के इसे मरीज भी वहीं गुड़गांव भेज दिया करूंगा और ठीक न हो तो आप ये सारी बात एक पर्चे में लिखकर बांटना कि वहां मेरी घरवाली ठीक नहीं हुई। हम ने discharge on request कर दिया । दो दिन बाद वापिस आ गया । महिला की हालत ज्यादा खराब हुई थी। खैर amputation ortho विभाग  के सहयोग से की और महिला ठीक होकर चली गयी । बुजुर्ग जाने से पहले आया कमरे में और कहने लगा-- पर्चा छापना चाहूँ सूँ फेर गांव वाले कह रहे हैं शीतला माता
के खिलाफ पर्चा। बहोत दबाव सै मेरे पै डॉ साहब । पैरों की तरफ हाथ किये । मैने बुजुर्ग को छाती से लगा लिया और आशीर्वाद देने को कहा।
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भुली बिसरी यादें -- मेडिकल कालेज वार्षिक खेल आयोजन--2012
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
जनवरी 2017
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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

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पुरानी
यादें
दर्जी राम लुभाया जी
बहुत बंडियाँ कच्छे
जाट  स्कूल रोहतक

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Dr G. S. Sekhon --My Teacher
टीचर्स डे के बहाने
प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका सूरजमुखी ने प्रभावित किया अपने खुशमिजाज व्यवहार से । हाई स्कूल के वक्त मेरे आदर्श टीचर रहे हैडमास्टर हरनंद राय जी और श्री देवी सिंह फिजिक्स के अध्यापक बहुत कुछ सीखने को मिला किताबी पढ़ाई के अलावा। प्री मेडिकल में कालेज के वक्त श्री हरिचंद हुड्डा । मेडिकल कालेज में प्रथम स्तर पर डॉ आई बी सिंह एनाटोमी विभाग से second profession  के दौरान डॉ वासुदेवा एसपीएम विभाग और third प्रोफेशन में डॉ पी एस मैनी और डॉ उर्मिल कपूर gynae विभाग ने बहुत कुछ सिखाया। एम् एस सर्जरी के वक्त डॉ सूबेदार सिंह और डॉ जी एस सेखों ने मेरे जीवन को मानवीय बनाने में धीमे धीमे बहुत सी चीजें सिखाई। वक्त की कीमत और टाइम schedule की अहमियत । सिम्पलिसिटी। डॉ सेखों कहा करते "A good human being is always a good doctor ,but, not the vice versa .। गदूद के ऑपरेशन के टिप्स। आदि आदि। अपने विद्यार्थियों से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। जनतांत्रिक प्रणाली से टीम के साथ काम करना आसान नहीं होता । शायद ही ऐसा कोई मौका होगा की राउंड के वक्त जूनियर्स पर गुस्सा किया हो या किसी नर्स पर डाँट लगाई हो। खास बात जो सामने आयी वो थी की इस प्रणाली से ओपीडी और दाखिल हुए मरीजों का सबसे ज्यादा विश्वास जीत पाते थे। सीखना सीखाना bilateral process बनता है तो टीचर और स्टूडेंट का बहुत अलग रिस्ता बनता है । अपने सभी शिक्षकों को याद करते हुए और उन विद्यार्थियों को भी याद करते हुए जिनसे भी बहुत कुछ सीखा।
रणबीर

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दूसरी से पांचवी क्लास जाट प्राइमरी स्कूल रोहतक से पास की। मास्टर जी फतेह सिंह दलाल शुरू में फिर साथ में सूरजमुखी बहिनजी, बाद में मास्टर जी दलजीत सिंह राठी  भी गुरुजन थे।
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Some of us still remember the torturing days of strike in Medical College Rohtak for 98 days in the year 1977. The dividion on strikers and non strikers was on extreeme caste based .PGIMS Suffered a lot in post strike period. More or less the same type of caste dirty play is active on the campus again . We should be careful about this . Our main and real issues then take back seat .

The time we went on the longest strike in the medical colleges' history(1978)!! Ved Pal Mehla

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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

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पुरानी यादें --
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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पुरानी यादें
24 -25 साल पहले की बात है । नार्थ जोन सर्जन कांफ्रेंस जम्मू में आयोजित की गई थी । रोहतक से 25-30 डॉक्टर थे । एक दिन सभी का मन वैष्णो देवी मंदिर की यात्रा का बना। मैने मना किया तो सभी ने अनुरोध किया कि चलें । हम चल दिये ।
       अर्ध कन्वारी से कुछ पहले 4-5 महिलाएं और 5-6 पुरुष परेशान से दिखाई दे रहे थे। हमारे में से किसी ने पूछा-क्या बात है क्या हुआ।
बताया- उनके एक बुजुर्ग पेशाब करने बैठे थे और वे नीचे खाई में लुढ़क गए हैं । उन्हें देखने गए हैं।
       हमने भी बुजुर्ग को ढूंढने की इच्छा बनाई और 5-6 डॉक्टर हम नीचे उतरते चले गए । 150 गज के करीब नीचे उतरने के बाद हमने आवाज लगाई कि क्या बुजुर्ग मिल गए। और नीचे से आवाज आई- हाँ मिल गए। हमने पूछा- कैसी तबियत है? जवाब आया- ठीक हैं। उप्पर रास्ते में खड़े लोगों ने सुना तो कुछ जय माता की बोलते चले गए।
         हमने फिर पूछा कि हम डॉक्टर हैं कोई चोट है तो हम आ जाते हैं मदद करने । बताओ कहाँ पर हो।
फिर आवाज आई थोड़ी धीमी - वो तो चल बसे । इतनी देर में हम भी वहां पहुंच गए थे। पूछा- पहले ठीक क्यों कहा ? जवाब था कि ऊपर वाले रिश्तेदारों में से किसी को सदमा न लग जाये इसलिए ।
        कुछ लोगों को तो लगा कि माता ने उस बुजुर्ग को बचा लिया। मगर सच्चाई यही थी कि माता उस बुजुर्ग को नहीं बचा पाई।
      मैने सभी डॉक्टर सहयोगियों से पूछा -- यदि बुजुर्ग जिंदा होते और चोटिल होते तो हम क्या फर्स्ट एड कर सकते थे । सब ने अपने अपने ढंग से बात रखी। मैने फिर कहा- बिना इमरजेंसी किट के शायद हम ज्यादा फर्स्ट एड करने की हालत में नहीं होते।
         हम सबने तय किया कि जब इस तरह के ग्रुप में कहीं जाएंगे तो इमरजेंसी किट जरूर साथ लेकर चलेंगे ।
बाकियों का तो पता नहीं मैने एक किट जरूर बना ली ।
तीन साल बाद वही कांफ्रेंस पी जी आई चंडीगढ़ में थी। कालेज की बस में गए थे हम सब । वापसी पर अम्बाला पहुंचने से पहले हमारे सामने ट्रैक्टर सड़क के किनारे पलट गया। हमने गाड़ी रुकवाई ।
    ड्राइवर ट्रैक्टर के पहिये के नीचे दबा था । हमने सबने मिलकर उसको निकाला और देखा तो वह शॉक में था । मैं ने इमरजेंसी किट से उसे मेफेंटीन इंजेक्शन दिया और एक वोवरान का inj दिया । कुछ संम्भल गया मरीज । हमने उसे अपनी गाड़ी में लिटाया और उसे अम्बाला सिविल अस्पताल में दाखिल करवाया । इलाज शुरू हुआ तो मरीज और इम्प्रूव हुआ ।
   3 साल तक लगता था यह किट खामखा उठाये फिरता हूँ मगर उस रोज लगा कि खामखा नहीं उठाई किट ।
शायद जो डॉक्टर साथी इन दोनों मौकों पर थे उनको याद हों ये दोनों घटनाएं ।
रणबीर दहिया
9812139001
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डॉ सुरेश शर्मा - पानीपत की चौथी लड़ाई
डा सूरजभान
राजेश अत्रेय
डा शंकर इसराना
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पुरानी यादें --मेरे बॉस डॉ सेखों
1976 -1977 का दौर
मेरी पोस्टिंग spm deptt की तरफ से सिविल अस्पताल बेरी में कर दी गई। सिविल अस्पताल के अलावा लेडीज का विंग भी था बाजार के अंदर जा कर । उसमें एक बुजुर्ग महिला फार्मासिस्ट की पोस्टिंग थी। designation दूसरा भी हो सकता है । वहां से सन्देश आया शाम के वक्त कि एक मुश्किल डिलीवरी है और डॉक्टर साहब को बुलाया है। मैं सोचता जा रहा था कि डेढ़ महीने की  maternity ड्यूटी में 5 या 6 डिलीवरी देखी थी। सोचते सोचते पहुंच कर देखा कि breech डिलीवरी थी। monaster था। चार टांगे , चार बाजू , धड़ एक और दो सिर वाला। चारों टांगे और दो बाजू डिलीवर हो चुकी थी। देख कर पसीने छूट गए। एक मिनट सोचा कि मेडिकल भेज दिया जाए। फिर सोचा इस हालत में कैसे भेजेंगे? अगले ही पल सोचा कोशिश करते हैं । मन ही मन Dr GS Sekhon मेरे बॉस याद आ गए। वे कहते थे कि कितना भी मुश्किल मामला हो अपनी कॉमन सैंस को मत भूलो और पक्के निश्चय के साथ शांत भाव से जुट जाओ । जुट गया । जल्दी लोकल लगाकर  episiotomy incision दिया और निरीक्षण किया। महिला का हौंसला बढ़ाया। बाकी के दो बाजू डिलीवर करने में 15 मिन्ट लगे । पसीने छूट रहे थे । खैर फिर मुश्किल से एक सिर और डिलीवर करवाया। फिर भी कुछ बाकी था । देखा अच्छी तरह तो एक सिर अभी बाकी था और पहले वाले सिर से कुछ बड़ा था । कोशिश की । episiotomy incision को extend किया । 15 से 20 मिन्ट की मश्शक्त के बाद दूसरा सिर भी डिलीवर हो गया । monaster था डेथ हो चुकी थी। मगर हम महिला को बचा पाए। पता लगता गया कि दो सिर चार बाजू चार टांगो वाला बच्चा पैदा हुआ है । कौतूहल वश बहुत लोग इकट्ठे हो गए थे। 6 महीने के बाद वापिस spm deptt में आ गया । 2-3 साल के बाद एक हैंड प्रोलैप्स का केस रेफ़ेर हुआ मेडिकल के लिए । रहडू पर लिटा कर बाजार के बीच से ले जा रहे थे तो किसी ने पूछा के बात कहां ले जा रहे हो। बताया कि एक हाथ बाहर आ गया । मेडिकल ले जा रहे हैं । तो अनजाने में उस बुजुर्ग ने कहा - एक बख्त वो था जिब चार चार हाथां आले की डिलीवरी करवा दी थी, आज एक हाथ काबू कोनी आया। किसी ने बताया था जब वह मरीज मेरे पास 6 वार्ड में दाखिल था । मेरे को मेरे बॉस Dr सेखों एक बार फिर याद आये। बहुत अलग किस्म की इंसानियत के धनी थे Dr सेखों।
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आज किशनपुरा चौपाल में सुश्री उर्मिला जी भूतपूर्व सरपंच गांगटान और साक्षरता आंदोलन की अग्रणी कार्यकर्ता से मुलाकात हुई। पुरानी यादें उस दौर की सांझा की। बहुत अच्छा लगा । उनके साथ दो महिलाएं अपने स्वाथ्य के बारे परामर्श करने आई थी।
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2014 अगस्त में रिटायरमेंट के टाइम पूरी यूनिट के डॉक्टर एक साथ अपनी पुरानी यादें, पुराने दुख सुख के दिन जो यूनिट में गुजरे थे उन्हें अपने अपने ढंग से याद कर रहे थे। एक सीनियर एस आर ने बताया कि एक बार एक unkown मरीज एक्सीडेंट के साथ आया । उसके पेट में चोट थी। उसको ऑपरेट करने की जरूरत थी मगर उसके ग्रुप का खून ब्लड बैंक में नहीं था । बताया कि सर आपका o पॉजिटिव ब्लड है जो पॉजिटिव दूसरे सभी ग्रुप्स को दिया जा सकता है। आप ब्लड बैंक गए वहां एक यूनिट ब्लड unkown मरीज के लिए दिया और वापिस आकर उसका आपरेशन किया। मरीज बचा लिया गया।
मैने बहुत कोशिश की पुरानी याद को याद करने की । मगर जब डेट आदि बताई तो मुझे भी यकीन हुआ कि ऐसा कुछ हुआ था।
और भी कई ना भुलाई जाने वाली पुरानी यादें साझा की गई। अब थोड़ा उम्र का असर होने लगा है तो सोचा सांझा कर लूँ सभी के साथ। मौके पर लिया गया फैंसला यदि एक ज्यान को भी बचा पाता है एक डॉक्टर के जीवन में तो एक एहसास और विश्वास बढ़ता है डॉक्टर का।
मेरे साथ के हमसफ़र सभी डॉक्टरों को याद करते हुए | मुझे गर्व है अपनी यूनिट के उन सभी डॉक्टरों पर जो मरीजों की सेवा में लग्न हैं।
डॉ रणबीर
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'पानीपत की चौथी लड़ाई' साक्षरता आंदोलन की 1992 की रैली।
***पुरानी यादें***
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Dr O.P.Grewal
पन्द्राह साल हो लिए वे चले गए हमनै छोड़कै।।
उनहत्तर साल बिताए ज्ञान विज्ञान मैं जी तोड़कै।।
डॉ ओम प्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान की जनरल बॉडी मीटिंग में हिस्सेदारी करने का मौका मिला। बहुत सी पुरानी यादें भी ताजा हो गई। डॉ ग्रेवाल के व्यक्तित्व बारे कहने को शब्द नहीं हैं मेरे पास। बहुत ही उत्साहवर्धक मीटिंग रही।
6.6.1937.....24.1.2006
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पुरानी यादें---
मंत्री खुर्सीद अहमद जी :
खेल प्रतियोगिता इनाम वितरण समारोह मेडिकल कॉलेज रोहतक सन 1971 के आस पास ।
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डा• कृष्णा सांगवान,डा• सरोज मुदगिल,डा• सुखबीर सांगवान,डा• रणबीर सिंह दहिया,डा• रणबीर हुड्डा,डा• श्रीराम सिवाच ,डा• मुकेश इन्दौरा ,डा• कोहली।
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पुरानी यादें -- डॉ विकाश कथूरिया, डॉ विकास अग्रवाल, डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ सुनील , डॉ पूजा , डॉ कुलदीप, डॉ राजू राजन, डॉ दीपांशु और सभी कॉलीग्स -- आप सबको सलाम ।
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सिरसली स्वर्गीय संतोष के पोते की शादी में -20 अप्रैल, 2022.पुरानी यादें ताजा हो गई। चम्पा सिंह जी भी मिले।
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आज नित्यानंद स्कूल गया सप्तरंग के प्रोग्राम में तो प्रोफेसर जय सिंह मलिक का फोटो नजर आया। देखकर पुरानी यादें ताजा हो गई। बहुत ही नेक दिल इंसान और दोस्त ।
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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आज बहुत दिनों बाद एनोटमी विभाग के लेक्चर थिएटर  वन में 2 घण्टे के लिए जाने का मौका मिला । 1967 कि यादें ताजा हो गई । पुरानी यादें ; पुराने अध्यापक : डॉ इंदरजीत दीवान, डॉ इंद्रबीर सिंह , डॉ छिबर, डॉ गांधी, डॉ राठी याद आ गए। 67 बैच के साथी भी दिमाग में घूम गए । सुशील खुराना, आर एन कालरा, अशोक भाटिया, दयासागर गोयल, हरीश भंडारी , रमेश मित्तल, ईश्वर नासिर, रीटा गुलाटी, कर्मजीत कौर, कृष्णा सहरावत , स्वर्ण लता, विमला कादयान आदि आदि।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
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795 पिल्लर(टिकरी बॉर्डर) पर जन स्वास्थ्य अभियान द्वारा 1 साल किसानों के लिए फ्री हेल्थ कैम्प का आयोजन । आज वहां से गुजरने का मौका मिला  तो पुरानी यादें ताजा हो गयी तो यह वीडियो बना लिया।
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भुली बिसरी यादें
सन 1956 की बात है की मेरे पिताजी चौधरी जागे राम सिरसा से बतोर इंस्पेक्टर एग्रीकल्चर की पोस्ट से  बतौर फार्म मैनेजर सरकारी एग्रीकल्चर फार्म रोहतक में तबादला हो कर आए। यह फार्म 100 एकड़ जमीन में बना सरकारी एग्रीकल्चर फार्म था , जिसमें हर तरह की खेती की जाती थी । चार जोड़ी हट्टे कट्टे बैल थे जो खेती करने में  बहुत कारगर रूप से इस्तेमाल किए जाते थे ।  पिताजी 1966 तक यहां पर रहे और यहीं से रिटायर हो गए।  आने वाले दिनों में यह फार्म नहीं रहा और जमीन कुछ बेच दी गई कुछ पर सरकारी दफ्तर खुलते गए और सरकारी अफसरों के रहने के लिये कोठियां और मकान बनते गए। सिरफ़ एग्रीकल्चर फार्म का मेन गेट बचा है जो कमिश्नर के  रेजिडेंस और दफ्तर दोनों यहां हैं, तक जाता है बाकि एग्रो मॉल इसकी जमीन में बना और कई कॉलोनी भी बन गई । बहुत से मकान हैं । दो पीपल के पेड़ आज भी पहचाने जा सकते हैं जो हमारे घर के सामने मौजूद थे। भूली बिसरी यादें हैं पूरे फॉर्म में घूमते थे। पिताजी बहुत सख्त मिजाज थे और फार्म के खेत से चूसने के लिए गन्ने भी नहीं लाने देते थे। बोहर वालों के खेतों से लेकर आते थे।  और चीजों का तो मतलब ही नहीं । यहीं से मैं बिल्कुल साथ लगता जाट स्कूल है वहां पर पढ़ने जाने लगा । पहले प्राइमरी स्कूल में पढ़ा  और फिर हाई स्कूल में छठी क्लास से हायर सेकेंडरी किया । बहुत सी यादें हैं उस दौर की जिन्हें याद करना इतना आसान नहीं है आज एक बार  कोशिश है उन पुरानी यादों को याद करने की।
प्राइमरी स्कूल में पहले एक ही टीचर थे मास्टर फतेह सिंह दलाल। तीसरी में हुए तो सूरजमुखी बहिनजी ने भी ज्वाइन कर लिया। पांचवी तक पहुंचे तो मास्टर दलजीत सिंह राठी जी भी क्लास लेने लगे।
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भूली बिसरी यादें
1978 में मेडिकल रोहतक में 98 दिन की हड़ताल हुई..उन दिनों चौधरी हरद्वारी लाल वाईस चांसलर थे। मेरे जीवन में बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई यह हड़ताल।
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वार्ड  6-- भूली बिसरी यादें
एक बार की बात की झरौट के बुजुर्ग अपनी घरवाली को लेकर आये । उसकी एक टांग में गैंग्रीन हो गई बायीं या दायीं याद नहीं। हमने सभी concerned विभागों की राय ली और यह तय हुआ कि amputation करनी होगी । ताऊ को समझाया। कटने की बात सुनकर दोनों घबरा गए । ताऊ मेरे कमरे में आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मैने बिठाया और उसकी और देखा। " काटनी ए पड़ैगी डॉ साहब। और कोए राह कोण्या इसकी ज्यान नै खतरा करदेगी या गैंग्रीन -- मैंने जवाब दिया बहुत धीमे से। ताऊ बोल्या-- न्यों कहवै सैं अक गुड़गांव मैं शीतला माता की धोक मारकै ठीक होज्यां हैं। मैंने कहा-- मेरी जानकारी में नहीं। ताऊ-- एक बार जाना चाहवैं सैं। फेर आपके डॉ न्यों बोले-- LAMA होज्या । छुट्टी कोण्या देवें । और फिर हमारे वार्ड में दाखिला नहीं हो सकता। चाहूँ सू आप के वार्ड मैं इलाज करवाना। मैने कहा एक शर्त है-- जै इसकी टांग धोक मारकै ठीक होज्या तो भी लियाईये और नहीं ठीक हो तो भी। ठीक होगी तो मैं बाकी के इसे मरीज भी वहीं गुड़गांव भेज दिया करूंगा और ठीक न हो तो आप ये सारी बात एक पर्चे में लिखकर बांटना कि वहां मेरी घरवाली ठीक नहीं हुई। हम ने discharge on request कर दिया । दो दिन बाद वापिस आ गया । महिला की हालत ज्यादा खराब हुई थी। खैर amputation ortho विभाग  के सहयोग से की और महिला ठीक होकर चली गयी । बुजुर्ग जाने से पहले आया कमरे में और कहने लगा-- पर्चा छापना चाहूँ सूँ फेर गांव वाले कह रहे हैं शीतला माता
के खिलाफ पर्चा। बहोत दबाव सै मेरे पै डॉ साहब । पैरों की तरफ हाथ किये । मैने बुजुर्ग को छाती से लगा लिया और आशीर्वाद देने को कहा।
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भुली बिसरी यादें -- मेडिकल कालेज वार्षिक खेल आयोजन--2012
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समस्त कर्मचारी व छात्र पीजीआईएमएस रोहतक द्वारा बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के 131वें जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम ।
पीजीआईएमएस,रोहतक लेक्चर थिएटर -1 में।
इस 1 थियेटर में कभी 1967से 1971के  दौर में अपने गुरुओं से पढ़ा और बहुत कुछ सीखा और फिर 1983 से 2014 तक पढ़ाया भी। बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गयी। (42 साल का सफर)
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हरियाणा के प्रथम साक्षरता अभियान, जो कि पानीपत जिले में चला था, उस अभियान के एक परोधा डॉ. रणबीर सिंह दहिया (पी.जी.आई.एम.एस. के सेवानिवृत्त प्रोफेसर) को जिला विकास भवन में आयोजित हरियाणा विज्ञान मंच के कार्यक्रम में सुनने का मौका मिला। सचमुच आज भी युवाओं जैसा जोश हैं डॉ. दहिया में।

इसी कार्यक्रम में कुछ फलैक्स  पर मेरे द्वारा विज्ञान लोकप्रियकरण एवं अंधविश्वासों के खिलाफ लिखे लेख और कुछ रिपोर्ट भी छपी हुई थी। पुरानी यादे ताजा हो गई। धन्यवाद, हरियाणा विज्ञान मंच का।
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कल भिवानी में डॉ अनिल जांगड़ा, डॉ शिव शंकर भारद्वाज , डॉ ईश्वर दास और डॉ त्रिलोकी गुप्ता से मिलने का और पूरानी यादें ताजा करने का मौका मिला और भरपूर सहयोग मिला ।
जनवरी 2017
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पुराणी यादें
MBBS के बाद इंटर्नशिप कर रहे थे । 3 महीने की रूरल पोस्टिंग बेरी में थी । SPM विभाग की तरफ से 10 दिन का हेल्थ कैम्प जहाजगढ़ माजरा में लगा। सर्जरी विभाग से सीनियर सर्जन डॉक्टर छाबड़ा की ड्यूटी थी । मेरी ड्यूटी भी सर्जरी सेक्सन में थी । पहले 3 दिन सुबह OPD और शाम को सर्जरी होती। एक दिन शायद बदलू राम का मरीज गर्दन के पिछले हिस्से (Nape of neck) में एक काफी बड़ी गाँठ लेकर आया। उसका diagnosis लाइपोमा(lipoma) बना। शाम को 7 बजे ऑपरेशन शुरू किया। डॉक्टर बलबीर छाबड़ा बेहोशी विभाग से थे ।
पौने घंटे से ज्यादा हो गया । खून ज्यादा बाह गया। गाँठ निकल नहीं पा रही थी । दो यूनिट खून की जरूरत पड़ी। लैब तकनीशियन नहीं मिला। ताला तोड़कर सिट्रेट निकाला और मरीज का सैम्पल लिया । spm deptt के पास एक ट्रक था उस वक्त वाही था। driver जय नारायण था और शाम को बरसात भी तगड़ी हुई थी । गांगटांन गाँव से परली तरफ सड़क पर काफी दूर तक पानी था ।मैंने जय नारायण को कहा कि फुल स्पीड से ट्रक चला मरीज का बचाना बहुत जरूरी है हमें अपनी जान की परवाह नहीं करनी है ।
फुल स्पीड से चलाया। रोहतक पहुंचे । डॉक्टर एल सी गुप्ता को घर से लिया और दो यूनिट ब्लड लेकर हम 1.5 घंटे में जहाजगढ़ माजरा वापिस थे । सब हैरान थे । ऑपरेशन हो चूका था। खून बहुत बह गया था। खून चढ़ाया गया। बदलूराम बच गया। मैंने जयनारायण का बहुत बहुत धन्यवाद किया। Biopsy Report  में sarcoma (एक तरह का कैंसर आया) । बाकि इलाज मेडिकल में चला और कई साल जिया बदलू राम ।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

कविताएं**

जिस्म में ताकत है हमारे यारो

सीनों में विरासत है हमारे यारो

फितरत में बगावत है हमारे यारो

समकतो.

काम में हिफाजत है हमारे यारो

पता तुम में हिमाकत है हमारे यारो

तुमसे ही आहत हैं हम हमारे यारो
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याद तुम्हारी-साफगोई आती है यारो बेझिझकता तुम्हारा कद बढ़ाती है यारो तुम्हारी सलाह दिल में समाती है यारा समाज की उलभने सुलभाती है यारा
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आर्थिक मन्दी
आर्थिक मन्दी के दौर ने सताया हमको 
जेब ढीली कर दी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए 
आई टी के कई योद्धा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल भाता नाथा जिसको 
उसी से भीख मांगनी पड़ रही उनको 
पड़ सकता दिल पर बुरा असर बताया चिकित्सकों ने हाल में ऐसा भी फरमाया दिल के दौरे से कैसे आज बचा जाऐगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहुंचाएगा'
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छबके
छबके मारने ना आते तो आज तूं कामयाब नहीं 
बिना सिफारिस कहां नौकरी पूरा होवे ख्वाब नहीं 
छल कपट बिना होवे मानस का आज गुजारा ना 
बिना माला घालें कई हजार की नेता का सहारा ना 
भीतर काला बाहर सफेद‌ यो मुखौटा पहन लिया 
जिसके भीतर सफेद उसने ये कहर सहन किया 
सब कुछ बहग्या आज किसपै कोये यकीन करे
थोड़े घने बचे उनको ये सिस्टम घणा गमगीन करे 
बिना संघर्ष नहीं गुजारा रणबीर यो जान लियो 
मानवता एक दिन जीतैगी बात इतनी मान लियो ।।
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चरागे शाम
चरागे शाम ये जलाने का मौका आया यारो गरीब का घर बसाने का मौका आया यारो 
मंदी का दौर संकट है बेरोजगारी का देखो 
ये एकता पूरी दिखाने का मौका आया यारो 
अमीरी का भार गरीबों पे बढ़ाया जा रहा क्यों अपना विरोध जताने का मौका आया यारो 
अब तक लूटा जिन्होंने मानवता को दोस्तो उसकी नींद उड़ाने का मौका आया यारो 
इश्क और पशुता में फर्क क्या होता है यही 
अब दुनिया की बताने का मौका आया यारो 

*****
नीतियों के वार
तुमने किया हर बार नीतियों से वार ये 
जख्में दिल दिये हैं हमको बार बार ये 
नए अंदाज और नए तरीके हैं तुम्हारे 
पहले तो धीभी थी तेज हुई रफ्तार ये
सच न बताओ उसके काले कारनामों 
पर जल्दी पर्दा डालो कहती सरकार ये 
किसान की सब्सिडी पे डाका डाल रहे हैं 
आत्म हत्या कर रहा है उजड़ी बहार ये
रणबीर अब और क्या क्या गिनवाऊं मैं
पता है सारा इनको बनते हैं होशियार ये

*****
इंकलाब
मुझे इकलाब का मौसम लगा है तेरी आंखों में 
विश्वास है आगाज है और घटा है तेरी आंखों में 
न क्यों रस्क हो उस पर मुझे जिसने पैदा किया 
मुझे यह लगने लगा कुछ जुदा है तेरी आंखों में 
तेरा साथ बहुत कुछ आज मायने रखता है यारो 
मेरे मकसद का एक आसरा दिखे तेरी आंखों में
नजर भर देख लेने से उमंगे झूम जाती हैं यारो 
आहवान का खास सिलसिला है तेरी आखों में 
रणबीर देख रहे हैं इन्कलाब जिंदाबाद का नारा 
सुबह और शाम कैसे झलकता है तेरी आंखों में.

16.1.2009.
***
लालच में तेरा सब कुछ खो गया बंदे 
अकेलेपन का ठूंठ हरा हो गया बंदे 
अब दोस्तों को ढूंढ़ोगे यहां तुम यारो 
जिगरी था दोस्त तुम्हारा वो गया बंदे 
दया त्याग मानवता सब भुला दिए हैं 
उसे कैसे भुला दोगे जो चला गया बन्दे 
उसका वास्ता मत देना मक्कारो हमें 
वह भी तुम्हारे ही घर में सो गया बंदे 
गरीब हंस बोल लेता कभी कभी रोता 
वो आसुंओं से तेरा चेहरा धो गया बंदे
****
बच्चे तरुण युवा लड़‌की रह पायें वो गांव कहाँ 
गाँव में बसेवा नहीं तो बताओ हम जायें कहां 
गांव नहीं गांव रहे ना शहर ही बन पाए गांव 
पहला उजड़ गया है नया नजर न आये गांव एक दूजे के कन्धों पर पैर रखते जा रहे देखो 
मानवता खोती जा रही काले बादल छा रहे देखो 
पैसा मंजिल बन गया बाजार यहां आया देखो 
खाओ पियो मौज करो नशा कैसा छाया देखो 
तुम्हें गैरो से कब फुरसत हम ग़म से न खाली 
हमारी चाहत छोड़ के गैरों से दोस्ती निभाली 
चलो आज की दुनिया में हमऑउट डेट हुए हमोर बंद दरवाजे हैं तुम्हारे खुले सब गेट हुए

******
यह तो कभी सोचा ही नहीं था 
दुश्मन से लड़ते लड़ते एक दिन 
हम खुद आपस में भिड़ जायेंगे 
हमारी कमजोरी या चाल उनकी 
क्या हम असलियत समझ पायेंगे 
सोचना बैठ कर ठण्डे दिमाग से 
कब कदम से कदम मिलायेंगे
****
"अमरीका के बारे में
 जानते हो?  
 साफ-सफाई है
 ऊंची ऊंची इमारते हैं
बिजली कभी गुल नहीं होती 
काम करवाने का पैसा 
देना नही पड़ता है 
बहुत उन्नतशील है अमरीका 
पशुओं को गेहूं  खिलाता है 
फिर  पशुओं को खुद खाता है
छोटी मच्छलियों को पालता है
 फिर उन्हें बड़ी मच्छलियों को
 खिलाता है हंसते हंसते 
जब इससे भी काम नहीं चलता 
तो आतंक फैलाता है या फिर 
फैलवाता है 
युद्ध करता है युद्ध करवाता है 
हथियार दोनों को बेचता है
अमरीका 
उसे क्या  मां की कोख खाली 
होती है तो हो चाहे वह 
इस पार की मां है या उस पार की 
जैसे अब पाकिस्तान और 
 हिन्दुस्तान दोनों को बेच रहा है 
अपने हथियार अमरीका, 
अपने परांठे सेक रहा है 
अब पाकिस्तान हिन्दु‌स्तान 
लड़ें या न लड़ें उसने तो अपने 
हथियारों का सौदा कर ही लिया 
इसकी चाल समझना है मुश्किल
दिमाग हो तो समझें चाल हम
इसे तो गिरवी रख दिया हमने
अपने परम परमेश्वर भगवान 
के पास
आस्था सवाल नहीं चाहती
सोचना नहीं चाहती
मगर अपने तौर पर सोचना
एक न एक दिन पड़ेगा हम सबको
उस दिन अमरीका के बारे में 
बहुत जान चुके होंगे हम।

******
      दूसरी दुनिया संभव है
सड़कों पर मजदूर आए थे
दूर दूर से पूरे भारत देश के
साथ ही बुद्धिजीवी भी आए थे
कोई इंजीनियर कोई डॉक्टर
कोई कोई समाज शास्त्री
'सब रंगों का था समावेश 
भारत देश हमारा देश '
' बिना महिला सहयोग के
हमारा विकास अधूरा है '
' साक्षरता हम वंचितों का
एक पैना हथियार है '
इन सब नारों की गूंज
सुनाई दी रांची शहर में
एक नई दुनिया की बात 
कई तरह से की गई वहां
जहां गरीब अमीर की
जात गौत और नात की
नाबराबरी लिंग अनुपात की
जहां ऊंच और नीच की 
जहां ज्ञान के बंटवारे की
बात बीमारी के इलाज की
असमानताएं खत्म होती
जायें
मानव मानव को न चूसे 
जिस दुनिया में वह दुनिया
संभव है
हम सब की एकता के दम
इसे लड़कर हासिल किया
जा सकता है
लगता बड़ा आसान है 
मगर उतना ही मुश्किल
काम है यह.. कैसे
अमीर ने जाल फैलाया
परम्परा का इज्जत का 
जात पात और धर्म का
प्राचीन संस्कृति का
इस या उस मजहब का
और बांट कर रख दिया 
इस चाल को जिस दिन 
हम समझ गए तो
फिर दूसरी दुनिया का
सपना हमारा जल्दी 
बहुत ही जल्दी 
पूरा होगा जरूर
20.12.08
रांची

******
पिछले कुछ साल से 
मौसम का मिजाज बदलता 
जा रहा है
इसका सबसे अधिक असर 
किसानों पर पड़ रहा है
सूखे के लंबे दौर
लगातार बाढ़, कम होती
यह अनियमित वर्षा 
भयानक ओलावृष्टि होना
टिड्डियां का अचानक हमला
किसानों की कमर तोड़ दी है
हालांकि सामुदायिक प्रयास 
रास्ता दिखा सकते हैं
मगर....
उनकी रक्षा के लिए सरकारी
समर्थन और संरक्षण बहुत
जरूरी है
इससे किसान बचेगा तो
उद्योग बचेगा
उद्योग बचेगा तो
भारत महान बचेगा....

********
*दो बेरोजगार (पति -पत्नी)*
 बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सटीक समीक्षा करना।  
बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सही तरफदारी करना। 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के 
प्रति मन से करुणा  दिखाना । 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति 
असल में आंसू बहाना ।

मगर बहुत मुश्किल है 
मेरी जिंदगी जीना। 
स्कूल से आगे बढ़कर 
फिर कॉलेज में जाना होगा 
इसके सपने 
 बहुत बार देखे थे मैंने । 
कौन से कॉलेज में दाखिला हो 
कई बार सोचा था मैंने यह भी। 
एक साल पहले सोचना शुरू किया  कि 
पहले दिन का पहनावा 
क्या होगा 
मेरा कालेज में ? 
हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी। 
सोचा क्या साइकिल पर ही मुझे 
कॉलेज जाना होगा हर रोज? 
या फिर घरवाले सेकंड हैंड 
स्कूटर का जुगाड़ कर देंगे। 

घर की हालत जुगाड़बाजी 
करने की भी कहां थी। 
यह बात नहीं मेरे भेजे के 
अंदर घुस रही थी। 
इसी उधेड़बुन में पूरा का पूरा दिन 
जुगाड़ बाजी के चक्कर में गुजर जाता। 
आखिर एक दिन 5 लोग आए थे 
हमारे घर में। 
उनकी बहुत आवभगत हुई थी। 
उन लोगों ने मेरे से भी पूछा- -
'बेटी कौन सी क्लास पास की है?' 
दूसरा सवाल था उनका -'कितने नंबर आए' 
मैंने धीमी से अपने नंबर बता दिए थे। 
उनकी नजरें मुझे घूरती 
सी महसूस हुई 
जैसे बकरे को उसके 
मारने से पहले कसाई 
उसे अपनी नजरों में से 
निकाल कर देखता है, 
उसी तरह का माहौल सा लगा मुझे । 
और इसके बाद कसाई 
बकरे को हलाल कर ही देता है। 
मुझे क्या पता था कि मेरा भी 
हलाल होने का वक्त आ गया है। 
और एक महीने के बाद ही 
मेरी शादी कर दी गई । 
एक और बेरोजगार के साथ ।

 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने क्या 
आप सोच सकते हो कि कैसे होंगे? 
हमने भी सोचने की कोशिश की थी 
खूब आगे का रास्ता देखने की। 

पर मैं नहीं देख पाई क्योंकि 
अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई 
नहीं दे रहा था । 
उनकी 2 एकड़ से भी कम जमीन थी। 
'भूखे घर की आ गई।' 
'हम क्या करें?' 
'यह दिन देखने के लिए क्या
 छोरे को जन्म दिया था?'
 दाएं बाएं से परिवार वालों से 
यह सब सुनने को मिलता था। 
तब पता लगा कि सपने 
और हकीकत में कितना 
फर्क होता है। 
प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी 
सब अतीत की बातें थीं। 
घर भी तंग से बस दो ही कमरे थे । 
साथ में भैंस व बछिया का भी 
सहवास 24 घंटे का। 
समझ  सकता है कोई भी 
के दो कमरों में छह सात 
सदस्यों के परिवार का 
कैसे गुजारा होता है? 
कहां फुर्सत होती है एक दूसरे के लिए । 
चोरों की तरह मुलाकात होती हैं 
अपने ही घर में। 
बस जीवन तो घिसट रहा है हमारा। 
एक दिन सोचा इस नरक से 
कैसे छुटकारा मिले? 
मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत 
कहां। 
घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत 
और तान्ने । 
यही तो जिंदगी है हमारे जैसे 
करोड़ों युवक और युवतियों की 
भारत में। 
कभी-कभी जीवन लीला को 
खत्म करने का मन करता है । 
फिर ख्याल आता है कि 
इससे क्या होगा? 
किससे होगा? 
यही तो सवाल है सबसे बड़ा
 कि सही रास्ता क्या है?
दो चार दिन का रोना धोना
फिर खेल खत्म
और यह सिलसिला यूं ही 
चलता रहेगा
इस अंधेरे को कैसे खत्म  किया 
जाये?
कैसे रोशनी की किरण 
हम तक भी पहुंच सके
यही तो यक्ष प्रश्न है
बहुत बार सोचा 
कई बार सोचा है
मगर रास्ता नजर नहीं आता 
हमें 
बस इसी कामोकश में जीवन
किसी तरह गुजर रहा है हमारा
जीवन सरक रहा है हमारा
 रणबीर

*******
आपात स्थिति के आज हालत बने
फासीवाद से कब हमारी मुलाकात बने
और कोई चारा बचा नहीं लगता यारो
संभलो इससे पहले कि दिन रात बने।
मगर फासीवाद से लड़ना आसान कहां 
पहले समझें इसको फिर कोई बात बने।
बोले विरोध में तो एन आई ए आए
घर पर फिर संकट के हालत बने।
*******
गधे की तरह काम करवाया 
हाथ में चालीस रुपया पकड़ाया
पूरा दिन और इतने कम पैसे 
मजदूर ने मालिक से फरमाया
ठीक किया तुमने न्याय मांगा है
मैनेजर ने तुरत मैनेजर बुलवाया
पैसे वापिस लो इसी वक्त और
इसे 'घास डालो' का फरमान सुनाया
*******
मंदी के दौर में भी एक नया दौर लाएंगे।।  
आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटाएंगे।। 
नएपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है 
इंसानियत बाजार में हर एक होता जा रहा है  
परचम इंसानियत का हम फिर फैहराएंगे।। 
भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है 
छिपा अपनी कमजोरी कर झूठा सॉन्ग रहा है 
जनता करे कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचाएंगे।। 
हाशिए पर फैंके गए जो उनका जमाना आएगा 
अपना हक पाने को नागरिक समाज बनाएगा 
बढ़े कदम नए साल में आगे बढ़ते जाएंगे।। 
नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है 
जात-पात गोत नात क्यों अपने रंग दिखाता है 
नए दौर की आशा से निराशा से लड़ पाएंगे।।
*******
किसी के कान में कही गई बात 
हजारों मील दूर तक सुनाई पड़ती है 
धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले 
गलत मत बोल कोई सुन न ले 
लेकिन फिर भी हर कोई सुन लेता है 
और वही राज की बात घूमती घूमती 
फिर आपके कानों में आ पड़ती है 
आप हैरान होते हैं कि यह कैसे हुआ 
इसे कहते हैं गॉशिप  या कहे चुगली 
जो आपसे गॉशिप करता है वह 
आपके बारे में भी गॉसिप करेगा।

*****
हरियाणा विकास
मॉडल बना है ये विकास में 
हरियाणा नम्बर वन हो रहा
कैसे बस कुछ ना पूछो भाई
पिछलों को सबको धो रहा
सब ही निडर घूम रहे हैं यहाँ
ये भ्रष्टाचार यहाँ से खो रहा 
शिक्षा ने उचाईयां छू ली हैं
बहुत उम्दा और कीमती है
जिसका भार गरीब ढो रहा
सेहत मान और पहलवान 
दुनिया में किया है गुनगान
भले अनीमिया और ज्यादा
गर्भवती औरत को डुबो रहा
हरियाणा नम्बर वन हो रहा 
फसल के दाम सबसे ज्यादा
मिलते हैं निठ्ठले किसान को
जमीन बेचो फायदा उठाओ
ये मंत्र दिया है हर इंसान को 
फिर भी क्यों किसान रो रहा
यह कोई नहीं जानता है कि
पिछले पांच साल के अन्दर
हमने विश्व बैंक से कितना 
लोन लिया है बताये तो कोई
बीएड कालेज धड़ाधड़ खुले
फीसें मनमर्जी की ली गयी
शिक्षक और छात्र भी बैठ के
कक्षा में रोज मजे से सो रहा

****
जिस्म में ताकत है हमारे यारो

सीनों में विरासत है हमारे यारो

फितरत में बगावत है हमारे यारो

समकतो.

काम में हिफाजत है हमारे यारो

पता तुम में हिमाकत है हमारे यारो

तुमसे ही आहत हैं हम हमारे यारो
****
याद तुम्हारी-साफगोई आती है यारो बेझिझकता तुम्हारा कद बढ़ाती है यारो तुम्हारी सलाह दिल में समाती है यारा समाज की उलभने सुलभाती है यारा
*****
आर्थिक मन्दी
आर्थिक मन्दी के दौर ने सताया हमको 
जेब ढीली कर दी इसने रुलाया हमको बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए 
आई टी के कई योद्धा इसने मार गिराए सरकारी कंट्रोल भाता नाथा जिसको 
उसी से भीख मांगनी पड़ रही उनको 
पड़ सकता दिल पर बुरा असर बताया चिकित्सकों ने हाल में ऐसा भी फरमाया दिल के दौरे से कैसे आज बचा जाऐगा पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहुंचाएगा'
*****
छबके
छबके मारने ना आते तो आज तूं कामयाब नहीं 
बिना सिफारिस कहां नौकरी पूरा होवे ख्वाब नहीं 
छल कपट बिना होवे मानस का आज गुजारा ना 
बिना माला घालें कई हजार की नेता का सहारा ना 
भीतर काला बाहर सफेद‌ यो मुखौटा पहन लिया 
जिसके भीतर सफेद उसने ये कहर सहन किया 
सब कुछ बहग्या आज किसपै कोये यकीन करे
थोड़े घने बचे उनको ये सिस्टम घणा गमगीन करे 
बिना संघर्ष नहीं गुजारा रणबीर यो जान लियो 
मानवता एक दिन जीतैगी बात इतनी मान लियो ।।
*****
चरागे शाम
चरागे शाम ये जलाने का मौका आया यारो गरीब का घर बसाने का मौका आया यारो मंदी का दौर संकट है बेरोजगारी का देखो ये एकता पूरी दिखाने का मौका आया यारो 
ऐस का भार गरीबों पर बढ़ाया जा रहा क्यों अपना विरोध जताने का मौका आया यारो अब तक लूटा जिन्होंने मानवता को दोस्तो उसकी नींद उड़ाने का मौका आया यारो इश्क और पशुता में फर्क क्या होता है यही अब दुनिया की बताने का मौका आया यारो 

*****
नीतियों के वार
तुमने किया हर बार नीतियों से वार ये 
जख्में दिल दिये हैं हमको बार बार ये 
नए अंदाज और नए तरीके हैं तुम्हारे 
पहले तो धीभी थी तेज हुई रफ्तार ये।।
सत्यम बताओ उसके काले कारनामों पर जल्दी पर्दा डालो तुम कहती सरकार ये ।।
किसान की सब्सिडी पर डाका डाल रहे हैं आत्म हत्या कर रहा है उजड़ी बहार ये
रणबीर अब और क्या क्या गिनवाऊं मैं
पता है सारा इनको बनते हैं होशियार ये।।

*****
इंकलाब

मुझे इकलाब का मौसम लगा है तेरी आंखों में 
विश्वास है आगाज है और घटा है तेरी आंखों में 
न क्यों रस्क हो उस पर मुझे जिसने पैदा किया 
मुझे यह लगाने लगा कुछ जुदा है तेरी आंखों में 
तेरा साथ बहुत कुछ आज मायने रखता है यारो 
मेरे मकसद का एक आसरा दिखे तेरी आंखों मे 
नजर भर देख लेने से उमंगे झूम जाती हैं यारो 
आहवान का खास सिलसिला है तेरी आखों में 
रणबीर देख रहे हैं इन्कलाब जिंदाबाद का नारा 
सुबह और शाम कैसे झलकता है तेरी आंखों में.

16.1.2009.
***
लालच में तेरा सब कुछ रखो गया बंदे अकेलेपन का ठूंठ हरा हो गया बंदे 
अब दोस्तों को ढूंढ़ोगे यहां तुम यारो 
जिगरी था वो दोस्त तुम्हारा गया बंदे 
दया त्याग भानवता सब भुला दिए हैं 
उसे कैसे भुला दोगे जो चला गया बन्दे उसका वास्ता मत देना मक्कारो हमें 
वह भी तुम्हारे ही घर में सो गया बंदे 
गरीब हंस बोल लेता कभी कभी रोता 
वो आसुंओं से तेरा चेहरा धो गया बंदे।
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बच्चे तरुण युवा लड़‌की रह पायें वो गांव कहाँ 
गाँव में बसेवा नहीं तो बताओ हम जायें कहां 
गांव नहीं गांव रहे ना शहर ही बन पाए गांव 
पहला उजड़ गया है नया नजर न आये गांव एक दूजे के कन्धों पर पैर रखते जा रहे देखो 
मानवता खोती जा रही काले बादल छाते  जा रहे देखो 
पैसा मंजिल बन गया बाजार यहां आया देखो 
खाओ पियो मौज करो नशा कैसा छाया देखो 
तुम्हें गैरो से कब फुरसत हरु ग़म से न खाली 
हमारी चाहत छोड़ के गैरौ से दोस्ती निभाली 
चलो आज की दुनिया में हमऑउट डेट हुए हमोर बंद दरवाजे हैं तुम्हारे खुले सब गेट हुए

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यह तो कभी सोचा ही नहीं था 
दुश्मन से लड़ते लड़ते एक दिन 
हम खुद आपस में भिड़ जायेंगे 
हमारी कमजोरी या चाल उनकी 
क्या हम असलियत समझ पायेंगे 
सोचना बैठ कर ठण्डे दिमाग से 
कब कदम से कदम मिलायेंगे
****
"अमरीका के बारे में

 जानते हो?  
 साफ-सफाई है
 ऊंची ऊंची इमारते हैं
बिजली कभी गुरु रही होती 
काम करवाने का पैसा 
देना नही पड़ता है 
बहुत उन्नतशील है अमरीका 
पशुओं को गेहूं  खिलाता है 
फिर  पशुओं को खुद खाता है
छोटी मच्छलियों को पालता है
 फिर उन्हें बड़ी मच्छलियों को
 खिलाता है हंसते हंसते 
जब इससे भी काम नहीं चलता 
तो आतंक फैलाता है या फिर 
फैलवाता है 
युद्ध करता है युद्ध करवाता है 
हथियार दोनों को बेचता है
अमरीका 
उसे क्या  मां की कोख खाली 
होती है तो हो चाहे वह 
इस पार की मां है या उस पार की 
जैसे अब पाकिस्तान और 
 हिन्दुस्तान दोनों को बेच रहा है 
अपने हथियार अमरीका, 
अपने परांठे सेक रहा है 
अब पाकिस्तान हिन्दु‌स्तान 
लड़ें या न लड़ें उसने तो अपने 
हथियारों का सौदा कर ही लिया 
इसकी चाल समझना है मुश्किल
दिमाग हो तो समझें चाल हम
इसे तो गिरवी रख दिया हमने
अपने परम परमेश्वर भगवान 
के पास
आस्था सवाल नहीं चाहती
सोचना नहीं चाहती
मगर अपने तौर पर सोचना
एक न एक दिन पड़ेगा हम सबको
उस दिन अमरीका के बारे में 
बहुत जान चुके होंगे हम।

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दूसरी दुनिया संभव है
सड़कों पर मजदूर आए थे
दूर दूर से पूरे भारत देश के
साथ ही बुद्धिजीवी भी आए थे
कोई इंजीनियर की डॉक्टर
कोई कोई समाज शास्त्री
'सब रंगीन का समावेश 
भारत देश हमारा देश '
' बिना महिला सहयोग के
हमारा विकास अधूरा है '
' साक्षरता हम वंचितों का
एक पैना हथियार है '
इन सब नारों की गूंज
सुनाई दी रांची शहर में
एक नई दुनिया की बात 
कार्यवतरह से की गई वहां
जहां गरीब अमीर की
जात गौत और नात की
नाबराबरी लिंग अनुपात की
जहां ऊंच और नीच की 
जहां ज्ञान के बंटवारे की
खान बीमारी के इलाज की
असमानताएं खत्म होती
जायें
मानव मानव की न चूसे 
जिस दुनिया में वह दुनिया
संभव है
हम सब की एकता के दम
इसे लड़कर हासिल किया
जा सकता है
लगता बड़ा आसान है 
मगर उतना ही मुश्किल
काम है यह.. कैसे
अमीर ने जाल फैलाया
परम्परा का इज्जत का 
जात पात और धर्म का
प्राचीन संस्कृति का
इस या उस मजहब का
और बांट कर रख दिया 
इस चाल को जिस दिन 
हम समझ गए तो
फिर दूसरी दुनिया का
सपना हमारा जल्दी 
बहुत ही जल्दी 
पूरा होगा जरूर
20.12.08
रांची

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पिछले चार पांच साल से 
मौसम का मिजाज बदलता 
जा रहा है
इसका सबसे अधिक असर 
किसानों पर पड़ रहा है
सूखे के लंबे दौर
लगातार बाढ़, कम होती
यह अनियमित वर्षा 
भयानक ओलावृष्टि होना
टिड्डियां का अचानक हमला
किसानों की कमर तोड़ दी है
हालांकि सामुदायिक प्रयास 
रास्ता दिखा सकते हैं
मगर....
उनकी रक्षा के लिए सरकारी
समर्थन और संरक्षण बहुत
जरूरी है
इससे किसान बचेगा तो
उद्योग बचेगा
उद्योग बचेगा तो
भारत महान बचेगा....

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*दो बेरोजगार (पति -पत्नी)
 बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सटीक समीक्षा करना।  
बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 
सही तरफदारी करना। 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के 
प्रति मन से करुणा  दिखाना । 
बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति 
असल में आंसू बहाना ।

मगर बहुत मुश्किल है 
मेरी जिंदगी जीना। 
स्कूल से आगे बढ़कर 
फिर कॉलेज में जाना होगा 
इसके सपने 
 बहुत बार देखे थे मैंने । 
कौन से कॉलेज में दाखिला हो 
कई बार सोचा था मैंने यह भी। 
एक साल पहले सोचना शुरू किया  कि 
पहले दिन का पहनावा 
क्या होगा 
मेरा कालेज में ? 
हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी। 
सोचा क्या साइकिल पर ही मुझे 
कॉलेज जाना होगा हर रोज? 
या फिर घरवाले सेकंड हैंड 
स्कूटर का जुगाड़ कर देंगे। 

घर की हालत जुगाड़बाजी 
करने की भी कहां थी। 
यह बात नहीं मेरे भेजे के 
अंदर घुस रही थी। 
इसी उधेड़बुन में पूरा का पूरा दिन 
जुगाड़ बाजी के चक्कर में गुजर जाता। 
आखिर एक दिन 5 लोग आए थे 
हमारे घर में। 
उनकी बहुत आवभगत हुई थी। 
उन लोगों ने मेरे से भी पूछा- -
'बेटी कौन सी क्लास पास की है?' 
दूसरा सवाल था उनका -'कितने नंबर आए' 
मैंने धीमी से अपने नंबर बता दिए थे। 
उनकी नजरें मुझे घूरती 
सी महसूस हुई 
जैसे बकरे को उसके 
मारने से पहले कसाई 
उसे अपनी नजरों में से 
निकाल कर देखता है, 
उसी तरह का माहौल सा लगा मुझे । 
और इसके बाद कसाई 
बकरे को हलाल कर ही देता है। 
मुझे क्या पता था कि मेरा भी 
हलाल होने का वक्त आ गया है। 
और एक महीने के बाद ही 
मेरी शादी कर दी गई । 
एक और बेरोजगार के साथ ।

 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने क्या 
आप सोच सकते हो कि कैसे होंगे? 
हमने भी सोचने की कोशिश की थी 
खूब आगे का रास्ता देखने की। 

पर मैं नहीं देख पाई क्योंकि 
अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई 
नहीं दे रहा था । 
उनकी 2 एकड़ से भी कम जमीन थी। 
'भूखे घर की आ गई।' 
'हम क्या करें?' 
'यह दिन देखने के लिए क्या
 छोरे को जन्म दिया था?'
 दाएं बाएं से परिवार वालों से 
यह सब सुनने को मिलता था। 
तब पता लगा कि सपने 
और हकीकत में कितना 
फर्क होता है। 
प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी 
सब अतीत की बातें थीं। 
घर भी तंग से बस दो ही कमरे थे । 
साथ में भैंस व बछिया का भी 
सहवास 24 घंटे का। 
समझ  सकता है कोई भी 
के दो कमरों में छह सात 
सदस्यों के परिवार का 
कैसे गुजारा होता है? 
कहां फुर्सत होती है एक दूसरे के लिए । 
चोरों की तरह मुलाकात होती हैं 
अपने ही घर में। 
बस जीवन तो घिसट रहा है हमारा। 
एक दिन सोचा इस नरक से 
कैसे छुटकारा मिले? 
मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत 
कहां। 
घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत 
और तान्ने । 
यही तो जिंदगी है हमारे जैसे 
करोड़ों युवक और युवतियों की 
भारत में। 
कभी-कभी जीवन लीला को 
खत्म करने का मन करता है । 
फिर ख्याल आता है कि 
इससे क्या होगा? 
किससे होगा? 
यही तो सवाल है सबसे बड़ा
 कि सही रास्ता क्या है?
दो चार दिन का रोना धोना
फिर खेल खत्म
और यह सिलसिला यूं ही 
चलता रहेगा
इस अंधेरे को कैसे खत्म  किया 
जाये?
कैसे रोशनी की किरण 
हम तक भी पहुंच सके
यही तो यक्ष प्रश्न है
बहुत बार सोचा 
कई बार सोचा है
मगर रास्ता नजर नहीं आता 
हमें 
बस इसी कामोकश में जीवन
किसी तरह गुजर रहा है हमारा
जीवन सरक रहा है हमारा
 रणबीर

*******
आपात स्थिति के आज हालत बने
फासीवाद से कब हमारी मुलाकात बने
और कोई चारा बचा नहीं लगता यारो
संभलो इससे पहले कि दिन रात बने।
मगर फासीवाद से लड़ना आसान कहां 
पहले समझें इसको फिर कोई बात बने।
बोले विरोध में तो एन आई ए आए
घर पर फिर संकट के हालत बने।
*******
गधे की तरह काम करवाया 
हाथ में चालीस रुपया पकड़ाया
पूरा दिन और इतने कम पैसे 
मजदूर ने मालिक से फरमाया
ठीक किया तुमने न्याय मांगा है
मैनेजर ने तुरत मैनेजर बुलवाया
पैसे वापिस लो इसी वक्त और
इसे 'घास डालो' का फरमान सुनाया
*******
मंदी के दौर में भी एक नया दौर लाएंगे।।  
आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटाएंगे।। 
नएपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है 
इंसानियत बाजार में हर एक होता जा रहा है  
परचम इंसानियत का हम फिर फैहराएंगे।। 
भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है 
छिपा अपनी कमजोरी कर झूठा सॉन्ग रहा है 
जनता करे कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचाएंगे।। 
हाशिए पर फैंके गए जो उनका जमाना आएगा 
अपना हक पाने को नागरिक समाज बनाएगा 
बढ़े कदम नए साल में आगे बढ़ते जाएंगे।। 
नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है 
जात-पात गोत नात क्यों अपने रंग दिखाता है 
नए दौर की आशा से निराशा से लड़ पाएंगे।।
*******
किसी के कान में कही गई बात 
हजारों मील दूर तक सुनाई पड़ती है 
धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले 
गलत मत बोल कोई सुन न ले 
लेकिन फिर भी हर कोई सुन लेता है 
और वही राज की बात घूमती घूमती 
फिर आपके कानों में आ पड़ती है 
आप हैरान होते हैं कि यह कैसे हुआ 
इसे कहते हैं गॉशिप  या कहे चुगली 
जो आपसे गॉशिप करता है वह 
आपके बारे में भी गॉसिप करेगा।

*****
हरियाणा विकास
मॉडल बना है ये विकास में 
हरियाणा नम्बर वन हो रहा
कैसे बस कुछ ना पूछो भाई
पिछलों को सबको धो रहा
सब ही निडर घूम रहे हैं यहाँ
ये भ्रष्टाचार यहाँ से खो रहा 
शिक्षा ने उचाईयां छू ली हैं
बहुत उम्दा और कीमती है
जिसका भार गरीब ढो रहा
सेहत मान और पहलवान 
दुनिया में किया है गुनगान
भले अनीमिया और ज्यादा
गर्भवती औरत को डुबो रहा
हरियाणा नम्बर वन हो रहा 
फसल के दाम सबसे ज्यादा
मिलते हैं निठ्ठले किसान को
जमीन बेचो फायदा उठाओ
ये मंत्र दिया है हर इंसान को 
फिर भी क्यों किसान रो रहा
यह कोई नहीं जानता है कि
पिछले पांच साल के अन्दर
हमने विश्व बैंक से कितना 
लोन लिया है बताये तो कोई
बीएड कालेज धड़ाधड़ खुले
फीसें मनमर्जी की ली गयी
शिक्षक और छात्र भी बैठ के
कक्षा में रोज मजे से सो रहा
*****

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

भगत सिंह तूं जिंदा है

भगतसिंह तू जिंदा है,
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   ,,, मुनेश त्यागी 

भगतसिंह तू जिंदा है, 
हर इंकलाब के नारे में, 
हर एक लहू के कतरे में, 
सूरज की सारी किरणों में, 
हवा  के  सारे  झोंकों  में, 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है 
हां,भगतसिंह तू जिंदा है।

साइमन गो बैक के नारों में, 
किताबों  की इबारत  में, 
ऐसेंम्बली में फैंके पर्चों में, 
मैं नास्तिक क्यों के विचारों में, 
भगवान से किये सवालों में,
हर एक लहू के  कतरे में, 
हर इंकलाब  के  नारे  में 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां, भगतसिंह तू जिंदा है।

जेबों में भरी किताबों में, 
समाजवाद  के  नारों  में, 
अछूत समस्या से निदानों में, 
साम्प्रदायिकता के इलाजों में, 
खेतों में  और खलिहानों में, 
हर एक लहू के  कतरे  में, 
हर इंकलाब  के  नारे  में, 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां, भगतसिंह तू जिंदा है।

आजादी के सब नारों में, 
अपनी कही हुई बातों में, 
किसानों  में, मजदूरों  में, 
लिखे हुए अपने लेखों में, 
हर एक लहू के कतरे में, 
हर इंकलाब के  नारे  में,
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां ,भगतसिंह तू जिंदा है।

जंजीरों में, हथकडियों  में
इंकलाब की सब लडियों में, 
अभियानों में, अरमानों में 
जमीन और असमानों में, 
हर एक लहू के कतरे  में, 
हार इंकलाब के नारों  में, 
ओ, क्रांतिवीर तू जिंदा है, 
हां, भगतसिंह तू जिंदा है .

मेरा नाम कबाड़ी

मेरा नाम है कबाड़ी
लेखक..सुभाष
अरविन्द स्टेशन के सामने पत्थर पर बैठा बीड़ी के सुट्टे लगा रहा था। कमर के पीछे प्लास्टिक का बड़ा थैला। थैले में खाली बोतलें और थोड़ा बहुत दूसरा कचरा। कई बार जेल हो आया। हालाँकि आश्रम को भी जेल ही कहता है। कई साल पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक गाँव से भाग आया था। परिवार में 7 बहन-भाई। पिता छोटे-मोटे सामान की फेरी लगाता है। पिता को शराब की लत थी। पिता शाम को शराब पीकर आता और बच्चों की पिटाई करता।
बचपन से स्कूल का मुँह नहीं देखा। एक कमरे का मकान। गली में सोना पड़ता था। अपने जैसे और बच्चों के साथ खेलता। पैरों में चप्पल नहीं। फटी बनियान और एक कच्छी। बीड़ी पीने की लत 10-11 साल की उम्र में ही लग गई। इधर-उधर बैठे बच्चे अपने-अपने घर-परिवार की चर्चा करते। घर के हालात पर बात करते। एक-दूसरे की पिटाई का जिक्र होता। आज परिवार में कौन पिटा। एक दिन कुछ दोस्तों के साथ घर से भाग आया। पकड़ा गया और जेल (आश्रम) में डाल दिया गया। फिर गाँव से आकर कोई छुड़वा कर ले गया। लेकिन गाँव में क्या करे? स्कूल में जाने के लिए कपड़े और पैसे नहीं थे। घर में फिर वही मार-पिटाई का सिलसिला। खाने के लाले। बाप शराबी। फिर गाँव से निकल लिया। गाँव में भी गली में सोना पड़ता था। यहाँ भी फुटपाथ पर सोना पड़ता है।

अरविन्द बड़े रौब से कहता है, "पुलिस से तो अपनी यारी है। कई बार पकड़ कर जेल में बंद किया। फिर छोड दिया। 70-80 रुपये कमाता हूँ। सारे अपनी मर्जी से खर्च कर लेता हूँ। मेरे पास सामान के नाम पर कुछ नहीं। कभी माँग कर खा लेता हूँ। कभी पैसे से खा लेता हूँ।" अरविन्द को कई-कई दिन नहाने की जरूरत नहीं है। वह कहता है- "सर्दियाँ तो बिना नहाए ही निकल जाती हैं। गर्मियों में स्टेशन पर कभी-कभी दिन में नहा लेता हूँ।"

"अपना घर याद नही आता?" इस सवाल के जवाब में वह कहता है- "था ही क्या घर में? न समय पर खाना मिलता था, न सोने की जगह। पिटाई मुफ्त में।"

नशे की बात चली तो थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उसने बताया, "कभी-कभी शराब की बोतलों में थोड़ी बहुत शराब भी मिल जाती है। पी लेता हूँ। पर शराब का आदी नहीं हूँ।" देर शाम को कई बार अरविन्द शराबियों के अड्डे के पास बैठ जाता है कि खाली बोतल मिल जाएँगी थोड़ी बहुत किसी बोतल में शराब भी मिल जाए। बहुत बार ऐसा भी हुआ कि शराबियों ने उसकी पिटाई भी की। उनको शक था कि चोरी की फिराक में बैठा है। पिटना, अपमान सहना, गालियाँ खाना उसे असहज नह करता। उसे कोई अपना भी तो नहीं लगता। अपने लगते हैं तो उसके साथ
कूड़ा बीनने वाले। बस वही अपने हैं. उन्हीं के साथ बैठना। उन्हीं के साथ बातें करना और उन्हीं के साथ कहीं भी सो जाना।

उसने बताया- "शाम को हम सारे बच्चे स्टेशन पर मिल लेते हैं। अपनी-अपनी कमाई का हिसाब लगाते हैं। किसी की 60 रुपये तो किसी की 80 रुपये। स्टेशन के पास अपनी-अपनी जगह तय कर रखी है सोने के लिए। रात को सीमेंट का खाली कट्टा या प्लास्टिक की थैली बिछाकर सभी लाइन में सो जाते हैं। वे कहीं भी सो जाते हैं। उन्हें कुछ भी खो जाने का डर नहीं है। कुछ पास हो तभी तो गुम होगा। इस सवाल के जवाब में कि रात को मच्छर काटते होगें? वह कहता है "नींद में मच्छरों को जहाँ काटते हैं वहीं मसल कर मार देता हैं। हाँ बारिश के दिनों में रात को काफी दिक्कत होती है। कई बार सोने की जगह ही नहीं मिलती।"

जब अरविन्द से बातचीत हो रही थी. तभी वहाँ दो-तीन बच्चे और आ जाते हैं। ऐसा लगा कि सारे अरविन्द के भाई ही होंगे। उसने बताया कि सब अलग-अलग प्रदेश के हैं। अलग-अलग प्रदेश का मतलब था कि उत्तर प्रदेश के ही अलग-अलग शहरों के बच्चे थे।
कुछ के पैरों में फटे हुए जूते थे, जो उनके पैरों के साइज से बड़े थे। किसी ने कबाड़ में फेंक दिए होंगे। ऐसे फेंके हुए जूते अरविन्द जैसे बच्चों के काम आ जाते हैं। शादी-ब्याह के दौरान बाहर फेंका हुआ खाना भी मिल जाता है। अरविन्द के पास कोई हुनर नहीं है। केवल कूड़ा-कचरा बीनना आता है। यह हुनर में नहीं गिना जाता। अरविन्द की एक इंसान के रूप में भी गिनती नहीं होती है। उसका न तो कहीं राशन कार्ड में नाम है और न ही उसके पास कोई पहचान का दस्तावेज है।

"पढ़ने का मन नहीं किया?" इस सवाल पर अरविन्द ने मुझे घूरा। ऐसा लगा मानों मैं उसके साथ मजाक कर रहा था। उसने कोई जवाब नहीं दिया। "कितनी बार जेल गए?" "कई बार। एक बार पूरा दिन स्टेशन पर बैठाए रखा। स्टेशन की सफाई भी की। तब जाकर छोड़ा।"

जब वह गलियों में घूमता है तो बहुत सारी नज़रें उसे घूरती हैं। कई बार उसके कानों में ऐसी आवाजें सुनाई पड़ती हैं कि सावधान रहना ये चोर हैं, मौका लगते ही कुछ भी उठा ले जाएँगे। पर उसे अब ज्यादा बुरा नहीं लगता। इस तरह की आवाजें सुनने का आदी हो गया है अरविन्द । कई बार तो उसके बोरे की तलाशी भी ली गई। बोरे में से चोरी का सामान तो नहीं निकला। हाँ, हमारा फेंका हुआ गंद जरूर निकला।

अब बात आती है, सरकार की योजनाओं की। अरविन्द जैसे बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिलेगा? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अरविन्द जैसे लाखों बच्चे हैं जो बिना किसी पहचान के घूम रहे हैं। सवाल है आख़िर अरविन्द जैसे बच्चे हैं कौन? इनके मौलिक अधिकार कहाँ हैं? इनके लिए काम करने वाले सरकारी संस्थान कहाँ हैं? क्यों इन संस्थानों की नजर अरविन्द जैसे बच्चों पर नहीं पड़ती? इन सवालों से बेखबर अरविन्द अपना प्लास्टिक का बोरा उठा कर अपने काम में जुट जाता है।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

हमले

देश में आधुनिक मुफ्त और वैज्ञानिक शिक्षा पर हमले किए जा रहे
सांप्रदायिक ताकतों द्वारा शिक्षा में भगवाकरण के पाठ ये धका रहे
तार्किक और वैज्ञानिक सोच का विकास बाधित किया जा रहा देखो
पिछले कई सालों से बिन बात स्कूलों पर ताले ये पूछो क्यों लटका रहे
निजी विद्यालयों को बढ़ावा पूरे देश में आज देता है दिखाई भाई
खास लोगों को इनमें करके आज भरती शिक्षा पे खास रंग चढ़ा रहे
संविधान में सबको शिक्षा मुफ्त मिले यह पैगाम दिया बताते देखो
जान पूछ के संविधान की चालाकी से धज्जियां आज क्यों उड़ा रहे
पाठशालाओं की बंदी की मुहिम तुरंत ही बंद करवाई जाए देखो
सभी स्कूलों में समस्त विषयों के निपुण शिक्षकों की नियुक्तियां चाह रहे 
विश्वविद्यालय परिसरों को भगवाकरण की मुहिम से बचाना होगा
शिक्षा के निजीकरण की मुहिम को तुरंत रोको मांग रणबीर हम उठा रहे

बुधवार, 10 सितंबर 2025

कविताएं

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423




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422


हल्ला बोल

कांति मोहन


हल्ला बोल भई हल्ला बोल, भई हल्ला बोल, भई हल्ला बोल 

बोल मंजूरे हल्ला बोल, बोल मंजूरे हल्ला बोल 

कांप उठे सरमायेदारी खुल के रहेगी इसकी पोल 

बोल जमूरे हल्ला बोल...

खून को अपने बना पसीना तूने बाग लगाया है 

कुएं खोदे नहर निकाली, ऊंचा महल उठाया है 

चट्टानों में फूल खिलाए,शहर बसाए जंगल में 

अपने चौड़े कंधों पर दुनिया को यहां तक लाया है 

बाकी फौजी कमेरों की है तूं  है वही भेड़ों की मोल

बोल जमूरे हल्ला बोल....

गोदामों में माल भरा है ,नोट भरे हैं बोरों में 

बेहोशों को होश नहीं है, नशा चढ़ा है जोरों में 

इसका दामन उसने फाड़ा उसका गिरेवां इसके हाथ 

कफनखसोटों का झगड़ा है, होड़ लगी है चोरों में 

ऐसे में आवाज उठा दे, ला मेरी मेहनत का मोल 

बोल जमूरे हल्ला बोल...

सिहर उठेगी लहर नदी की, सुलह उठेगी फुलवारी 

कांप उठेगी पत्ती पत्ती , चटकेगी डारी डारी 

सरमायेदारों का पल में नशा हिरन हो जाएगा 

आग लगेगी नंदन वन में , दहक

 उठेगी हर क्यारी  

सुन सुन कर तेरे नारों को धरती होगी डांवाडोल 

बोल मजूरे हल्ला बोल.... 

हल्ला बोल, भई हल्ला बोल, भई हल्ला बोल, भई हल्ला बोल 

बोल मजूरे हल्ला बोल.... बोल मजूरे हल्ला बोल।



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421


हमारे देश की सेहत की चर्चा 

पूरी दुनिया में हो रही है 

दूसरे देशों के लोग यहां पर 

इलाज करवाने आ रहे हैं 

अपोलो सपोले पांच सितारा 

अस्पतालों का बोलबाला है 

मेडिकल टूरिज्म का कमाल है 

जनता इलाज के लिए रो रही है 

विश्व बैंक का हरेक देशवासी पर

तीस हजार सात सौ छिहत्तर का

खर्च बताया जा रहा है आज 

 प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च 

भारत में  बहुत कम किया जा रहा

 फिर भी सेहत वान होने का 

हर रोज हम भरते रहते दम 

कांगो जहां 10 साल से 

कोई सरकार नहीं बताई 

वहां से भी कम खर्च हमारा 

देश सरकार क्यों ढ़ो रहा है 

दूसरे विकसित देशों में भी 

सेहत पर 80% 

खर्च सरकार करती कहते हैं

भारत देश में बस 20% 

खर्च करे है सरकार हमारी 

अमीर तो पैसा फैंक करवाएं 

जहां चाहे वहां से उपचार 

गरीब क्या करे कहां जाए 

जब हो जाए वह बीमार?

(कई साल पहले की रचना)


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420


जनता को दबाना दिन बी दिन मुश्किल होता जायेगा 

मिलट्री पुलिश सारा ढांचा उसके सामने डगमगायेगा 

तुमने ही ये हालत पैदा किये जनता को बाँटने के लिए 

यही हालत उसे एकता देंगे ये सिंघासन लड़खड़ायेगा  

जात धर्म इलाके का भूत जनता के दिमाग में डाल दिया

जन अब आहिस्ता आहिस्ता समझ रहा सही रास्ते आयेगा

बेरोजगारी, महंगाई, रिश्वतखोरी जन जन को चूस रही हैं

अब और सहन नहीं होगा इनके खिलाफ वो आवाज उठायेगा 

शिक्षा स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा प्राइवेट हाथों में दे रहे

जन संघर्ष का मंच बना किसान मजदूर गरीब अब संघर्ष बढ़ायेगा

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419


अब हालत बदलने होंगे ग़म का बोझ उठाने वाले |

वरना देते ही जायेंगे दुःख दिन रात ज़माने वाले |

मजलूमों को बाँट रहे हैं परम्पराओं के बहाने करके 

इस साजिस ही में शामिल हैं वे नफरत फ़ैलाने वाले |

दुनिया पर कब्ज़ा है जिन का वो उस के हक़दार नहीं हैं 

उनसे अब कब्ज़ा छीनेंगे  सब का बोझ उठाने वाले |

पत्थर दिल लोगों से अपने जख्मों को ढांपे ही रखो

खुद को हल्का कर लेते हैं सबको जख्म दिखाने वाले |

कोई किसी का साथ निभाए इतनी फुर्सत ही किसको है 

अफसानों में मिल सकते हैं अब तो साथ निभाने वाले

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418


अपणा खोट छुपाणा सीख


अपणा खोट छुपाणा सीख।

औरां कै सिर लाणा सीख।।

खोट करया पछतावै ना

मन्द मन्द मुस्काणा सीख।

हाथ काम कै ला ना ला

बस फोए से लाणा सीख।

जित भी रौल़ा सा दिक्खै

बीच म्ह टांग फसाणा सीख।

दो भाई जित बैट्ठे हों

उत् जुत्ता बजवाणा सीख।

अफसर गेल्यां ढब ला कै

अपणे काम कढ़ाणा सीख।

बाब्बा बणकै मौज उडा

बस थोड़ा बहकाणा सीख।

खूब दवाई बिक ज्यांगी

थोड़ा पेट घुमाणा सीख।

के करैगा पढ़ लिख कै

पेपर लीक कराणा सीख।

काम करण की लोड़ नहीं

बस ठग्गी का खाणा सीख।

मुंह कान्ही देक्खैंगे लोग

आग म्ह घी बगाणा सीख।

देकै गाल़ पड़ौसी नै

देशभक्त कहलाणा सीख।

दिन म्ह सुथरे भाषण दे

रात नै पाड़ लगाणा सीख।

सारे घरके खुश रैह्ंगे

मीठा मश्का लाणा सीख।

लिप्पा पोत्ती का युग सै

झुट्ठी बात बनाणा सीख।

कूड़ा राख संभाल कै

मैट तल़ै सरकाणा सीख।

अपणै घरां बिठा पैहरे

औरां कै दा लाणा सीख।

नंबरां आल़ा फोन छोड

टच का फोन चलाणा सीख।

गया जमाना चिट्ठी का

फेशबुक पै आणा सीख

फेसबुक वट्सप ट्विटर पै

क्रांति शंख बजाणा सीख।

समझौता तो होज्यागा

पहलम सिर फुड़वाणा सीख।

खोज बीन कोण करै इब 

पील़ी कलम चलाणा सीख।

थाणेदार के गोस्से ढो

ऐण्डी गधी कुहाणा सीख।

राजनीति के झगड़े नै

जात धरम पै ल्याणा सीख।

हवा भतेरी चाल्लै सै

आग पुल़े म्ह लाणा सीख।

किसका कोण बिगाड़ै के

शर्म तार गिरकाणा सीख।

सब बैंकां का धन तेरा

करजा ले पां ठाणा सीख।

बैरी बिना लड़ैगा के

कुछ तो बैर बिसाणा सीख।

खतरे म्ह सै दीन धरम 

मन म्ह भय बिठाणा सीख।

टेम इलैक्शन का आवै

धन दारू बंटवाणा सीख।

जनता की मजबूरी का

पूरा फैदा ठाणा सीख।

लोड़ नहीं सै देवण की

दिखा दिखा तरसाणा सीख।

बडा नामवर होज्यागा

गीत राज के गाणा सीख।

गोर्की मुन्शी कुछ कोनी

नाम बदल छपवाणा सीख।

ज्यादा मगज खपावै क्यूं

फरजी ठप्पा लाणा सीख।

आयोजक की कर तारीफ

आच्छी गोज भराणा सीख।

शाल इनाम सभी तेरे

बस ताड़ी बजवाणा सीख।

भेष बदल कै आणा सीख

हंगामा करवाणा सीख।

झुठ्ठी साच्ची लाणा सीख

मुद्यां नै उल़झाणा सीख

ज्ञानी कैह्ंगे लोग तनै

खड़तल गाल बजाणा सीख।

अपणा खोट छुपाणा सीख।

औरां कै सिर लाणा सीख।।

मंगत राम शास्त्री

Ranbir Singh Dahiya.


********

417


रसातल 

 बस कुछ मत पूछो 

रसातल में जा रहा है समाज 

पहले वाली कोई बात ही नहीं 

लड़के तो बिगड़ैल पहले से ही थे 

अब इन लड़कियां को आज डराया

धमकाया बहकाया जा रहा है 

नकल करने को मजबूर 

आजकल एकल परिवार और एकल हो गया 

मां कहीं बाप कहीं खुद कहीं तो पत्नी कहीं 

इसे क्या कहें घर परिवार या महज एक व्यक्ति 

खाने में मिलावट, पानी साफ नहीं ,

हवा का प्रदूषण कोई भी माफ नहीं 

ग्लोबल फूड क्राइसिस वाटर क्राइसिस 

ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ता यह खटका 

सिस्टम लगता है पूरा का पूरा भटका 

भर गया भर गया पाप का मटका 

यह तो सभी चाहते हैं कि समाज में 

सुधार की बहुत जरूरत है आज 

कई भगत सिंह पैदा हों  फिर से 

मगर हों पड़ोसियों के यहां 

हमारे बच्चों को तो ट्यूशन से 

फुर्सत ही कहां है?

2/5/08


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416


बाजार की आवाज

पुकार म्हारे बाजार की इपै कान आज तूँ धरले।।

लेकै साहरा मक्कारी का दौलत तैं घर भरले।।

1

रिश्वत लेकै छवि बनाले करै सारा जगत बड़ाई

लालच मिशन होग्या पाप की फेर फ्लै कमाई

चोरीजारी जुआ जामनी भ्रष्टाचार की टोहकै राही

पीछै मुड़कै नहीं लखाना चाहे हो कितनी तबाही

आछभूंड कर मनचाही छिपकै कै खुली करले।।

लेकै साहरा मक्कारी का दौलत तैं घर भरले।।

2

जीवन बिगड़ै ऐस बिना बिना तृष्णा के दुख पावै

बिना दारू ऐस होवै ना बिन औरत ना दारू भावै

नशा करण तैं श्यान बढ़ै दिल भोगों पर ललचावै

भोग फेर और भोग नित नया भोग माणस चाहवै

कार बदेशी बढ़िया कोठी सबके दिल नै हरले।।

लेकै साहरा मक्कारी का दौलत तैं घर भरले।।

3

पीसा दिखा रूतबा बढाले वाह वाही सबकी लूटै

कमीशन खोरी के दमपै ठेका तेरे नाम पै छूटै

नेता अफसर पुलिस की तिग्गी बाजार बीच चूटै 

कई ढाल की शराब तै बनी कॉकटेल रोज घूंटै

मजबूत तेरा खूंटा इनै हिला हिला जनता मरले।।

लेकै साहरा मक्कारी का दौलत तैं घर भरले।।

4

झूठ साख सम्मान बढ़ावै तेरी बदमाश तैं यारी

दगाबाजी खूब सीखली थानेदार की थानेदारी

जी हजूराँ की लार लगी यो रूतबा तेरा बाजारी

चुगल खोरी तनै भावै सुनावनिया तनै देवै उडारी

बदेशी ऐस हो न्यारी जब अमरीका मैं फिरले।।

लेकै साहरा मक्कारी का दौलत तैं घर भरले।।

5

नशा हिंसा पोर्न फैला मिनिस्टर बन अनीति तैं

दगा कपट का छोंक लगा आगै बढ़ले कुरीति तै

खुदगर्जी बेईमानी बाकी काम करले भभूति तै

झूठी तोहमद लगाकै सबक सिखादे समिति तै

रणबीर लिखैगा साच्ची दिखा कितना ए डरले।।

लेकै साहरा मक्कारी का दौलत तैं घर भरले।।

2008



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415


गुर्दे का गुर्दा 

किडनी लगवाने वाले विदेशी मूल के

 किडनी देने वाले सभी देसी फूल थे 

बीच में एजेंट हैं साथ में डॉक्टर उसूल के  

जिसके गुर्दे फेल हो गए मरने को है 

दूसरा जीवन देना हम सबका फर्ज है 

गरीबी के चलते किडनियां फेल न हों

उनको भी बचाना मानवता के खाते दर्ज है 

जिसे गुर्दा चाहिए था उसे गुर्दा दिलवाया 

भूख के कारण दोनों गुर्दे मरने को थे 

उनमें से एक गुर्दा तो बचा ही दिया 

दानी गुर्दे से एक और मानव बच पाया

काफी लोगों को रोजगार मुहैया करवाया 

एजेंटों का जाल बिछा कर चुपचाप पुण्य किया 

गुर्दा लेने और देने का कानून सख्त इतना

इससे बचने का प्रयास करना पड़ता कितना

जरा सोचो तो सही दिमाग पर जोर देकर 

विदेशी को अपने ही देश में अपने लिए 

महज एक गुर्दा भी क्यों नहीं मिला 

भारत देश महान का गुर्दा उसे क्यों भाया 

पैसे का खेल है यहां पर मेरे यारों 

इसी कारण बदेशी देशी गुर्दा खरीद पाया 

इसके लिए नेता अफसर पुलिस के 

 बिक गए बस कीमत की बात थी यारो।


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414


मंदी के दौर में भी एक नया दौर लाएंगे।।  

आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटाएंगे।। नएपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है इंसानियत बाजार में हर एक होता जा रहा है  परचम इंसानियत का हम फिर फैहराएंगे।। 

भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है 

छिपा अपनी कमजोरी कर झूठा सॉन्ग रहा है जनता करें कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचाएंगे।। हाशिए पर फैंके गए जो उनका जमाना आएगा अपना हक पाने को नागरिक समाज बनाएगा बढ़े कदम नए साल में आगे बढ़ते जाएंगे।। नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है जात-पात गोत नात क्यों अपने रंग दिखाता है नए साल की आशा से निराशा से लड़ पाएंगे।।


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413


नोट बंदी और आम जनता 

युद्ध के समय नहीं देखी ऐसी

आपातकाल में नहीं देखी ऐसी

अबकी नोट बंदी ज्यादा खतरनाक

मगर बगावत का माहौल नहीं था

लोग दिन रात लाइनों में खड़े खड़े 

दम तोड़ रहे थे

किसानों की खेती चौपट हो गई 

और मजदूर खाली हाथ घूम रहे

दुकानदार भी झेल रहे मार इसकी

हुए थे शिकार मंदी के किरयाने वाले

कर्मचारी भी झेल रहे थे इसकी मार

शादियां पोस्टपोन हो रही थी या फिर

करकरा के बस फेरे पूरे किये गए थे

विपक्ष पक्ष को कोस रहा था देखो 

तुगलक का अवतार बताया किसी ने

संसद नहीं चल पा रही थी इसके चलते

नितीश कुमार और अखिलेश की भाषा

अपने ही ढंग की लगती थी

उनको लगता था यह सब देश हित में 

किया गया काम है सरकार का 

ऐसा जनता लाइन में खड़ी सोच रही 

थी शायद!

काला धन खत्म करने का 

कारगर रास्ता बताया था

आतंक वाद खत्म करने का सही

कदम उठाया था

भ्रष्टाचार खत्म करने का रास्ता 

यही दिखाया था

कहा वास्तव में अमीरों पर पहली बार

नकेल कसी जायेगी पहली बार यहाँ

इस नोट बंदी ने काले को सफेद 

करने की कला हमको सिखलायी थी

जन धन योजनाओं में पिचहत्तर हजार

करोड़ कोई पूछे कहाँ से आया यह धन?

चार माह की छूट थी काले को सफेद की

पैंसठ हजार करोड़ ही आये थे कहते

जन धन खतों में रोजाना अरबों 

आ रहे थे

कोई पूछे क्या मजदूरों के पास 

काला धन था?

दो हजार का नोट लाये ही क्यों ?

काले धन की रेल तेजी से दौड़ने लगी 

मेरे देश भारत महान में 

आखिर यह खेल क्यों और किसलिए 

खेला गया था?

सोचना ही होगा बहन और भाईयो!

वो जो कहा वह बिलकुल भी न हुआ

तो हररोज कुछ न कुछ नया जुगाड़

भिड़ाती नजर आयी थी सरकार

हाथ पैर फूल गए थे 

जनता लाइनों में खड़ी खड़ी देख रही 

थी

किस दिन ये भूचाल बन जायेगा सरकार

भीतर ही भीतर बहुत घबराई हुई थी

बात पक्की है ये यारो दूसरे उन देशों से 

भी शिक्षा नहीं ली थी कि जिस देश ने 

नोट बंदी की वह बर्बाद ही हुआ कहते

इतिहास इसका गवाह बताया 

सोचने की बात तो फिर भारत कैसे बचेगा?

मगर सोचना हमने बन्द कर दिया है 

काला धन इस नगदी में तो एक प्रतिशत

ही बताया है बाकी का हिसाब क्या है?

बाकी तो सोने में, जमीन में, उद्योग में, डॉलर में स्विस बैंक में , भगौड़ों के पास, में बताया

इनमें से किसी पर हाथ डालकर तो 

दिखाओ जो चिंता काले की सच में 

मारो छापे उनके अड्डों पर 

नहीं जो इस सब की पोल खोल 

रहे हैं छापे उनपर डलवाये जा रहे हैं 

आर्थिक संकट घटा नहीं बल्कि बढ़ 

रहा है 

आने वाले दिन , आने वाला दौर और 

मुश्किल नजर आ रहा है 

जनता को गुमराह करने के तरीके भी 

तेज कर दिए हैं 

असली मुद्दे आर्थिक संकट के, बेरोजगारी के, महंगाई के, महंगी शिक्षा के, महंगे इलाज के , महिला उत्पीड़न के दलित उत्पीड़न के कावड़ यात्राओं में भुलाए जा रहे हैं ।

असमानताओं का संकट पूरी दुनिया में 

बढ़ रहा है?

सोचो मेरे देश भारत महान के बारे 

देर होती जा रही है ।

रणबीर



******//

412


किसी के कान में कही गई बात 

हजारों मील दूर तक सुनाई पड़ती है 

धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले 

गलत मत बोल कोई सुन न ले 

लेकिन फिर भी हर कोई सुन लेता है 

और वही राज की बात घूमती घूमती 

फिर आपके कानों में आ पड़ती है 

आप हैरान होते हैं कि यह कैसे हुआ 

इसे कहते हैं गॉशिप  या कहे चुगली 

जो आपसे गॉशिप करता है वह 

आपके बारे में भी गॉसिप करेगा।

*******

411


उलटे सीधे धंधे करते डर नहीं थारै घळणे का


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


बाजार मैं आज सब किमैं बिकता पाया देखो


इसनै पीस्से का रिश्ता हर घर पहोंचाया देखो


मानवता को नचाया देखो फूल इंका ना खिळणे का ।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


त्याग प्रेम की भावना आज ये जमा सुखा दई रै


आपसी आव भगत भी या पढ़ण बिठा दई रै


ईमानदारी रुआ दई रै यो संकट ना टळणे का ।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


पीसा चाहिए बेशक काला रास्ते करे काले रै


पूरी दुनिया पै छाया अपने चमचे घने पाले रै


बद राजनीत घर घाले रै खेल रचाया दलणे का।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


रिश्ते नाते बिगाड़ दिए यो व्यभिचार फैला दिया


चोरी जारी और डकैती पूरा समाज हिला दिया


फासिज्म याद दिला दिया रणबीर ना फ़लणे का ।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


****

410

हम सब किधर जा रहे हैं जरा सोचो तो सही

हम सब क्या बना रहे हैं जरा सोचो तो सही

सार्वभौमिक शिक्षा पर अब हमला बोल दिया

कैसी शिक्षा ला रहे हैं जरा सोचो तो सही

स्वास्थ्य भी प्राइवेट सेक्टर को सौंपा जा रहा

पाकिट खर्च बढ़ा रहे हैं जरा सोचो तो सही

भूख बेरोजगारी पूरे देश में आज बढ़ाई देखो

देश विश्वगुरु बना रहे हैं जरा सोचो तो सही

समाधान सबका कंधों पे कावड़ लाद दिये

असली रास्ता छिपा रहे हैं जरा सोचो तो सही

जात धर्म पर बांट रहे बहुविविधता पर हमला

आज धर्मांधता फैला रहे हैं जरा सोचो तो भला


****

409

76वें आजादी दिवस पर एक तस्वीर यह भी है मेरे देश महान की कि जहाँ ---


1 देश में शिक्षण संस्थानों से ज्यादा धार्मिक स्थल हैं


2 देश में गाय दूध की जगह वोट देती है


3 देश के बच्चों के हाथ में कलम की बजाय झूठे बर्तन हैं


4 देश का शिक्षक अध्ययन की जगह घर घर जाकर जनगणना , आर्थिक गणना और मतदाता सर्वे करता है


5 देश का अन्नदाता कर्ज में डूब कर आत्महत्या कर रहा है


6 देश में शिक्षा और स्वास्थ्य बाजार की वस्तु हैं


7 देश में मजदूर की मज़दूरी और किसान की उपज का भाव बढ़ाने में तकलीफ होती है


8 देश में नेताओं का वेतन एक मिनट में बढ़ जाता है


9 देश की जनता हाथ जोड़ कर नेताओं के सामने गिड़गिड़ाती है


10 देश में धर्म ,जाति, सम्प्रदाय,लिंग और गोत्र के नाम पर पहचान की राजनीति होती है


11 देश के नेताओं के लिए शिक्षा, उम्र और चरित्र का कोई पैमाना नहीं है


*********** उस लोकतांत्रिक देश का भविष्य क्या होगा-------- ?


*****

408

दिल की बात दिल से



हमने तो बस निभा दी किसी तरह ईमानदारी यहां


तुमने तो बस दबा दी किसी तरह ईमानदारी यहां


स्टेज पर मशवरे देना बड़ा आसान है सब कहते


मगर जीवन में धारणा बड़ा मुश्किल कहते रहते


करनी कुछ कथनी कुछ सारी उम्र झूठ ढोते देखे


ऊपर से प्यार मुलाहजा वैसे जहर बीज बोते देखे


जब मैडीकल में दाखिल हुए समाज सेवा इरादा था


हमें सिखाया उसमें अपनी सेवा का भाव ज्यादा था


मैडीकल में भी लालच बहुत गये थे दिखाये हमको


पैसा कमाओ मौज उडाओ यही मंत्र सिखाये हमको


बाकी समाज से अलग मैडीकल ऐसा समझा जाता


जीने मरने के बीच का जीवन इन्सान यहां बिताता


मरीजों से ही सीखा मैने ये इलाज हर बीमारी का


अब सर्जन बन कर कैसे रुप धारुं मैं व्यापारी का


यह भी अच्छा ही हुआ माहिर सर्जन न बन पाया


कई माहिर सर्जनों ने पैसे के पीछे ईमान ही गंवाया


दिखावटी ईमानदारी का लबादा कुछ ने बात बनाई


हमारी ईमानदारी की कसम लोगों ने कई बार उठाई


चीफ विजीलैंस आफिसर की चुनौती भरी जिम्मेदारी


इस चुनौती के दांव पर सच्चाई ये चाही खरी उतारी


हमने समाज सेवा पक्ष जीवन में पूरी तरह अपनाया


वी आर एस ली चाहते समाज सेवा को आगे बढ़ाया


आप सबका सहयोग चाहिये यही है अरदास साथियो


समाज सुधार का ही एजैंडा रहेगा आस पास साथियो


*******

407

मुझे लगता है उन्ही के मैदान में खेल रहे हम

उन्हीं की शर्तों को आज देखो झेल रहे हैं हम

संस्कृति के नाम पे उन्होंने मेहनत छीनी हमारी

परम्परा के नाम पर अच्छे से खाल गयी उतारी

हमारे नेताओं नेभी उन्हीं मैदान में झोंक दिया रे

अपना मैदाने जंग नहीं पूरा अभी तयार किया रे

समझने की ताकत हैं अंगिन्नत ये दिमाग हमारे 

कम्प्यूटर फेल हो जाते हैं बहुत बार देखो बेचारे

हमारी सोचने की ताकत को घुमा दिया दोस्तो

अपने मैदान में आने का मन बना लिया  दोस्तों

अपनी लड़ाई अपने मैदान में लड़ने की ठानली

समझो मालिकों ने हार शुरू हुई पक्का मानली

इंकलाब तो आएगा ही नहीं कोई रोक पायेगा रे

इंसान का कब्ज़ा पूंजी पर फिर हो ही जायेगा रे

सबके लिए सब कुछ होगा ना भूख रहेगी यारो

मांनवता की जीत होगी हैवानियत ढहेगी यारो



*********

406


आज भी याद जो कसमें खाई थी


भूल गये वजह होगी बेवफाई की


हमें भूलो तो कोई बात नहीं यारो


राह क्रांति का भूले बात रुसवाई की


****

405

माना कि हममें कमियां कई होंगी


इतना तो पक्का हम नहीं थे ढोंगी


ढोंगी तो तुम भी नहीं इतना यकिन


समझ न आई क्यों पहनी ये चोंगी


****

404

मुश्किल हो गयी चेहरों की पहचान


समझते रहो इंसान निकलते शैतान


मुखौटे पहना दिए हैं हम सबको यारो


पूंजीवाद ने संभाली पूरी आज कमान



*****

403

एक दूजे से आगे निकलूँ लगी है हौड


कुचल के पैरों के नीचे मैं जीतूँ दौड़


हंसमुख चेहरा दीखता मन है मैला


मारो काटो हाथ ना आओ ये निचौड़


*******

402

भाई भाई आज बैरी हो गया है कहते


इंसानियत का चेहरा खो गया कहते


पैसा और पैसा सब नैतिकता बेच के


बाजारवाद गरीब को डबो गया कहते


*****

401

कई कमरे की कोठी आज बनाई देखो


मियां बीबी और नहीं आवा जाई देखो


बेटा फ़्रांस में अटका बेटी यु के में बैठी


विडिओ कांफ्रेंसिंग से दिल बहलाई देखो


*****

400

दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है


पुरानी पर नई की हो दखल रही है


बदलाव है कैसा यह देखना होगा ही


वातावरण की बदल शकल रही है


******

389

नाजुक जमाना देख के चलना समाज को वे हैं तोड़ रहे


देश द्रोही का खिताब उन्हें जो हिंदुस्तान को जोड़ रहे


आर्थिक संकट बढ़ता जा रहा इसकी धार को मोड़ रहे


धर्म जात पर बांट दिए अंधविश्वास के पहन खोड़ रहे


*******

388

मीडिया टीवी अखबार सोशल मीडिया की मार बड़ी


बहुविविधता को खंडित करो ये होती है प्रचार बड़ी


डेमोक्रेसी पर हमला भारी विचारों की है धार बड़ी


दाएं बाएं सोते उठते नफरत की चले है तलवार बड़ी


******

387

गरीब और गरीब हो गये अमीर के कहने क्या


रोटी नहीं नसीब मुरारी देखे उनके गहने क्या


उनके तो हैं सूट सुपारी हम बताओ पहने क्या


देख के हाल सारा आंसू तुम्हारे ना बहने क्या


****

386

रोने से किसी को कभी पाया नहीं जा सकता


खोने से किसी को भुलाया नहीं जा सकता


वक्त तो मिलता है जिंदगी बदलने के लिए


मगर जिंदगी छोटी है वक्त बदलने के लिए


****

385

आज रास्ते बदल लिए मौका परस्ती दिखलाई


पन्द्रह साल तक तुमने कदम से कदम मिलाई


चुनौती ज्यादा गंभीर आज जब सामने है आयी


भूल गए वो इंकलाबी नारे नकली कुर्सी है भाई


******

384

इंकलाब छुपा रखा है इन पलकों मे ही


पर इनको ये बताना ही तो नहीं आया,


संकट के वक्त लाल हो जाती ऑंखें पर ,


गरीब का दर्द दिखाना ही तो नहीं आया


****

383

ये रिश्ते काँच की तरह होते है,


टूट जाए तो चुभते है अंदर तक


इन्हे संभालकर हथेली पर यारो


क्योकि इन्हे टूटने मे एक पल


और बनाने मे बरसो लग जाते हैं


*****

382

एक क्रोधित हुए दिल का आगाज़ मुझे कहिए


सुर जिसमें सब क्रान्ति के, वो साज़ मुझे कहिए


मैं कौन हूँ क्या हूँ मैं किसके लिए ज़िंदा हूँ यारो


वंचित और दमित की एक आवाज मुझे कहिए


******

381

मेरे अल्फाज़ों को झूठ ना समझना यारो


असल में ही चाहता समाज बदलना यारो ,


जी रहा हूँ ईमानदारी का दामन थाम कर,


नहीं बदल पाऊँ तो बेवफा मत समझना..


****

380

दोस्ती फूल से करोगे तो महक जाओगे


सावन से करोगे तो जरूर भीग जाओगे


सूरज से करोगे तो जरूर जल जाओगे


हमसे करोगे तो जरूर "बिगड़"जाओगे


******

379

ए दोस्तों कभी हमको तुम भुला ना देना


इस हँसते हुए चेहरे को तुम रुला ना देना


कभी किसी बात पर खफा हो भी जाओ


मुझ से दूर होकर जुदाई की सजा ना देना


*****

378

उलटे सीधे धंधे करते डर नहीं थारै घळणे का


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


बाजार मैं आज सब किमैं बिकता पाया देखो


इसनै पीस्से का रिश्ता हर घर पहोंचाया देखो


मानवता को नचाया देखो फूल इंका ना खिळणे का ।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


त्याग प्रेम की भावना आज ये जमा सुखा दई रै


आपसी आव भगत भी या पढ़ण बिठा दई रै


ईमानदारी रुआ दई रै यो संकट ना टळणे का ।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


पीसा चाहिए बेशक काला रास्ते करे काले रै


पूरी दुनिया पै छाया अपने चमचे घने पाले रै


बद राजनीत घर घाले रै खेल रचाया दलणे का।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे का


रिश्ते नाते बिगाड़ दिए यो व्यभिचार फैला दिया


चोरी जारी और डकैती पूरा समाज हिला दिया


फासिज्म याद दिला दिया रणबीर ना फ़लणे का ।


सब कुछ छोड़ कै जाना साथ कुछ ना चळणे



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377


ये रिश्ते काँच की तरह होते है,


टूट जाए तो चुभते है अंदर तक


रखो संभालकर हथेली पर यारो


क्योकि इन्हे टूटने मे एक पल


और बनाने मे बरसो लग जाते हैं




********

376


बाल मजूरी

बचपन जवानी और बुढ़ापा सब गढ़मढ़ हो गए 

बचपन में की बाल मजूरी सपने सब ही खो गए

दो साल की थी तो पिता जी ने साथ छोड़ दिया 

तीन साल की थी तो माता जी ने नाता तोड़ लिया 

बचपन में मेरे जैसे बच्चे तो बस डले ही ढो गए

बचपन जवानी और बुढ़ापा सब गढ़मढ़ हो गए 

बड़ा भाई मेरा शराबी बहुत डर लगता मुझको 

बाल मजूरी मेरी मजबूरी मालिक ठगता मुझको 

काम ज्यादा पैसे थोड़े आज कानून सब सो गए

बचपन जवानी और बुढ़ापा सब गढ़मढ़ हो गए 

एक घर में छोड़ दिया दिन रात मजूरी करती मैं

कर पूरे घर की सफाई मुश्किल से पेट भरती मैं

मालिक का गुस्सा देख मेरे दिलो-दिमाग रो गए

बचपन जवानी और बुढ़ापा सब गढ़मढ़ हो गए 

एक नहीं हजारों लाखों बच्चे ये भारत महान के 

बाल मजूरी को मजबूर हुए ये तारे हिंदुस्तान के 

किस्मत का लेके बहाना जीवन में कांटे बो गए

बचपन जवानी और बुढ़ापा सब गढ़मढ़ हो गए



*******

375


बच्चे

बच्चों को हंसना आता है 

बच्चों को रोना आता है 

बच्चों को शांति का अंदाज है 

बच्चों को अराजकता का अंदाज है 

बच्चों को स्वीकार करना आता है 

बच्चों को खारिज करना आता है 

बच्चों को खुशी की जानकारी है 

बच्चों को दर्द का भी अहसास है 

बच्चों को अधिकता का ज्ञान है 

बच्चों को अभाव की पहचान है 

बच्चों को सेहत के बारे में पता है 

बच्चों को मालूम रोग की खाता है 

बच्चों को जी भर कर जीने का पता है 

बच्चों को दुनिया के खालीपन की भी 

जानकारी है 

बच्चों को पता है आस क्या होती है 

बच्चों को पता है निराशा क्या होती है 

बच्चों को पता है प्यार का 

पता है घृणा के हथियार का 

उन्हें यदि पता नहीं तो 

इस बात का कि यह 

सब आखिर क्यों है ?



*************

374


आसान है

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

सटीक समीक्षा करना 

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

सुंदर सी तस्वीर बनाना 

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

तरफदारी करते रहना 

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

नुमाइश दिखाते रहना 

मगर बहुत मुश्किल है इस जिंदगी को 

हकीकत में जी सकना


*********

373


नयन देवी 

नयन देवी में हादसा हुआ 

डेढ़ सौ लोगों की मौत हो गई 

तीन सौ घायल हो गए 

कहते हैं पुलिस ने भांजी लाठियां मची भगदड़ तो फिर कोहरम मचा  

हर तरफ चीख पुकार थी

मंदिर में खौफ पसर आया

रास्ता बहुत ही संकरा सा था

लोग भाग भी नहीं पाए और कुचले गए

आठ दस करोड़ का चढ़ावा आता है

सुविधाएं तो चाहियें भक्तों को

मगर कौन मांग करे और किससे?

हिंदू उतराधिकारी कानून की धारा छह का संबंध 

सांझा संपति से है

कानून बनाने से कितना फर्क आएगा

महिला को हिस्सा कैसे मिल पाएगा

आसान नहीं है डगर महिला की

उसका सफर मुश्किल होता जाएगा।



*********/

372

भारत को सही तस्वीर की फ़िलहाल जरूरत है

झलकारी बाई गंभीर की फ़िलहाल जरूरत है

कुरुक्षेत्र के मैदान में कहते सच की जीत हुई थी

द्रोपदी चीर हरण हुआ कलंकित ये रीत हुई थी

एकलव्य वाले तीर की फ़िलहाल जरूरत है

बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज में

ज्योतिबाफुल्ले रमाबाई उभरे थे नए अंदाज में

दोहों वाले उस कबीर की फ़िलहाल जरूरत है

अंड वंड पाखंड खिलाफ जमके लड़ी लडाई देखो

सत्य की खोज में त्यार करे थे भाई बहन देखो

स्वामी दयानंद फकीर की फ़िलहाल जरूरत है

ठारा सौ सतावन में लाखों फांसी फंदा चूम गए

राजगुरु सुखदेव भी आजादी की खातिर झूम गए

उस भगत सिंह रणधीर की फ़िलहाल जरूरत है

जलियाँ वाले बैग का बदला दिल में ज्योत जलाई

जालिम डायेर कै जाकै छाती मैं गोली मार दीखाई

उस उधम सिंह बलबीर की फ़िलहाल जरूरत है

जवाहर रविंदर गाँधी देस आजाद करना चाहया

अनगिनत लोग थे जिन्होंने अपना खून बहाया

अहिंसा पुजारी गाँधी पीर की फ़िलहाल जरूरत है

मजदूर किसान की खातिर जिंदगी ही न्योछार दई

मार्क्स नै दुनिया के बारे मैं एक नई सी विचार दई

आज मार्क्सवादी शूरवीर की फ़िलहाल जरूरत है

महिला दलित का दोस्त आज चाहिए समाज इसा

पूंजीवाद राज अन्यायी ख़त्म हो मंदी का राज इसा

एक सही लिखारी रणबीर की फ़िलहाल जरूरत है


**********

371


विश्व बैंक 

विश्व बैंक हमारा रक्षक हमने रक्षक माना इसको। 

निकला यह पूरा ही भक्षक अनुभव से जाना इसको।   

  गरीबी और बेकारी सबके खत्म होने की आस उठी

मगर पन्दरा साल के भीतर जवान बेटे की लाश उठी

विश्वबैंक के कान हों तो गरीब की व्यथा सुनाना इसको।

शिक्षा जगत में गुणवत्ता का इसने ही प्रचार किया  

जैसी शिक्षा थी अपनी उस पर जमकर प्रहार किया

महंगी शिक्षा गुणवत्ता नहीं इतना तो बताना इसको।

स्वस्थ जगत का रंग बदला बड़े अस्पताल ले आए 

मेरे जैसे गरीब गुरबा तो इनके अंदर नहीं घुस पाए 

अपोलो फोर्टिस की कल्चर ये जरा समझाना इसको।  

   बहुराष्ट्रीय कंपनियों का यह रक्षक असल में पाया 

मुखौटा हमारी मदद का रंग रंगीला इसने लगाया 

रणबीर का पैन खोसने का ना मिला बहाना इसको।

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370

क्या किया

शराब नहीं पीते तो क्यों इस संसार में आए तुम तुमने छेड़छाड़ भी न की तो क्यों नहीं पछताए तुम 

मांरो खाओ हाथ ना आओ जीवन का दस्तूर यही 

इस दस्तूर को दोस्त मेरे क्यों ना निभा पाए तुम।।

चोरी जारी नहीं करना सीखा तो क्या खाक जवानी 

जेल की सजा नहीं काटी ना शहीद कहलाए तुम।। 

दो-तीन लड़कियां नहीं भलाई रहे कोरे के कोरे समय से पीछे क्यों रहे ना अखबारों में छाए तुम।। 

एचआईवी ऐडज से क्यों वंचित तुम घूम रहे संवेदनशील मानव को फिरते गले लगाए तुम।।


**********

369


दोहरापन 

दोहरापन जीवन  का हमको अंदर से खा रहा ।

एक दिखे दयालू दूसरा राक्षस बनता जा रहा ।

चेहरों का खेल चारों तरफ दुनिया में फैल रहा ,

मुखोटे हैं कई तरह के कोई पहचान नहीं पा रहा।

सफेद मुखौटा काला चेहरा काम इनके काले हैं 

बिना मुखोटे का तेरा चेहरा न किसी को भा रहा।

कौन सा मुखौटा गुजरात में करतब दिखा रहा ये 

जनता को बहला धर्म पर कुर्सी को हथिया रहा ।

धार्मिक कट्टरता का चेहरा प्यारा लगता क्यों है 

मानव से मानव की हत्या रोजाना ही करवा रहा।

कौन धर्म कहता हमको घृणा का मुखौटा पहनो 

खुद किस झोपड़ी में आग खुदा जाकर लगा रहा। 

राम भी कहता प्यार करो दोहरेपन को छोड़ दो अब 

रणबीर भी बात वही  दूजे ढंग से है समझा रहा।।।

*********

368


दोस्त 

पास रहकर भी दूर रहना कोई सीखे तुमसे 

बिना कहे बहुत कुछ कहना कोई सीखे तुमसे 

लालच व भोग का बाजार जकड़े हुए हैं हमें 

बाजारी दुनिया से फ़हना कोई सीखे तुमसे ।

हर ईंट  के नीचे आज बैठा बिच्छू दिखाई देता है 

बिच्छुओं के दंश न सहना कोई सीखे तुमसे ।

माया जाल फैला है यहां झूठ और मक्कारी का 

इस जाल की आग़ में न दहना कोई सीखे तुमसे ।

सोने पर ये रांग का पानी चढ़ा कर बेचते देखो 

कैसे पहचानें असली गहना कोई सीखे तुमसे ।

वैश्वीकरण के तूफान में सब कुछ बह चला है 

इस तेज तूफान में न बहना कोई सीखे तुमसे।


********

367


जुबां खुली भी है तो उनके 

गुणगान करने को 

इजाजत कहां है उनकी 

समीक्षा करने की। 

आजादी है औरत को अपना 

शरीर बाजार में बेचने की 

मगर आजादी नहीं अपनी 

मर्जी से शादी करने की ।

बिकने की आजादी पूरी 

ना बिकने पर रास्ते से 

हटाने की उनकी मजबूरी 

पता नहीं शहीद कितनी 

बोली नहीं लगने दी जिन्होंने 

आज के खूबसूरत से इस 

बाजार में।


******

366


होंगे बेशक मीलों के फ़ाँसले पर प्यार न कम होगा ।।

लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप को निभाने का दम होगा ।।

जरूरी पक्ष है इसका आपस में बातचीत करते रहना 

इसका मतलब यह भी नहीं 24 घंटे इसमें खपते रहना 

समय-समय पर बात करना ही लगता सही कदम होगा ।।

बात करते समय भविष्य या रिश्तो की बात नहीं जरूरी 

सकारात्मक मुद्दों पर बातचीत काम करती है ये हमारी ग़रूरी 

विवाद की बातचीत करने का फिर कभी नहीं हमारा मन होगा।।

 उनकी सुने अपनी सुनाऐं साथी की अनदेखी ठीक नहीं होती 

अनदेखी खटास लाती रिश्तो में आपस का विश्वास भी खोती 

इसलिए हमको जीवनसाथी की बात पर ज्यादा से ज्यादा नमन होगा।।

रिश्तो की पास के या दूर के इनकी नींव आपस का भरोसा बताया 

मिलने का प्रयास रहना चाहिए जब भी मिलने का मौका पाया 

प्यार और सम्मान हो रिश्ते में इसी से दमदार हमारा चमन होगा।।




***********

365


हर एक चीज आज ऑनलाइन मिल जाती है बाजार की छोटी दुकानों को जम्हाई दिलाती है 

कूरियर की सेवा मध्यम वर्ग को आज भाती है गरीब जनता ही अब इन छोटी दुकानों पे आती है

सिले सिलाये कपड़े की सप्लाई दर्जी को रुलाती है

खेती में ट्रैक्टर की कमाई किसान मजदूर को खाती है

बिहारी मजदूरों की लाइन चौराहों पर लगी पाती है

पार्कों में महिलाओं की टोली बैठी गीत गाती है

कई घंटी टीवी देखने की आदत बच्चों को भरमाती है



************

364


एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई 

बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई 

कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी 

गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई 

केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ 

लड़की के बाप ने बीच में आकर के  खेल रचाई 

पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़

यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई 

कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों 

एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी


********

363


लड़कियों ने भी समोकिंग में कदम बढ़ा दिए 

दारू पीने के खाते कईओं ने अपने खुला दिए 

क्या कहूं इसको के बराबरी की शाबाशी दे दूं 

झिझक रहा हूँ हमने ये क्या गुल खिला दिए 

इस तरह  बराबरी की बात शायद ठीक नहीं

हमें गुमराह करके हमारे सही राह भुलवा दिए 

मग़र यह बहुत छोटा हिस्सा है मालूम मुझे 

बड़े हिस्से ने संघर्ष के बिगुल आज बजा दिए



*****

362


एक किताब की तरह हैं हम यारो 

कितनी भी पुराणी हो जाये पर

उसके अल्फाज नहीं बदलेंगे कभी

याद आये तो पन्ने पलट के देखना

जैसे आज हैं हम वैसे ही मिलेंगे


********

361


बलात्कारियों का दबदबा चारों तरफ छा  रहा 

रोजाना ब्लात्कार हो रहे समझ नहीं आ रहा 

एक तरफ पेट में मारते जांच पड़ताल करके 

महिला भ्रूण हत्या हरयाणा में गुल खिला रहा 

शरीफ से शरीफ का दिमाग भी फिसल जाता 

जब भी उसे मौका मिले शरीफ नहीं गवां रहा

औरत को दोषी ठहराने का झूठा चलन आज 

हरयाणा में रोजाना दिन दिन बढ़ता जा रहा  

रिश्तेदार ठेकेदार  बने हमारी संस्कृति के देखो 

बाप चाचा भाई पड़ौसी मुंह काला करवा रहा 

पतन समाज का हो रहा नंबर वन हरयाणा में 

नम्बर वन कहने में मेरा कलम तो घबरा रहा


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360


आज बाजार व्यवस्था की 

 चारों तरफ गूंज  बताते हैं 

 हीरो विलेन और विलेन ये

 हीरो कैसे ये बन जाते हैं 

एंटी हीरो एंग्री हीरो का 

जमाना खत्म हुआ जताते हैं 

अब तो हीरो विलेन बन गया 

ऐसा फिल्में सीरियल दिखाते हैं 

कल तक जो राम थे यहां 

रावण बनकर इतराते हैं 

भीतर से रावण बन गए

मुखौटा राम का लगाते हैं  

हम भी रावण की कर पूजा

 दिवाली हर साल मनाते हैं।


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359


सत्य की असत्य पर

अच्छाई की बुराई पर

प्रकाश की अंधकार पर

ज्ञान की अज्ञान पर 

ये शब्द कोई भी इस्तेमाल कर सकता है शोषक भी और शोषित भी । सबसे ज्यादा लाइक भी इसी तरह की अपरिभाषित चीजों को मिलते हैं 

किसी भी वर्गीय समाज में एक तरह की नैतिकता नहीं होती मसलन 

गीता का सन्देश है 

कर्म कर फल की चिंता मत कर 

-- किसान ने इसे सही अर्थों में लागू किया तो फांसी खाने को मजबूर 

अडानी अम्बानी पहले फिजिबिलिटी सर्वे करवाते हैं कि फल रूपी कितना मुनाफा होगा तब कर्म करते हैं 

गीता का पाठ वे पढ़ें ,किसान मजदूर तो असल में सदियों से लागू करते आये हैं और फल सबके सामने हैं ।


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358

मनुष्य होने से अच्छा 

कुछ और हो ही नहीं सकता 

क्यों ?

यह कुदरत की सबसे बड़ी 

नियामत है |

पशु के पास विवेक की कमी 

बताते हैं 

मनुष्य की पूँजी इसे ही 

जताते हैं 

बहोत बार हम अपना विवेक 

खो जाते हैं 

इसी कारण कई बार हम 

पशु कहाते हैं |

Nov 2010

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357

बेवफा सिस्टम

इस बेवफा सिस्टम से वफ़ा मांग रहे हैं

हमें क्या मालूम है हम खता मांग रहे हैं

ये किस्मत का खेल रचाया है इसी ने तो

इसी से हम किस्मत की दुआ मांग रहे हैं

सच को छिपाता आधा सच बताता हमें

जहर घोला उससे साफ हवा मांग रहे हैं

रोजाना जो खेले हमारे जज्बात के साथ

सुख की राही का उससे पता मांग रहे हैं

सुरग की कामना में छिपी है जो रणबीर

अपने खुद की ही हम चिता मांग रहे हैं

13/9/09



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356


पता नहीं 

पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है

सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है

नई तकनीक ने कब्जा जमाया पूरे इस इंसान पर

आदमी आदमी को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है

दूसरों के कंधों पर पैर रखकर आसमान छू रहे हैं

गंदी फिल्मों का फैशन आज नई पीढ़ी पर छा रहा है 

दारू समाज के हर हिस्से में सत्यानाशी बनती जा रही 

अच्छा खासा हिस्सा आज दारु पी गाने गा रहा है

लालच फरेब धोखाधड़ी का दौर चारों तरफ छाया

नकली दो नम्बर का इंसान हम सबको भा रहा है

बाजार व्यवस्था का मौसम है मुट्ठी भर हैं मस्त इसमें

बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है

भाई भाई के सिर का बैरी कत्लोगारत बढ़ रही है

पुलिस अफसर कोई बाएं दाएं से खूब पैसे बना रहा है

पूरे के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो

आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना फैला रहा है

एक तरफ 

मॉल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी हुई सड़कें देती दिखाई

तरक्की का यह मॉडल देखो दूरियां बहुत बढ़ा रहा है

अपने बोझ तले एक दिन मुश्किल होगा सांस लेना

तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है


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355


जो अन्धविश्वास नै गल्त बतावै पक्का पाकिस्तानी होज्या 

जो मनुवाद पै सवाल उठावै पक्का पाकिस्तानी होज्या

जो साच कहन्ता ना घबरावै पक्का पाकिस्तानी होज्या

जो भगवाकरण नै बिसरावै पक्का पाकिस्तानी होज्या

रणबीर


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354


कहाँ छुपा के रख दूँ अपने हिस्से की शराफत, 

जिधर भी देखता हूँ उधर बेईमान खड़े हैं॥ 

क्या खूब तरक्की कर रहा है अब देश देखिये, 

खेतों में बिल्डर, सड़क पर किसान खड़े हैं ॥


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353


हिंदुस्तान की अनौखी खाशियत दुनिया में निराली है

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई रंग बिरंगा हाली पाली है

गंगा जमुनी मानवता सहिष्णुता गजब की थाली है

पीर की पूजा सभी करते परम्परा हमने ही डाली है


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352


उसने कुछ कहा तो मुझे नहीं सुनायी दिया

मैंने कुछ कहा तो उसे नहीं सुनायी दिया

क्या कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ क़ि

ना तुम्हें सुनायी दिया ना उन्हें सुनायी दिया


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351


खुदा को खुद इन्सान ने बनाया है

वक्त वक्त पर उसका स्वरूप बदला

इंसान की  जरूरत के रूप में आया है

अग्नि देवता बनी वायु देवता बनी

जब भी इन्सान क़ि कुदरत से ठनी

एक और देवता वजूद में पाया है

कुदरत के खेल में खुदगर्जों ने ही

खुदा को इन्सान और कुदरत के

बीच जान बूझ कर के फंसाया है

आज तक इन्सान मूलभूत में वही

कोई बदलाव नहीं है सदियों से पर

खुदा के रूप बदलते ही रहे और

आगे भी खुदगर्ज इंसान और भी

भगवान घड़ेगा अपनी जरूरत से


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350


जमाना अपनी रफ़्तार से चलता है

हमारे चाहने से भी  फरक डलता है

हमारी क़िस्मत कोई नहीं लिखता

हमारा अपना कर्म ही तो फलता है

मग़र शातिर लोगों की बदमाशी है

हमारे कर्म का फल उन्हें मिलता है


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349


लोग कहते हैं कि मैं पागल हूँ।

क्यों?

मुझे नहीं मालूम

डॉक्टर होकर पैसा न कमाकर 

लोगों की 

बीमारियों की सही जड़ पकड़ने की 

कोशिश शायद 

पागलपन नहीं तो और क्या है?

मुझे नहीं मालूम 

डायरी~1982



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348


आपात काल से बदतर आज हालात बने

फासीवाद से रोजाना देखो मुलाकात बने

और कोई चारा बचा नहीं लगता है यारो

सम्भलो इससे पहले कि ये दिन रात बने

फासीवाद से लड़ना इतना आसान कहाँ

पहले समझो इसको फिर कोई बात बने

************/

347


NTPC बेच रहे हमतै - कहते देश नहीं 

BSNL बेच रहे हमतै - कहते देश नहीं

MTNL बेच रहे हमतै- कहते देश नहीं

BPCL बेच रहे हमतै - कहते देश नहीं

IRCTC बेच रहे हमतै-कहते देश नहीं


************//

346


AIRPORT बेच रहे हमतै-कहते देश नहीं

लालकिला बेच रहे हमतै- कहते देश नहीं

रेलवे स्टेशन बेच रहे हमतै- कहते देश नहीं

एयर इंडिया बेच रहे हमतै -कहते देश नहीं 

रेलवे स्टेशन बेच रहे हमतै- कहते देश नहीं 

थारी संपत्ति बेच रहे हमतै- कहते देश नहीं


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345


पाखंडी कहते हैं ----

"सब प्रभु की माया है l

जिसने तर्क किया वो नरक में जगह पाया है l "

.

.

लेकिन भगत सिंह ने यही समझाया है ,

कोई भगवान ना आयेगा ,ना कभी आया है l

जिसने किया संघर्ष उसी ने सफलता का रस पाया है,

पाखन्डियो ने दलितों को बहुत सताया

है l

अब जाके नया सवेरा आया है l

जब से हमने शिक्षा को अपना हथियार बनाया है l

हर कामयाबी की बुलंदियों पर हमने

अपना परचम लहराया है l

हर जुल्म से लड़ने का हौसला पाया है l

जब से "क्रान्तिकारियों"के होठों पर

# इनंकलाब -आया है l l


इनंकलाब जिंदाबाद 🇮🇳💪🏻 SBYF



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344


एक बात

 

सुबह होती है फिर श्याम होती है 

सुबह रोती  है फिर श्याम रोती है 

अपनी इज्जत आबरू महिला 

सुबह खोती है फिर श्याम खोती है 

दलित जीवन में अमीरी दुःख के बीज 

सुबह बोती है फिर श्याम बोती है 

दबंग  और  पैसे की दुनिया रंगीन 

सुबह होती है फिर श्याम होती है 

लगते हैं जो धब्बे काली रातों में 

सुबह धोती है फिर श्याम धोती है 

सफरिंग दुनिय शाइनिंग  दुनिया को 

सुबह ढ़ोती है फिर श्याम ढ़ोती है 

प्रस्तुतकर्ता ranbir dahiya


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343


विदेशी फल 

विदेशी फलों का स्वाद 

चखें अपने देसी शहर में ही 

दिल्ली मुंबई और कलकत्ता

भागकर जाने की जरूरत नहीं 

हमारे शहर का बाजार भी 

विदेशी फलों से सजा हुआ है 

शहर की रेहड़ियों पर तरतीब से 

टिके हुए हैं विदेशी फल 

चाहे देसी से विदेशी की कीमत 

ज्यादा क्यों न हो

कीमत की किसे चिंता है 

फल विदेशी हमारे घर में है 

यह बात दीगर है कि हमारे 

पिताजी देसी की लड़ाई 

लड़ते-लड़ते दम तोड़ गए 

थाईलैंड का अमरूद 

मिलता है ₹200 किलो 

कैलिफोर्निया का हरा सेब

क्या कहने हैं सब के 

चाइनीज सेब भी आ टपक 

थोड़ा सस्ता है कैलिफोर्निया से ऑस्ट्रेलिया का बब्बू गोसा 

अमीर को क्या परवाह महंगे की

मध्यम वर्ग भी देखा देखी 

भरने लगा अपने फ्रिजों को 

विदेशी फलों से 

स्वाद तो बेहतर है 

देसी में वह स्वाद कहां 

जो विदेशी में है।


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342


विश्व बैंक को हमने अपना रक्षक माना इसको।।

निकला यह पूरा ही भक्षक अनुभव से जाना इसको।।

गरीबी और बेकरी सबके खत्म होने की आस उठी

मगर पन्दरा साल के भीतर जवान बेटे की लाश उठी

विश्व बैंक के कान हों तो गरीब की कथा सुनाना इसको।।

शिक्षा जगत में गुणवत्ता का इसने ही प्रचार किया 

जैसी शिक्षा थी अपनी उसपर जमके प्रहार किया 

महंगी शिक्षा गुणवत्ता नहीं इतना तो बताना इसको।।

स्वास्थ्य सुविधाओं की जगह बड़े अस्पताल ले आये

मेरे जैसे गरीबगुरबा इनके अंदर ना घुस पायें

अपोलो फोर्टिस की कल्चर ये जरा समझाना इसको।।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का ये रक्षक असल में पाया 

मुखौटा हमारी मदद का रंग रंगीला इसने लगाया 

रणबीर का पैन खोसने का बताया बहाना इसको।।



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341


बचपन की दोस्ती बहुत अलग होती देखो ||

जवानी की दोस्ती अलग बीज बोती देखो ||

हर उम्र की दोस्ती की मांग अलग होती है 

अधेड़ उम्र की दोस्ती तान कर है सोती देखो ||

अकेलापन अखरता बिना दोस्ती बुढ़ापे मैं 

बुढ़ापे की दोस्ती पुराणी यादें संजोती  देखो ||

टिकाऊ दोस्ती या भरोसे की दोस्ती कहो 

विचार और स्वभाव की समता पिरोती देखो ||

वक्त बदलते हैं रिवाज बदलने का दस्तूर भी 

सच्ची दोस्ती अपना भार  उम्र भर ढोती देखो ||

चाहे ये दुनिया इधर से उधर हो जाये यारो 

पक्की दोस्ती अपना सबब नहीं खोती देखो ||



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340


उस दिल में और इस दिल में 

फर्क सिर्फ इतना ही तो है 

वो पत्थर है जो साबूत है

ये शीशा था जो टूट गया


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339


पिछले चार-पांच साल से 

मौसम का मिजाज बदलता 

जा रहा है 

इसका सबसे अधिक असर

किसानों पर पड़ रहा है 

सूखे के लंबे दौर 

लगातार बाढ़ कम होती 

यह अनियमित वर्षा 

भयानक ओलावृष्टि होना 

टिड्डीयों का अचानक अमला 

किसानों की कमर तोड़ दी है 

हालांकि सामुदायिक प्रयास 

रास्ता दिखा सकते हैं 

मगर

उनकी रक्षा के लिए सरकारी

समर्थन और संरक्षण बहुत

जरूरी है।

इससे किसान बचेगा 

तो उद्योग बचेगा 

उद्योग बचेगा तो 

भारत महान बचेगा 

जय हिंद


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338


अलग-अलग रंगों का ये

हिंदुस्तान हमारा है 

हिंदू मुस्लिम सिख इसाई 

अनोखा भाईचारा है 

मजहबी लोग लड़ाते हमको 

भाईचारे को ललकारा है 

पिसता गरीब बेचारा है 

आतंक घृणा नहीं चाहिए 

बच्चा बच्चा पुकारा है 

लिंगभेद पर शरमाओ तो 

मानव बना हत्यारा है 

आदिवासी सब उजाड़ दिए 

कैसा विकास तुम्हारा है 

युवक-युवती भटका दिए हैं 

मुश्किल हुआ गुजारा है 

महिला का जीना मुश्किल 

बाजार में इसे उतारा है 

बच्चों की कुछ ना पूछो 

पूरा जीवन उधारा है 

कुपोषण ने मारा है 

एक तरफ शाइनिंग है 

दूसरी तरफ अंधियारा है 

दो दुनिया एक ही जगह 

कैसा अजब नजारा है।

20.12.2008


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337


वह धंसती  है 

वह खसती है 

वह फंसती है 

वह चरती है 

उसपे मस्ती है 

वह भिड़ती है 

सोचो कौन है 

वह भैंस हमारी 

अरे हम भी तो

जिन्दा इन्सान हैं


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336


ऊट पटांग 

पुलिस तुम्हारी फ़ौज तुम्हारी 

मीडया तुम्हारा कोर्ट बीचारी 

जनता द्वारा जनता के लिए 

चुनी हुई ये सरकार हमारी 

जनतंत्र का झुनझुना पकडाया 

कार्पोरेट की करे है ताबेदारी 

मसला इस या उस नेता का  नहीं 

जनतंत्र की पोल खुल गयी सारी 

कैसे मजबूत हो जनतंत्र भारत का 

कैसे जनता की बढे हिस्सेदारी 

सवाल आया है तो जवाब भी 

ढूंढेगी मिलके ये जनता सारी

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335


चले थे दुनिया बदलने 

सब्जी मण्डी से सब्जी ली 

और घर लौट आये !!!

घर आ कर बीवी पर 

भड़ास निकाली और 

क्रांति का एक कदम 

बढ़ा दिया ये अहसास 

हुआ और तसली से 

सो गया


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334


हिंदू मुस्लिम सिख इसाई 

आपस में सब भाई भाई

इनमें जो बढ़ाते हैं खाई

वे समाज तोडक हैं भाई


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333


पता नहीं इतना खुदगर्ज मुझे किसने बनाया 

अपने के इलावा दूसरे को कभी देख न पाया

अपनी शोहरत अपना रूतबा दिमाग पर छाया 

सोचता हूँ आखिर यह सब किस लिए कमाया 

जो गया इस दुनिया से यहीं छोड़ गया माया 

खाली हाथ जाना है बन्दे ख़ाली हाथ ही आया


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332

जल रहा सब  जहाँ उम्मीद करें भी तो कैसे करें

नहीं पहली सी फिजां यकीन करें भी तो कैसे करें

अनुशासन की सीख हमें खुद सभी कानून तोड़ो

ऐसा इन्साफ यहाँ तस्लीम करें भी तो कैसे करें ।

खाना बदोश बनाओ हमको हमीं से गिला करो 

प्यार की गुंजाइश कहाँ दुश्मनी करें तो कैसे करें।

हमारी आह भी गुनाह क़त्ल भी मुआफ़ उनके 

कैसे जल जाती ये शमाँ बयां करें भी तो कैसे करें।

किसने किसे तड़फाया है सही हिसाब करेगा कौण

वे हमारी बात यहाँ मंजूर करें भी तो कैसे करें।

सच कहना अगर बगावत है तो हम भी बागी हैं 

रणबीर झूठा इम्तिहां पास करें भी तो कैसे करें।

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331


मेरा गाँव ____________________


पुलिस सिपाही और दरोगा सरपंचों ने हाथ मिलाये 

मलंग दो दो तीन हरेक जाति के इनके संग आये 

महज दबंग नहीं अब मलंग के कब्जे में गाँव हुआ 

सरपंच के बाएं दायें बनके लूट  का अब काम हुआ 

पहले बी डी ओ की मार्फ़त गाँव का पैसा लगता था

बी डी ओ सरपंच मिलके हमारे गाँव को ठगता था 

अब मलंग दबंग और पुलिस साथ हुए हैं सरपंच के 

विकास का पैसा बलि चढ़ा आज इनके छल प्रपंच के

ठेकेदारी प्रथा छाई देश में देश को आज बर्बाद किया  

हरेक क्षेत्र में ठेकेदारों को आज पूरी तरह आबाद किया 

गाँव के बाकी नब्बे लोग भूखे प्यासे ही आज खटते हैं 

उनकी मेहनत के बहोत से हिस्से मलंगों बीच  बँटते हैं 

बहन बेटी बहु महिला पर  इन सबकी बुरी नजर देखो 

चरित्रहीन का फिर दोष लगाते करते मुश्किल डगर देखो 

बिन ब्याही गर्भवती की संख्या गाँव में बढ़ रही बताते हैं 

आस पडौस चाचा ताऊ भाई के हत्थे चढ़ रही बताते हैं 

इसके अलावा भी सेक्श माफिया गाँव में जा पहुंचा है 

शहरों की सड़ांध का असर अब तो गाँव तक आ पहुंचा है

दारू ने हरेक गाँव में बहुत ही जयादा कहर ढाया देखो 

घर कोई बचा नहीं शायद कोई मेंबर ही बच पाया देखो   

बिना बयाहे गरीब नौजवान दारू पास अपने बुलाती देखो 

दिमाग दिल और जिगर को धीमें धीमें खाती जाती देखो 

दारू ने आज चोर हमको अहिस्ता अहिस्ता बनाया देखो 

पत्नी का गहना  इसके लिए हमने कभी तो है चुराया देखो 

यह गाँव है मेरा इसका कैसे आज सुधार और  विकास करूँ 

भाईचारा डग्वारा  सब लौटेगा आज कैसे मैं ये विश्वास करूँ 

उम्मीद है और यकीन मुझको वह सुबह कभी तो आयेगी 

गाँव में इंसान बसेंगे एक दिन ये हैवानियत हार जायेगी



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330


एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई 

बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई 

कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी 

गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई 

केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ 

लड़की के बाप ने बीच में आकर के  खेल रचाई 

पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़

यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई 

कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों 

एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी



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329


लड़कियों ने भी समोकिंग में कदम बढ़ा दिए 

दारू पीने के खाते कईओं ने अपने खुला दिए 

क्या कहूं इसको के बराबरी की शाबाशी दे दूं 

झिझक रहा हूँ हमने ये क्या गुल खिला दिए 

इस तरह  बराबरी की बात शायद ठीक नहीं

हमें गुमराह करके हमारे सही राह भुलवा दिए 

मग़र यह बहुत छोटा हिस्सा है मालूम मुझे 

बड़े हिस्से ने संघर्ष के बिगुल आज बजा दिए



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328


प्यार का तोफा 

एक लड़की ने एक लड़के से प्यार किया 

लड़के ने उसे बलात्कार का उपहार दिया 

इतने मेंभी सबर नहीं उस वहसी को आया 

अपने चार मुसटन्ड़ों को था साथ में लाया 

उन्होंने भी बारी बारी मुंह किया था काला 

गिरती पड़ती ताऊ के घर पहुँची थी बाला 

ताऊ को  बाला ने सारी हकीकत बताई थी 

ताऊ ने भी वह हवस का शिकार बनाई थी 

माँ बाप ने जाकर बाला को छुड वाया था 

पुलिस में हिम्मत कर केस दर्ज कराया था

गाँव के कुछ नौजवानों ने आवाज उठाई थी 

पाँचों की  और साथ ताऊ की जेल कराई थी 

आज भी जेल में पैर पीट रहे हैं सारे के सारे 

क्या हुआ समाज को हवस ने हैं पैर पसारे


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327

मेरी सूरत ना पहचानो है ये तो गंवारा मुझको

अपने दुष्मन को पालो नहीं मंजूर नजारा मुझको

खुद ही राह बदल गये अब खड़े अनजान बने

कहो ए खुदा के इन्सानो किसलिए पुकारा मुझको

हमसे मुहब्बत की थी तब कितनी कसमें खाई थी

अब खंजर मुझ पर तानो क्या है इषारा मुझको

नजरें क्यों झुकरई हैं सिर उठाके देखो तो सही

तुम मानो या मत मानो तुमने ही संवारा मुझको

कसमे वादे भूलने वालो यही षिकवा तुमसे है

लगता है आज तुमने समझा है बेचारा मुझको

कहां से चल कहां पहुंचे दंग है रणबीर आज

सम्भलो कदर दानों लगता है दूर किनारा मुझको



**************

326


दुनिया को देखते हैं कितनी हैरानी के साथ दोस्तो

जिन्दगी गुजार दी है हमने परेशानी के साथ दोस्तो

तुम्हारे साथ गर्दिश में भी कभी मायूस ना हुए हम

गरीबी में किसी तरह गुजरी आसानी के साथ दोस्तो

हमको गर्दिश में भी तुम्हारी वो अदाएं याद हैं अभी

सम्मान के साथ खाती थी रोटी पानी के साथ दोस्तो

हमको तुम्हारे दिल की धड़कनें याद हैं अभी तक

काम करती पसीने में तर पूरी जवानी के साथ दोस्तो 

कभी भी षिकन नहीं देखी चेहरे पर तुम्हारे हमने

जीवट जीवन तुम्हारा पास है वीरानी के साथ दोस्तो

टूटे बदन काम के बाद हमेषा बुलन्द होसले के साथ

कहती दिन बदलेंगे एक नई कहानी के साथ दोस्तो



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325


हिम्मत इतनी आज यार नहीं कर पा रहे 

खुद को नंगा सरे बाजार नहीं कर पा रहे

दिल में सोचते रहे पूरी दुनिया की बाबत

चौखट घर की मगर पार नहीं कर पा रहे

सच पर न चल पाये मगर झूठ बोलने से

चाह कर भी हम इन्कार नहीं कर पा रहे 

तुम्हें देख कर गफलत में डूबे हम भी अभी

अपने गुस्से का इजहार ही नहीं कर पा रहे

पता है गल्त हो रहा मेरे पड़ोस में हर रोज

इसके खिलाफ खड़ा विचार नहीं कर पा रहे

घुसते ही जा रहे हैं अंधियारों में सब्र से हम 

उजाले का भी आज इन्तजार नहीं कर पा रहे

रणबीर जरुरी है बदलना इस सिस्टम का अब

इस सच्चाई पर अभी ऐतबार नहीं कर पा रहे


*************

324


जल रहा सब जहां उम्मीद करें भी तो कैसे करें

नहीं पहली सी फिजां यकीन करें भी तो कैसे करें

अनुषासन की सीख हमें खुद सभी कानून तोड़ो

ऐसा इन्साफ यहां तस्लीम करें भी तो कैसे करें

खानाबदोष बनाओ हमको हमसे ही गिला करो 

प्यार की गुंजाइष कहां दुष्मनी करें भी तो कैसे करें

हमारी आह भी गुनाह कत्ल भी मुआफ उनके

कैसे जल जाती ये षमां ब्यां करें भी तो कैसे करें

किसने किसे तड़फाया है सही हिसाब करेगा कौण

ये तुम्हारी बात यहां मंजूर करें भी तो कैसे करें

सच कहना अगर बगावत है तो हम भी बागी हैं 

रणबीर झूठा इम्तिहां पास करें भी तो कैसे करें


*****/////**

323

सांप के डँसे का तो इलाज खोज लाया यारो 

आदमी  के डंसने का इलाज नहीं पाया यारो 

फिर सुन रहा हूँ गुजरे ज़माने की चाप को यारो 

भुला हुआ था बहुत देर से अपने आप को यारो 

भोंथरा मत करो जिन्दगी के अलाप को यारो 

कितना ही अकेला हो तरसे है मिलाप को यारो 

इतने पास रह कर  भी बहोत  दूर हैं यारो 

अपने ही  भीतर से  हम  मजबूर हैं यारो 

अपनी मजबूरी भी बयाँ न कर सकते हम 

ये दुनिया वाले  कितने  मगरूर हैं यारो 

बातचीत भी नहीं  हो पाती पता नहीं क्यों 

क्यों इस दुनिया के  बेरहम दस्तूर  हैं यारो 

हमारी तो समझ आती है बात मुझको ये 

दुःख उनकी भी रातें क्यों  बे-नूर हैं यारो 

उनको मै नहीं समझ सका या वे मुझे 

कही न कही पर मौजूद  नासूर हैं  यारो

**********

322


बेटी मारण  क़ी या रात नै प्लान बनाई 

खून सिर पै चढ़रया नादे इंसान  दिखाई 

बहोत पैना चाकू ल्याए दोनूं  बाबू  बेटा 

साँझ हुयी तो बतलाये  दोनूं  बाबू  बेटा 

गला काट बेटी का खून क़ी ख़ाल बहाई 

छोरी तड़फ रही थी सोगे दोनूं पड़  कै    

खाप पनचाती गए काल उनते लड़ कै 

आज दाब मैं उनकी छोरी मारनी चाही  

ख़ूने खून चोबारे मैं माँ कै पसीने आये 

रुके मारे बचाल्यो नै  बोल घने लगाये 

कोए बी ना आया ख़ामोशी कसूती छाई  

माँ  पड़ी पड़ी चिलावै आंख खुलगी फेर 

इसा सपना यो आया साँस रूलगी फेर 

रणबीर बचा बेटी कर पैनी कविताई


*********/*

321


वर्गीय समाज में एक ही 

नैतिकता नहीं हो सकती

एक नैतिकता गरीब की 

दूसरी नैतिकता अमीर की

कर्ज की अनुमति के बाद भी

सेंसेक्श धडाम से गिर रहे हैं

जापान जर्मनी हुए परेशान क्यों

गलत होते जा रहे उनमान क्यों  

इतनी जल्दी झटका है दोबारा

हेकड़ी हो गयी है नौ दो ग्यारा

अमीर तो झेल लेंगे किसी तरह

गरीब कैसे झेल पाएंगे ये सब

अंधी गली से बाहर आना होगा

पूंजीवाद रास्ता छोड़ कर अब तो

नया रास्ता  मिलके बनाना होगा


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320


कर्मों से ही पहचान होती है इन्सानों की यारो 

महंगे कपडे तो पुतले भी पहनते हैं दुकानों में


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319


इंसान की चाहत है कि उड़ने को पर मिलें

और परिंदे सोचते हैं कि रहने को घर मिलें



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318


गुल्ली डंडे के खेल का वो दौर बीत रहा

जुआरियों का खेल आज बन रीत रहा

भीड़लिंचिंग का दौर भयानक आ गया

नफरत का आलम क्यों आज जीत रहा


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317


उलझन में फंसी जिंदगी किसको बताऊँ मैं

जमाने ने दिए जख्म किसको दिखाऊं मैंं 

असुरक्षा नफरत बढ़ती जा रही है शहर में 

बाहर कदम रखते हुए हर बार  घबराऊँ मैं


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316

जब टूटने लगें होंसले तो बस ये याद रखना 

बिना मेहनत के हासिल तख्तो ताज नहीं होते 

ढूंढ लेना अंधेरों में अपनी मंजिल तुम  यारो 

जुगनू कभी अंधेरों के मोहताज नहीं होते


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315


कुत्ते भी कोमा में चले गए हैं देखो

शायद यह देख कर कि क्या मस्ती

से तलवे चाटता तथाकथित इंसान


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314

आत्म हत्या करली गिरगिट ने ये 

सुसाइड नोट छोड़ कर के यारो

अब इंसान से ज्यादा मैं तो ये रंग 

कतई ही नहीं बदल सकता यारो


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**313


महिलाओं ने असरसन बढ़ाया है 

अपने हकों की खातिर लड़ती देखि जा सकती है औरत

घर से बाहर निकल कर बढ़ती देखि जा सकती है औरत

दबती पिसती रहती है फिर भी मासूमियत है बाकी देखो

अपने अपने घरों में ही पढ़ती देखी जा सकती है औरत

नयी जंजीरें और बेड़ियां आज क्यों डाली जा रही उसे

फिर से अंगड़ाई लेकर के उठती देखी जा सकती है औरत

शैतान सभी चौकन्ने हो गए औरत की जरा सी हरकत पर

उनकी छाती पर दिनों दिन चढ़ती देखी जा सकती है औरत

औरत को खिलौना मत समझो वह भी तो एक इंसान है 

डुबो कलम खूने जिगर में लिखती देखी जा सकती है औरत 

कितने रूप दिए औरत को असली इंसाँ का रूप छीनकर

इंसानियत की खातिर कबसे लड़ती देखी जा सकती है औरत




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312


अब हालत बदलने होंगे ग़म का बोझ उठाने वाले |

वरना देते ही जायेंगे दुःख दिन रात ज़माने वाले |

मजलूमों को बाँट रहे हैं परम्पराओं के बहाने करके 

इस साजिस ही में शामिल हैं वे नफरत फ़ैलाने वाले |

दुनिया पर कब्ज़ा है जिन का वो उस के हक़दार नहीं हैं 

उनसे अब कब्ज़ा छीनेंगे  सब का बोझ उठाने वाले |

पत्थर दिल लोगों से अपने जख्मों को ढांपे ही रखो

खुद को हल्का कर लेते हैं सबको जख्म दिखाने वाले |

कोई किसी का साथ निभाए इतनी फुर्सत ही किसको है 

अफसानों में मिल सकते हैं अब तो साथ निभाने वाले

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311


एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई 

बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई 

कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी 

गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई 

केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ 

लड़की के बाप ने बीच में आकर के  खेल रचाई 

पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़

यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई 

कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों 

एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी



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310

प्यार का तोफा 

एक लड़की ने एक लड़के से प्यार किया 

लड़के ने उसे बलात्कार का उपहार दिया 

इतने मेंभी सबर नहीं उस वहसी को आया 

अपने चार मुसटन्ड़ों को था साथ में लाया 

उन्होंने भी बारी बारी मुंह किया था काला 

गिरती पड़ती ताऊ के घर पहुँची थी बाला 

ताऊ को  बाला ने सारी हकीकत बताई थी 

ताऊ ने भी वह हवस का शिकार बनाई थी 

माँ बाप ने जाकर बाला को छुड वाया था 

पुलिस में हिम्मत कर केस दर्ज कराया था

गाँव के कुछ नौजवानों ने आवाज उठाई थी 

पाँचों की  और साथ ताऊ की जेल कराई थी 

आज भी जेल में पैर पीट रहे हैं सारे के सारे 

क्या हुआ समाज को हवस ने हैं पैर पसारे


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309

अभी खाईयां और तनहाईयाँ  और बढेंगी 

अकेलापन भी बढेगा कर्ज और भी चढ़ेगा 

समाज का साँस  हो रहा आज बद हवास 

बाप बेटी का रिश्ता कलंकित जलूस कढेगा 

झुके कन्धे  कमजोर के अमीर सवार आज 

खेल खेला जा रहा देख रहा दिल्ली दरबार 

टूट रहा है बुरी तरह से हर परिवार आज 

शायद इस टूट में ही कोई हो नया परिवार


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308

भगत सिंह हुए बड़े क्रांतिकारी

उनके विचार पर चलाई कटारी

शोषण मुक्त समाज का सपना

इसपर संघर्ष आज भी है जारी

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307

हिंदू मुस्लिम सिख इसाई 

आपस में है भाई भाई 

इस एकता पर तीर चलाई

चलाने वाले पहचानो भाई



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306

*लगता हरियाणा में और बढ़ेगी बेरोजगारी*

*बिन ब्याहों की संख्या ओर बढ़ेगी बेसुमारी*

*दलित और महिला उत्पीड़न बढ़ती जारी*

*बाजारवाद की व्यवस्था सारा उधम मचारी*

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305

*हमारा वजूद ईमानदारी का खटक रहा है* 

*भ्रष्टाचार भ्रष्ट करने को ये भटक रहा है*

*ईमानदारों का राह उनको अटक रहा है*

*सच्चाई को जान बूझकर झटक रहा है*

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304


मैंने एक चिडिया पाली...

एक दिन वो उड गई|


फिर मैंने एक गिलहरी पाली...

एक दिन वो भी भाग गई


फिर मैंने एक दिन एक पेड लगाया. .

कुछ दिनों बाद दोनों वापिस आ गई|


पेड लगाएँ खुशियाँ पाए।


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303


प्यास लगी थी गजब की...

मगर पानी मे जहर था...

पीते तो मर जाते और ना पीते

 तो भी मर जाते...

देखो लाचारी फिर भी पीया 


बस यही दो मसले, जिंदगीभर ना हल हुए!!!

ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए!!!


वक़्त ने कहा.....काश थोड़ा और सब्र होता!!!

सब्र ने कहा....काश थोड़ा और वक़्त होता!!!

फिर भी सब्र ही बचा है हमारे पास तो यारो 


सुबह सुबह उठना पड़ता है कमाने 

के लिए साहेब...।। 

विडम्बना आराम कमाने निकलता हूँ 

आराम छोड़कर।।


"हुनर" सड़कों पर तमाशा करता है और

 "किस्मत" महलों में राज करती है!!

कितने दिन और यारो .......


"शिकायते तो बहुत है तुझसे ऐ जिन्दगी, 

पर चुप इसलिये हूँ कि, जो दिया तूने,

वो भी बहुतो को नसीब नहीं होता"...

इसके बावजूद जंग जारी है सच और झूठ 

के बीच यारो ।


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302


न्यों कहते पिस्से आले दखे यो कररया सै घणी अंघाई........

भा घणे चढ़ा दिए तो यो गरीब के खावैगा सुनिए भाई ..........

काम न करता ताश खेलै या दारू उसके घर मैं छाई ..........

कर्म कर फल की चिंता ना कर कमेरे तैं गीता पढ़ाई..........


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301


किसान धरती कै मारया पूंजी नै चौपड़ सार बिछाई ............

कई लाख फाँसी खागे या सरकार बहरी हुई बताई .............

खेती करना काम करड़ा यो नहीं सबके बसका भाई...........

किसान घणी मेहनत करै मण्डी कोण्या काबू आई.............


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300

मत कहो की तुम्हे हमसे प्यार  हो गया  

गर था तो इतनी जल्दी   कहाँ खो गया 

प्यार तो सोनी महीवाल का बताते यारो  

कचा  मटका भी उनके प्यार पे रो गया

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299


मेरा गाँव ____________________


पुलिस सिपाही और दरोगा सरपंचों ने हाथ मिलाये 

मलंग दो दो तीन हरेक जाति के इनके संग आये 

महज दबंग नहीं अब मलंग के कब्जे में गाँव हुआ 

सरपंच के बाएं दायें बनके लूट  का अब काम हुआ 

पहले बी डी ओ की मार्फ़त गाँव का पैसा लगता था

बी डी ओ सरपंच मिलके हमारे गाँव को ठगता था 

अब मलंग दबंग और पुलिस साथ हुए हैं सरपंच के 

विकास का पैसा बलि चढ़ा आज इनके छल प्रपंच के

ठेकेदारी प्रथा छाई देश में देश को आज बर्बाद किया  

हरेक क्षेत्र में ठेकेदारों को आज पूरी तरह आबाद किया 

गाँव के बाकी नब्बे लोग भूखे प्यासे ही आज खटते हैं 

उनकी मेहनत के बहोत से हिस्से मलंगों बीच  बँटते हैं 

बहन बेटी बहु महिला पर  इन सबकी बुरी नजर देखो 

चरित्रहीन का फिर दोष लगाते करते मुश्किल डगर देखो 

बिन ब्याही गर्भवती की संख्या गाँव में बढ़ रही बताते हैं 

आस पडौस चाचा ताऊ भाई के हत्थे चढ़ रही बताते हैं 

इसके अलावा भी सेक्श माफिया गाँव में जा पहुंचा है 

शहरों की सड़ांध का असर अब तो गाँव तक आ पहुंचा है

दारू ने हरेक गाँव में बहुत ही जयादा कहर ढाया देखो 

घर कोई बचा नहीं शायद कोई मेंबर ही बच पाया देखो   

बिना बयाहे गरीब नौजवान दारू पास अपने बुलाती देखो 

दिमाग दिल और जिगर को धीमें धीमें खाती जाती देखो 

दारू ने आज चोर हमको अहिस्ता अहिस्ता बनाया देखो 

पत्नी का गहना  इसके लिए हमने कभी तो है चुराया देखो 

यह गाँव है मेरा इसका कैसे आज सुधार और  विकास करूँ 

भाईचारा डग्वारा  सब लौटेगा आज कैसे मैं ये विश्वास करूँ 

उम्मीद है और यकीन मुझको वह सुबह कभी तो आयेगी 

गाँव में इंसान बसेंगे एक दिन ये हैवानियत हार जायेगी 

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298

भारत का मजदूर मैं 

घर ज़र ज़र हो चला मेरा देखो 

खाना भी गला सडा मेरा देखो 

बरसात में छात टपकती है मेरी 

पाखाने को बेटी भटकती है मेरी 

दो ही कमरे हैं एक तो कच्चा है 

दूसरा कहने को ही ये पक्का है 

दिहाड़ी मिले तो चूल्हा जलता है 

नहीं मिले तो बस फाका चलता है 

गुजर रही है तीन बच्चे मेरे देखो 

पोली थीन बीनते सुबह सबेरे देखो 

रोजाना की कमाई पे जी रहे हमतो 

चटनी रोटी और पानी पी रहे हमतो 

मग़र आजाद हैं इसका फखर है 

चाहे कहीं नहीं हमारा ज़िकर है

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297


जिनकी नफ़रत से बुत भी लहूलुहान खड़े हैं।

सुना है आज वो भी कुछ परेशान खड़े हैं॥


कहाँ छुपा के रख दूँ मैं अपने हिस्से की शराफत,

जिधर भी देखता हूँ उधर बेईमान खड़े हैं॥


क्या खूब तरक्की कर रहा है अब देश देखिये,

खेतों में बिल्डर, सड़क पर किसान खड़े हैं ॥


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296


दिल की बात दिल से 


हमने तो बस निभा दी किसी तरह ईमानदारी यहां 

तुमने तो बस दबा दी किसी तरह ईमानदारी यहां 

स्टेज पर मशवरे देना बड़ा आसान है सब कहते 

मगर जीवन में धारणा बड़ा मुश्किल कहते रहते 

करनी कुछ कथनी कुछ सारी उम्र झूठ ढोते देखे

ऊपर से प्यार मुलाहजा वैसे जहर बीज बोते देखे

जब मैडीकल में दाखिल हुए समाज सेवा इरादा था

हमें सिखाया उसमें अपनी सेवा का भाव ज्यादा था

मैडीकल में भी लालच बहुत गये थे दिखाये हमको

पैसा कमाओ मौज उडाओ यही मंत्र सिखाये हमको

बाकी समाज से अलग मैडीकल ऐसा समझा जाता

जीने मरने के बीच का जीवन इन्सान यहां बिताता

मरीजों से ही सीखा मैने ये इलाज हर बीमारी का 

अब सर्जन बन कर कैसे रुप धारुं मैं व्यापारी का 

यह भी अच्छा ही हुआ माहिर सर्जन न बन पाया

कई माहिर सर्जनों ने पैसे के पीछे ईमान ही गंवाया

दिखावटी ईमानदारी का लबादा कुछ ने बात बनाई

हमारी ईमानदारी की कसम लोगों ने कई बार उठाई

चीफ विजीलैंस आफिसर की चुनौती भरी जिम्मेदारी

इस चुनौती के दांव पर सच्चाई ये चाही खरी उतारी  

हमने समाज सेवा पक्ष जीवन में पूरी तरह अपनाया

वी आर एस ली चाहते समाज सेवा को आगे बढ़ाया

आप सबका सहयोग चाहिये यही है अरदास साथियो

समाज सुधार का ही एजैंडा रहेगा आस पास साथियो




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295

कर्ज की अनुमति के बाद भी 

सेंसेक्श धडाम से गिर रहे हैं 

जापान जर्मनी हुए परेशान क्यों

गलत होते जा रहे उनमान क्यों  

इतनी जल्दी झटका है दोबारा 

हेकड़ी हो गयी है नौ दो ग्यारा 

अमीर तो झेल लेंगे किसी तरह 

गरीब कैसे झेल पाएंगे ये सब 

अंधी गली से बाहर आना होगा 

पूंजीवाद रास्ता छोड़ कर अब तो 

नया रास्ता  मिलके बनाना होगा


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294

HAPPY FRIEND SHIP DAY

बचपन की दोस्ती बहुत अलग होती देखो ||

जवानी की दोस्ती अलग बीज बोती देखो ||

हर उम्र की दोस्ती की मांग अलग होती है 

अधेड़ उम्र की दोस्ती तन कर है सोती देखो ||

अकेलापन अखरता बिना दोस्ती बुढ़ापे मैं 

बुढ़ापे की दोस्ती पुराणी यादें संजोती  देखो ||

टिकाऊ दोस्ती या भरोसे की दोस्ती कहो 

विचार और स्वभाव की समता पिरोती देखो ||

वक्त बदलते हैं रिवाज बदलने का दस्तूर भी 

सच्ची दोस्ती अपना भर उम्र भर ढोती देखो ||

चाहे ये दुनिया इधर से उधर हो जाये यारो 

पक्की दोस्ती अपना सबब नहीं खोती देखो ||

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293


मत पूछ मेरे हौसलों की हदों के बारे में


मत पूछ मेरे हौसलों की हदों के बारे में,

ये वो पंछी हैं, जो जानते ही नहीं सरहदों के बारे में !

उड़ते रहते हैं ये निरंतर ख्वाहिशो के आसमानों में,

और बाज नहीं आते कभी तकदीर को आजमाने से !


रूठ जाती हैं तकदीरे कभी, बदल जाता हे वक़्त भी

दगा देते हैं इंसा अपने, दिक्क़ते देती उम्र भी

बस ये हौसले ही हैं जो कभी रुठते नहीं

हारती हैं ज़िंदगियाँ पर ये कभी हारते नहीं


मत पूछ क्या हासिल हैं इन हौसलों की वजह से

ये वो पंछी हैं, टिका हैं आसमा जिनकी वजह से

ढूंड लाते हैं ये रोजाना ज़िन्दगी का दाना

और भूलकर सारे गम गाते हैं मस्ती का तराना


आया था इक दिन जब हार गए थे ये हौसले

कट गए थे पर इनके, टूट गए थे घौसले

लग रहा था अब न उड़ सकेगी ये कोपले,

पर अगले दिन फिर निकल पड़े ये तिनको को धुंडने

एक-एक तिनका बीनकर, लगे फिर आशियाना जोड़ने


मत पूछ उस दिन इन हौसलों की हालत के बारे में

कुछ सोच ही नहीं रहे थे ये उस दिन राहत के बारे में

उड़ रहे थे उस दिन ये उम्मीद के आकाश में

आसुओं को पौछ्कर आशियाने की तलाश में


ये हौसले भी किसी हकीम से कम नहीं होते हैं,

हर तकलीफ को ताक़त बना देते हैं,

और दर्द से भी दवा चुरा लेते हैं !

एक ख्वाहिश टूटे तो हज़ार ख्वाब सजा लेते हैं,

और छोटी-छोटी कोशिश से मुक़द्दर बना देते हैं !


मत पूछ क्या हाल होगा इन हौसलों के न होने से

मर जाता हैं पंछी कोई पिंजरों में क़ैद होने से

मोह नहीं रहता उसे न खाने में न जीने में

और मर जाती हैं तमन्ना उड़ने की फडफड़ाकर सीने में


मत पूछ मेरे हौसलों की हदों के बारे में,

ये वो पंछी हैं, जो जानते ही नहीं सरहदों के बारे में !

उड़ते रहते हैं ये निरंतर ख्वाहिशो के आसमानों में,

और बाज नहीं आते कभी तकदीर को आजमाने से !




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292


बेलगाम पूंजी का दौर के तेज बदलाव आ रहे 

इसके मारे गरीब हैं दुनिया में बिलबिला रहे 

मगर कुछ हाथों में बेलगाम पूंजी छटप टाई

वो भी बेलगाम पूंजी पे लगाम न कस पा रहे


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291

शादी की अल्बम

शादी वह मौका है जब दो दिल 

दो ख़ानदान अपने सुख के पलों को 

पूरे भरपूर अंदाज में जीते हैं यारो 

इसके गवाह होते हैं कई परिवार 

बहुत से मेहमान दूर से आते यारो 

वे सब अपनी हाजरी दर्ज करवाते

कैमरे की जद में सब कैद हों जाते

जब भी शादी का अल्बम पल्टा जाता

यादों के हम सब के दरीचे खुल जाते

पुरानी खुसबूएं फिर महकने लगती हैं

धुंधले पड़ गए चेहरे साफ दिखाई देते

तभी तो हम तुम सब अपनी अल्बम

देखकर मुस्कुरा उठते हैं मन ही मन

हर तस्वीर एक कहानी कहती है

जाने क्या क्या यादें तजा होती

फूफा बुआ ताऊ ताई सब आये 

कुछ लोगों के बीच नई शादी का

आगाज भी बनता इन शादियों में

आप भी देखना एक बार फिर आज

अपनी शादी की एल्बम और

लीख देना अपने दिल की बात

अपनी डायरी के किसी पन्ने पर



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290


दोगलापन दुनिया का 

बेजुबान पत्थर पर लदे हैं करोड़ों के गहने मन्दिरों में 

उसी दहलीज पे एक रूपये को नन्हें हाथों को तरसते देखा है 


सजे थे छप्पन भोग और साथ में मेवे मूरत के सामने यारो 

बाहर एक फकीर को भूख से तड़प कर मरते देखा है यारो




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289

सच का झूठ झूठ का सच यहाँ होते देखा यारो 

मेहनत कश को मेहनत अपनी खोते देखा यारो 

तिकड़मबाजों को विष के बीज बोते देखा यारो 

किसान को आपका सबका बोझ ढोते देखा यारो


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288

दूरियों से फरक नहीं पड़ता 

बात तो दिलों की नजदीकियों से होती है 

दोस्ती हर उम्र के हिसाब जनाब होती है 

वरना रोज बहुत लोगों से मुलाकात तो 

रोजाना ही हम सब की  बेहिसाब होती है


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288

न महकी फुलवारी होती ख़ुशबू के घर न होते

राधा की पायल,कान्हा की वंशी के स्वर न होते

जीवन का ये रंग रंगीला उत्सव अम्बर थम जाता

मौत घरों में मातम करती यदि ये डॉक्टर न होते

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287


बच्चे की अपनी दुनिया होती

आलोचना का माहौल मिलता तो

ये बच्चे नकारना सीख जाते हैं 

अगर आक्रामकता  का माहौल है

तो बच्चे लड़ना सीख जाते हैं

अगर उपहास होता बचपन में

ता उम्र शर्मिंदा रहते हैं बच्चे

अगर अपमान मिलता बचपन में

अपराध बोध पालते हैं बच्चे 

उनको सब्र का पाठ पढाया तो

सहनशीलता के वट व्र्क्ष बनेंगे 

अगर उनका उत्साह बढ़ाते हैं तो 

आत्म  विश्वास जागता है उनमें 

बच्चों की उचित तारीफ बच्चों में

सकारात्मकता का उद्भव करती

ईमान सीखने की कोशिश की तो

ये बच्चे न्याय की पहचान को

अपने जीवन में अपनाते हैं जरूर

बच्चों को सहमति का माहौल 

इस दुनिया में प्यार से देखने का

अंदाज  प्रदान करता है उनको

यह सब चीजें बच्चे  अपने ही

परिवार से सीखते हैं दोस्तों

स्कूल तो इसके बाद आता है

तो फिर बच्चा कैसा बना है

इसमें उसका क्या कसूर दोस्तों



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286


गरीब  परिंदा उड़ान में  है  

तीर अमीर की कमान में है 

है डराने को मारने को नहीं 

मरा तो अमीर नुकसान में है 

जिन्दा रख कर लहू चूसना 

अमीरों के दीन ईमान में है 

खौफ ही खौफ है जागते सोते 

लूट हर खेत खलिहान में है 

मरने न देंगे न जीने देंगे 

साजिश  पूंजी महान  में है

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285


गर मेरे  बर्बाद  होने  से तुम्हारा आबाद होना जुड़ा है  

तो आज बन्दा तयार होके  तुम्हारे सामने देखो खड़ा है 

कुछ भी कर ले मगर बेवफाई का ख़िताब न दे देना तुम 

ईमानदारी और वफादारी के लिए ही तो बन्दा लड़ा है


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284

बचपन 

बचपन जवानी और बुढापा 

सब गढ़ मढ़ हो गये

बचपन में की बाल मजूरी

सपने सारे ही खो गए

दो साल की का पिता साथ 

छोड़ गए मेरा

तीन साल की थी तो माता

दुख बढ़ा गई

बचपन में मेरे जैसे बच्चे बस

डले ही ढो गये

बड़ा भाई शराबी मेरा लगता

डर बहुत मुझको

बाल मंजूरी है मजबूरी

मालिक ठगता मुझको

काम ज्यादा पैसे थोड़े

कानून सभी सो गये

एक घर में छोड़ दिया

दिन रात मंजूरी करती

कर पूरे घर की सफाई

मुश्किल से पेट भरती

मालिक की डांटें खाती

मेरे दिल दिमाग रो गये

एक नहीं हजारों लाखों

बच्चे भारत महान के 

बाल मजूरी को मजबूर

सितारे हिंदुस्तान के 

किस्मत का ले बहाना वो

जीवन में संकट बो गये



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283


था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया 

हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया 

दिया जिसकी खातिर था हमने लहू 

वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया


कुछ नए बन रहे  कुछ पुराने बने 

हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने 

किस तरफ से चली गोलियां क्या पता 

किन्तु हर बार हम ही निशाने बने


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282


लत बुरी बला 

लत किसी चीज की हो 

बुरी ही मानी जायेगी  

लत का मतलब एडिक्शन

इससे आगे कैसे समझूं 

जरा कोई समझाए तो 

आजकल फेसबुक की लत 

बहुत चर्चा में है !!

दारू पीने की लत की चर्चा 

बेबसी के साथ करती 

महिलाएं सबसे ज्यादा 

फिर भी दारू के ठेके 

खोलने की लत लगी है 

सरकार को क्यों ?

सुल्फे की लत मत पूछो 

चरस और फीम की लत 

हेरोइन की लत पंजाब को 

निगलती जा रही 

मगर सब चुप हैं क्यूँ 

तम्बाकू की लत मान का 

सिम्बल हरयाणा में है 

हुक्का !!!

कमाल है लत का सम्मान 

हरयाणा की एक मिस्साल 

लत और भी हैं कई मग़र 

डर लगता है उनके बारे 

ज़िकर करते हुए मुझे

मजबूरी में शरीर का सौदा

एक अलग बात है बिल्कुल

 मग़र फ्री सेक्श की लत गलत है

पोर्नोग्राफी मोबाईल में 

चार क्लिक की दूरी पर 

विधान सभा में बैठकर 

 देखने की लत का क्या करें 

बचो संभलो लत का लात

से इलाज  नहीं हो सकता

सकारात्मक माहौल की

जरूरत है हम सबको

खासकर युवा वर्ग को ||



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281

भारत तीसरी महाशक्ति

गाँव कस्बों की तरफ ना देखिये

बड़े बड़े शहरों की गंदी बस्तियों

को बिल्कुल मत देखिये मुड़कर

पाश इलाकों में बनी ऊंची ऊंची

इमारतों को ही बस तुम देखिये 

उनमें रहने वाले लोगों को तुम

देखिये तो तरक्की ही तरक्की

नजर आयेगी चारों तरफ तुम्हें

हमारा कोर्पोरेट सैक्टर देखो ना

हमारा इंडस्ट्री सैक्टर देखो ना

हमारा बिजनेस सैक्टर देखो ना 

हमारा फोरन एक्सचेंज देखो ना

कितने आधुनिक हो गये हम

दुनिया की एक महाशक्ति  की

क्षमता है छिपी हमारे अन्दर

बड़ी ताकत  के पास एटम बम

होना चाहिय वह है हमारे पास

चार छः लाख फ़ौज भी है ही

थोड़ा सा पैसा और हों थोड़े से

हथियार तो बड़ी तीसरी ताकत

अमेरिका की तरह हम बन ही

जायेंगे दो हजार बीस तक तो

तब तक ये गरीबी बढती है तो

वह तो देखो बढ़ेगी ही जरूर

अशिक्षा और ये बेरोजगारी तो 

बढती ही जा रही है और भी  

भूख और ये बीमारी भी अभी

देखो बढ़ेगी हर जगह पर ये

विकास की कीमत तो चुकानी

पड़ती  है ना तो गिला शिकवा

किस बात का और किस लिए

मग़र कीमत तो जनता देगी

और हम महाशक्ति बन जायेंगे




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280


Boss घर की रानी 


मान कर खुद को ;रानी कर रही थी राज

पति बच्चे छोटा सा परिवार

घर की चार दीवारों को मान बैठी संसार

हँसता खेलता भरा पूरा परिवार

परिवार की ख़ुशी में मेरी ख़ुशी थी

कठिन थी राहें फिर भी मुस्करा रही थी

रानी थी पर !करती थी हर काम

मुश्किल था; या आसान

दूध सी काया मुरझा रही थी

पर जीवन के अनुभवों से कंाति-

चेहरे की बढ़ा रही थी

रेलगाड़ी जीवन की कभी धीमी चली 

कभी थमी फिर आगे बड़ती चली

जहाज की कप्तान बनी इतरा रही थी

मान कर कप्तान मुश्किलें अपनी बढ़ा रही थी

छोटे से छोटे छेक को कोशिशों से दबा रही थी

जीवन आगे बढ़ा बढ़ता गया

पर उम्र में डहराव आता गया

आवाज़ की कोमलता हो गई कठोर

हँसी तो जैसे चुरा ले गए वक्त के चोर!


लोक संघर्ष जून 2014


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279


पाखंडी कहते हैं देखो सब प्रभु की माया है 


जिसने तर्क किया वो नरक में जगह पाया है l "

.

.

लेकिन भगत सिंह ने यही समझाया है ,

कोई भगवान ना आयेगा ,ना कभी आया है l

जिसने किया संघर्ष उसी ने सफलता का रस पाया है,

पाखन्डियो ने दलितों को बहुत सताया

है l

अब जाके नया सवेरा आया है l

जब से हमने शिक्षा को अपना हथियार बनाया है l

हर कामयाबी की बुलंदियों पर हमने

अपना परचम लहराया है l

हर जुल्म से लड़ने का हौसला पाया है l

जब से "क्रान्तिकारियों"के होठों पर

# इनंकलाब -आया है l l 


इनंकलाब जिंदाबाद 🇮🇳💪🏻 SBYF



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278

मिर्ज़ा ग़ालिब:

हमें तो अपनों ने लूटा

गैरो में कहाँ दम था

अपनी कश्ती वहां डूबी

जहां पानी कम था

ग़ालिब की पत्नी:

तुम तो थे ही गधे

तुम्हारे भेजे में कहाँ दम था

वहां कश्ती लेकर गए ही क्यों

जहाँ पानी कम था!!


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277


जिस ने ज़ल्द बाज़ी में शादी की

उसने अपना जीवन बिगाड़ लिया 

पर 


शादी जिसने सोच समझ कर की


उसने कौन सा तीर मार लिया।।



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276


कदे ताशां पै तो 

कदे खेत मैं पावैगा 

कदे फ़ौज मैं कदे 

चौधर मैं पावैगा 

फेर एक बात पक्की 

हरियाणा का आदमी 

अपनी ए मरोड़ मैं 

पावैगा


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275

मेरा स्वतंत्र वो वजूद 

मेरे से किसने पूच्छा था कि वहां

पैदा होना भी चाहता हूँ मैं कि नहीं

वो घर वो गाओं वो जिला वो प्रदेश

वो देश वो मजहब चिपक से गए 

बिना कभी पूच्छे मेरे वजूद के साथ 

बहुत बार अहसास करवाया जाता 

मेरे इस प्रकार के अनचाहे वजूद का 

मेरी मानवता मेरा स्वतंत्र वो वजूद 

पता नहीं कहाँ खो गया ढूंढ रहा हूँ 

ढूंढ नहीं पाया अभी तक तो शायद 

कभी इसे ढूंढ भी पाऊंगा कि नहीं


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274


एक नया ट्रेंड 

आज की मोहब्बत फेसबुक और व्हाट्सअप हो गई हैं बताते 

धीरे - धीरे दोस्ती और फिर मोहब्बत का अहसास हैं  जताते 

फिर नम्बरों का आदान प्रदान होता पूरी रात जागके बिताते 

मोहब्बत के पाठ पढ़े जाते हैं ,वादों का सिलसीला है  चलाते   

और फिर मॉल में मुलाकातें शुरू हो हाँ में हाँ कुछ रोज मिलाते 

कुछ दिन का सिलसिला फिर किसी बात पर तकरार बनाते 

और फिर अन्फ्रेंड का बटन दब जाता है सब कुछ फिर भुलाते 

और फिर एक नया चेहरा उस पर लाइक कर  नया प्यार रचाते 

सिलसिला जारी है चार के बाद पांचवें प्यार से फेरे फिर घुमाते  

दो तीन साल चलता मगर  फिर तलाक का परचम  उठाते



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273

गाँव जो टिका था अन्याय पर

एक दिन उसे ढहना ही था 

ना बराबरी के गाँव भक्तों  को

एक दिन यह सहना ही था

बिगड़ गया गाँव का माहोल

महिला सुरक्षित नहीं वहां

नशाखोरी बढती जा रही

ढूढ़ दही का था सेवन जहाँ


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272


प्यार का नाम लेकर कम से कम

इसको बदनाम तो मत करो तुम 

आज की दुनिया में प्यार की दुकानें 

हर गली हर मोड़ पर खुल गयी हैं 

सम्भल के खरीदना  ए मेरे दोस्त 

काश प्यार ख़रीदा भी जा सकता !!!!


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271

खुदा को खुद इन्सान ने बनाया है 

वक्त वक्त पर उसका स्वरूप बदला 

इंसान की  जरूरत के रूप में आया है 

अग्नि देवता बनी वायु देवता बनी 

जब भी इन्सान क़ि कुदरत से ठनी

एक और देवता वजूद में पाया है 

कुदरत के खेल में खुदगर्जों ने ही 

खुदा को इन्सान और कुदरत के 

बीच जान बूझ कर के फंसाया है

आज तक इन्सान मूलभूत में वही 

कोई बदलाव नहीं है सदियों से पर 

खुदा के रूप बदलते ही रहे और 

आगे भी खुदगर्ज इंसान और भी 

भगवान घड़ेगा अपनी जरूरत से

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270

अच्छा जीवन क्या है ???

अच्छी जिंदगी क्या है सवाल चारों और घूमता है 

मानवजाति का शाश्वत प्रश्न कानों में खूब गूंजता है 

सभ्यता और संस्कृति के साथ अर्थ बदल जाते हैं 

पुराना बदलता नए में सामने कई सवाल आते हैं 

यह बात साफ़ है कि अच्छी जिंदगी की परिभाषा 

अर्थशाश्त्र बाजार या वस्तु इसका  बना देते हैं तमाशा 

इसकी परिभाषा का संस्कृति ही आधार हो सकती है 

जो प्रगति के अलग पड़ाव पर आगाह हमें करती है 

जीवन का लक्ष्य क्या है और कौन से मूल्य मददगार 

या फिर कौनसे नए मूल्यों की है सभ्यता को दरकार

साफ़ है की अच्छी जिंदगी कोई हवाई चीज नही है 

परलोक , पुनर्जन्म स्वर्ग या मोक्ष से ना जुडी कहीं है 

इसका सम्बन्ध  भौतिक जीवन से जुड़ा हुआ  बताया 

अतः उसकी प्राप्ति केवल मूल्यों और आदर्शों नहीं है

बल्कि भौतिक सुख सुविधाओं तथा उनको पैदा करने

वाले संसाधनों से ही हो सकती है यह रास्ता दिखाया

और यह राजनैतिक शाश्त्र का विषय ही बताते हमको

मग़र यह राजनैतिक शाश्त्र नैतिक या सांस्कृतिक

अनुशासन में रहना चाहिए वर्ना अनर्थ में धकेलेगा सबको

एक तरफ बाजारूपन के और दूसरी तरफ बर्बरता के मुहाने

में धकेल रहा है और आने वाले वक्त में और धकेलेगा

अच्छा जीवन नहीं मिलेगा घुमते रहो बाबाओं के पास !!!



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269


हमारे ही रक्षक बने फिरते ऐसे शातिर ये ख़िलाड़ी 

हमारे सिर पर ही चलाते हमने बनाई जो कुल्हाड़ी 

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भक्षक को रक्षक मानके करते हैं हम उनके गुणगान

देखे कहाँ छिपा बैठा हमारा मालिक वह भगवान

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भगवान की सच्चाई से उठ रहा है विस्वास हमारा

भगवान की दया उसी पे जो  लेता बुराई का सहारा

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भगवान कहते अपने  आप अपना अन्दर ठीक करले

इन्नर की खोज करके अपने जीवन में रंग भरले

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अन्दर की बात चीत  सभी गुरु और बाबाजी करते

बाहर की दुनिया का ये ज़िकर करने से भी डरते


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268

प्रकृति का अपना एक अलग अंदाज़ है...

जब देती है तो...

*अहसान* नहीं करती

और...।।

जब लेती है तो...

*लिहाज़*नहीं करती...


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267


मेरा जनाजा निकाल कर कितने दिन जी पाओगे ।।

तुम मेरी मेहनत बिना कैसे शक्कर घी खाओगे।।

कई ढंग से बांट रहे हैं एक दूजे के दुश्मन बनाए

ये चाल तुम्हारी समझी तो दस के एक बांटे आओगे।।

हमारे वास्ते जो गढ़े खोदे इनका पता जल गया तो 

याद रखना इन्हीं गढ़ों में मूंधे मूंह गिरते जाओगे।।

ये संकट बढ़ता जा रहा हमारा निवाला खोसते हो 

यूं कितने दिन जालिमो दुनिया को ठेके पे दौड़ाओगे।।

तुमसे ज्यादा शातिर कौन पैदा करते हो आतंकवादी 

पालते पोसते हो इन्हें सच कब तक छिपाओगे।।



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266

खुदा की  क़िस्मत की आड़ 

बेकारों को चाहिए 

कालाधन को चाहिए

भ्रष्टाचार को चाहिए

ठेकेदार को चाहिए

गुनाहगार को चाहिए 

मेहनतकश अपनी क़िस्मत 

खुद लिखता है 

खुदा वाले उसको 

बहकाते रहते है 

तथाकथित खुदा की 

क़िस्मत के नाम से 

चल रहा है धंधा 

सदियों से



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265


यह साफ़ हो गया है कि एक समय 

और एक स्तर के बाद "सफलता" 

और "अनैतिकता " सिक्के के  दो

पहलू हो जाते हैं


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264


आज का लक्ष्य 

समूची  जनता को खाद्य  सुरक्षा , पूर्ण रोजगार और शिक्षा , 

स्वास्थ्य तथा आवास तक सर्वभोम पहुँच मुहय्या करना |

 इसका अर्थ है मजदूरों , किसानों तथा अब तक हाशिये पर 

पड़े रहे तबकों की जीवन स्थितियों में भारी सुधार लाकर ,

 जनता का आर्थिक व राजनितिक शक्तिकरण करना |


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263


अहसास------------------

मेरा ना होना तुम बर्दास्त नहीं कर सकते 

मेरी ताकत का अहसास है तुम्हें 

इसीलिये बाँट दिया मुझे धर्म, जात ,

इलाके, भाषा के नाम पर 

मुझे अपनी कमजोरी का जिस दिन 

अहसास  हो जायेगा उस दिन ये जमाना 

बदल जायेगा  


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262

चुप रहे 

फिर भी  

बहुत कुछ 

कह गये 

अब कोई 

ना समझे 

तो क्या

करे कोई



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261

असल में जो नंगे हो गये वो अपना नंगा पन  छिपाने को 

सबको नंगा कहते हैं ताकि हम झिझकें उंगली उठाने को 

पत्थर तोड़ कर ताज महल बनाया क्यों नहीं दिखाई देता 

ताज महल के साथ सब कोई नाम शाहजहाँ का ही लेता



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260


कैसा अजीब नजारा 

कैसा अजीब नजारा देह मेरी पर हल्दी बीरू के नाम की 

कैसा अजीब नजारा हथेली मेरी मेहंदी बीरू के नाम की 

कैसा अजीब नजारा सिर मेरा पर चुनरी बीरू के नाम की 

कैसा अजीब नजारा मांग मेरी पर सिन्दूर बीरू के नाम की 

कैसा अजीब नजारा माथा मेरा पर बिंदी बीरू के नाम की 

कैसा अजीब नजारा नाक मेरी पर नथनी बीरू के नाम की 

कैसा अजीब नजारा गला मेरा मंगल सूत्र बीरू के नाम की 

कैसा अजीब नजारा कलाई मेरी चूड़ियाँ बीरू के नाम की 

कैसा अजीब जमाना ऊँगली मेरी अंगूठी बीरू के नाम की 

कैसा अजीब जमाना कुछ भी तो नहीं है मेरा मेरे नाम का 

चरण वन्दना करूँ सदा सुहागन आशीष बीरू के नाम का 

करवा चौथ व्रत मैं करूँ  पर वो भी तो बीरू के नाम का 

बड़मावस व्रत मैं करती पर वो भी तो बीरू के नाम का 

कोख मेरी खून मेरा दूध मेरा और नीरू बीरू के नाम का 

मेरे नाम के साथ लगा गोत्र भी मेरा नहीं बीरू के नाम का 

हाथ जोड़ अरदास सबसे बीरू के पास क्या मेरे नाम का 

रणबीर 

6.7.2015




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259


अगले पिछले का चक्कर 

अगले पिछले के चक्कर में अबका हिसाब बिगाड़ लिया 

टिकवा पथरों पर माथे हमारे भक्तों ने बिठा जुगाड़ लिया 

इसमें भोगा वो पिछले का अब किया वो मिलेगा अगले में 

इसकी कोई जगह नहीं है सार सोच कर लिकाड़ लिया

कर्म करो फल की चिंता ना करो कभी से इसे मानते आये 

अडानी अम्बानी जैसों ने गीता से क्यों खिलवाड़ किया 

अन्धविश्वाशों का हुआ है क्यों बहुत प्रचार प्रसार यहाँ पर 

विज्ञान ने अंधविश्वासों का आज पूरा नकाब उघाड़ दिया


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258

अध्यापक कामचोर 

डॉक्टर कामचोर 

कर्मचारी कामचोर 

किसान भी कामचोर 

मजदूर कामचोर 

अडानी अम्बानी कर्मठ 

तभी तो विकास दर 

बढ़ रही है । 

अबकी बार तो कुछ 

पॉजिटिव कहा कि नहीं


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257


होंश में आना होगा 

अब नए संगठन को हमें अपनाना होगा ।।

जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा ।।

संगठन बनायें जो रजके रोटी खाना चाहते 

अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाना चाहते 

सब बराबर हों ऐसा समाज बनाना चाहते 

अब हमें क्रांति के गीतों को गाना होगा ।।

जो भाई  नहीं आएं उनको बुलाना होगा।।

वो क्यों अमीर हो गए इस पर विचार करें 

हम क्यों गरीब ही रहे इस पर ध्यान धरें 

अलग अलग बंटे हम एक दूजे से ही डरें

जात पात भूलके एक मंच पर आना होगा।।

जो भाई नहीं आये उनको  बुलाना होगा ।।

हरियाणा बुरी तरह जलवाया देख लिया 

जातों  को आपस में भिड़वाया देख लिया 

फूट डालो राज करो आजमाया देख लिया 

मेहनतकश को मानवता को बचाना होगा।।

जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।।

महंगाई बढ़ती जा रही देखो आज यहाँ 

बेरोजगारी हमें खा रही देखो आज यहाँ 

प्याज भाव नहिं पा रही देखो आज यहाँ 

इन मुद्दों को मिलकर के उठाना होगा ।।


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256


ranbir dahiya - October 4, 2009

दोहरापन

दोहरा पन जीवन का हम को अन्दर से खा रहा |


एक दिखे दयालु दूसरा राक्षस बनता जा रहा |


चेहरों का खेल चारों तरफ दुनिया में फैल रहा


मुखौटे हैं कई तरह के कोई पहचान ना पा रहा |


सफेद मुखौटा काला चेहरा काम इनके काले हैं,


बिना मुखौटे का तेरा चेहरा नहीं किसी को भा रहा |


कौनसा मुखौटा गुजरात में करतब दिखा रहा ये


जनता को बहला धर्म पे कुरसी को हथिया रहा |


धार्मिक कट्टरता का चेहरा प्यारा लगता क्यों है


मानव से मानव की हत्या रोजाना ही करवा रहा |


कौन धर्म कहता हमें कि घृणा का मुखौटा पहनो,


खुद किसकी झोंपड़ी में आग खुदा जाकर लगा रहा |


राम भी कहता प्यार करो दोहरेपन को छोड़ दो अब


रणबीर सिंह भी बात वही दुजे ढंग से समझा रहा |


CHALE KHETON KI AUR



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255


क्या कुछ नहीं बदला 

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उखल कहाँ अब

मुस्सल  कहाँ अब 

गौजी  कहाँ अब 

राबडी  कहाँ अब 

बाजरे की खिचडी 

बताओ कहाँ अब 

गुल्गले  कहाँ अब 

पूड़े  कहाँ अब 

सुहाली  कहाँ अब 

शकर पारे  कहाँ अब 

पीहल  कहाँ अब 

टींट कहाँ अब

हौले  कहाँ अब

मखन का टींड 

कहाँ दिखता अब 

छोटी  सी बात 

आलू ऊबाल कर 

आलू के परोंठे 

कहाँ चले गये 

पौटेटो चिप्स आये 

बीस गुना महंगे 

छद्म आधुनिकता 

पौटेटो चिप्स खाना 

फैशन बन गया 

बहुत कुछ बदला 

लम्बी फहरिस्त है |


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254


बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही 

समझौता संघर्ष करती आ रही 

डायलैक्टिस इसी को कहते हैं 

आज बेचैनी दुनिया पर छा रही 

डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है 

जनता ने कुछ अधिकार पाया है 

कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो 

इसके खिलाफ विरोध जताया है 

उठती बैठती जीवण बिता रही है 

कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है 

लूट के हथियार बदल लिए जाते हैं 

जनता ने एकता हथियार बनाया है


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254

एकतरफ़ा मोहब्बत का भी एक अंदाज होता है  

उपर से कहता है कोई बात नहीं अंदर से रोता है  

प्यार तो दोतरफ़ा होना है लाजमी यही सुना है  

एक तरफ़ा आसिक क्यूँ गल्त फ़हमी में सोता है

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253

रुकना नहीं 

निराश मतना होईये बेटी दिखा दे आज बन कै नै चिंगारी 

पाछै मतना हटियो जंग तैं छोरियो निगाह थारे पर हमारी

हरयाणा मैं  महिलावाँ नै आजादी का  बिगुल बजा  दिया 

खेलां मैं चमकी दुनिया मैं शिक्षा मैं आगै कदम बढ़ा दिया 

तेरे इस कदम नै पूरा हरयाणा एक बै तो आज डरा दिया 

कुछ दकियानूसों नै विरोध मैं यो अपना झण्डा उठा दिया 

नम्बर वन नहीं सै पर इसनै जरूर नम्बर वन बनावेंगे हम

अपने नौजवान भाइयां गैल्यां मिलकै कदम बढ़ावैंगे हम


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252

नब्बे और दस की लड़ाई नब्बे को समझ नहीं आई 

दस ने अपनी पूरी ताकत न समझें इसपे  है लगाई 

मगर दस का जो पैसा आज ताकत है बेलगाम ये 

एक दिन कर ही देगा इसकी भी नींद खूब हराम ये 

तब अपनी असल शकल लेगी दस नब्बे की लड़ाई 

इतिहास गवाह है मानवता का पलड़ा आखिर जीता 

झूठ का संसार फले कितना सच बन जाती है कविता 

इंसान की इंसानियत की वही झूठ भी देती है दुहाई

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251

शादी की अल्बम

शादी वह मौका है जब दो दिल 

दो ख़ानदान अपने सुख के पलों को 

पूरे भरपूर अंदाज में जीते हैं यारो 

इसके गवाह होते हैं कई परिवार 

बहुत से मेहमान दूर से आते यारो 

वे सब अपनी हाजरी दर्ज करवाते

कैमरे की जद में सब कैद हों जाते

जब भी शादी का अल्बम पल्टा जाता

यादों के हम सब के दरीचे खुल जाते

पुरानी खुसबूएं फिर महकने लगती हैं

धुंधले पड़ गए चेहरे साफ दिखाई देते

तभी तो हम तुम सब अपनी अल्बम

देखकर मुस्कुरा उठते हैं मन ही मन

हर तस्वीर एक कहानी कहती है

जाने क्या क्या यादें तजा होती

फूफा बुआ ताऊ ताई सब आये 

कुछ लोगों के बीच नई शादी का

आगाज भी बनता इन शादियों में

आप भी देखना एक बार फिर आज

अपनी शादी की एल्बम और

लीख देना अपने दिल की बात

अपनी डायरी के किसी पन्ने पर


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250


कीमत

यह सच है कि किसान

घोलते हैं हमारे व्यंजनों में

मिठास अपनी मेहनत से

लेकिन बेहद कडवा है

इसका दूसरा पहलू

गन्ना पैदा करता मगर

नहीं मिल पाती वाजिब

कीमत उसे अपनी

मेहनत की 

आखिर ऐसा क्यों ?


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249


मेरा कस्सूर

मेरा कसूर

हमने दोनो ने मिलकर सोचा


जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे


बहुत सुन्दर सपने संजोये थे

प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा

क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया

यह सब मालूम था हमको पर


प्यार की राहों पर बढ़ते गए


मेरे परिवार वाले खुश नहीं थेa


क्यों मुझे पता नहीं चला है


न तो मैंने एक गोत्र में की है

न ही एक गाँव में शादी मेरी

न ही दूसरी जात में की मैंने


तो भी सब के मुंह आज तक


फुले हुए हैं हम दोनों से देखो


प्यार किया समझा फिर शादी


ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं


शायद मन पसंद गुलाम नहीं


मिल सकी जो रोजाना उनके


पैर छूती पैर की जूती बनकर


सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती


दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना


प्यार का खुमार काम हुआ अब


जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी


मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब


क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के

रहने के लायक बन पाया यहाँ \


चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे


मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो


वो सुबह कभी तो आयेगी की

इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे

झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी

नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही

जिद हमारी शायद यही है कसूर



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248


TO OPPOSE

कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर

लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर

बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम

इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम

आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर

मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही यारो

चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही यारो

कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर

बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती

फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती

महल बने ये सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर


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247


गुनाह उनका  सजा हमें

उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले

ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले

नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये 

कैसे हम जैसों को  जीने की यहाँ फिजा मिले

तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत  कई बार ही

मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले

तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद

बताओ तो  कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले

हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं

न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले

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247


घूंघट में छात्रा वधु


पन्द्रह सोलह बरस की

छात्रा दर्जे दस की

बालिका वधु बनी

ससुराल में है पढ़ रही

हमें पास से देख रही है

बड़ी आस से देख रही है

शायद मिट जाए सन्ताप

सदियों से जो लगा हुआ है

असूर्यपश्या का अभिशाप

और हम हैं कि दौड़ रहे हैं

परम्पराओं की गाड़ी में

खड़े हैं मर्यादाओं की अगाड़ी में

घूंघट का झँडा फहरा रहे हैं

कल्चर के गीत गा रहे हैं

लेकिन उसकी नंगी आँखों से

आँखें नहीं मिला सकते

कितने कमजोर हैं हम

सीधे बातें नहीं चला सकते

पर्दा गिराया हुआ है जो

झीनी चुनरी का बीच में

अंटा पड़ा है व्यक्तित्व

पूरा एक इन्सान का 

जिसे थाह खोजना है

ऊंचे आसमान का

पढ़ने की जो मिली इजाजत

नहीं रुकेगी बात यहाँ

ससुराल और मायके से

आगे भी जानेगी जहाँ

पंख फैला कर शिक्षा के

वो आसमान को लांघेगी

और घूंघट की चुनरी का

बना के परचम थामेगी


      मंगतराम शास्त्री  10/3/03


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246


नौंजवानों का हाल सुनाऊं,

साच्ची बात ना झूठ भकाऊं, 

बिना नौकरी दुखी दिखाऊं , 

के होगा इस हरियाणे का।।

बेरोजगारी बढ़ती जावै सै, 

शिक्षा महंगी होंती आवै सै, 

युवक युवती हाँडै खाली, 

खत्म हुई चेहरे की लाली, 

नशे नै कसूती घेरी घाली, 

के होगा इस हरियाणे का।।

छोटा मोटा ठेके का काम यो,

 ठेकेदार खींचै म्हारा चाम यो, 

तनखा मिलती घणी थोड़ी, 

मालिक बणे हाँडै करोड़ी, 

काम नै म्हारी कड़ तोड़ी,

के होगा इस हरियाणे का ।

बेरोजी नै युवा रूआया रै, 

संकट सिर ऊपर छाया रै

नशे का पैकेज ल्याये देखो , 

युवा इसमें फँसाये देखो, 

अंधविश्वासी बनाये देखो, 

के होगा इस हरियाणे का।

मजबूत संगठन बनाना हो

संघर्ष मिलकै चलाना हो

सोचां युवा युवती सारे रै, 

कैसे क्लेश मिटेंगे महारे रै, 

छोड़ जात पात के नारे रै , 

फेर कुछ होगा हरियाणे का ।




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245


सब कुछ बहता जा रहा है 

एकाध खड़ा रम्भा रहा है 

सफेद धन ढूंढें मिलता यहाँ 

काला धन सब पे छा रहा है 

गंभीरता शिकार हुई उतावलेपन की 

मानवता शिकार हुई शैतानियत की 

इमानदारी शिकार हुई बेईमानी की 

वो शिकारी हैं और हम शिकार उनके 

खेल पूरे यौवन पर है जीत उनकी है 

पर डर सता रहा है उनको क्योंकी 

जीत कर भी हारेंगे ही अम्बानी जी 

हार कर भी जीत तो हमारी ही होगी 

क्योंकी मानवता इंसानियत गंभीरता 

ये तो हमारे पास ही हैं और रहेंगी भी




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244


प्यार का तोफा 

एक लड़की ने एक लड़के से प्यार किया 

लड़के ने उसे बलात्कार का उपहार दिया 

इतने मेंभी सबर नहीं उस वहसी को आया 

अपने चार मुसटन्ड़ों को था साथ में लाया 

उन्होंने भी बारी बारी मुंह किया था काला 

गिरती पड़ती ताऊ के घर पहुँची थी बाला 

ताऊ को  बाला ने सारी हकीकत बताई थी 

ताऊ ने भी वह हवस का शिकार बनाई थी 

माँ बाप ने जाकर बाला को छुड वाया था 

पुलिस में हिम्मत कर केस दर्ज कराया था

गाँव के कुछ नौजवानों ने आवाज उठाई थी 

पाँचों की  और साथ ताऊ की जेल कराई थी 

आज भी जेल में पैर पीट रहे हैं सारे के सारे 

क्या हुआ समाज को हवस ने हैं पैर पसारे



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243

अभी तो शुरुआत है

लालच खुदगर्जी ये 

हमें शैतान बनायेंगी 

जरा संभल के !!!!!


हमारी इंसानियत को 

हवानियत में तब्दील 

करने के अथक प्रयास 

किये जा रहे हैं दोस्तों 

अबतोसंभलना ही होगा 


जितना समझा दुनिया को 

उतना दुःख बढ़ता गया मेरा 

कि इतना भेदभाव क्यूं है 

क़िस्मत का ये जुमला तेरा 

मुझे सबसे बड़ा हथियार लगता 

इस भेदभाव के असली कारणों 

को छिपाने का !!!!!!!!!!!!



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242


एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई 

बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई 

कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी 

गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई 

केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ 

लड़की के बाप ने बीच में आकर के  खेल रचाई 

पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़

यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई 

कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों 

एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी


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241


दलित महिला से गैंग रेप हिसार में 

अपराधी खुले घूमें वहां बाजार में 

दलित ही नहीं यह महिला का सवाल 

ताकतवर दबंग और पैसे का बबाल

कमजोर की बहू सबकी जोरू कहते 

गरीब ही सबसे ज्यादा जुलम सहते


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240


झाँसी क़ि रानी की गंभीर की फिलहाल जरूरत है

भारत देश की सही तस्वीर की फिलहाल जरूरत है

कुरुक्षेत्र के मैदान मैं कहते सच की जीत हुई थी

द्रोपदी चीर हरण हुआ कलंकित ये रीत हुई थी 

एकलव्य वाले तीर की फिलहाल जरूरत है 

बुराई फैलती जा रही थी इस भारत के समाज मैं 

ज्योतिबा फुले रमाबाई उभरे थे नए अंदाज मैं 

दोहों वाले उस कबीर की फिलहाल जरूरत है 

अंड वंड पाखंड खिलाफ जमके लड़ी लड़ाई देखो 

सत्य की खोज में तयार करे बहन भाई देखो 

उस दयानंद से फकीर की फिलहाल जरूरत है

ठारा  सो सतावन में लाखों फंसी फंदा चूम गए

राजगुरु सुखदेव भी आजादी की खातिर झूम गए

उस भगतसिंह से रंधीर की फिलहाल जरूरत है

जलियाँ वाले बाग़ का बदला दिल में ज्योति जलाई 

जालिम डायर की लन्दन में  जाके थी  भया बुलाई  

उस उधम सिंह बलबीर की फिलहाल जरूरत है

जवाहर गाँधी रविन्द्र देश आजाद करना  चाहया

अनगिनत लोग थे जिन्होंने था अपना खून बहाया 

अंहिंसा पुजारी गाँधी पीर की फिलहाल जरूरत है  

मजदूर किसान की खातिर जिंदगी ही न्योछार दई

मार्क्स ने दुनिया के बारे में एक नई सी  विचार दई 

उस मार्क्सवादी शूरवीर की फिलहाल जरूरत है  

महिला दलित का दोस्त आज चाहिए समाज इसा

पूंजीवाद राज अन्यायी ख़त्म हो मंदी का राज इसा

तोड़ने की जुल्मी जंजीर की फिलहाल जरूरत है






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239

सच छिपाए न छिपे 

एक बार भोपाल से ग्वालियर 

ट्रेन से अपने घर जा रहा था मैं 

उसी ट्रेन में उसी डिब्बे में एक 

लड़की पास की सीट पर बैठी थी 

थोड़ी बातचीत शुरू हुयी तो पूछा 

मेरे घर परिवार के बारे में उसने 

बताया पिता हाई कोर्ट में जज मेरे 

मम्मी सुप्रीम कोर्ट की वकील हैं 

लड़की मन ही मन में हंसने लगी 

समझ नहीं सका मैं उसका हँसना 

अपनी सीट पर लेट सो गया मैं 

घर पहुंचा तो देखा वही लड़की 

मेरे घर पर मेरे से पहले पहुंची थी

देख मुझे बहुत जोर से हँसी लड़की 

असल में मेरी मौसी की बिटिया

मैंने सफ़र में पहली बार देखा उसे 

उसकी हँसी ने शर्मशार किया मुझे 

क्योंकि ट्रेन में जो बताया था मैंने 

सभी कुछ झूठा था था कथन मेरा 

उस दिन के बाद मैंने कसम खाई 

अब के बाद झूठ नहीं बोलूँगा मैं 

बहुत हद तक कसम मैंने है निभायी 

कभी कभी झूठ बोलता हूँ मैं तो 

ट्रेन का नजारा जरूर याद आता

एक बार फिर मुझे याद दिला जाता


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238

इम्तिहान

हमारा इम्तिहान लिया हर बार पास हुए 

सब कुछ तुम्हारे पास फिर भी उदास हुए 

पता है तुम्हारा तुम एक अमर बेल हो

रब राखा क़िस्मत का रचा रहे खेल हो 

तुम्हारा अहम् और ये अहंकार 

दिखाता अन्दर का पूरा अंधकार 

अंधी गली में तुम बढ़ते जा रहे 

अपनी मौत के श्लोक पढ़ते जा रहे


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237

कारोबार नया साल हुआ

आज नए साल का मनाना भी एक कारोबार हो गया 

बनावटी पन लटके झटके मस्त हमारा घरोबार हो गया 

कैटरिना मलायका के ठुमके कैसी इन्तहा ये बेहयाई की 

देखके पूरा हिंदुस्तान ख़ुशी से कितना ये सरोबर हो गया 

एक फुटपाथ पर बैठा हुआ वह यह सब देख रहा है 

दो चार लकड़ी इकठी करके हाथ अपने सेक रहा है 

सामने दुकान पर देखी ठुमकों की झलक थोड़ी सी 

घरवाली ने देख लिया तो सच मुच ही झेंप रहा है 

नए साल का जश्न मनाकर आज मुंबई छाई देखो 

ठिठुरे बचपन और जवानी ये गाँव की रुसवाई देखो

लड़की मांरके पेट में हमने लूटी है वाह वाही देखो

शराब नशा और मस्ती ठुमकों की ये बेहयाई देखो 

गला काट मुकाबला आज दुनिया में है छाया देखो 

भाई का भाई दुश्मन इसने यहाँ पर है बनाया देखो

आखिर कहाँ जा रहे है हम जरा देर सोचो तो यारो 

इंसानियत का चेहरा यहाँ पर किसने है चुराया देखो



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236

क्या कहूं

सौ बार मरना चाहा आँखों में डूबकर के हमने 

हर बार निगाहें झुका लेते हमें मरने नहीं देते 

तुझे देखे बिना तेरी तस्वीर बना सकता हूँ मैं 

तुझसे मिले बिना तेरा हाल बता सकता हूँ मैं 

दिल में क्या है तेरे सब तो जता सकता हूँ मैं 

क्या सोचते रहते दिन भर गिना सकता हूँ मैं

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235


मेरी शादी से पहले

मेरी शादी से पहले परिवार ने 

खूब पूछताछ छानबीन की थी 

बहुत गुणवान लड़का है कोई 

मांग नहीं हैं उनकी सीधे सादे 

सैल पर दो एक बार बात की 

सपनों के संसार में खो गए हम 

बस झट मंगनी और पट ब्याह 

महीना दो महीना बहुत यादगार 

गुजर गया वक्त पता नहीं चला 

फिर असली जिन्दगी से सामना 

हुआ मेरा तो बस धडाम से गिरी 

सोचा यह सब किससे साँझा करूँ ?

या फिर घुट घुट के मैं यूं ही मरूं 

उसकी शिकायत कि माँ को मैं 

बिल्कुल खुश नहीं रख पा रही हूँ 

बहुत देर बाद समझ आया कि 

खुश ना रहने का दिखावा करती माँ 

मुझे प्रताड़ित करना फितरत ये 

माँ की बनता चला गया समझो 

बहुत कोशिश की मैंने तो दिल से 

मगर तीन साल में परिवार पूरा 

कलह का अखाडा सा बन गया 

मेरी माँ (सास) तीन साल हुए हैं 

मुझसे बोलती ही नहीं है कभी 

पूरा परिवार बायकाट पर उतरा 

ऐसे में पति देव भी अब तो 

छोटी छोटी बात के बहाने ही 

मुझ में कमियां देखने लगे हैं 

मेरे परिवार की विडम्बना पर 

मुझे रोना आता है कई बार 

मैंने तो लव मेरेज भी नहीं की

न ही एक गौत्र कि गलती की है 

न ही एक गाँव में बसाया घर 

दहेज़ जैसा बना वैसा तो लाई मैं 

मैं जीन भी नहीं पहनती कभी भी 

नौकरी भी करती हूँ और घर भी 

पूरी तरह सम्भालती हूँ फिर भी 

यह सब क्यों हों गया बताओ तो 

हमारे बीच कोई लगाव न बचा 

बस ये लोग क्या कहेंगे हमको 

इस अदृश्य भय के कारण ही तो 

हम एक छत के नीचे जी रहे 

छत एक है मकान एक है 

पर घर नहीं है यह हमारा 

बंद करती हूँ यहीं पर मैं किस्सा 

वर्ना अब खुल जायेगा पिटारा पूरा 

आज का दौर नाज्जुक दौर है 

मैं दुखी हूँ तो पति खुश है 

ऐसी बात नहीं मानती हूँ मैं 

दुखी वे भी बहुत जानती मैं 

मगर क्या समाधान है इसका ?

एक साल मैं अपने पीहर रही 

वहां भी बोझ ही समझी गयी 

सासरे में दूरियां और बढ़ी मेरी 

कई बार सोचा अलग हों जाऊं 

अलग होंकर क्या हांसिल होगा 

शायद पति के बिना नहीं रह

सकती मैं अकेले अकेले कहीं पर 

तलाक का लोड सोच कांप जाती 

समझौता कर के जीने की सोची 

पता नहीं ठीक हूँ या गलत मैं !!!


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234


तीर सच्चाई के

हम तीर सच्चाई के रूक रूक के चलाते हैं 

दीवाने हैं इसके औरों को दीवाना बनाते हैं 

हम रखते हैं ताल्लुक सफरिंग दुनिया से 

उसके तस्सवुर में हम खवाब जगाते हैं 

रहना होशियार उनके छलकते जामों से 

ये मय के बहाने से बस जहर पिलाते हैं 

चलना सही राहों पर रख जान हथेली पर 

लूटेरे है धर्म की आड़ में खूब लूट मचाते हैं 

साईनिंग जाल साजी रचते रचते हम पर 

हम हैं की अपने से दीवाने बनाना चाहते हैं


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233


कोई खेल रहा है कोई रो रहा है यारो

कोई छा रहा है कोई खो रहा है यारो


कोई ताक में है किसी को है गफ़लत

कोई जागता रहा कोई सो रहा है यारो


कहीँ असफलता ने बिजली गिराई

कोई बीज उम्मीद के बो रहा है यारो


इसी सोच में मैं तो रहता हूँ अक्सर मैं

यह क्या हो रहा क्यों हो रहा है यारो


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232


कम उमर के बच्चे होते हैं बहोत सच्चे 

उमर  ही ऐसी है करे ऐसी की तैसी है 

उलटी सीधी बात मिलें  दोस्तों के हाथ

हारमोन का कसूर आकर्षण का दस्तूर 

माँ बाप भी  चुप हैं ये तो अँधेरा घुप है 

नासमझी नादानी नहीं सिर्फ हिन्दुस्तानी

दुनिया में ऐसा होता नासमझ इसे ढोता

इतने जालिम न बनो हद से आगे न तनों


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231


Naya beej

पितृ सत्ता की ताकत हमारी नाक  जरूर डबोवेगी

नया बीज बोवेंगे तो ही नई फसल की खेती होवेगी  

हरयाणा की बुरी छवि पूरे जगत में खिंची रहेगी

पुत्र लालसा जब तलक हमारी सोच मैं बची रहेगी

मिलके हटे काली स्याही सरतो सुख से रोटी पोवेगी 

सामाजिक सुरक्षा का घटना महिला का बैरी हो  गया

पूरा समाज होगा जगाना पढ़ा लिखा आप्पा खो गया

नहीं तो हमारी अगली पीढ़ी ये माथा पकड़ के  रोवेगी 

महिला विरोधी रीत पुराणी छांट के निकाल बगानी होँ

महिला के हक़ मैं जो भी हैं हमको वे रीत बचानी होँ 

महिला पुरुष बराबर होँ कमला सुख से फिर सोवेगी

काम जमा आसान नहीं नया समाज सुधार चाहिए

वंचित दलित महिला को यो पूरा  अधिकार चाहिए

रणबीर सिंह की कलम हमेशा ये सही छंद पीरोवेगी 


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230

आज का दौर 

विनाशकारी कदम ताबड़  तौड़ हम पर थोंप दिए

पैट्रोल के बाद  डीजल के दाम नियंत्रण मुक्त किये

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से नहीं डरे   

देश भर में व्यापक विरोध हुआ फिर भी लागू करे

लूट खसोट उत्पीडन मुनाफाखोरी पर व्यवस्था टिकी

दिवालियेपन और संकट से बचने को ये नीतियाँ दिखी

सुधारों की आड़ में  बिगाड़ पूरे  देश पर थोंपे जा रहे

इनके विनाश कारी परिणाम हमारे सामने आ रहे

उदारीकरण निजीकरण की नीतियाँ लागू की गयी

बड़े बड़े साहूकारों को मुनाफे बढ़ने की छूट दी गयी

दूसरी तरफ रोटी रोजी को तरस रहे मजदूर किसान     

छोटे मोटे कर्मचारी भी हो  रहे इन नीतियों से परेशान

खादय सुरक्षा रोटी रोजी शिक्षा स्वास्थ्य और आवास

पढ़ाई महंगी इलाज महंगा बिन आयी मौत से मरते

अपनी जमीं मकान बेचकर इलाज का खर्च ये भरते

लाखों पढ़े लिखे योग्यता प्राप्त युवा ढूढ़ते हैं रोजगार

लाखों नौकरी पद खाली रखे बैठी है हमारी सरकार  

अस्थायी नौकरियां देकर स्थाई नौकरियों पे लगाते

आर्थिक शोषण उत्पीडन करने में बिलकुल न घबराते

महिला कमजोर तबके मान सम्मान से नहीं  जी पाते  

बलात्कार और घरेलू हिंसा कदम कदम पर हैं सताते

दलित महिला सबसे ज्यादा उत्पीडन का शिकार होती

दबंग लोग शामिल होते असफल गरीब की पुकार होती

जातिवादी आकराम्कता को दबंग बढ़ावा दे रहे हैं देखो

सामाजिक सद्भाव बिगाड़ के दबंग दरव दे रहे हैं देखो

कब तक आखिर यह सब हम और आप सहते रहेंगे

एक नयी जंग की शुरुआत देखो तो हो चुकी है दोस्तों

जात पात से ऊपर उठ कर लड़ो जो भी दुखी है दोस्तों




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229

Tuesday, March 12, 2013

आज के विकास की परिभाषा

असमानता और विषमता को बढ़ावा देने वाला 

पर्यावरण के संतुलन को ख़राब करने वाला 

बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाला 

एक राष्ट्र को दुसरे राष्ट्र  द्वारा दबाने वाला 

स्त्रियों को हासिये पर डालने वाला 

स्त्रियों की अस्मिता को खत्म करने वाला 

बच्चों का बड़े पैमाने पर शोषण करने वाला 

महिला का बड़े पैमाने पर कोमोड़ीफिकेशन  करने वाला 

सभी को बाजार हवाले छोड़ने वाला 

प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करने वाला 

मनुष्य की मानवीय जरूरतों के आधार की बजाय मुनाफे पर आधारित उत्पादन का समर्थन करने वाला 

जनसँख्या के बड़े हिस्से की जीवन गुणवत्ता को ध्यान में रखकर न चलने वाला -- मसलन शिक्षा ,स्वास्थ्य व् सांस्कृतिक क्षेत्रों का धयान न रखने वाला 

पुरुष सत्ता का प्रतीक  विकास 

ज्ञान विज्ञान को तकनीक में बदलकर सूचना पर कब्ज़ा करके चलने वाला विकास 

विज्ञानं को मानव के खिलाफ खड़ा करने वाला 

मनुष्य जाति  को    युद्धों में धकेलने वाला 

सामाजिक असुरक्षा पैदा करने वाला 

यांत्रिक ढंग से किया जा रहा विकास 

मूल रूप से स्त्री विरोधी , प्रकृति विरोधी विकास 

एक उप्भोग्तावादी अपसंस्कृति विकसित करने वाला 

विविधता की बजाय एकरसता की हिमायत करने वाला 

हिंसक और विनासकारी प्रवर्तियों को बढ़ावा देने वाला 

जनता के बड़े हिस्से के श्रम के शोषण पर टिका रहने वाला 

विज्ञानं की मरदाना अवधारणा व्याख्यायित करने वाला 

मनुष्य की संज्ञान क्षमताओं को घटाने वाला 

चीजों को उनके सन्दर्भों से काटकर देखने वाला 

अलगाव,गैर बराबरी व् गई भागीदारी पर आधारित वैधता की कसौटियों वाला 

क्षेत्रीय असमानता बढ़ने वाला 

ऐसे विकास से तौबा !!!




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228

*मोमबती के अंदर पिरोया गया*

*धागा मोमबती से पूछता है.. ..*

"" *जब मैं जलता हूं तो तू क्युं*

 *पिघलती (रोती) है ।*

*मोमबती ने सुंदर जवाब*

 *दिया ....*

   *कहा कि-----*

*जब किसी को दिल के अंदर*

 *जगह दी हो और वो ही छोड़के*

*चला जाये तो रोना तो आयेगा* ही...*


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227

नई नवेली दुल्हन जब

ससुराल में आई तो उसकी

सास बोली :बींदणी कल

माता के मन्दिर में

चलना है।

बहू ने पूछा : सासु माँ एक

तो ' माँ ' जिसने मुझ जन्म

दिया और एक ' आप ' हो

और कोन सी माँ है ?

सास बडी खुश हुई कि मेरी

बहू तो बहुत सीधी है ।

सास ने कहा - बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है

सब औरतें जायेंगी हम भी चलेंगे ।

सुबह होने पर दोनों एक साथ मन्दिर जाती है ।

आगे सास पीछे बहू ।

जैसे ही मन्दिर आया तो बहू ने मन्दिर में गाय की मूर्ति को देखकर

कहा : माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है ,

मैं बाल्टी लाती हूँ और दूध निकालते है ।

सास ने अपने सिर पर हाथ पीटा कि बहू तो " पागल " है और

बोली :-,बेटा ये स्टेच्यू है और ये दूध नही दे सकती।

चलो आगे ।

मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी ।

फिर बहू ने कहा - माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा

सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फूट गया ।

और बोली - बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ?

चलो अंदर चलो मन्दिर में, और

सास बोली - बेटा ये माता है और इससे मांग लो , यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी ।

बहू ने कहा - माँ ये तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है ? ,

जब पत्थर की गाय दूध नही दे

सकती ?

पत्थर का बछड़ा दूध पी नही सकता ?

पत्थर का शेर खा नही सकता ?

तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ?

अगर कोई दे सकती है तो आप ......... है

" आप मुझे आशीर्वाद दीजिये " ।

तभी सास की आँखे खुली !

वो बहू पढ़ी लिखी थी,

तार्किक थी, जागरूक थी ,

तर्क और विवेक के सहारे बहु ने सास को जाग्रत कर दिया !

अगर मानवता की प्राप्ति करनी है तो पहले असहायों , जरुरतमंदों , गरीबो की सेवा करो

परिवार , समाज में लोगो की मदद करे ।

"अंधविश्वास और पाखण्ड को हटाना ही मानव सेवा है " ।

बाकी मंदिर , मस्जिद , गुरुद्वारे, चर्च तो मानसिक गुलामी के केंद्र हैं

ना कि ईश्वर प्राप्ति के

........ मानव का सफर पत्थर से शुरु हुआ था। पत्थरों को ही महत्व देता है और आज पत्थर ही बन कर रह गया -


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226

राज दरबारी क्या कहते सुनते हैं यारो 

पेट की खात्तर बेचारे झूठ गाते हैं 

सच कहना गर बगावत तो हम बागी हैं 

दिल दुखता जब नाकारे लूट मचाते हैं 

अमीर गरीब की बढ़ा खाई समता लाएंगे

झूठ के एक दिन ये शिकारे डूब जाते हैं


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225

छक्का 

हिंदुस्तान जलन लागरया बूझा लियो मिल करकै रै

आंख मींच कै क्यूँ बैठे थाम बजर का दिल करकै रै

आजादी रूपी फूल मुर्झाग्या जो आया था खिल करकै रै 

देश का किसान फांसी तोड़या किसनै मुश्किल करकै रै

साम्प्रदायिकता चढ़ती आवै नफरत के या बिल करकै रै

अडानी और अम्बानी नै धरया देश आज छिल करकै रै


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224

पेट मैं छाला 

गुड़ का राला 

खर्च कुढ़ाला 

दुख देज्या

आंख मैं जाला 

भीत मैं आला 

दिल मैं काला 

दुख देज्या

पोह का पाला 

खेत रिहाला

कपटी रूखाला

दुख देज्या


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223


मेरा कसूर

हमने दोनो ने मिलकर सोचा

जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे

बहुत सुन्दर सपने संजोये थे

प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा

क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया

यह सब मालूम था हमको पर

प्यार की राहों पर बढ़ते गए

मेरे परिवार वाले खुश नहीं थे

क्यों मुझे पता नहीं चला है

न तो मैंने एक गोत्र में की है

न ही एक गाँव में शादी मेरी

न ही दूसरी जात में की मैंने

तो भी सब के मुंह आज तक

फुले हुए हैं हम दोनों से देखो

प्यार किया समझा फिर शादी

ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं

शायद मन पसंद गुलाम नहीं

मिल सकी जो रोजाना उनके

पैर छूती पैर की जूती बनकर

सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती

दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना

प्यार का खुमार काम हुआ अब

जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी

मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब

क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के

रहने के लायक बन पाया यहाँ 

चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे

मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो

वो सुबह कभी तो आयेगी की

इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे

झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी

नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही

जिद हमारी शायद यही है कसूर


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222

हमारी बर्बादी 

हमें बर्बाद करके उनको पता नहीं क्या मिल गया 

ईमानदारी का दामन थामा हमारा निवाला छिन गया 

आदमी से आदमी की मोहब्बत कहाँ काफूर हो गयी 

मेहनत हमने की मगर पता नहीं कहाँ ये खो गयी 

दर्द हद से गुजर गया है सीना हमारा तो छिल गया 

मोहब्बत के गीत गाएँ कैसे चिंता हमें बीमारी की 

यकीं कौन करेगा इस पर मोहब्ब्त गरीब भिखारी की 

देख के उनके ढंग निराले मुंह हमारा है सिल गया 

मरने वाले हथियार लिए बैठे साधा निशाना हम पर 

मार न पाना मजबूरी उनकी टिका जमाना हम पर 

हमारे वजूद का तस्सवुर कीचड में गुलाब खिल गया 

तूफ़ान जो उठा समुन्द्र में अब नहीं  टाला जायेगा 

पड़ाव अब ये हमारा मंजिल पर  ही डाला जायेगा 

भगवन का आसरा किया पर भरोसा सारा हिल गया 

आर पार की जंग शुरू करना होगा स्वीकार हमें 

फूंक फूंक के चलना है रहना होगा होशियार हमें 

देख देख जुल्म उनके कलेजा हमारा छिल गया 

मानवता का औढ़ा मुखोटा लिया धर्म का सहारा है 

जात पात का जहर फैलाया निचौड़ा खून हमारा है 

रणबीर आज रो उठा हो छलनी उसका दिल गया




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221

आंधी चल रही ये नहीं थमीं यारो 

रात की गर्द मेरे चेहरे पे जमीं यारो 

कुछ ठूंठ खड़े हैं कहीं कहीं मेरे जैसे 

कुछ उखड़े पड़े हैं कहीं तुम्हारे जैसे 

हम सब बचें हैं इसके थपेड़े  खाकर 

तुम बैठ गये अपने महलों में जाकर  

यह आंधी आज किसे साल रही देखो  

झोंपड़ी इधर उधर उछाल रही देखो 

धर्म की आँधी चलने ही वाली यारो 

क्या गुल खिलेंगे उजड़ेगा माली यारो


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220

Please React

इस बेवफा सिस्टम से वफ़ा मांग रहे हैं |

हमें क्या मालूम है हम खता  मांग रहे हैं |

ये क़िस्मत  का खेल रचाया है इसी ने तो---

 इसी से हम क़िस्मत क़ि दुआ  मांग रहे हैं|

पूरा सच छिपा ये आधा  सच बताते हमको --

जहर घोला उसीसे साफ हवा मांग रहे है|

 रोजाना जो खेलता हमारे जज्बात के साथ--

 सुख क़ि राही का उससे पाता मांग रहे हैं |--

सुरग क़ि कामना में छिपी हुयी रणबीर--

अपने खुद क़ि ही हम चिता मांग रहे हैं  |


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219

SUN JARA AUR KAH JARA

किसी पर भी तूं एतबार न कर|

 

भावुकता में बर्बाद घरबार न कर|

 

बात हैं बात का भरोसा क्या है 

--

जाँ किसी पर निस्सार न कर|

 

अमीर क़ि नजरें जाँ लेलेंगी--

 

इनसे कभी कोई करार न कर|

 

बेवफा से वफ़ा नहीं होती है 

--

जाने दे दिल को बेक़रार न कर 

|

अमीर गरीब क़ि दुनिया है यह 

--

झूठे वायदे हैं स्वीकार न कर 

|

रणबीर एक दिन टूट जायेगा--

 

ख्वाब है ख्वाब से प्यार न कर |


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218


पूजा 

पूजा अपने आप में खोयी 

लेकिन बिल्कुल सुलझी हुई 

शक्शियत !

जो भी उससे मिलता 

उसकी सादगी और 

आत्मितीयत्ता से प्रभावित 

हुए बिना न रहता |

हर किसी की मदद के 

लिए हर समय तैयार 

विचारों से परिपक्व 

दिल से इमानदार और सच्ची 

जिन्दगी भर समाज और 

दुनिया को बदलने में लगी 

एक अनोखी लड़की 

पूजा !!


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217

आज का दौर *** एक कविता के माध्यम से **

दुनिया की क्या हालत हो गई बाजार चारों ओर छाया।।

भैंस बंधी है घर घर में पर दूध ढोलों के अंदर पाया।।

1

दूध बेच भैंसों का लोग गांव के करते हैं आज  गुजारे

लुप्त हो गए घरों से आज घी के जो हुआ करते बारे 

थोड़ा साँस आया करता आज घूटन मानते हैं सारे 

महिलाओं के अनीमिया ने फिर से  जोर के डंक मारे 

बाजरे की खिचड़ी गौजी का आज जोड़ा तोड़ बगाया।।

2

पहले भाई चारा था छोरे बहू लेने आया करते

जिब रोटी जिम्मन बैठते खांड बूरा खाया करते

पड़ौसी दूध के बखौरे बटेऊ वास्ते ल्याया करते

दूजे का बटेऊ पड़ौसी आंखों पे बिठाया करते

बैठे रहते फूंक बुढ़िया सी अब अपना ही बटेऊ ना भाया।।

3

आबो हवा मैं जहर घुला कीटनाशक छागये हैं

युवा के नर्वस सिस्टम पे दोष गुस्से का लागये हैं 

पेट को पकड़े घूम रहे डॉक्टर भी हाथ ठागये हैं

हमारी कष्ट कमाई को ये अमीर क्यों खागये हैं

टैस्ट क्यों नहीं होते मैडीकल मैं नहीं किसी ने कष्ट उठाया।।


4

किलो दूध मिले पचास का उसमें आधा पानी पावे

महंगाई के क्या कहने कोई क्या खाएं क्या नहीं   खावे

कुपोषण बालकों में आज दिन दिन क्यों बढ़ता जावे

बाजार व्यवस्था दोषी है पर दोष क्यों कोई नहीं 

लावे

राम की इच्छा कैहकर रणबीर हमारा क्यों मोर नचाया।।



**********

216

हमारा हरियाणा दो तरह से आज दुनिया में छाया है।। 

आर्थिक उन्नति बहुत की पर लिंग अनुपात ने खाया है।।

1

छांट के मारते लड़की पेट में समाज के नर नारी 

समाज अपने कसूर की मां के लगावे जिम्मेदारी जनता हुई है हत्यारी पुत्र लालसा ने ही राज जमाया है ।।

2

औरत औरत की दुश्मन है जुमला बहुत चलता आदमी आदमी का दुश्मन समाज को न खलता समाज ढांचा इसपे पलता यह हरियाणा बदनाम कराया है।।

3

वंश की पुरानी परंपरा पुत्र को चिराग बताते हैं लड़का जरूरी होना चाहिए लड़की को मराते हैं

जुल्म रोजाना बढ़ते जाते हैं सुनकर के कांपती काया है।।

4

अफरा तफरी फैली महिला कहीं महफूज नहीं

जो पेट से बच गई है उनकी समाज में बूझ नहीं आती हमको क्यों सूझ नहीं रणबीर सिंह बहुत घबराया है।।



**************/

215


दो हजार तेरा का आधा बरस बीत गया  

सुधार कहाँ मंहगायी का दानव जीत गया  

भारत की अर्थ व्यवस्था चली गयी खाई मैं  

विकास दर बीते दस साल की नीची इकाई मैं  

औद्योगिक विकास दर की क्या बात बताऊं  

पिछ्ले बीस साल में सबसे नीचे गई दिखाऊँ  

बजट घाटा हमारी आज की चुनौती बड़ी है  

मोदी के बसकी नहीं आई सी यू में पड़ी है  

राजनीति दिशाभ्रम इसका कारण हैं बताते  

पूंजीवादी विकास दोषी ये बात क्यों छिपाते


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214

ढाई लाख किसान देश के पाछले दिनों मैं फांसी खागे  

एफ डी आई तैं छोटे दुकानदारों के बुरे दिन आगे  

आर्थिक सुधारों के ना पै कार्पोरेट सैकटर छाया  

अंबानी अदाणी टाटा बिड़ला देश के चौखा चूना लाया  

सरकार कारपोरेट की बांदी ये गरीब घने  दुख  पागे  

नब्बे के दशक तैं देश मैं लागू ये सुधार हुए देखो  

ये भूख बीमारी बधगी घने बेरोजगार हुए देखो  

आवारा पूंजी उधम मचाया ये काले धन आले छागे | 

विश्व बैंक ड्ब्ल्यू टी ओ आई एम एफ नकेल थामरे  

तीसरी दुनिया के देशों के ये कसूती लगाम घालरे  

ये म्हारी घी घी बांध रहे विकसित देश फयदा ठागे| 

मन मोहन जी मोह लिए बिल्कुल नहीं समझ रहे  

इन आर्थिक सुधारों मैं क्यों और भी घने उलझ रहे  

ये आर्थिक सुधार तो  सबकै चपत घनी कसूती लागे|



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213


अभी बहुत कुच्छ बाकी है इस तुम्हारी  

खुश्क दुनिया में  

हमारी मेहनत  

हमारी सच्चाई  

हमारी इंसानियत  

हमारी कुर्बानी 

हमारी मोहब्बत  

हमारी शर्मो लिहाज  

हमारी भूख मरी 

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लंबी फहरिश्त है  

इस दुनिया को  

तबाह नहीं होने देंगे  

रणबीर


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212


साइनिंग इंडिया सफरिंग इंडिया अंतर  आज बढ़ता जाता है।।

कैसे पाटें इस अंतर को नहीं कोई हमको आज समझाता है।।

1

ये शाइनिंग इंडिया बहोत ज्यादा आगे जा लिया बताऊँ 

गुड़गामा नया और पुराना देखलो नहीं मैं झूठ भकाऊं 

नए और पुराने का अंतर क्यों ना जनता को उलझाता है।।

2

पुराने ढांचों से जन बहुत दुखी हो लिए हिंदुस्तान के

कई पुरानी सोच ये ओछी जूती काटें पैर मजदूर किसान के

नए ढांचे नहीं मिटा पा रहे ये भ्रष्टाचार घूमे दनदनाता है।।

3

इन हाल में नई इबारत जनता लिखनी चाहती जरूर

जात पात से ऊपर उठ चाहवे भ्रष्टाचार मिटाती जरूर

लड़ाई लम्बी संघर्ष मांगती समों जन को समझ आता है।।

4

सिस्टम एक रात में बदले एसा इतिहास ना टोहया पाए

सिर धड़ की कुर्बानी मांगे जब खून खरोंच इसको आए 

जनता का दिल अंतर कम करने को पूरी तरह चाहता है।।

5

बहोत सी उपलब्धियां अब पूरे साल ये गिनाई 

जाएंगी

पर नाकामियां इतनी ज्यादा हैं बिल्कुल न छिप पाएंगी

आने वाले समय में मुझे जो दिखे आम जन ना देख पाता है।।

6

फासिज्म नए ब्रांड का आज हमारे सिर पै आ खड़ा भाई

तरल पूंजी ने डिजाइन पूंजी से भर दिया है ये घड़ा भाई

रणबीर पड़े जूझणा कट्ठे होकर के ये सही छंद बनाता है।।


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211


साइनिंग इंडिया सफरिंग इंडिया 

ये महज शब्दों का खेल नहीं है 

ये हैं दो दुनिया इसी जमीन पर

एक तरफ एयर कंडीशन्ड कोठी 

उधर बरसात में टपकती झोंपड़ी

करोड़ों के को वह भी नहीं नसीब 

एक तरफ एयर कंडीशन्ड कारें हैं

उधर कई कोश नँगे पांव चलना है

एयर कंडीशन्ड पांच सितारा होटल

उधर दो रुपये की चाय का ढाबा है

एयर कंडीशन्ड अपोलो फोर्टिस हैं

उधर बिना दवाई के सीएचसी हैं

एयर कंडीशन्ड मॉल सब मिलता

उधर खुदरा छोटी छोटी दुकानें हैं

एयर कंडीशन्ड स्कूल आलिसान 

उधर बिना पंखे के कमरे के स्कूल

एक तरफ ऐयासी की दुनिया छाई

दूसरी तरफ मेहनत से फुरसत नहीं

दोरंगी दुनिया नजर नहीं आती हमें 

इस अंधेपन को क्या कहूँ?शब्द नहीं

आपके पास हैं तो इंतजार इनबॉक्स में

रणबीर

15.03.08


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210

बढ़ रहे मीलों के फासले हमारा प्यार नहीं कम होगा 

लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप को निभाने का दम होगा 

जरूरी पक्ष है इसका आपसे में बातचीत करते रहना 

इसका मतलब यह नहीं चौबीस घंटे ही खपते रहना 

समय-समय पर बात करना ही ये सही कदम होगा 

बात करते समय भविष्य या रिश्तों की बात नहीं जरूरी 

सकारात्मक मुद्दों पर बात कम करती है हमारी गरूरी 

विवाद की बातचीत का फिर नहीं हमारा मन होगा 

उनकी सुने अपनी सुनाऐं अनदेखी ठीक नहीं होती 

अनदेखी खटास लाती है आपस का विश्वास खोती 

इसलिए जीवनसाथी की बात पर जरूर चलन होगा 

रिश्ते पासके या दूरके नींव आपस का भरोसा बताया 

मिलने का प्रयास रहे जब भी मिलने का मौका पाया

प्यार और सम्मान रिश्ते में खूबसूरत ये चमन होगा


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209


राखी का त्यौहार मन में उल्टा सवाल उठाता यारो 

ना बराबरी का मसला लगता कहीं ये छिपाता यारो 

करवा चौथ रख कर महिला लम्बी उम्र मांगती है 

रक्षा करवाने को आपकी कलाई पर राखी बांधती है 

कितना इमोशनल ब्लैक मेल सवाल उठाते डरता हूँ 

मन में उठे सवाल पूछने की न मैं हिम्मत रखता हूँ 

महिला का शोषण है इस जगह से सोच कर देखो 

पुरुष प्रधान व्यवस्था को यारो खोल कर तो देखो


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208

यही रफ़्तार रही ज़माने की ताऊ

तो इंसानों की जगह होंगे ये हाऊ

खुदगर्जी चुगलखोरी खुसामद की 

मौज होगी हर चीज यहाँ बिकाऊ 

अमेरिका और कोर्पोरेट छाया देखो 

भारत बनाया इन्होंने बैल हिलाऊ


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207

गरीब  परिंदा उड़ान में  है  

तीर अमीर की कमान में है 

है डराने को मारने को नहीं 

मरा तो अमीर नुकसान में है 

जिन्दा रख कर लहू चूसना 

अमीरों के दीन ईमान में है 

खौफ ही खौफ है जागते सोते 

लूट हर खेत खलिहान में है 

मरने न देंगे न जीने देंगे 

साजिश  पूंजी महान  में है


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206

आम जनता के लिए बेरोजगारी है 

घरों से बेदखली है बड़े पैमाने पर 

समाज कल्याण के प्रावधानों में 

कटौतियां बखूबी से जारी यारो 

सरकारी खजाने की कीमत पर 

बैंकों और  वितीय कम्पनियों को 

फिर बड़ा मुनाफा बटोरने का ये 

मौका मिल रहा है भारत देश में 

मेहनतकश की कीमत पर ही तो 

मग़र कब तक एक दिन हिस्साब 

तो माँगा जायेगा  पाई पाई का


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205

बड़ी मुश्किल से ये आंसू छिपाए हमने

हँसना चाहा झूठे ठहाके लगाये हमने

तुमको मालूम ये  शायद हो के ना  हो

तुम्हारे जाने के बाद आंसू बहाए हमने

प्यार किया हमने नहीं  छुपाया कभी

दिल के तराने थे तुमको सुनाये हमने

तेरे साथ इन्कलाब के जो नारे लगाये

यारो अब तलक नहीं हैं भुलाये  हमने

राह में साथ छोड़ गये अफ़सोस तो है

पल याद हैं वो जो संग बिताये हमने

जानते हैं आप हमें नहीं  भूल सकेंगे

एक अनुभव बस बिंदु दिखाए हमने

हादसा नहीं एक सच्चाई है ये प्यार

अफ़सोस है क्यों ये रास्ते भुलाये तुमने


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204

किसानों मजदूर का संघर्ष तेज करने का समय आया।।

दूसरे कमेरे तबके साथ ले चाहिए देश में बिगुल बजाया ।।

इस पार्टी उस पार्टी का नहीं ये मामला कहते हैं कॉरपोरेट सांप्रदायिकता की मार हम सहते हैं सिस्टम का मालिक कॉरपोरेट यह लुटेरा असल बताया ।।

शिक्षा बेची स्वास्थ्य बेचा सब कुछ बेच रहे आज निजीकरण की लहर फैलाई झूठ को सच कहे आज 

आमजन के जीवन पर संकट आज गहरा है छाया ।।

अमेरिका से दोस्ती देश की मीडिया पूरा उछाल रहा 

असल मातहेती अमेरिका की छुपाने का कर कमाल रहा 

बातों बातों में देश को आज आसमान पर देखो पहुंचाया।।

बहु विविधता देश हमारे की पूरी दुनिया करे बड़ाई

एक देश एक पहचान इस पर छेड़ी रणबीर क्यों लड़ाई 

बहु विविधता हार नहीं मानेगी संघर्ष का बिगुल बजाया।।


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203

हरेक चीज आज देखो आनलाइन मिल जाती है बाजार की छोटी दुकानो को जम्हाई दिलाती है कूरियर की सेवा मध्यमवर्ग को आज भाती है

गरीब जनता ही अब छोटी दुकानो पे आती है सिले सिलाए कपड़ों की दुकान आज ये छाती है 

खेती में ट्रैक्टर की कमाई किसान को खाती है बिहारी मजदूरों की लाइन चौराहों पर पाती है पार्कों में महिलाओं की टोली बैठी गीत गाती है घंटों टीवी देखने की चाहत बच्चों को भरमाती है

बदल रहा शहर और गांव कंपकंपी सी आती है


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202

कैसे जांचें

कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या  सिस्टम खस्ता है ॥ 

सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ 

जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को 

मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ 

जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से 

कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ 

आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो 

कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ 

मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था 

अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ 

जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये 

इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥


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201

आज के राज में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढती जा रही 

राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो(एनसीआरबी) ये हमको बता रही

दो हजार चोदा में यह अपराध दर 52.5 प्रति लाख दिखा रही । 

2021 तक बढ़ कर 64.5 प्रति लाख पर यह दर जा रही । 

2021 तक, दैनिक बलात्कार की संख्या भी बताई देखो

यह संख्या प्रतिदिन 90 बलात्कार से ऊपर है दिखाई देखो 

2017 में अपराध के 315215 से अधिक संख्य जताई देखो 

2022 में यह बढ़कर 365300 से अधिक पहुंचाई देखो


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200


ये कमरसियेलाइजेशन देखो तेज रफ़्तार से आया

पुराने की सड़ांध ने आज नई सड़ांध से हाथ मिलाया

पुराने कबीलाई रिश्ते नाते आज भी हम पे हावी देखो

नैतिकता को पढने बिठाया मद मस्त पीढ़ी भावी देखो

ऑनर किल्लिंग की चारों तरफ पड़ रही काली छाया ||

फ्री लौंस यौनिक सम्बन्ध आज इस समाज में छाये रहे

लीलो चमन के प्यार को ये अँधा प्यार बतलाये रहे

आज यहाँ तो काल वहां बस घुमंतू जीवन अपनाया ||

पैसा पैसा और साथ में बदनाम मुन्नी यहाँ मशहूर हुयी

दो दो पैसे को मोहताज भुखमरी यहाँ का दस्तूर हुयी

शीला को बीच बाजार में है अधनंगी करके नचवाया ||

दोनों सड़ांध  के मेल से अधखबड़ा  इन्सान बना दिया

सिविक समाज सभ्य समाज सपना कहके भका दिया

रणबीर देख के सड़ांध मानव बहुत ज्यादा घबराया ||


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199

कुछ नए बन रहे  कुछ पुराने बने

हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने

किस तरफ से चली गोलियां क्या पता

किन्तु हर बार हम ही निशाने बने

था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया

हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया 

दिया जिसकी खातिर था हमने लहू

वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया


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198

मारें जाओ धोक पत्थरों की गरीबी दूर नहीं होवे

नाबराबरी  और बढ़ेगी किसान जोर जोर से रोवे

शिक्षा और स्वास्थ्य का भार अपनी जेब से ढोवे

सरहद ऊपर जवान फौजी ज्यान यो अपनी खोवै


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197

पता है सामने वाला बहुत अत्याचारी है

पूरी दुनिया में लूट की ये कमाई भारी है

अभी संकट के दिन और बढ़ेंगे दुनिया में

फिर भी संघर्ष की ये जंग जारी हमारी है


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196

हमारे शरीरों पर कपड़े 

कम से कमतर होते जा रहे हैं 

फिर चाहे कोई बिना कपड़े 

नंगा घूम रहा है तो हमारी बला से 

एटम बम है हमारे पास 

मिसाइल है दूर मार की 

अच्छी खासी फौज है हमारे पास

फिर चाहे सामाजिक असुरक्षा बढ़ती है तो 

हमारी बला से 

 पांच सितारा अस्पताल हैं 

सुहाने भारत देश में 

मैडिकल टूरिज्म फल फूल रहा है 

फिर चाहे लोग बिना इलाज के मरते हैं 

तो मरें 

प्लेग फैलता है तो फैले 

एडस दनदनाता है तो दनदनाए 

वेश्यावृत्ति बढ़ती है तो बड़े 

हमारी बला से 

 आर्थिक स्तर पर गोवा के बाद है 

हरियाणा 

' सेक  बिछाई जा रही है तेजी से 

फिर चाहे लिंगानुपात में सबसे 

नीचे है तो क्या 

हमारी बला से 

कुछ हथियार और हों 

कुछ पैसा और हो 

गौ रक्षा हमारा धर्म है 

फिर शायद दलितों के घर जलाएं 

 जाते हैं तो क्या 

मनुष्य मरते हैं तो मरते रहे 

हमारी बला से हम 

2020 तक दुनिया की 

महाशक्ति बन सकते हैं 

विकास की कीमत तो अदा 

करनी ही पड़ेगी 

ऑडियोलोजी का जमाना गया 

क्वालिटी जीवन का जमाना आया है

 हमने तरक्की की है किस कीमत पर 

हमारी बला से

कुछ साल पहले की रचना




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195

आज बाजार व्यवस्था की 

चारों तरफ गूंज बताते हैं 

हीरो विलेन और विलेन ये

हीरो कैसे यह बन जाते हैं 

एंटी हीरो एंग्री हीरो का 

जमाना खत्म हुआ जताते हैं 

अब तो हीरो विलेन बन गया 

ऐसा फिल्मी सीरियल दिखाते हैं 

कल तक जो राम थे यहां 

रावण बनकर इतराते हैं 

भीतर  से रावण बन गए 

मुखौटा राम का लगाते हैं 

हम भी रावण की कर पूजा 

दिवाली हर साल मनाते हैं।


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194


अब  सीख  लिया  तुमसे  मैंने नया तराना सीख लिया 

औरों के कन्धों पर रख के बन्दूक चलाना सीख लिया 

सच को झूठ झूठ को सच  तुरंत  बनाना सीख लिया 

अपनी ही तस्वीर से मैंने तो ऑंखें  चुराना सीख लिया 

अब  सीख  लिया  तुमसे  मैंने नया तराना सीख लिया  ||

पैसे के दम पे दुनिया में अब इठलाना सीख लिया 

धर्म के नाम पर जनता को खूब लड़ना सीख लिया 

अब  सीख  लिया  तुमसे  मैंने नया तराना सीख लिया  ||

भूल कर गाम अपना झूठे सपने सजाना सीख लिया 

जीणा है तो भूलो अपने को नया फ़साना सीख लिया 

अब  सीख  लिया  तुमसे  मैंने नया तराना सीख लिया  ||

सब कुछ दांव पर लगाकर पैसा कमाना सीख लिया 

जैसा मौसम हो मैंने वैसा बजा बजाना  सीख  लिया  

अब सीख लिया तुमसे  मैंने नया तराना सीख लिया ||


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193


शराब नहीं पीते तो क्यों इस संसार में आए तुम।।

 तुमने छेड़छाड़ भी न की तो क्यों न  पछताए तुम ।।

मारो खाओ हाथ ना आओ जीवन का दर्शन यही

 इस दस्तूर को दोस्त मेरे क्यों ना निभा पाए तुम।।

चोरी जारी नहीं करना सीखा तो क्या खाक जवानी 

जेल की सजा नहीं काटी ना शाहिद भी कहलाए  तुम।।

दो-तीन लड़कियां नहीं भकाई रहे कोरे के कोरे क्यों 

समय से पीछे क्यों रहे ना अखबारों में ही छाए तुम।। 

एचआईवी एडस से क्यों वंचित रहे घूम रहे तुम

संवेदनशील मानव को फिरते  गले लगाए तुम।।

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192

AGLA PICHHLA


अगला पिछला और वर्तमान 

ना इस जन्म में झूठ बोला 

ना कभी दुकान पे कम तोला

फिर भी भगवान नाराज हुए 

हार्ट अटैक मुश्किल इलाज हुए 

मैंने सोचा मुझे क्यों कष्ट मिला 

मिला बताया पिछले का सिला 

वर्तमान का कब होगा हिस्साब 

अगले में मिलेगा इसका जवाब 

पिछला ना कभी समझ आया 

ना अगले बारे ही जान पाया 

आज की बाबत नहीं बताते वो 

अगले पिछले में फँसाते हैं वो 

दम मारो दम मिट जाएँ गम

देवी देवता हमारे इनके हैं हम 

सवाल उठाने वाले कौन हो तम ?



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191


मेरा कस्सूर

मेरा कसूर

हमने दोनो ने मिलकर सोचा

जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे

बहुत सुन्दर सपने संजोये थे

प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा

क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया

यह सब मालूम था हमको पर

प्यार की राहों पर बढ़ते गए

मेरे परिवार वाले खुश नहीं थे

क्यों मुझे पता नहीं चला है

न तो मैंने एक गोत्र में की है

न ही एक गाँव में शादी मेरी

न ही दूसरी जात में की मैंने

तो भी सब के मुंह आज तक

फुले हुए हैं हम दोनों से देखो

प्यार किया समझा फिर शादी

ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं

शायद मन पसंद गुलाम नहीं

मिल सकी जो रोजाना उनके

पैर छूती पैर की जूती बनकर

सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती

दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना

प्यार का खुमार काम हुआ अब

जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी

मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब

क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के

रहने के लायक बन पाया यहाँ \

चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे

मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो

वो सुबह कभी तो आयेगी की

इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे

झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी

नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही

जिद हमारी शायद यही है कसूर


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190

जिंदगी से महज मशीन बनी देखी जा सकती है औरत 

घर के अंदर और बाहर भी दबती देखी जा सकती है औरत 

विज्ञान ने बहुत कुछ दिया खुले हाथ है जमाने को भारत में हर रोज ही मरती देखी जा सकती है औरत 

गाड़ी के दो पहिए कहते औरत और मर्द दुनिया के दोनों को ही ढोती रहती देखी जा सकती है औरत दोनों ही सजाते हैं महल मगर जब ढह जाता है 

तब निशाना सिर्फ ये बनती देखी जा सकती है औरत 

कोई बदलाव नहीं मुमकिन एक पहिया की गाड़ी से 

चीख चीख कर क्यों कहती देखी जा सकती है औरत 

जमाना भी बहरा हो गया कभी सुनता ही नहीं है सुनाते सुनाते ही बस थकती देखी जा सकती है औरत 

जब भी समाज बदला है वह औरत की बदौलत ही पता नहीं क्यों पीछे रहती देखी जा सकती है औरत

मर्द का करिश्मा देखो औरत है औरत की दुश्मन सास बहू में ये बंटती देखी जा सकती है औरत 

भाग्य कभी तो बदलेगा इसी उम्मीद पर जीती है ता उमर भगवान को पूकती देखी जा सकती है औरत


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189

कैसे जांचें

कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या  सिस्टम खस्ता है ॥ 

सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ 

जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को 

मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ 

जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से 

कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ 

आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो 

कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ 

मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था 

अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ 

जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये 

इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥



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188

एक घटना को दिमाग ने झकझोर दिया 

गाँव के ही दो लूंगाडों ने मुझे अँधेरे में जब घेर लिया,

अपनी हवस मिटाकर मेरे जीवन में तो अंधेर किया। 

किसको बताऊँ दुःख अपना कौन सुनेगा मेरी बात,

दबंग घरों के दीपक वे तो भला मेरी क्या औकात ।

गाँव के किसी पंचायती ने नहीं सुनी मेरी अरदास, 

गुर्गे हैं दोनों ये लूँगाडे गाँव के  पंचायतियों के ख़ास।

कहते घूमें मिट्टी डालो गाँव की इज़्ज़त उछल रही,

एक हाथ कहाँ ताली बजे लड़की भी फिसल रही।

वहशी छा गए चारों तरफ बचे आज इंसान कहाँ,

भोग की वस्तु मानी औरत अलग है पहचान कहाँ।


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187

चोर जार नशेबाज जुआरी 

चोर जार नशेबाज जुआरी बढ़ते जावैं समाज मैं ॥ 

इनकी लिखूं कहानी सुणो अपणे ही अंदाज मैं ॥ 

पहले बात करू चोर की हाथ सफाई दिखावैं ये 

घने  चोर तो  ताला तोड़ लें दुष्ट कमाँ कै नहीं खावैं ये 

घिटी मैं गूंठा  देकै मारदें  घर साफ़ कर ले ज्यावै ये 

राह चलती महिला की चेन दो मिनट मैं झपटावें ये 

चोर बी के करैं और कोए नौकरी ना इस राज मैं ॥ 

जार आदमी दुष्ट घना पर नारी पै नीत  धरै सै रै 

कुकर्म करता हाँडै वो उसका पेट नहीं भरै सै रै 

पकड़या जा जब जूत लगैं जूतां तैं बस डरै सै रै 

नालियां मैं मुंह मारता एक दिन बेमौत मरै सै रै 

पहर धोले लत्ते यो घूमै दुनिया  हवाई जहाज मैं ॥ 

नशे बाज का के कहना रोज नशा करना उसनै 

तर तर तर जुबान चलै किसे तैं ना डरना उसनै 

सुल्फा गान्झा भांग धतूरा पी डूब मरना उसनै 

अगल बगल मैं झाँकै फेर पाप घड़ा भरना उसनै 

नशा उतर ज्या तो कहै सुधरना चाहूँ कर इलाज मैं ॥ 

चोर जार नशेबाज जुआरी सब तैं मानस बताये 

औढ़न पहरण नहान खान तैं ये बालक तरसाये 

घाघरे टूम तक ना बक्शी चोरी कर नशे चढ़ाये 

गाम मैं आतंक फैलाया सरीफ मानस घबराये 

रणबीर समझाया चाहवै समाज सुधर की खाज मैं 


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186

कार्बन से पैदा हुए और मर कर कार्बन बन जाना  है ।

अंतहीन है यह कहानी जिसका कोई छोर नहीं है।


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185

एक लड़की ने साहस किया और आवाज उठाई 

बदतमीज गुरु जी ने अपनी बदनीयत दिखाई 

कुछ लडकीयों ने साहस किया और भीड़ गयी 

गुरु जी की सरेआम की सबने मिल कर पिटाई 

केस दर्ज होने जा रहा था उस गुरु के खिलाफ 

लड़की के बाप ने बीच में आकर के  खेल रचाई 

पैसे लेकर केस बिगड़ दिया गुरु छुट गया साफ़

यह कहानी नही हकीकत है आप तक पहुंचाई 

कहाँ जा रहे हैं हम समझ नहीं पा रहा दोस्तों 

एक घटना नहीं है ऐसी घटनाओं की बाढ़ आयी


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184

बुड्ढाबुड्ढीकी कहानी

एक बुड्ढाआया

साथ में एक  बुढिया लाया

होटल में जाकर वेटर को बुलाया

दोनों ने अपना अपना आर्डर मंगवाया

पहले बुड्ढ़े ने खाया

बुढिया ने बिल चुकाया 

फिर बुढिया ने खाया

बुड्ढ़े ने बिल चुकाया 

ये देख वेटर का सिर चकरायावो उनके पास आया और बोला

जब तुम दोनों में इतना प्यार है

तो खाना एक साथ क्यूँ नहीं खाया?

इस पर बुड्ढ़े ने फरमाया

"जानी तेरा सवाल तो नेक है

पर हमारे पास दांतों का सेट सिर्फ एक है !!!!


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183


पुराना दौर 

तेरी कलम तो चली यही बहुत है मेरे लिए

तकरार अभी तो टली यही बहुत है मेरे लिए

तेरे अंदर का गुस्सा बरकरार है अभी भी

मेरी एक ना चली यही बहुत है मेरे लिए

मुझे मालूम है तेरा इंसां मर नहीं सकता

बात है कितनी भली यही बहुत है मेरे लिए

दो पल का साथ नहीं ये मालूम हम तुमको

सुबह हुई सांझ ढली यही बहुत है मेरे लिए 

मेरी चाहत मेरी इबादत है यही चाहत तुमको

फिर भी तुमको खली यही बहुत है मेरे लिए

कमी लाख सही आखिर इंसां हैं खुदा तो नहीं

मुरझाये ना खिलती कली यही बहुत है मेरे लिए

हमें मुआफ़ करो या न करो अखितयार तुम्हारे है

तुम्हारी आँखों में नमी यही बहुत है मेरे लिए

कुछ तो है जो बांधे है हमको आज तलक भी

आबाद रहे तेरी गली यही बहुत है मेरे लिए

पत्थर दिल माँ से बना ये है मालूम मुझको

पिंघली मोम की डली यही बहुत है मेरे लिए

29-08-1992


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182

सहारे मत बना ए दिल सहारे रूठ जाते हैं 

ना किस्मत पेभरोसा कर सितारे टूट जाते हैं

साहिल पर आके ना समझो कि पार आ गए 

जरा सी लहर आयी तो किनारे छूट जाते हैं 

राज दरबारों में न जाना वहां पे क्या रखा है

पेट की खातिर ही तो वे उनके झूठ गाते हैं 

सच कहना अगर बगावत तो हम भी बागी

ज्यादा हवा भरने पर ये गुब्बारे फ़ूट जाते हैं

भगत सिंह के देश का फिर से देखा सपना

आखिरकार लूट के ये शिकारे डूब जाते हैं 

अमीर गरीब की खाई बढ़ा विकास करेंगे वो

एक न एक दिन झूठे जनता के बूट खाते हैं।


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181

बेचैनी जनता की बढ़ती जा रही 

समझौता संघर्ष करती आ रही 

डायलैक्टिस इसी को कहते हैं 

आज बेचैनी दुनिया पर छा रही 

डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है 

जनता ने कुछ अधिकार पाया है 

कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो 

इसके खिलाफ विरोध जताया है 

उठती बैठती जीवण बिता रही है 

कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है 

लूट के हथियार बदल लिए जाते हैं 

जनता ने एकता हथियार बनाया है

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180

डेमोक्रेसी ने आगे कदम बढाया है 

जनता ने कुछ अधिकार पाया है 

कितना ही भ्रष्टाचार बढ़ गया हो 

इसके खिलाफ विरोध जताया है 

उठती बैठती जेवण बिता रही है 

कई बार घन घोर अँधेरा हटाया है 

लूट के हथियार बादल लिए जाते 

जनता ने एकता हथियार बनाया है

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179

मंदी के दौर में भी एक नया दौर लायेंगे

आतंक का अंधेरा ये मिलकर के मिटायेंगे 

नंगेपन के नाम पर नंगापन छाता जा रहा है इंसानियत बाजार में हरेक खोता जा रहा है 

परचम इंसानियत का हम फिर फैरायेंगे 

भीमकाय बाजार फिर संरक्षण मांग रहा है 

छिपा अपनी कमजोरी यह झूठ छांग रहा है 

जनता करे कंट्रोल बाजार ऐसा संसार रचायेंगे 

हाशिए पर फेंके गए जो उनका जमाना आएगा अपना हक पाने खातिर नागरिक समाज बनाएगा बड़े कदम नए साल में बस आगे बढ़ते जाएंगे नौजवानों का प्यार यहां फांसी चढ़ाया जाता है जात-पात गोतनात क्यों अपने रंग दिखाता है 

नए साल की आशा से निराशा से लड़ पायेंगे


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178

आर्थिक मंदी के दौर ने सताया हमको

जेब ढीली करदी इसने रुलाया हमको

बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए

आ ई टी के कई योधा इसने मार गिराए

सरकारी कंट्रोल बता न था जिनको

उसी से भीख मंगनी पड़ रही उनको

पड़ सकता दिल पेय बुरा असर बताया

चिकत्सकों ने हाल मे ऐसा भी फ़रमाया

दिल के दौरे से आज कैसे बचा जाएगा

पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहोंचायेगा

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177

1986 के दौर की रचना 

अब मैंने रटना छोड़ दिया है 

मैं कुछ कुछ सोचने लगा हूं 

भगवान के भक्तों का असली चेहरा 

थोड़ा पहचान में आने लगा है 

मेरे दिमाग में 

भगवान के वजूद पर भी एक 

सवालिया निशान लग गया है; 

वह होता तो सरसों के पीले फूल 

उगाने की 

एक सच्चे प्यार की कीमत 

उन्मादी गोली या त्रिशूल का निशाना 

न होती। 

कुछ और सोचना और देखना शुरु किया 

यूं लगा भगवान है इंसान का बनाया हुआ 

तभी तो वह अपने मालिकों की जेल में 

कैद है

आज तक वह जनता के दुख-दर्द 

बढ़ाने तो बाहर निकला है 

कभी कम करने नहीं 

शायद यही कर सकता है 'वह' 

आगे कुछ नजर दौड़ आता हूं तो 

पाता हूं कि आज भी 

कुछ बहादुर लोग सरसों के पीले फूल 

उगाने की जी तोड़ कोशिशें कर रहे हैं 

अपने खून से खेत को सींच रहे हैं 

मुझे इंसान की इंसानियत पर 

फिर भरोसा होने लगा है 

और यह विश्वास बनता जा रहा है 

सरसों के फूल भगवान नहीं लगा पाएगा 

यह बहादुर इंसान ही फिर लगाएगा 

और यकीं है वह दिन अवश्य आएगा 

जब 

सरसों के पीले फूल फिर से उगेंगे 

शशि पुन्नू के बीच की दीवारें 

ढह जाएंगी 

चारों तरफ सरसों के फूल लहलाने लगेंगे


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176

आर्थिक मंदी के दौर ने सताया हमको

जेब ढीली करदी इसने रुलाया हमको

बहुत सी जगह इसने करतब दिखाए

आ ई टी के कई योधा इसने मार गिराए

सरकारी कंट्रोल बता न था जिनको

उसी से भीख मंगनी पड़ रही उनको

पड़ सकता दिल पेय बुरा असर बताया

चिकत्सकों ने हाल मे ऐसा भी फ़रमाया

दिल के दौरे से आज कैसे बचा जाएगा

पूंजीवादी मंदी का दौर कहाँ पहोंचायेगा


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175

सच के रास्ते पर चलना सीख लो

त्याग क़ि आग में जलना सीख लो

आगे बढ़ते रहो इस अंधी तूफान में

और अंगारों पर उतरना सीख लो

भगवान क़ि दया ने यहाँ पहुँचाया

गिर गए खुद ही संभालना सीख लो

रणबीर अनुभव चाहिए  प्रकाश  का

आज अँधेरे से गुजरना सीख लो

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174

पहले वाले गाँव नहीं बीरा पहले वाले बीर नहीं

रसायनिक हथियार आये पहले क़ि शमशीर नहीं

वक्त के साथ बदलती इस दुनिया का दस्तूर यही

कबीर रैदास सूफी संतों ने घुमा फिर ये बात कही

रोहतक जो छप्पन में था बची वाह तस्वीर नहीं

खाना पीना बादल गया अब ज्वर बाजरे बचे कहाँ

हरयाणा नंबर वन  हुआ डिस्को डांस में फ़सा जहाँ 

बथुआ राबड़ी खिचड़ी गौजी बची खाने में खीर नहीं 

कडुआ सच है बदलाव का इसे समझना जरूरी देखो 

देखनी होगी दिशा इसकी इसको  परखना जरूरी देखो 

बदलाव कई तरह के होते कुछ को माने जमीर नहीं 

जनता हक़ में बदलाव के ये नारे बहोत  उछाले  हैं 

जनता बहकावे में आई मुंह से ये दूर हुए निवाले हैं 

पैनी नजर ये जनता क़ि बणी प्रहरी रणबीर नहीं


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173

हर एक कदम पर हादसा होना सोचो तो यारो

हमारे सिस्टम में क्यों है रोना सोचो तो यारो

जो कुछ कमाया हमने छीन लिया चालाकी से

किसी ने नहीं समझाया ये सब खेल बेबाकी  से

कहते  तुम्हारी क़िस्मत  में  खोना सोचो तो यारो 

क़िस्मत  का खेल मान कर हमने इसको ढ़ोया  

अपने हाथों से खुद हमने बीज कीकर का बोया

क़िस्मत क़ि मार को क्यों ढ़ोना सोचो तो यारो 

दिलो दिमाग पर मेरे तो यही सब तो छाया है 

आज  जो कुछ भी हूँ मैं मेरे नसीब ने बनाया है 

औरों  के खेलने का ये खिलौना  सोचो तो यारो

बात समझ में आ गयी क़िस्मत का खेल नहीं

बिना इन्सां के चल सकती यह देखो रेल नहीं

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172


महम चौबीसी बदल रही देखो

नहीं पुराणी चौबीसी वही देखो

महम परंपरागत खेती में मशहूर

आज परंपरा छोड़ने को मजबूर

गेहूं जवार  बाजरा उगाते रहे धान

गरीब अमीर सब यहाँ के किसान 

फल व  सब्जी की खेती आई देखो 

अपार संभावनाएं गयी बताई देखो

परंपरागत खेती ख़तम होती जा रही

परासंगिकता अपनी है खोती जा रही

भूजल  स्तर कहीं पर तो है बढ़ रहा

कहीं पर भूजल स्तर ये घट  रहा  

बेर के बाग़ महम में दिखाई ना देएँगे

किन्नू   की खेती ये किस्सान भाई लेंगे  

तीतरी गाँव टमाटर बहोत उगाता है

अमरुद के बाग़ विभाग लगवाता है

परंपरागत खेती क्यों छोड़ता किसा न

रूढ़िवादी  सब  कहाँ गए  फरमान --

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171

कई बार सोचता हूँ तो बस

सोचता ही रह जाता हूँ मैं

सड़क पर रहने वाले बचों की

बेमिशाल हिम्मत संकट का  दौर

फिर भी हंसी के पल चुरा लेना

इन बचों से ही सीखे कोई

उनका साहस उनकी जीवटता

देखकर अचरज होता है  मुझे

कई बार सोचता हूँ तो बस

सोचता ही रह जाता हूँ मैं


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170

तुममें  शिकश्त और जिल्लत का अहसास बाकी

पता हमें तुममें  अभी नफरत का अहसास बाकी

कितना ही दिखावा करो अपनी सादगी का तुम

खूब तुममें देखा है  हिमाकत का अहसास बाकी

मुहब्बत से कहते हैं दौलत का कोई वास्ता नहीं

तुम्हारे दिल में अपनी दौलत का अहसास बाकी

कितना ही अपमान करो तुम बार बार ये हमारा

रहेगा हममें फिर भी कयामत का अहसास बाकी

हमारी शराफत को करदो बिल्कुल तार तार तुम 

रणबीर को रहेगा ही शराफत का अहसास बाकी


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169

हमारी बर्बादी 

हमें बर्बाद करके उनको पता नहीं क्या मिल गया 

ईमानदारी का दामन थामा हमारा निवाला छिन गया 

आदमी से आदमी की मोहब्बत कहाँ काफूर हो गयी 

मेहनत हमने की मगर पता नहीं कहाँ ये खो गयी 

दर्द हद से गुजर गया है सीना हमारा तो छिल गया 

मोहब्बत के गीत गाएँ कैसे चिंता हमें बीमारी की 

यकीं कौन करेगा इस पर मोहब्ब्त गरीब भिखारी की 

देख के उनके ढंग निराले मुंह हमारा है सिल गया 

मरने वाले हथियार लिए बैठे साधा निशाना हम पर 

मार न पाना मजबूरी उनकी टिका जमाना हम पर 

हमारे वजूद का तस्सवुर कीचड में गुलाब खिल गया 

तूफ़ान जो उठा समुन्द्र में अब नहीं  टाला जायेगा 

पड़ाव अब ये हमारा मंजिल पर  ही डाला जायेगा 

भगवन का आसरा किया पर भरोसा सारा हिल गया 

आर पार की जंग शुरू करना होगा स्वीकार हमें 

फूंक फूंक के चलना है रहना होगा होशियार हमें 

देख देख जुल्म उनके कलेजा हमारा छिल गया 

मानवता का औढ़ा मुखोटा लिया धर्म का सहारा है 

जात पात का जहर फैलाया निचौड़ा खून हमारा है 

रणबीर आज रो उठा हो छलनी उसका दिल गया

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168


जिन्दगी का सफ़र

स्कूल से आगे बढ़कर फिर

कालेज में जाना होगा इसके

सपने बहोत बार देखे थे मैंने

कोनसे कालेज में दाखिला हो

यह भी कई बार सोचा था मैंने

एक साल पहले सोचना शुरू किया

पहले दिन का पहनावा क्या होगा

हेयर स्टायल पर भी नजर डाली थी

क्या सायकिल पर ही कालेज जाना होगा

या फिर स्कूटर का जुगाड़ करेंगे

घर की हालत जुगाड़ की भी नहीं है

इसी उधेड़ बुन में गुजर जाता है

पूरा का पूरा दिन मेरा जुगाड़ पर

आखिर एक दिन पाँच सात लोग आये

आव भगत हुई मेरे से भी पूछा

कोनसी क्लास पास की है बेटी

दूसरा सवाल था कितने नंबर आये

नंबर बताये मैंने धीमे से ही सही

नजरें मुझे घूरती सी महसूस हुई

जैसे बकरे को घूरती हैं मारने से पहले

हर कसाई की नजरें और फिर हलाल

कर दिया जाता है बेचारा बकरा

मुझे क्या पता था कि मेरा भी

हलाल होने का वक्त आ गया है

हाँ एक महीने बाद ही मेरी शादी

कर दी गयी एक बेरोजगार के साथ

दो बेरोजगारों कि दुनिया के सपने

मैं नहीं देख पाई क्योंकि अँधेरे के

सिवाय कुछ दिखाई नहीं दी रहा था

भूखे घर कि आ गयी हम क्या करेँ ?

ये दिन देखने के लिए क्या छोरे

को जन्म दिया था ?

प्यार मोहबत बेहतर जिन्दगी

ये सब अतीत कि बातें थी

घर भी तंग सा दो ही कमरे

साथ में भैंस व बछिया का भी

सहवास रहता था चौबीस घंटे

समझ सकता है कोई भी कि

दो कमरों में छः सात सदस्यों के

परिवार का कैसे गुजारा होता है !

फुर्सत ही नहीं होती एक दूसरे के लिए

चोरों कि तरह मुलाकातें होती हैं हमारी

बस जीवन घिसट रहा है हमारा

एक दिन सोचा इस नरक से कैसे

छुटकारा मिले ?

मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत कहाँ

घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत और तान्ने

यही तो है जिन्दगी हमारी

हमारे जैसे करोड़ों युवक युवतियां हैं

कभी कभी जीवन लीला को ख़त्म

कर लेने का मन बनता है फिर

ख्याल आता है इससे क्या होगा

दो चार दिन का रोना धोना फिर खत्म

यह सिलसिला यूंही चलता रहेगा आगे

इस अँधेरे को कैसे ख़त्म किया जाये ?

कैसे रौशनी कि किरण हम तक भी

पहुँच सके यही तो यक्ष प्रश्न है

बहुत बार सोचा कई बार सोचा है

मगर रास्ता नजर नहीं आता है हमें

बस इसी कशमोकश में जीवन

किसी तरह गुजर रहा है हमारा

जीवन सरक रहा है हमारा !

पूजा पाठ बालाजी कि सेवा सब

कर के देख लिया मगर सब मन की

शांति की बात करते हैं कोई भी

रोटी और रोजगार की बात नहीं करता

आप ही बताओ क्या करेँ हम ?

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167

पिछले चार-पांच साल से 

मौसम का मिजाज बदलता 

जा रहा है 

इसका सबसे अधिक असर

किसानों पर पड़ रहा है 

सूखे के लंबे दौर 

लगातार बाढ़ कम होती 

यह अनियमित वर्षा 

भयानक ओलावृष्टि होना 

टिड्डीयों का अचानक अमला 

किसानों की कमर तोड़ दी है 

हालांकि सामुदायिक प्रयास 

रास्ता दिखा सकते हैं 

मगर

उनकी रक्षा के लिए सरकारी

समर्थन और संरक्षण बहुत

जरूरी है।

इससे किसान बचेगा 

तो उद्योग बचेगा 

उद्योग बचेगा तो 

भारत महान बचेगा 

जय हिंद

2008

********

166

दोस्त

पास रहकर भी दूर रहना कोई सीखे तुमसे 

बिना कहे बहुत कुछ कहना कोई सीखे तुमसे 

लालच व भोग का बाजार जकड़े हुए हैं हमें

 बाजारी दुनिया से कहना कोई सीखे तुमसे

 हर ईंट के नीचे आज बैठा बिच्छु दिखाई देता है 

बिच्छूओं के दंश न सहना कोई सीखे तुमसे

माया जाल फैला है यहां झूठ और मक्कारी का 

इस जाल की आग में न दहना कोई सीखे तुमसे 

सोने पर यह रांग का पानी  चढ़ा कर बेचते देखो 

कैसे पहचाने असली गहना कोई सीखे तुमसे 

वैश्वीकरण के तूफान में सब कुछ वह चला है 

इस तेज तूफान में न बहना कोई सीखे तुमसे


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165

रांची के रास्ते में काफी बातें हुई 

अलग-अलग ढंग से 

सांग पर भी बातचीत हुई 

गांव में काम करने की 

रणनीति क्या हो और 

कार्य नीति क्या हो? 

इस पर भी काफी बातचीत हुई 

पानीपत एक बार फिर चर्चा में आया 

Literacy के बाद जो मांस कांटेक्ट बने 

उन्हें कैसे कंसोलिडेट करें हम 

नहीं तय कर पाए 

अब आगे कैसे बढ़ें ?

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164

दूसरी दुनिया संभव है

सड़कों पर मजदूर आए थे 

दूर-दूर से पूरे भारत देश के 

साथ ही बुद्धिजीवी आए थे 

कोई इंजीनियर कोई डॉक्टर 

कोई कोई समाजशास्त्री 

'सब रंगों का समावेश, भारत देश हमारा देश' 

'बिना महिला सहयोग के हमारा विकास अधूरा है'

' साक्षरता हम वंचितों का एक  पैना सा हथियार है'

 इन सब नारों की गूंज 

सुनाई दी रांची शहर में 

एक नई दुनिया की बात 

कई तरह से की गई वहां 

जहां अमीर गरीब की

 जात गोत और नात की 

ना बराबरी लिंगानुपात की 

जहां उच्च और नीच की 

जहां ज्ञान के बंटवारे की 

जहां बीमारी के इलाज की

 असमानताएं खत्म हो जाए

 मानव मानव को

न चूसे जिस दुनिया में 

वह दुनिया संभव है 

हम सब की एकता के दम 

इसे लड़कर हासिल किया 

जा सकता है ।

लगता बड़ा आसान है 

मगर उतना ही मुश्किल 

काम है यह- कैसे 

अमीर ने जाल फैलाया 

परंपरा का इज्जत का 

प्राचीन संस्कृति का 

इस या उस मजहब का 

और बांट कर रख दिया 

हमको और आपको 

इस चाल को जिस दिन

 हम समझ गए तो 

फिर दूसरी दुनिया का

सपना हमारा जल्दी 

बहुत ही जल्दी 

पूरा होगा जरूर होगा।

रांची 

20.12.08

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163

अमरीका के बारे में क्या 

जानते हो ?

साफ़ सफाई है ऊंची इमारतें

बिजली मजाल की गुल हो जाये

काम करवाने का पैसा नहीं

देना पड़ता है

बहुत उन्नतिशील है 

पशूओं को गेहूं खिलाता है 

फिर पशुओं को खुद खाता है 

छोटी मछलियों को पालता है 

फिर बड़ी मछलियों को खिलाता है

इससे भी जब काम नहीं चलता तो

आतंक फैलाता है या फिर

 फैलवाता है 

युद्ध करता है युद्ध करवाता है 

हथियार दोनों को बेचता है 

अमरीका 

जैसे अब पाकिस्तान और हिंदुस्तान

दोनों को बेच रहा है 

आतंक के बहाने रोटी नहीं 

अपने परोंठे सेक रहा है 

अब पाकिस्तान हिंदुस्तान 

लड़ें या न लड़ें उसने तो अपने 

हथियारों का सौदा कर ही लिया

इन चालों को समझना है मुश्किल 

दिमाग हो तो समझें चाल हम

इसे तो गिरवी रख दिया हमने

अपने भगवान या खुदा के पास

वही सोचते हैं हमारे लिए 

सोचना है तो अपने तौर पर 

सोचना ही होगा एक दिन 

उस दिन अमरीका के बारे 

बहुत कुछ जान चुके होंगे 

हम ।

2008


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162


अलग-अलग रंगों का ये

हिंदुस्तान हमारा है 

हिंदू मुस्लिम सिख इसाई 

अनोखा भाईचारा है 

मजहबी लोग लड़ाते हमको 

भाईचारे को ललकारा है 

पिसता गरीब बेचारा है 

आतंक घृणा नहीं चाहिए 

बच्चा बच्चा पुकारा है 

लिंगभेद पर शरमाओ तो 

मानव बना हत्यारा है 

आदिवासी सब उजाड़ दिए 

कैसा विकास तुम्हारा है 

युवक-युवती भटका दिए हैं 

मुश्किल हुआ गुजारा है 

महिला का जीना मुश्किल 

बाजार में इसे उतारा है 

बच्चों की कुछ ना पूछो 

पूरा जीवन उधारा है 

कुपोषण ने मारा है 

एक तरफ शाइनिंग है 

दूसरी तरफ अंधियारा है 

दो दुनिया एक ही जगह 

कैसा अजब नजारा है।

20.12.2008

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161

हमारे देश की सेहत की चर्चा 

पूरी दुनिया में हो रही है 

दूसरे देशों के लोग यहां पर 

इलाज करवाने आ रहे हैं 

अपोलो सपोले पांच सितारा अस्पतालों का बोलबाला है मेडिकल टूरिज्म का कमाल है जनता इलाज के लिए रो रही है विश्व बैंक का हरेक देशवासी पर

तीस हजार सात सौ छिहत्तर का

खर्च बताया जा रहा है आज 

 प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च भारत में  बहुत कम किया जा रहा

 फिर भी सेहत वान होने का 

हर रोज हम भरते रहते दम 

कांगो जहां 10 साल से कोई सरकार नहीं बताई 

वहां से भी कम खर्च हमारा 

देश सरकार ढ़ो रहा है 

दूसरे विकसित देशों में भी 

सेहत पर 80% खर्च सरकार करती कहते हैं

भारत देश में बस 20% खर्च 

करे है सरकार हमारी 

अमीर तो पैसा फैंक करवाएं 

जहां चाहे वहां से उपचार 

गरीब क्या करे कहां जाए 

जब हो जाए वह बीमार?

21.12.2008


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160

याद कर जुलम तेरा आहें भरता है गरीब 

हर सांस के साथ संघर्ष करता है गरीब 

मौत एक ऐसी चीज है जिसे आना ही है 

काम की खिंचाई में रोज मारता है गरीब

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159

आंसूओं को पालकों पर लाया ना किजिए 

अपनी लूट की तहरीर सुनाया ना किजिए 

लोग मुट्ठी में नमक लिए फिरते हैं आज

अपने जख्म लुटेरों को दिखाया ना किजिए 

********

158

मजदूर और बारिश 

ए बारिश अभी जरा थम के बरस 

मेरा पेट भर जाए तो जम के बरस 

न बरसी तो भी बरसी तो भी मेरा 

निवाला तो खतरे में कैसे भी बरस 

फिर भी तमन्ना है कि बरस तो सही 

खेत खलिहान के लिए कैसे भी बरस

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157

संकट था खूब घर लेकिन हम खोए नहीं 

दर्द बहुत था दिल में लेकिन हम रोए नहीं 

साहब को क्यों फिक्र हो हमारी भूख का 

उनको क्या पता तीन दिन से सोए नहीं

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156

गरीबी का लंबा सफर कटता ही नहीं 

भूखे पेट कुछ भी अच्छा लगता ही नहीं 

कोई नहीं जो पूछे इस दर्दे दिल का हाल 

महज वादों से यह दिन चलता ही नहीं

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155


आज अपने हकों की खातिर लड़ती देखी जा सकती है औरत ।।

घर से बाहर निकल कर बढ़ती देखी जा सकती है औरत ।।

दबती पिसती रहती है फिर भी मासूमियत है बाक़ी उसकी 

अपने अपने घरों में आज पढ़ती देखी जा सकती है औरत।।

नई जंजीरें और बेड़ियां आज क्यों उसको डाली जा रही हैं 

फिर से अंगड़ाई लेकर के उठती देखी जा सकती है औरत।।

शैतान सभी चौकन्ने हो गए औरत की जरा सी हरकत पर 

उनकी छाती पर दिनों दिन चढ़ती देखी जा सकती है औरत।।

औरत को खिलौना मत समझो वह भी आखिर एक इंसान है 

डुबो कलम खूने जिगर में लिखती देखी जा सकती है औरत ।।

कितने रूप दिए औरत को असली इंसान का रूप छीनकर 

इंसानियत की खातिर अब लड़ती देखी जा सकती है औरत।।


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154


प्रदूषण और हम 

उम्र कम दिल्ली 6 साल

देश का दम तीन साल कम

बिहार 5 साल कम 

प्रदूषण फल फूल रहा 

मौत का झूला झूम रहा

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153

तरक्की 

हमने तरक्की की है   किस कीमत हमारी बला से 

ऊंची ऊंची इमारतें     फिर चाहे गरीबी बढे या    

पाश इलाकों में जहाँ   90 करोड़ के मकान 

5 या 10                   बरसात में टपकते रहें 

करोड़  लोग रहते हैं

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152

वे बचपन के दिन 

जब कंचों का और 

खत्ता खुलिया का खेल ही 

जिंदगी थी।

लाभ हानि के सवाल 

दूध में पानी का मिलाना 

फिर लाभ प्रतिशत बताना 

फ्रांस की क्रांति का तराना 

औरंगजेब के पतन का फसाना 

तोते की तरह रट लेना ही 

जिंदगी थी। 

रटने की प्रक्रिया ने सोचने की 

प्रक्रिया पर जादू किया 

सोचना शुरू ही नहीं हो पाया 

मैं खुश था मगर मेरे से ज्यादा 

वो खुश थे।

स्कूल के बाद कॉलेज में पहुंच जाना 

मेरे सनम फिल्म की ट्रेचडी पर रोना 

रुलाना इसको 

हकीकत मानकर मातम मनाना 

और फिर इस बात का गिला उठाना 

इतना भी नहीं मालूम था 

धत तेरे की।

और इस प्रकार अंधेरी में भटकता रहा

भगवान पर भरोसा किया मैंने 

इस उम्मीद को जिया मैने

कि कभी तो असली पड़ाव पर 

पहुंच जाऊंगा एक दिन। 

इसी बीच मैंने देखा कि 

हीर और रांझे के बीचों-बीच 

लीलो-चमन के दरमियान

शशि पन्नू के आमने-सामने 

नफरत और दहशत की 

इतनी ऊंची दीवार खड़ी कर दी गई कि 

वे एक दूसरे को देखने भर को 

तरस गए 

वो सर सरसों के पीले खेत 

उनमें उमड़ता वह अनोखा प्यार 

आज दूर कहीं 

हैवानियत के खूनी पंजों में जकड़ा 

बार बार चीख रहा है 

है कोई माई का लाल जो 

फिर से काले पड़े खेतों में 

सरसों के पीले पीले फूल  उगादे? 

लगता है आज 

उन खेतों में पीले फूल उगाना 

चमन का लीलो को बुलाना 

इतना आसान नहीं रह गया है 

क्योंकि आज इस सब की कीमत 

उन्माद से लबोलब बंदूक की गोली है 

मैं आसमान की ओर देखकर 

पुकार उठता हूं 

हे भगवान तू कहां है?

1993


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151

नई दुनिया - प्यार की दुनिया

नई दुनिया का सपना  हम दोनों ही देख रहे हैं।।

सोचा अपने अपने ढंग से कहते हुए झेंप रहे हैं।।

1

झेंप मिटी साथ चले सोचा जीवन सफल हो गया

अलग अलग जातें हमारी जिनका मतलब खो गया

ब्यां नहीं कर सकते सब हम पर उंगली टेक रहे हैं।।

2

प्रेम विवाह को समाज में देखा क्या दर्जा मिलता

खूंखार हो जाता है समाज देख कर ही दिल हिलता

बिना बात की बात में निकाल मीन मेख रहे हैं।।

3

तुम्हारी जिद प्यार का विरोध तो जिद हमारी भी है

प्यार को परवान चढ़ायेंगे इसमें इज्जत तुम्हारी भी है

जात के तवे पर देखो ठेकेदार रोटी सेंक रहे हैं।।

4

जातें अलग अलग हमारी मगर मानवता है भरपूर

जाति की सीमा मालूम है इसके बन्धन नहीं मंजूर

एक अपना सा घर बनाएं यही इरादे नेक रहे हैं।।


********

150

2008

स्कूल से आगे बढ़कर फिर

कॉलेज में जाना होगा 

इसके सपने 

बहुत बार देखे थे मैंने 

कौन से कॉलेज में दाखिला हो 

कई बार सोचा था मैंने 

यह भी 1 साल पहले सोचना शुरू किया 

पहले दिन का पहनावा क्या होगा ?हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी

क्या साइकिल पर ही मुझे 

कॉलेज जाना होगा हर रोज ?

या फिर स्कूटर का जुगाड़ करेंगे 

घर की हालत जुगाड़ की भी कहां

 इसी उधेड़बुन में गुजर जाता है 

पूरा का पूरा दिन मेरा जुगाड़ पर आखिर एक दिन पांच सात लोग आए आव भगत हुई मेरे से भी पूछा 

कौन सी क्लास पास की है बेटी

 दूसरा सवाल था कितने नंबर आए नंबर बताएं मैंने धीमे से ही सही 

नजरें मुझे घूरती सी महसूस हुई 

जैसे बकरे को घूरती हैं मारने से पहले हर कसाई की नजरें और फिर 

हलाल कर दिया जाता है बकरा 

मुझे क्या पता था कि मेरा भी 

हलाल होने का वक्त आ गया है

 और एक महीने बाद ही मेरी शादी

 कर दी गई एक और बेरोजगार के साथ 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने 

मैं नहीं देख पाई क्योंकि अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई नहीं दे रहा था भूखे घर की आ गई हम क्या करें ?

यह दिन देखने के लिए क्या छोरे को जन्म दिया था?

 प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी 

यह सब अतीत की बातें थी 

घर भी तंग सा दो ही कमरे 

साथ में भैंस व बछिया का भी 

सहवास रहता था 24 घंटे 

समझ सकता है कोई भी कि

 दो कमरों में 6 सदस्यों के

 परिवार का कैसे गुजारा होता है?फुर्सत ही नहीं है एक दूसरे 

के लिए !

चोरों की तरह मुलाकातें होती हैं 

अपने ही घर में 

बस जीवन के घिसट रहा है हमारा 

एक दिन सोचा इस नरक से कैसे छुटकारा मिले ?

मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत 

कहां ?

घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत

 और ताने!

 यही तो है जिंदगी हमारी 

हमारे जैसे करोड़ों युवक और 

युवतियां है भारत में 

कभी-कभी जीवन लीला को 

खत्म कर लेने का दिल करता है 

फिर ख्याल आता है 

इससे क्या होगा ?

इससे आगे नहीं सोच पाती !!


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149

बैंकों पर पैसा लाक 

निजी चिकित्सक हड़ताल पर 

जन साधारण एक्सप्रेस में लूट 

छह को फांसी दो को

उम्र कैद

मुंबई दहलाने की साजिश

नाकाम

पांच आतंकी गिरफ्तार

निजी डायनिंग रूम में 

मोहन को भोज देंगे

बुश 

पानीपत में कांग्रेस की

जवाब रैली

कचरी की चटनी खाएंगे

हमारे मेहमान


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148

आपात स्थिति से भी बदतर हालत बने

फासीवाद से हर रोज मुलाकात बने

और कोई चारा बचा नहीं लगता  यारो

 संभलो इससे पहले कि दिन रात बने

देखो फासीवाद से लड़ना आसान कहां

पहले समझो इसको फिर कोई बात बने

बोले विरोध में तो ई डी तत्काल ही आए

घर पर फिर से संकट के ये हालत बने


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147

गधे की तरह काम करवाया

हाथ में चालीस रूपया थमाया

पूरा दिन और इतने कम पैसे 

मजदूर ने मालिक से फरमाया

ठीक किया तुमने न्याय मांगा है

मैनेजर ने तुरत मैनेजर बुलवाया

पैसे वापिस लो इसी वक्त और 

' इसे घास डालो' का फरमान सुनाया


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146

किसी के कान में कही गई बात 

हजारों मील दूर तक सुनाई पड़ती है

धीरे धीरे बोल कोई सुन न ले

गलत मत बोल कोई सुन न ले

लेकिन फिर भी हर कोई सुन लेता है

और वही राज की बात घूमती घूमती 

फिर आपके कानों में आ पड़ती है

आप हैरान होते हैं कि यह कैसे हुआ

इसे कहते हैं गपशप या चुगली

जो आपसे गॉशिप करता है,वह

आपके बारे में भी गॉशिप करेगा।


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145

जनून

 क्या कहूं तुम से कि ये क्या है जनून

 जान का रोग है यह बड़ी बला है जनून

 जनून ही जनून है दिलो दिमाग में

 सारे आलम में ही  भर रहा है जनून

 जनून मेरा प्यार मेरा इश्क है यारो

 यानि अपना ही मुबतला है जनून

 गरीब की मेहनत मशकत में यारो

 लगता खुद से भी ज्यादा है जनून

 कौन मकसद को जनून बिन पहुंचा

 आरजू है जनून और मुद्दा है जनून

 तुमने आज तक नहीं समझा मतलब

 मगर एक तरह से जिया है  जनून

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144

रात ग्यारा बजे चालकै दिल्ली एयरपोर्ट आये ।।

दिल्ली तैं कुवैत के जहाज के टिकट कटाये ।।

हवाई जहाज का सफर कई घण्टे का होग्या भाई

ब्रेकफास्ट किया फेर लंच फेर फ़िल्म एक चलाई

कुवैत पहोंच लंदन की मिलगी या जहाज हवाई 

लंदन की हवाई यात्रा घर आली नै खूब सराही 

लंदन पहोंचे सांझ ताहिं फेर सांस थोड़े ले पाये ।।

दिल्ली तैं कुवैत के जहाज के टिकट कटाये ।।

2

विवेक भाई एयरपोर्ट पै देखै था वो बाट म्हारी 

सारा सामान लाद लिया फेर चली म्हारी सवारी

सत्तर मील की दूरी साउथ एन्ड रहवै

बेटी प्यारी 

दोहती अनन्या दोहता आदि सबकै खुशी छारी

कुलदीप शीतल नै आंख्यां पै सारे बिठाये ।।  

दिल्ली तैं कुवैत के जहाज के टिकट कटाये ।।

3

रात का खाना खाकै या नींद गजब की आई 

सपने मैं घूमै रोहतक दे इंद्रप्रस्थ का पार्क दिखाई  

सबतें सम्पर्क टूट गया सिम कार्ड ना

मिल पाई 

जी मैं जी आग्या मेरै जिब चलगी वाई फाई

नमस्ते लंदन से के फूल सब धोरै पहोंचाये  ।।

दिल्ली तैं कुवैत के जहाज के टिकट कटाये ।।

4

स्वीमिंग पूल अर पार्क अगले दिन घूम कै आये 

लंदन आई जाकै दूजे दिन पूरा लंदन देख पाये 

विंडसर कैस्टल तीजे दिन उड़ै मजे खूब उड़ाए 

चौथे दिन बीच पै घूमे बालक झूले खूब झुलाये

रणबीर दस तारीख नैं बेल्जियम के प्लान बनाये  ।। 

दिल्ली तैं कुवैत के जहाज के टिकट कटाये ।।


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143

यादें

बचपन में मोहल्ले के मैदानों में दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं।

कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और नावेल पढ़े हैं।

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142


मैंने देखा है अपने माँ बाप को लड़ते हुए

रोजाना इस या उस बात पर झगड़ते हुए

माँ कहती पापा को क्यों पड़ौसिन को तकते 

माँ को पीटते हाथ कभी नहीं  उनके थकते  

बच्चे बड़े हो रहे इसका उनको ख्याल नहीं

क्या असर पड़ रहा इसका उनको मलाल नहीं 

बचपन था हमें ज्यादा चीजों का पता न था 

तरुनाई की उमर आई बच्चों  का खाता न था 

पिता पड़ौसिन का छुप  कर मिलना समझा

अवैध संम्बंधों  पर माँ का हिलना समझा 

सुरता कईबार मुझे बुलाकर प्यार में सहलाता 

बहुत खुश होती मैं दानवी रूप समझ न आता 

एक दिन वह रूप उसका सामने आ ही गया 

देख के उसकी हरकतें सिर चकरा ही गया  

ये आँखें बीस चालीस साठ साल की बताऊँ 

उमर कोई सीमा नहीं बीती उसका हाल सुनाऊँ 

आदर्श संस्कारों की उम्मीद कैसे विद्वान् करते हैं 

देखो कैसे बच्चियों के शराब पीके पर कतरते हैं

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141


नई दुनिया - प्यार की दुनिया

नई दुनिया का सपना  हम दोनों ही देख रहे हैं

सोचा अपने अपने ढंग से कहते हुए झेंप रहे हैं

झेंप मिटी साथ चले सोचा जीवन सफल हो गया

अलग अलग जातें हमारी जिनका मतलब खो गया

ब्यां नहीं कर सकते सब हम पर उंगली टेक रहे हैं।।

प्रेम विवाह को समाज में देखा क्या दर्जा मिलता

खूंखार हो जाता है समाज देख कर ही दिल हिलता

बिना बात की बात में निकाल मीन मेख रहे हैं।।

तुम्हारी जिद प्यार का विरोध तो जिद हमारी भी है

प्यार को परवान चढ़ायेंगे इसमें इज्जत तुम्हारी भी है

जात के तवे पर देखो ठेकेदार रोटी सेंक रहे हैं।।

जातें अलग अलग हमारी मगर मानवता है भरपूर

जाति की सीमा मालूम है इसके बन्धन नहीं मंजूर

एक अपना सा घर बनाएं यही इरादे नेक रहे हैं।।


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140

कोई गाता बंगाली में देखो 

कोई गा रहा गीत तमिल में 

कोई पंजाबी में गिद्दा पा रहा 

कोई राजस्थानी में बतियाए देखो अपने अनुभव हर कोई सुना रहा नाटक रेलगाड़ी और सद्गति ये 

ना समझे उसे भी बहुत भा रहा रोक नहीं पाया यह देख नजारा मेरी आंखों में आंसू आ रहा 

कैसे बयां करूं दास्तान इनकी शब्दों में बयां नहीं कर पा रहा 

सुना झारखंड का हाल जब से 

क्यों है आदिवासी इस हालत में 

ख्याल तब से मुझे यही खा रहा दलित महिला बच्चे भोजन संकट पानी सवातावरण संकट भी बातचीत में चारों तरफ छा रहा 

एक नई दुनिया का सपना हमें आईपीएसएन दिखला रहा 

नई दुनिया का नक्शा कहीं और नहीं 

यहीं है वह नई दुनिया जो अंगड़ाई ले रही है 

और जरूर जवां होगी शायद हमको यकीन नहीं आ रहा 

नई दुनिया संभव है यहीं नारा 

इस बात का बस यकीं दिला रहा।।

2008


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139

आसान है

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

सटीक समीक्षा करना 

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

सुंदर सी तस्वीर बनाना 

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

तरफदारी करते रहना 

बहुत आसान है हमारी जिंदगी की 

नुमाइश दिखाते रहना 

मगर बहुत मुश्किल है इस जिंदगी को 

हकीकत में जी सकना


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138

नैना देवी

 नैना देवी में हादसा हुआ

डेढ़ सौ लोगों की मौत हो गई

तीन सौ घायल हो गए 

कहते हैं पुलिस ने भांजी लाठियां

मची भगदड़ तो फिर 

कोहराम मचा

हर तरफ चीख पुकार थी 

मंदिर में खौफ पसर आया

रास्ता बहुत ही संकरा सा था

लोग भाग भी नहीं पाए और कुचले गए

आठ दस करोड़ का चढ़ावा आता है

सवाल उठ रहे हैं वह कहां जाता है

सुविधाएं तो चाहिएं भक्तों को

मगर कौन मांग करे और किससे?




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137

किसान ने अपनी मेहनत से 

जो गेहूं अपने खेत में 

उगाया 

उसका भाव भी उसे 

उसकी मेहनत के मुताबिक 

ना मिल पाया 

मंडी में आढती ने भी 

अपना पूरा करतब 

दिखलाया 

मंडी में जब वही गिहूं

खुले में रखा गया और 

बरसात में भीग गया 

यह देख किसान का जी 

बहुत दुख पाया 

पूरे 6 महीने की मेहनत 

जब यूं खुले में बर्बाद हो 

तो गम तो होगा ही 

यह बात अलग है कि 

हम उस मेहनत की 

कीमत से वाकिफ ही 

नहीं हैं?

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136

क्वालिटी 

क्वालिटी का जमाना है 

कीमत का क्या मायना है 

फल विक्रेता की भी 

खूब चांदी हो रही है 

ग्राहक ज्यादा मूल भाव भी 

नहीं करते मगर 

देसी आम और तरबूज 

साथ में है खरबूजा 

इनका संगी ना बदेशी दूजा 

लीची भी है देसी अपनी 

सबसे बढ़िया देसी फलों का 

अपने ही बाजार में यूं पिटना  

सोचो तो सही 

क्या यह सही बात है?

 


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135

पता नहीं 

पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है

सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है

नई तकनीक ने कब्जा जमाया पूरे इस इंसान पर

आदमी आदमी को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है

दूसरों के कंधों पर पैर रखकर आसमान छू रहे हैं

गंदी फिल्मों का फैशन आज नई पीढ़ी पर छा रहा है 

दारू समाज के हर हिस्से में सत्यानाशी बनती जा रही 

अच्छा खासा हिस्सा आज दारु पी गाने गा रहा है

लालच फरेब धोखाधड़ी का दौर चारों तरफ छाया

नकली दो नम्बर का इंसान हम सबको भा रहा है

बाजार व्यवस्था का मौसम है मुट्ठी भर हैं मस्त इसमें

बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है

भाई भाई के सिर का बैरी कत्लोगारत बढ़ रही है

पुलिस अफसर कोई बाएं दाएं से खूब पैसे बना रहा है

पूरे के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो

आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना फैला रहा है

एक तरफ 

मॉल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी हुई सड़कें देती दिखाई

तरक्की का यह मॉडल देखो दूरियां बहुत बढ़ा रहा है

अपने बोझ तले एक दिन मुश्किल होगा सांस लेना

तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है


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134

विदेशी फल 

विदेशी फलों का स्वाद 

चखें अपने देसी शहर में ही 

दिल्ली मुंबई और कलकत्ता

भागकर जाने की जरूरत नहीं 

हमारे शहर का बाजार भी 

विदेशी फलों से सजा हुआ है 

शहर की रेहड़ियों पर तरतीब से 

टिके हुए हैं विदेशी फल 

चाहे देसी से विदेशी की कीमत 

ज्यादा क्यों न हो

कीमत की किसे चिंता है 

फल विदेशी हमारे घर में है 

यह बात दीगर है कि हमारे 

पिताजी देसी की लड़ाई 

लड़ते-लड़ते दम तोड़ गए 

थाईलैंड का अमरूद 

मिलता है ₹200 किलो 

कैलिफोर्निया का हरा सेब

क्या कहने हैं सब के 

चाइनीज सेब भी आ टपक 

थोड़ा सस्ता है कैलिफोर्निया से ऑस्ट्रेलिया का बब्बू गोसा 

अमीर को क्या परवाह महंगे की

मध्यम वर्ग भी देखा देखी 

भरने लगा अपने फ्रिजों को 

विदेशी फलों से 

स्वाद तो बेहतर है 

देसी में वह स्वाद कहां 

जो विदेशी में है।


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133

सुरक्षित कौन 

रोहतक में करोड़ों रुपए का 

व्यापार रोजाना होता 

5 महीने में शहर में 

व्यापारियों की 

दो हत्याएं हो चुकी है 

चार व्यापारियों को 

लूटा जा चुका है 

एक पर जान लेवा हमला 

किया गया दिन दहाड़े 

यदि व्यापारी ही है सुरक्षित हैं 

तो सीएम सिटी में 

फिर कौन सुरक्षित है ?

कई साल पहले की रचना 


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132

दोगलापन दुनिया का 

बेजुबान पत्थर पर लदे हैं करोड़ों के गहने मन्दिरों में 

उसी दहलीज पे एक रूपये को नन्हें हाथों को तरसते देखा है 

सजे थे छप्पन भोग और साथ में मेवे मूरत के सामने यारो 

बाहर एक फकीर को भूख से तड़प कर मरते देखा है यारो


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131

साइनिंग इंडिया सफरिंग इंडिया 

ये महज शब्दों का खेल नहीं है 

ये हैं दो दुनिया इसी जमीन पर

एक तरफ एयर कंडीशन्ड कोठी 

उधर बरसात में टपकती झोंपड़ी

करोड़ों के को वह भी नहीं नसीब 

एक तरफ एयर कंडीशन्ड कारें हैं

उधर कई कोश नँगे पांव चलना है

एयर कंडीशन्ड पांच सितारा होटल

उधर दो रुपये की चाय का ढाबा है

एयर कंडीशन्ड अपोलो फोर्टिस हैं

उधर बिना दवाई के सीएचसी हैं

एयर कंडीशन्ड मॉल सब मिलता

उधर खुदरा छोटी छोटी दुकानें हैं

एयर कंडीशन्ड स्कूल आलिसान 

उधर बिना पंखे के कमरे के स्कूल

एक तरफ ऐयासी की दुनिया छाई

दूसरी तरफ मेहनत से फुरसत नहीं

दोरंगी दुनिया नजर नहीं आती हमें 

इस अंधेपन को क्या कहूँ?शब्द नहीं

आपके पास हैं तो इंतजार इनबॉक्स में

रणबीर

15.03.08


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130

पृथ्वी अपना संकट ये आज सबको सुनाती है 

चारों तरफ से हमला अस्तित्व बचाना चाहती है 

हरियाणा की धरती से गिद्ध खत्म हुए जा रहे 

मोर भी जगह-जगह पर आज मरे हुए हैं पा रहे 

कैंसर बढ़ते जा रहे आज हमें समझ ना आती है ।

जमीन हमारे खेतों की बांज होती जा रही आज 

फसल सब कुछ करके भी नहीं बढ़ पा रही आज 

बीमारी क्यों छा रही आज जमीन भी बिक जाती है। बाजारू विकास के तले टिकाऊ विकास खो गया 

कैसा दोहन कुदरत का देखो चारों तरफ हो गया 

बीज बिघन के बो गया धरती की हद छाती है।

सामाजिक सूचक हमारे बहुत हो गए खराब 

आर्थिक सूचक से काम नहीं चलेगा जनाब 

लिख रहे हैं ऐसी किताब जो सब भेद बताती है


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129

रसातल 

 बस कुछ मत पूछो 

रसातल में जा रहा है समाज 

पहले वाली कोई बात ही नहीं 

लड़के तो बिगड़ैल पहले से ही थे 

अब इन लड़कियां को आज डराया

धमकाया बहकाया जा रहा है 

नकल करने को मजबूर 

आजकल एकल परिवार और एकल हो गया 

मां कहीं बाप कहीं खुद कहीं तो पत्नी कहीं 

इसे क्या कहें घर परिवार या महज एक व्यक्ति 

खाने में मिलावट, पानी साफ नहीं ,

हवा का प्रदूषण कोई भी माफ नहीं 

ग्लोबल फूड क्राइसिस वाटर क्राइसिस 

ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ता यह खटका 

सिस्टम लगता है पूरा का पूरा भटका 

भर गया भर गया पाप का मटका 

यह तो सभी चाहते हैं कि समाज में 

सुधार की बहुत जरूरत है आज 

कई भगत सिंह पैदा हों  फिर से 

मगर हों पड़ोसियों के यहां 

हमारे बच्चों को तो ट्यूशन से 

फुर्सत ही कहां है?

2/5/08


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128

गुर्दे का गुर्दा 

किडनी लगवाने वाले विदेशी मूल के

 किडनी देने वाले सभी देसी फूल थे 

बीच में एजेंट हैं साथ में डॉक्टर उसूल के  

जिसके गुर्दे फेल हो गए मरने को है 

दूसरा जीवन देना हम सबका फर्ज है 

गरीबी के चलते किडनियां फेल न हों

उनको भी बचाना मानवता के खाते दर्ज है 

जिसे गुर्दा चाहिए था उसे गुर्दा दिलवाया 

भूख के कारण दोनों गुर्दे मरने को थे 

उनमें से एक गुर्दा तो बचा ही दिया 

दानी गुर्दे से एक और मानव बच पाया

काफी लोगों को रोजगार मुहैया करवाया 

एजेंटों का जाल बिछा कर चुपचाप पुण्य किया 

गुर्दा लेने और देने का कानून सख्त इतना

इससे बचने का प्रयास करना पड़ता कितना

जरा सोचो तो सही दिमाग पर जोर देकर 

विदेशी को अपने ही देश में अपने लिए 

महज एक गुर्दा भी क्यों नहीं मिला 

भारत देश महान का गुर्दा उसे क्यों भाया 

पैसे का खेल है यहां पर मेरे यारों 

इसी कारण बदेशी देशी गुर्दा खरीद पाया 

इसके लिए नेता अफसर पुलिस के 

 बिक गए बस कीमत की बात थी यारो।


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127

क्या है यह विकास या विनाश 

फिर भी हमें तो यही है आस

जिनका सम्मान छीन लिया गया 

जिनकी अस्मिता तार तार कर दी गई 

वह एक दिन इकट्ठे होकर पूरा 

हिसाब मांगेंगे और हिसाब करके 

हिसाब सरएक नई दुनिया बनाएंगे

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126

कीमत बढ़ेगी 

महिलाओं की संख्या कम होगी तो 

महिलाओं की कीमत बढ़ जाएगी 

यही मानते और सुनते आए थे 

मगर यह क्या है?  

मुर्रा भैंस की कीमत एक लाख 

बिहारी बहु मिले पांच हजार  में 

हर रोज भारत में क्या होता  है 

मालूम है आपको ? रोजाना

चौबीस की चढ़ती है बलि दहेज की 

छियासी की लुटे है हर रोज आबरु

चार सौ अस्सी से हो छेड़छाड़ 

पैंतालीस फीसद के पति करें पिटाई 

पचास प्रतिशत  गर्भवती महिलाएं

जिनपर हिंसा करके मर्द बनते हम

हिंसा की शिकार सत्तर प्रतिशत

आत्महत्या का प्रयास करती हैं

मेरा देश महान है

विश्व गुरु बनाने का आह्वान है।


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125

विश्व बैंक 

विश्व बैंक हितैसी बनकर आया 

रक्षक भक्षक कैसे बन जाता है

 इसने हमें समझाया 

गरीबी और बेकारी खत्म होने की आस बंधी

15 साल के भीतर जवान बेटे की लाश उठी

 बदेशी कंपनी आ गई 

हमने पूरे दरवाजे खोल दिए

 विदेशियों के साथ मिल गए 

देसी भी 

घी के दीए जल रहे उनके 

हमारे घर घुप अंधेरा है 

गुरबत की जंजीर जकड़ रही है हमें 

वहां सब कुछ शाइनिंग है

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124

ब्रह्मांड 

बेअंत ब्रह्मांड ऊपर कब धरती और ग्रह आए 

इसके बारे में दो विचार कदे कदीमी चलते आए एक विचार यों कहता पदार्थ से बनी जगत हमारी ज्ञान विज्ञान ने खोज की कैसे उपजी धरती प्यारी डार्विन की खोज भारी विकास सिद्धांत समझाए कैसे हुआ विकास हमारा मानव संसार जान रहा 

तर्क और विवेक के साथ कुदरत को पहचान रहा सच्चाई खोज विज्ञान रहा एक सैल के जीव बताए इस धरती पे संतुलन ये कहते कुदरती बैठता आया जीवन निर्जीव कैसे पनपे गया पूरा  हिसाब लगाया हर बात पे सवाल उठाया सबके जवाब ढूंढना चाहे अपने पर विज्ञान आज सवाल दर सवाल उठाए समाज में क्या और क्यों हुआ जवाब ढूंढना चाहे रणबीर साथ कलम चलाए सोच करछंद बनाये


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123

पृथ्वी अपना संकट ये आज सबको सुनाती है 

चारों तरफ से हमला अस्तित्व बचाना चाहती है 

हरियाणा की धरती से गिद्ध खत्म हुए जा रहे 

मोर भी जगह-जगह पर आज मरे हुए हैं पा रहे 

कैंसर बढ़ते जा रहे आज हमें समझ ना आती है ।

जमीन हमारे खेतों की बांज होती जा रही आज 

फसल सब कुछ करके भी नहीं बढ़ पा रही आज 

बीमारी क्यों छा रही आज जमीन भी बिक जाती है। बाजारू विकास के तले टिकाऊ विकास खो गया 

कैसा दोहन कुदरत का देखो चारों तरफ हो गया 

बीज बिघन के बो गया धरती की हद छाती है।

सामाजिक सूचक हमारे बहुत हो गए खराब 

आर्थिक सूचक से काम नहीं चलेगा जनाब 

लिख रहे हैं ऐसी किताब जो सब भेद बताती है


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122

विश्व बैंक 

विश्व बैंक हमारा रक्षक हमने रक्षक माना इसको। 

निकला यह पूरा ही भक्षक अनुभव से जाना इसको।   

  गरीबी और बेकारी सबके खत्म होने की आस उठी

मगर पन्दरा साल के भीतर जवान बेटे की लाश उठी

विश्वबैंक के कान हों तो गरीब की व्यथा सुनाना इसको।

शिक्षा जगत में गुणवत्ता का इसने ही प्रचार किया  

जैसी शिक्षा थी अपनी उस पर जमकर प्रहार किया

महंगी शिक्षा गुणवत्ता नहीं इतना तो बताना इसको।

स्वस्थ जगत का रंग बदला बड़े अस्पताल ले आए 

मेरे जैसे गरीब गुरबा तो इनके अंदर नहीं घुस पाए 

अपोलो फोर्टिस की कल्चर ये जरा समझाना इसको।  

   बहुराष्ट्रीय कंपनियों का यह रक्षक असल में पाया 

मुखौटा हमारी मदद का रंग रंगीला इसने लगाया 

रणबीर का पैन खोसने का ना मिला बहाना इसको।


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121

दोहरापन 

दोहरापन जीवन  का हमको अंदर से खा रहा ।

एक दिखे दयालू दूसरा राक्षस बनता जा रहा ।

चेहरों का खेल चारों तरफ दुनिया में फैल रहा ,

मुखोटे हैं कई तरह के कोई पहचान नहीं पा रहा।

सफेद मुखौटा काला चेहरा काम इनके काले हैं 

बिना मुखोटे का तेरा चेहरा न किसी को भा रहा।

कौन सा मुखौटा गुजरात में करतब दिखा रहा ये 

जनता को बहला धर्म पर कुर्सी को हथिया रहा ।

धार्मिक कट्टरता का चेहरा प्यारा लगता क्यों है 

मानव से मानव की हत्या रोजाना ही करवा रहा।

कौन धर्म कहता हमको घृणा का मुखौटा पहनो 

खुद किस झोपड़ी में आग खुदा जाकर लगा रहा। 

राम भी कहता प्यार करो दोहरेपन को छोड़ दो अब 

रणबीर भी बात वही  दूजे ढंग से है समझा रहा।।।

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120

दोस्त

पास रहकर भी दूर रहना कोई सीखे तुमसे 

बिना कहे बहुत कुछ कहना कोई सीखे तुमसे 

लालच व भोग का बाजार जकड़े हुए हैं हमें

 बाजारी दुनिया से कहना कोई सीखे तुमसे

 हर ईंट के नीचे आज बैठा बिच्छु दिखाई देता है 

बिच्छूओं के दंश न सहना कोई सीखे तुमसे

माया जाल फैला है यहां झूठ और मक्कारी का 

इस जाल की आग में न दहना कोई सीखे तुमसे 

सोने पर यह रांग का पानी  चढ़ा कर बेचते देखो 

कैसे पहचाने असली गहना कोई सीखे तुमसे 

वैश्वीकरण के तूफान में सब कुछ वह चला है 

इस तेज तूफान में न बहना कोई सीखे तुमसे

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119

अपना घर नै हरयाणा चारों कूट बदनाम किया ||

सी एम सिटी के भीतर घणा घटिया काम किया ||

शराफत का लबादा  ओढ़ कै कितना ग़दर मचाया 

बच्चों की मजबूरी का फायदा अपना घर नै उठाया 

शर्म मैं नाड़ तले नै होगी कई का जीणा हराम किया ||

बड़े बड़े अफसरों तक मैडम का आना जाना बताया 

कुछ शामिल किये खेल मैं कुच्छ को हमराज बनाया 

परत उघडती जावैं सें रिकार्ड तलब तमाम किया ||

सफ़ेद पोश बण कै काला धंधा कई करते बताये ये 

ले दे कै रफा दफा करावें जमा नहीं काबू मैं आये ये 

मूल भूत बदल  चाहिए अदल बदल देख तमाम लिया||

हरेक नागरिक आगे आवै  बिना इसके ना बात बनै 

गुण दोष पै तोल करकै छाज महँ कै सबका नाज छनै

साहमी ल्याना होगा सारा जो भी आज गुमनाम किया ||

दोषी जितने सब नै मिलै सजा रखना होगा ध्यान दखे 

भ्रष्ट अफसर पुलिस अर नेता साथ देवे भगवान दखे 

रणबीर नै छंद बनाया सबको आज यो  पैगाम दिया ||


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118

आग सीने की तुम कब तक दबाये रखोगे 

सीने में दर्द लब पे मुस्कान सजाये रखोगे 

कराहें उठ रही हर घर में आज देखो यारो 

जात गोत मजहब की बेड़ियां लगाये रखोगे

आसान नहीं मानवता तक यूं पहुंच पाना 

हैवानियत को कब तक तुम उठाये रखोगे 

जाग जायेगा इंसान तो हक तो मांगेगा ही 

शातिर हो तुम सोये हुए को सुलाये रखोगे 

जुल्म की रात भी कट जायेगी एक दिन 

जो ए कामगारों आस अपनी जगाये रखोगे


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117

तर्ज --- सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार  था

टेक ---ठहर जाओ भय्या भागना बेकार  है ||

           देता दिखाई ये अँधेरा बेसुम्मार है ||

            हम भागे जाते हैं पर रास्ता तो नहीं पाता है 

            जिधर भी देखते हैं अँधेरा नजर आता है 

            खाता है भय अपनों की मार है ||

            यहाँ धोखेबाजी है हमें आज बहला करके 

            हमारी कमाई बैठे हैं अपने घर में भरके 

            डरके नहीं रहना करना पलटवार है ||

            अँधेरी गली है रौशनी नहीं आती है 

            लालच और पैसे की भूख नहीं मिट पाती है 

            खाती है धोखा जिन्दगी कई बार है ||

             रणबीर रोशनी की चाह दिल में बस्ती है 

             अँधेरे में भी भी कहीं किरण हंसती है 

              बसती नई दुनिया  परले पार है ||

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116

जब नयी सुबह के सूरज को सदा दी जायेगी ।।

सफ़ेद पोश हैवानों को फिर सजा दी जायेगी ।।

आज के दौर में प्रेमियों की ऑंनर किलिंग होती

नयी सुबह में इन्हें शहीदों की जगा दी जायेगी।।

हमारी मेहनत लूटते हैं दगा देकर हमको यारो

वो सुबह आएगी जब न कोई दगा दी जायेगी।।

हमारे बच्चे मजदूरी करते रहते क्यों बिन पढ़ाई

यकीं मानों ये सारी बातअब समझा दी जायेगी।।

जात पात धर्म की लक्ष्मण रेखाएं सब टूटेंगी 

मानवता को सब जगह पर पन्हा दी जायेगी ।।

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115

दस जमा एक लाइनी बात 

आप लेफ्ट का फर्क समझ आवै इतनै घनी वार होज्यागी 

ओहले कहे तैं नहीं काम चलै इतनै घनी मार होज्यागी 

ईमानदारी के लबादे मैं लूट की या गाड्डी सवार होज्यागी 

सिस्टम बदले बिना क्यूकर भ्रष्टाचार की हार होज्यागी 

लेफ्ट बिना मजदूर किसान की कैसे नैय्या पार होज्यागी 

दस कै खिलाफ जिस दिन नब्बै की सेना तयार होज्यागी 

उस दिन पूरी दुनिया मैं भारत की हटकै  पुकार होज्यागी 

नहीं तो लूट कार्पोरेट की इस ढालाँ या स्वीकार होज्यागी 

अम्बानी की जागां दूजे लुटेरयाँ की खड़ी या लार होज्यागी 

ईमानदार उदारवाद की फेर तेज घनी रफ़्तार होज्यागी 

जनता नहीं जागी तो लोगो मानवता शर्मशार होज्यागी


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114

आज पी जी आइ ऍम एस में सद्भावना दिवस मनाया गया  हाजरी काबिले गौर थी  |

सद्भावना दिवस आज कालेज में गया मनाया 

थी सद्भावना या विद्वेष भावना समझ ना पाया 

एक तरफ हम सा धर्मों का गुणगान करते हैं 

दूजी तरफ पाकिस्तान काफ़िर उनको  बताया 

सद्भावना का मतलब दुनिया में हो शांति देखो 

देशों के बार्डरों को ना जाये कताल्गाह बनाया 

कोई सैनिक जब मरता है इस पार या उस पार 

कोख खाली एक माँ की होती समझ में आया 

पाकिस्तान को सबक सिखाने को सब तैयार 

अपने ही दलित भाईयों को नहीं  गले लगाया  

मंदिर मैं आज तक दलित बहन भाईयों को वही 

देश भगत क्यों आज तलक जगह नहीं  दे पाया  

अंध राष्ट्रवाद झलका कई कविताओं में वहां पर 

तालियों की गडगडाहट ने मुझे पूरा ही दहलाया 

सोच रहा ठा वहीँ उठ कर कोसूं अंध देश भक्ति 

मग़र कमजोरी मेरी वहां उठके ना विरोध जताया 

ये कैसी देश भक्ति है जो सरहद पर मर कटती है  

यहाँ अनाज गोदामों में सडा ना गरीब को दिलवाया 

इंसान की परिभाषा जिस दिन समझ जायेंगे हम 

फिर ये अंधराष्ट्रवाद अंतर राष्ट्र वाद में बदले जताया 

सारी दुनिया का आदमी इंसान जब हो जायेगा तो 

बार्डरों का सिलसिला ढह जायेगा मुझे यही सुझाया


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113

इस पार या उस पार मां की कोख खाली होती है 

जब भी कोेई जंग इस जहां में होती है ।


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112

परिवार में  मुझको जितने भी पाठ पढ़ाये

सारे ही उनके मुझको लूटने के काम आये

कर्म कर फल की चिंता मत कर गीता सार 

मेरी लूट के गए हैं सही औजार बनाये


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111

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो हैं,

नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो हैं.


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110

मेरे घर आकर तो देखो एक बार 

एक दूजे के पता लगे क्या परिवार

ना आप हमें जाने ना हम आपको 

किया हम सब के बारे गलत प्रचार

अफवाहें  बे सिर पैर की बातें उनकी

हमें लड़वा देती हैं देखो भाई हरबार

सभी कौम सुख से रहती आई यहाँ

मगर उनको पसंद नहीं ऐसा घरबार

हिन्दू मुस्लिम सिख और ईसाई यहां

सभी भाई भाई का करते है व्यवहार 

दुख सुख सभी मिलके झेलते खेलते

किया संघर्ष सबने मिल कर बारंबार


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109

सोच सोच कर

सोच सोच कर घबरा जाता हूँ मैं 


सोच सोच कर 

सोच सोच कर घबरा जाता हूँ मैं 

अपने आप को अकेला पाता हूँ मैं 

एक  नयी दुनिया का सपना मेरा है 

यहाँ क्या मेरा है और क्या तेरा है 

इंसानियत  पैदा की है समाज ने 

हैवानियत  पैदा की है दगा बाज ने 

हैवानियत ख़त्म हो है यही सपना 

इंसानियत बढे यही लक्ष्य अपना 

मनकी शान्ति की खोज में धर्मात्मा 

खोजते खोजते खोज लिया परमात्मा 

अपनी शान्ति पाई हमारी लूट पर 

हमारी शांति भगवन की छूट पर 

भगवान भी इंसान की खोज कहते 

हम तो भुगतें वो करते मौज रहते 

जिस दिन ये चालबाजी भगवान की 

समझ आयेगी तो मुक्ति इन्सान की 

 सोचता हूँ जितना उतना ही भगवान 

नजर आता है मुझको तो बस शैतान 

मेरे लिए तो मेहन त इमानदारी 

उनको लूट की दी उसने थानेदारी 

सबसे पहले होगी बगावत मेरी 

सामने  लायेगी उसकी हेरा फेरी

जग नहीं है सोता उसकी हाँ के बिना 

घोटाला कैसे होता उसकी हाँ के बिना 

मंदिरों में हजारों टन सोना जमा है 

यहाँ भूख से मौतों का लगा मजमा है 

लोगो ने चढ़ावा चढ़ाया है मंदिरों में 

चढ़ावे तेन मौज उड़ाया है मंदिरों में 

महिला को दासी बनाया है मंदिरों में 

गरीबों को गया भरमाया है मंदिरों में 

मन की  शांति नहीं मिली है मंदिरों में 

इंसानियत आज हिली है मन्दिरों में 

बुद्ध ने नया रास्ता खोजा मन शांति का 

भगवान को नाकारा दर तोडा भ्रान्ति का 

मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया था 

गरीब किया आदि हमें समझाया था 

पूंजी का खेल सारा है पूंजीवाद में 

इसका जवाब तो है समाजवाद में 

सोचता समाजवाद कैसा हो आज का 

क्या रिश्ता होगा चिड़िया और बाज का 

कई सवाल हैं जिनके ढूँढने जवाब 

महात्मा ने नहीं हमें ढूँढने जनाब 

रंग भरने हैं समाजवादी समाज में 

सब की हिस्सेदारी के सही अंदाज में  

"रणबीर "


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108

dost ki yaad mein

मैं पढ़ा अपने गांव थाने के स्कूल में

तख्ती पर लिखते खेलते वहीं धूल में

दसवीं पास की मैने अच्छे नम्बर पाये

आगे कहां क्या करें पढ़ाई पर हुई चर्चा

सभी के दिल में था कितना होगा खर्चा

हिन्दू कालेज सोनीपत बाहरवीं पास की

मिलेगा मेडीकल में प्रवेष मैंने आस की

दाखिला मिल गया घर में थी खुषी छाई

रोहतक पहुंचा कुछ माहौल बदला भाई

तरह तरह के सवाल रैगिंग हुई मेरी थी

सीनियर का डर बैठा देखी मेरा तेरी थी

चीर फाड़ की षरीर की ज्ञान बढ़ाया था

फिजियोलॉजी रटी तब पास हो पाया था

पैथो और फारमा दोनों मुझे भा गये थे

इम्तिहान में ये नम्बर अच्छे आ गये थे

एसपी एम फोरैंसिक बांए हाथ का खेल

इनकी पढ़ाई पाई छुक छुक करती रेल

फाइनल मुष्किल होगा यही तो बताया

मरीज देखने में पूरा समय मैने लगाया

पास हुआ ठीक नम्बर चिनता थी छाई

नौकरी या करुं मैं आगे की और पढ़ाई

आखिर आगे पढ़ने का मन मैंने बनाया

सर्जरी में फिर जैसे तैसे दाखिला पाया

रुरल और अरबन का एक नजारा था

दलित और स्वर्ण का देखा बंटवारा था

फेल पास का संकट खुला सामने पाया

सेवन्टी ऐट में यह सबके सामने आया

जाट और नोन जाट का घमासान हुआ

लड़ाई उपर की नीचे का नुकसान हुआ

इसी बीच अनुपमा मेरे जीवन में आई

धीरे धीरे दोस्ती रिस्ते का रुप ले पाई

सवाल यही था अब आगे किधर जाउं

सरकारी नौकरी या नर्सिंग होम बनाउं

खरखोदा में किराए पर काम षुरु किया

तन मन धन सब कुछ मैने झोंक दिया

प्रैक्टिस अच्छी चली पैसा खूब कमाया

कुछ साल में अपना नर्सिंग होम बनाया

नन्ही बच्ची षादी के दो साल बाद आई

फिर तीन साल बाद थी थाली गई बजाई

दो साल बाद छोटा बेटा दुनिया में आया

सब तो ठीक ठ्याक था कस्बा मुझे भाया

तभी अनुपमा चली गई हमको छोड़ करके

बीमार हुई चल बसी मुह वह मोड़ करके

बस जिन्दगी में खालीपन छाता चला गया

बच्चों पर ध्यान पूरा लगाता चला गया

कई बार मेहर सिंह समिति वाले आये

अपने विचार मुझसे सांझा थे कर पाये

तभी दारु ने जिन्दगी में दखल बढ़ाया

ज्यादा न पिया करो बच्चों ने समझाया

धीमे से मिकदार बढ़ी फिर आदत बनी

लगा ऐसा मानो षराब मेरी ताकत बनी

ताकत नहीं कमजोरी बाद में समझ पाया

फिर इस दारु ने था अपना रंग खिलाया

नर्सिंग होम फिर दारुमय हो गया मेरा

कर्मचारी भी पीते मरीज खो गया मेरा

बहुत जगह इलाज किया न छुटी भाई

जो षोहरत कमाई सारी तो लुटी भाई

दुख और अफसोस कि कहां आ पहुंचा

कभी सोचा न ये मुकाम वहां जा पहुंचा

अस्पताल में दाखिल मैं जीना चाहता हूं

वहां पर भी मंगवा कर पीना चाहता हूं

कैसी विडम्बना मेरी दिल दिमाग पछताते

आदत बलवान हुई पीछा नहीं छुड़ा पाते

बेटी बेटे बहुत दुखी नहीं है पार बसाती

देखी है बेटी बैठी सीट पे आंसूं बहाती

छोटा बेटा सातवीं तक मेरा पढ़ पाया है

क्या होगा इसका आगे मन भर आया है

एक बड़ा दुष्मन दारु हरियाणे में हो रही

कितने हैं परिवार जहां बोझा पत्नी

षायद अब ज्यादा दिन नहीं मैं चल पाउंगा

आदत जीती सतवीर हारा ये लिख जाउंगा

रणबीर सिंह दहिया......


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107

अन्दर और बाहर 

मैंने अपने अन्दर को ठीक करने का जतन किया 

बाहर ने हर बार ही तो मेरे अन्दर का पतन किया 

कहते हैं यदि हरेक इंसान अन्दर सुधार करले 

पूरा भारत चमक उठेगा नई फिर हूंकार भरले

अन्दर के सुधार के बावजूद मेरा संकट जारी है 

बाहर से कैसे निपटूं यारो जिसका दबाव भारी है


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106

छोटे शहर बदल रहे 

रात के ढाई बज चुके हैं यारो पर 

मेरा शहर अब भी जाग रहा है 

मेरे युवा भारत की आँखों में नींद 

नहीं है 

कुछ नौजवान डी जे की धुन पर 

थिरक रहे हैं और मस्ती में मस्त हैं 

यह सीन किसी मैट्रो शहर का हो 

मगर ऐसा नहीं है यह सीन तो अब 

लखनऊ बनारस लुधियाना और 

रायपुर इंदौर भोपाल गुडगाँव 

जैसे शहरों में भी रात का शबाब 

अपने पूरे यौवन पर होता है 

नौजवान यहाँ के सो कर नहीं बिताते 

रातें बिताते है जाग जाग कर यहाँ 

कहते जिन्दगी बहुत हसीं हो जाती 

माईन्ड रिफरेशमेंट हम सब की हो पाती 

इन शहरों का भूगोल तो अब भी 

वैसा ही है मेरे ख्याल में 

मगर बदल गए युवाओं के मिजाज 

दिल्ली मुंबई कोलकता जैसे शहरों 

या फिर  में यू के या यू एस ए में 

कुछ साल  के  बाद 

वापसी हुई है नौजवानों की तो 

अपने साथ उन शहरों के लाये हैं 

लाइफ़ स्टाइल और मस्ती के नुस्खे 

सौगात में 

जबर दस्त ललक है इस तरह से 

जीने की उनके दिल में आज 

इस बदले मिजाज को बाजार ने 

बहुत अच्छी तरह पहचान लिया है 

इसीलिये छोटे शहरों में भी इसके 

शो रूम ,इटिंग पॉइंट्स उभर रहे हैं 

और एक मॉल कल्चर विकसित 

हो रही है 

हमारे में से कुछ बुजुर्ग 

युवाओं की इस आजाद ख्याली को 

सभ्यता और संस्कृति की राह में 

बड़ी रूकावट मान रहे हैं 

वे इसको युवाओं की महत्वाकांक्षा  और

 भोग विलास का नाम दे रहे हैं 

पर सामाजिक चिन्तक इस बदलाव का 

स्वागत करते नजर आये


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105

मेरा ना होना तुम बर्दास्त नहीं कर सकते 

मेरी ताकत का अहसास है तुम्हें 

इसीलिये बाँट दिया मुझे धर्म, जात ,

इलाके, भाषा के नाम पर 

मुझे अपनी कमजोरी का जिस दिन 

अहसास  हो जायेगा उस दिन ये जमाना 

बदल जायेगा  \\

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104

नए और पुराने का हमेशा संघर्ष हुया बताया रै||

पुराने की नींव पर नया महल बनता आया रै ||

पुराने नै ढाह कै नै यो बता नया क्यूकर बनैगा

पुराने की कमी छाँट कै ईमारत नई फेर चिनैगा 

रीत घनी पुरानी सै कई बै पुराना घबराया रै ||

जरूरी नहीं नया बी घणा बढ़िया हो सारे का सारा 

मनसां बीच खाई बढ़ावै वो नया ना साथी म्हारा 

जो सबका भला करै वोहे नया सही ठहराया रै ||

तर्क और विवेक  ये परखन के औजार बताये 

नियम कुदरत के जाने बिना नए नै दुःख ठाए 

कुदरत की गेल्याँ तालमेल तै कमाल दिखाया रै ||

मेरे बीरा क्यों लड़ते हो इस नए और पुराने पै 

सोच समझ बढ़ो आगै रणबीर सिंह के गाने पै 

संघर्ष तै बनता नया दीखे पुराने की बी छाया रै ||


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103

आज का दौर 

अपने स्वभाव के हिस्साब से ही 

साम्राज्यवादी आक्रामकता बढ़ी

उसने ठीक उन्ही भीमकाय से 

वितीय  खिलाडियों को जो इस 

मंदी के संकट को पैदा करने के 

सही सही जिम्मेदार हैं इनको 

बड़ी रकमों के बेल आउट पैकेज 

देने के माध्यम से संकट पे काबू 

पाने की कशिश की है |

इसमें कोई शक नहीं है दोस्तों 

इन कम्पनीयों को तो फिर से 

जीवन हासिल करवा के मुनाफा 

बटोरने का फिर मौका दे दिया 

देशों की राज्य सरकारों पर कर्जों 

का भारी बोझ लाद दिया गया है 

कमाल की बात अबतो करदी यारो 

नैगम कम्पनीयों के दीवालों को अब 

संप्रभु शासनों के ही दीवालों में 

तब्दील  कर दिया गया है 

जिसका असर  योरोपीय संघ के 

अनेक देशों पर पड़ा और 

अमेरिका भी नहीं बच पाया 

बचेंगे हम जैसे भी नहीं |

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102

बात पते की 

सुबह होती है फिर श्याम होती है 

सुबह रोती  है फिर श्याम रोती है 

अपनी इज्जत आबर एक महिला 

सुबह खोती है फिर श्याम खोती है 

दलित जीवन में अमीरीदुख के  बीज 

सुबह बोती है फिर श्याम बोती है 

दबंग  और  पैसे की दुनिया रंगीन 

सुबह होती है फिर श्याम होती है 

लगते हैं जो धब्बे काली रातों में 

सुबह धोती है फिर श्याम धोती है 

सफरिंग दुनिय शाइनिंग  दुनिया को 

सुबह ढ़ोती है फिर श्याम ढ़ोती है


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101

असल में जो नंगे हो गये वो अपना नंगा पन  छिपाने को 

सबको नंगा कहते हैं ताकि हम झिझकें उंगली उठाने को


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100

मेहनत कर हमने ताज महल बनाया क्यों नहीं दिखाई देता 

ताज महल के साथ सब कोई नाम शाहजहाँ का ही क्यूँ लेता


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99

बाजार में सब चीजों की बोली लगादी

गुरु शिष्य का रिश्ता कैसे बचता यारो

पैसे ने चारों तरफ दहशत सी फैलादी

फिर भी लड़ेंगे जीजाँ से हम सब यारो

कुछ लाइनों  में बात पूरी हमने बतादी

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98

जिन्होनें न दी माँ बाप को भर पेट रोटी जीते जी कभी 

आज उनके मर जाने के बाद उन्हें भंडारे लगाते देखा है

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97

RAHGEER

चलते चलते जिन्दगी में मिला एक राहगीर मुझको||

मि ल बैठे कुछ बात हुई मन भाई तासीर मुझको||

कुछ तो था पर क्या था उसमें अब तक सोच रही

दिमाग लगाकर देखा साफ नहीं तसवीर मुझको||

उसका हंसना ही था जिसने मुझको बांध लिया

याद आती उसके पेहरे की एक एक लकीर मुझको||

कुछ पल मिल बैठे हम अपने दिलों में झांक सके थे

दरिया दिल इन्सान मिला बांध गया जंजीर मुझको||

कह नहीं सके एक दूजे को दिल की बात कभी हम

सुहानी यादों की दे गया खजाने की जागीर मुझको||

होन्डा के आन्दोलन में शहीद हो गया वो साथी

मैं समझूं या अनजान बनूं संदेश दिया गम्भीर मुझको||

साथ चले साथ हंसे थे साथ ही सितम झेले हमने

सम्भल के चलना यारो बता गया रणबीर मुझको||


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96

कुछ नए बन रहे  कुछ पुराने बने

हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने

किस तरफ से चली गोलियां क्या पता

किन्तु हर बार हम ही निशाने बने

था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया

हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया 

दिया जिसकी खातिर था हमने लहू

वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया


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95

हमने खोल के दिल से बातें करनी चाही 

बहुत सोच समझ कर अपनाई ये राही 

मेहनत और ईमानदारी की की है बाही 

गंदे विचार और गंदगी दिमाग से ताही


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94

बचपन की दोस्ती बहुत अलग होती देखो ||

जवानी की दोस्ती अलग बीज बोती देखो ||

हर उम्र की दोस्ती की मांग अलग होती है 

अधेड़ उम्र की दोस्ती तान कर है सोती देखो ||

अकेलापन अखरता बिना दोस्ती बुढ़ापे मैं 

बुढ़ापे की दोस्ती पुराणी यादें संजोती  देखो ||

टिकाऊ दोस्ती या भरोसे की दोस्ती कहो 

विचार और स्वभाव की समता पिरोती देखो ||

वक्त बदलते हैं रिवाज बदलने का दस्तूर भी 

सच्ची दोस्ती अपना भार  उम्र भर ढोती देखो ||

चाहे ये दुनिया इधर से उधर हो जाये यारो 

पक्की दोस्ती अपना सबब नहीं खोती देखो ||

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93

आज रास्ते बदल लिए मौका परस्ती दिखलाई

पन्द्रह साल तक तुमने कदम से कदम  मिलाई

चुनौती ज्यादा गंभीर आज जब सामने है आयी

भूल गए वो इंकलाबी नारे नकली कुर्सी है भाई

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92

बड़ी मुश्किल से ये आंसू छिपाए हमने  

हँसना चाहा झूठे ठहाके लगाये हमने 


तुमको मालूम ये  शायद हो के ना  हो 

तुम्हारे जाने के बाद आंसू बहाए हमने 


प्यार किया हमने नहीं  छुपाया कभी 

दिल के तराने थे तुमको  सुनाये हमने


तेरे साथ इन्कलाब के जो नारे लगाये 

यारो अब तलक नहीं हैं भुलाये  हमने 


राह का साथ छोड़ गये अफ़सोस तो है 

पल याद हैं वो जो संग बिताये हमने


जानते हैं आप हमें नहीं  भूल सकेंगे 

एक अनुभव बस बिंदु दिखाए हमने 


हादसा नहीं एक सच्चाई है ये प्यार 

ग्लानी नहीं रास्ते नए बनाये  हमने


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91

हरयाणा नम्बर 1 क्लेम किया जा रहा है 

1 बेरोजगारी कम करने में

2 गुणकारी शिक्षा सबको देने में

3 महंगाई पर काबू पाने में

4 गुणवत्ता पूर्ण इलाज सबको देने में 

5 महिला उत्पीड़न कम करने में

6 कृषि संकट हल करने में 

7 सामाजिक न्याय हासिल करने में

आपकी राय रखना जरूर या भेजना 

9812139001

क्या यह सब सही है???

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90

ऊट पटांग 

पुलिस तुम्हारी फ़ौज तुम्हारी 

मीडया तुम्हारा कोर्ट बीचारी 

जनता द्वारा जनता के लिए 

चुनी हुई ये सरकार हमारी 

जनतंत्र का झुनझुना पकडाया 

कार्पोरेट की करे है ताबेदारी 

मसला इस या उस नेता का  नहीं 

जनतंत्र की पोल खुल गयी सारी 

कैसे मजबूत हो जनतंत्र भारत का 

कैसे जनता की बढे हिस्सेदारी 

सवाल आया है तो जवाब भी 

ढूंढेगी मिलके ये जनता सारी


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89

वह धंसती  है 

वह खसती है 

वह फंसती है 

वह चरती है 

उसपे मस्ती है 

वह भिड़ती है 

सोचो कौन है 

वह भैंस हमारी 

अरे हम भी तो

जिन्दा इन्सान हैं


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88

एक गरीब महिला की नजर से 

हमारा इम्तिहान लिया हर बार पास हुए

सब कुछ तुम्हारे पास फिर भी उदास हुए

पता है तुम्हारा तुम एक अमर बेल हो

रब राखा क़िस्मत का रचा रहे खेल हो  

आज कल तुम्हारा अहम् और ये अहंकार

दिखाता है तुम्हारे अन्दर का पूरा अंधकार

सच है कि अंधी गली में तुम बढ़ते जा रहे

अपनी मौत के खुद ही  श्लोक पढ़ते जा रहे

इल्जाम मुझको सफाई नहीं करनी आती 

मेरे घर आंगन को मैं साफ ना रख पाती

एक राज बस तुमको ही बस बताती हूँ मैं  

बताओ तुम्हारे फर्श कैसे चमकाती हूँ मैं    

तुम्हारे दरवाजे पे गए तुमने दुत्कार दिया

हमारे दरवाजे पे आये हमने सत्कार किया

इंसानियत और हैवानियत का फर्क यही तो

दुत्कारा तोभी आँखों पे बिठा  के प्यार किया

कुदरत से प्यार जिसका तुम भी एक हिस्सा हो

विश्व ग्राम का चर्चित तुम एक अहम् किस्सा हो

बदलाव नियम है कुदरत का इतना तो जान लो

दिशा गलत या ठीक है इतना अब पहचान लो 

तन मन जन हो सुखी जीवन का लक्ष्य  मेरा

विवेक के प्रकाश से भागे अंध विश्वास घनेरा

सेहत के लिए चाहिए साफ पानी भोजन हवा 

फिर बिल्कुल नहीं  चाहिए हमको कोई दवा


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87

पति पत्नी का झगडा ओबामा ने करवा दिया

पत्नी बोली  क्यों  इस  भारत को मरवा दिया 

सोच कर बोला करो महाशक्ति  बना दिए हम 

ओबामाजी ने भारत का सिर ऊंचा  उठवा दिया

पत्नी माथा पकड़ के रोऔगे पता लगेगा तुम्हें

ऊंचा क्या उठाया भारत सिर उल्टा झुकवा  दिया

एक भी हमारे  हित का कौनसा समझौता हुआ

आँखों में धूल झोंक दी लगा कोठा भरवा दिया

पति बोला पहली बार भारत को सम्मान दिया

प्रतिबंध जितने हमने लगाये सबको हटवा दिया


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86

कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर

लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर

बुराई की ताकत को यारो देख   कर डर जाते हम

इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम

आका बैठ के हँसते रोजाना  फिर हमारी रुसवाई पर  

मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही यारो

चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही यारो

कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर

बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती

फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती

महल बने ये सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर


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85

मिल गया राहगीर मुझको एक दिन चलते चलते 

बात बताई बहुत पते  की पर थोडा सा डरते डरते 

कहा अपने पर कर भरोसा दुआ करना बंद करदे 

कुछ नहीं कर पायेगा तूं उसकी दुआ करते करते 

ये विश्वास तेरे से छीना इस दुआकी करामात से 

कमाल दुआ करता रहता तूं बेमौत मरते मरते 

दिन देखा नही रात देखी आंख मींचकर लगा रहा 

जिंदगी पूरी लगादी तूने उनका पानी भरते भरते  

उठ विश्वास लौटा देख दुनिया अपनी आँखों से   

पता है वक्त लगेगा इस दुआ से उभरते उभरते


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84

संकट और नवजागरण 

आज देश हमारा चौतरफा संकट से घिर गया 

उदारीकरण के कारण सिर उनका फिर गया 

वैश्वीकरण के नाम पर कितना कहर ढाया है 

आर्थिक संकट बेरोजगारी ने उधम मचाया है 

छंटनी महंगाई लूट खसोट आज बढती जा रही 

भ्रूण हत्या और दहेज़ की आँधी चढ़ती आ रही 

कठिनाईयों का बोझ ये महिलाओं पर आया है 

युवा लड़कियों की दुनिया पे काला बादल छाया है 

गहरे तनाव में लड़कियां ये जीवन बिता रही हैं 

फिर भी हिम्मत करके करतब खूब दिखा रही हैं 

सारे रिश्ते कलंकित हुए आज के इस संसार में 

सगे सम्बन्धी परिचित फंसे घिनोने बलात्कार में 

शिक्षक का रिश्ता भी तो हरयाणा में दागदार हुआ 

अभिभावकों का दिलो दिमाग आज तार तार हुआ 

सामाजिक मूल्यों में आज गिरावट आई है भारी 

चारों तरफ अपसंस्कृति की छाई देखो महामारी 

फेश बुक पर चैटिंग से नहीं समाज बचने वाला 

उदारीकरण और ज्यादा भोंडे खेल रचने वाला 

वंचित तबके और महिला युवा लड़के लड़कियां 

मिलके खोलेंगे जरूर समाज की बंद खिड़कियाँ 

इंसानी रिश्ते बनेंगे रंग भेद जात भूल जायेंगे 

नवजागरण का सन्देश घर घर तक पहुंचाएंगे

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83

बे मोसम की बरसात

बे मोसम की बरसात कैसा कहर ढाया है

ख़राब गेहू खेत मैं मंडी नै गुल खीलाया है

मोसम तो ठंडा मगर ठंडा हुआ कीसान भी

ये पकी पकाई खेती ढहे बहोत अरमान भी 

मंदी की मार ने मारा बरसात ने हीलाया है

कीसान सह लेगा इसे मान कीस्मत का खेल

पता नही चलेगा कीसने बनायीं उसकी रेल

ग्लोबल वार्मीग से मोसम में बदल आया है

क्लाईमेट चेंज हो गया दोसी अमीर बताये हैं

फार्म हॉउस गैसों के अम्बार वही लगाये हैं

बेमोसम ओलों का कीसान पे संकट छाया है

कीस्मत की बात नहीं ये सीस्टम का खेल है

असली दोसी छीपा रहे सीस्टम की धकापेल है

सच झूठ जान लियो खोल सब बतलाया है


*********

82

हमें  याद करने की कोशिश कीजिये यारो 

वक्त तो अपने आप मिल ही जायेगा देखो

तमन्ना मिलने की ये दिल से सोचिये यारो 

बहाना कोई न कोई मिल ही जायेगा देखो


********

81

वजूद तुम्हारा मुमकिन नहीं बिना वजूद हमारे 

सिस्टम की नजाकत है खिले हैं आँगन तुम्हारे

हमारी मेहनत पर खड़े होकर हुंकार रहे आज

भक्षक बनके रक्षक खड़े अपने घर बार निखारे

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80

मैंने मानवता का आचरण अपनाने की कोशिशें की 

मानवता से दूर हटाने की बहकाने की कोशिशें की 

जिद है तुम्हारी हटाने की तो जिद हमारी कि डटे हैं 

काले धन की चाल  काली बरगलाने की कोशिश की


********

79

पदार्थ परम सत्य है इससे बना संसार बताया है

इसका विकसित रूप आदमी जिसने समाज बनाया है

मानव के अंदर सब कुछ आत्मा इसका हिस्सा है 

बाहरी ताकत स्वर्ग नर्क ये सब झूठा किस्सा है 

पदार्थ के गुणों ने दुनिया को आगे बढ़ाया है 

पदार्थ के अंदर निरन्तर एक गति देती दिखाई

यही गतिशीलता नए गुणों को जन्म देती बताई

पदार्थ का विकास होता प्रकृति नियम रचाया है

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78

हरियाणा विकास

मॉडल बना है ये विकास में 

हरियाणा नम्बर वन हो रहा

कैसे बस कुछ ना पूछो भाई

पिछलों को सबको धो रहा

सब ही निडर घूम रहे हैं यहाँ

ये भ्रष्टाचार यहाँ से खो रहा 

शिक्षा ने उचाईयां छू ली हैं

बहुत उम्दा और कीमती है

जिसका भार गरीब ढो रहा

सेहत मान और पहलवान 

दुनिया में किया है गुनगान

भले अनीमिया और ज्यादा

गर्भवती औरत को डुबो रहा

हरियाणा नम्बर वन हो रहा 

फसल के दाम सबसे ज्यादा

मिलते हैं निठ्ठले किसान को

जमीन बेचो फायदा उठाओ

ये मंत्र दिया है हर इंसान को 

फिर भी क्यों किसान रो रहा

यह कोई नहीं जानता है कि

पिछले पांच साल के अन्दर

हमने विश्व बैंक से कितना 

लोन लिया है बताये तो कोई

बीएड कालेज धड़ाधड़ खुले

फीसें मनमर्जी की ली गयी

शिक्षक और छात्र भी बैठ के

कक्षा में रोज मजे से सो रहा


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77

बड़ी मुश्किल से ये आंसू छिपाए हमने  

हँसना चाहा झूठे ठहाके लगाये हमने 


तुमको मालूम ये  शायद हो के ना  हो 

तुम्हारे जाने के बाद आंसू बहाए हमने 


प्यार किया हमने नहीं  छुपाया कभी 

दिल के तराने थे तुमको  सुनाये हमने


तेरे साथ इन्कलाब के जो नारे लगाये 

यारो अब तलक नहीं हैं भुलाये  हमने 


राह का साथ छोड़ गये अफ़सोस तो है 

पल याद हैं वो जो संग बिताये हमने


जानते हैं आप हमें नहीं  भूल सकेंगे 

एक अनुभव बस बिंदु दिखाए हमने 


हादसा नहीं एक सच्चाई है ये प्यार 

ग्लानी नहीं रास्ते नए बनाये  हमने


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76

मैडम सीतारमन ने संसद में यह था फरमाया देखो 

लोगों की आए दोगुनी कर दी इसका बिगुल बजाया देखो 

जिंदगी बहुत बेहतर बना दी दुनिया में नाम कमाया देखो 

दस ट्रिलियन की तीसरी अर्थव्यवस्था इसे बताया देखो

पिछले दस साल की  तरक्की  की घंटी कमाल की बजी देखो 

मुख्यधारा चाटुकार मीडिया ने भी छोड़ी नहीं कोई कमी देखो

बार बार झूठ की बहार  जनता के एक हिस्से को जमी देखो

केंद्रीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर इन बातों को नहीं मान रहे

रघुराम राजन इन सभी दावों को बता झूठा बड़ा बखान रहे

आईएमएफ जैसी संस्थाएं भी बहुत से सवाल तान रहे

तरक्की में भी आत्म हत्याओं के आंकड़े कर परेशान रहे


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75

नई दुनिया - प्यार की दुनिया

नई दुनिया का सपना  हम दोनों ही देख रहे हैं।।

सोचा अपने अपने ढंग से कहते हुए झेंप रहे हैं।।

1

झेंप मिटी साथ चले सोचा जीवन सफल हो गया

अलग अलग जातें हमारी जिनका मतलब खो गया

ब्यां नहीं कर सकते सब हम पर उंगली टेक रहे हैं।।

2

प्रेम विवाह को समाज में देखा क्या दर्जा मिलता

खूंखार हो जाता है समाज देख कर ही दिल हिलता

बिना बात की बात में निकाल मीन मेख रहे हैं।।

3

तुम्हारी जिद प्यार का विरोध तो जिद हमारी भी है

प्यार को परवान चढ़ायेंगे इसमें इज्जत तुम्हारी भी है

जात के तवे पर देखो ठेकेदार रोटी सेंक रहे हैं।।

4

जातें अलग अलग हमारी मगर मानवता है भरपूर

जाति की सीमा मालूम है इसके बन्धन नहीं मंजूर

एक अपना सा घर बनाएं यही इरादे नेक रहे हैं।।


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74

तुममें  शिकश्त और जिल्लत का अहसास बाकी

पता हमें तुममें  अभी नफरत का अहसास बाकी 

कितना ही दिखावा करो अपनी सादगी का तुम 

खूब तुममें देखा है  हिमाकत का अहसास बाकी 

मुहब्बत से कहते हैं दौलत का कोई वास्ता नहीं 

तुम्हारे दिल में अपनी दौलत का अहसास बाकी 

कितना ही अपमान करो तुम बार बार ये हमारा 

रहेगा हममें फिर भी कयामत का अहसास बाकी

हमारी शराफत को करदो बिल्कुल तार तार तुम 

रणबीर को रहेगा ही शराफत का अहसास बाकी


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73

कहते  तुम्हारी क़िस्मत  में  खोना सोचो तो यारो 

क़िस्मत  का खेल मान कर हमने इसको ढ़ोया  

अपने हाथों से खुद हमने बीज कीकर का बोया

क़िस्मत क़ि मार को क्यों ढ़ोना सोचो तो यारो 

दिलो दिमाग पर मेरे तो यही सब तो छाया है 

आज  जो कुछ भी हूँ मैं मेरे नसीब ने बनाया है 

औरों  के खेलने का ये खिलौना  सोचो तो यारो 

बात समझ में आ गयी क़िस्मत का खेल नहीं 

बिना इन्सां के चल सकती यह देखो रेल नहीं

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72

हर एक कदम पर हादसा होना सोचो तो यारो 

हमारे सिस्टम में क्यों है रोना सोचो तो यारो 

जो कुछ कमाया हमने छीन लिया चालाकी से 

किसी ने नहीं समझाया ये सब खेल बेबाकी  से


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71

गाँव जो टिका था अन्याय पर 

एक दिन उसे ढहना ही था 

ना बराबरी के गाँव भक्तों  को 

एक दिन यह सहना ही था 

बिगड़ गया गाँव का माहोल 

महिला सुरक्षित नहीं वहां 

नशाखोरी बढती जा रही 

ढूध  दही का था सेवन जहाँ


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70

हमारी आह भी गुनाह कतल भी मुआफ उनके 

कैसे जल जाती शमां बयाँ करें भी तो कैसे करें 

किसने किसे तडफाया है सही हिसाब करेगा कौन 

ये तुम्हारी बात यहाँ मंजूर करें भी तो कैसे करें 

सच कहना अगर बगावत है तो हम दोषी हैं 

रणबीर झूठा इम्तिहाँ पास करें भी तो कैसे करें

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69

जल रहा यहाँ सब उम्मीद करें भी तो कैसे करें  

नहीं पहली सी फिजां यकीं करें भी तो कैसे करें 

अनुशासन क़ि सीख हमें खुद सभी कानून तोड़ो 

ऐसा इंसाफ वहां तस्लीम करें भी तो कैसे करें 

खानाबदोश बनाओ हमको हमीं से गिला करो 

प्यार क़ि जगह कहाँ दुश्मनी करें भी तो कैसे करें


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68

दूसरे देशों के प्रजातंत्रों की तरह

यदि भारत देश में भी यह छूट 

दे दी जाये की तुमाहरे बच्चों की

देखभाल का खर्च सरकार करेगी

तो अस्सी प्रतिशत शादियाँ यहाँ 

ये टूटकर बिखर जाएँगी अपने आप 

मानवीय सम्बन्ध बचे ही कहाँ हैं 

बच्चे बस एक मजबूरी बन कर 

खड़े हुए हैं एक पुल की तरह 

वर्ना कोई सम्बन्ध नहीं बचा है  --


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67

कितने संवेदनहीन हो गये हैं ---

चोट लगकर तड़पता रहे सड़क पर

हम पास से गुजर जाते हैं

हम हत्यारे ही गये हैं ---

अपनी ही संतान को , लड़की को पेट में ही 

मारने की आदत हो गयी है हमें 

हम सब से बड़े टैक्स चोर हो गये हैं ---

चार करोड़ का समान बेचकर

पचास लाख की राशि की सेल का

इनकम टैक्स भरते हैं हम

हम कामचोर हो गये हैं ---

सरकारी नौकरी को पैसन समझते हैं

और साइड बिजनैस में तन माँ धन से जुटे हैं 

भ्रष्टाचार  की सभी सीमायें लाँघ दी हैं 

जयादा देर तक ऐसा नहीं चल पायेगा


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66

आदमी की चाहत क्या है

क्या चाहता है वह ?

जान देकर भी नहीं मानता

जिस बात के लिए कभी

एक समय में उसी बात को

हंस कर खुसी खुसी मान

जाता है वह क्यूं ?

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65

मुझे पढाया बताया मेहनत और ईमानदारी

ऊंचे मानवीय गुण हैंये हम कहलाते संस्कारी

ठीक उल्टा देख रहा हूँ आजके अपने समाज में

बेईमानी और घोटाले छाये बड़े नए अंदाज में 

छः एकड़ जमीं बिकी रूपये तीन करौड़ मिले 

दो भाई दो बहन बांट पर रिश्ते बुरी तरह हिले  

भाईयों ने दी दोनों बहनों की पाँच लाख की सुपारी

भून डाली गोलियों से भूल गये सब दुनियादारी

बड़े को छोटे ने अपने रास्ते से चाहा हटवाना फिर  

सोते हुए का काट कर फैंक दिया नाहर में सिर

तीन करौड़ का मालिक बना खिलाके पैसे बच गया

ईमानदारी का और मेहनत का नया इतिहास रच गया

अपराधीकरण और भ्रष्टाचार आज समाज में छाये 

इमानदार चुप बैठे इनके सामने अपना सिर झुकाए


********

64

अन्दर और बाहर को समझना जरूरी है

न समझने की भी कईयों की मजबूरी है

अन्दर का मतलब हमारा अपना शरीर

बाहर का मतलब वातावरण की शमशीर

बाहर अन्दर को प्रभावित  करता बताते

अन्दर बाहर को प्रभावित करता जताते

अन्दर बाहर का आपसी क्या तालमेल

इसे समझने में हो ही जाता है घालमेल

अंदर बहुत छिपाता हमारी हकीकत को 

फिर भी आ जाता बाहर कई मुशीबत को


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63

*दो बेरोजगार (पति -पत्नी)

 बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 

सटीक समीक्षा करना।  

बहुत आसान है मेरी जिंदगी की 

सही तरफदारी करना। 

बहुत आसान है मेरी जिंदगी के 

प्रति मन से करुणा  दिखाना । 

बहुत आसान है मेरी जिंदगी के प्रति 

असल में आंसू बहाना ।


मगर बहुत मुश्किल है 

मेरी जिंदगी जीना। 

स्कूल से आगे बढ़कर 

फिर कॉलेज में जाना होगा 

इसके सपने  बहुत बार देखे थे मैंने । 

कौन से कॉलेज में दाखिला हो 

कई बार सोचा था मैंने यह भी। 

एक साल पहले सोचना शुरू किया  कि 

पहले दिन का पहनावा 

क्या होगा मेरा कालेज में ? 

हेयर स्टाइल पर भी नजर डाली थी। 

सोचा क्या साइकिल पर ही मुझे 

कॉलेज जाना होगा हर रोज? 

या फिर घरवाले सेकंड हैंड 

स्कूटर का जुगाड़ कर देंगे। 


घर की हालत जुगाड़बाजी 

करने की भी कहां थी। 

यह बात नहीं मेरे भेजे के 

अंदर घुस रही थी। 

इसी उधेड़बुन में पूरा का पूरा दिन 

जुगाड़ बाजी के चक्कर में गुजर जाता। 

आखिर एक दिन 5 लोग आए थे 

हमारे घर में। 

उनकी बहुत आवभगत हुई थी। 

उन लोगों ने मेरे से भी पूछा- -

'बेटी कौन सी क्लास पास की है?' 

दूसरा सवाल था उनका -'कितने नंबर आए' 

मैंने धीमी से अपने नंबर बता दिए थे। 

उनकी नजरें मुझे घूरती 

सी महसूस हुई 

जैसे बकरे को उसके 

मारने से पहले कसाई 

उसे अपनी नजरों में से 

निकाल कर देखता है, 

उसी तरह का माहौल सा लगा मुझे । 

और इसके बाद कसाई 

बकरे को हलाल कर ही देता है। 

मुझे क्या पता था कि मेरा भी 

हलाल होने का वक्त आ गया है। 

और एक महीने के बाद ही 

मेरी शादी कर दी गई । 

एक और बेरोजगार के साथ ।


 2 बेरोजगारों की दुनिया के सपने क्या 

आप सोच सकते हो कि कैसे होंगे? 

हमने भी सोचने की कोशिश की थी 

खूब आगे का रास्ता देखने की। 


पर मैं नहीं देख पाई क्योंकि 

अंधेरे के सिवाय कुछ दिखाई 

नहीं दे रहा था । 

उनकी 2 एकड़ से भी कम जमीन थी। 

'भूखे घर की आ गई।' 

'हम क्या करें?' 

'यह दिन देखने के लिए क्या

 छोरे को जन्म दिया था?'

 दाएं बाएं से परिवार वालों से 

यह सब सुनने को मिलता था। 

तब पता लगा कि सपने 

और हकीकत में कितना 

फर्क होता है। 

प्यार मोहब्बत बेहतर जिंदगी 

सब अतीत की बातें थीं। 

घर भी तंग से बस दो ही कमरे थे । 

साथ में भैंस व बछिया का भी 

सहवास 24 घंटे का। 

समझ  सकता है कोई भी 

के दो कमरों में छह सात 

सदस्यों के परिवार का 

कैसे गुजारा होता है? 

कहां फुर्सत होती है एक दूसरे के लिए । 

चोरों की तरह मुलाकात होती हैं 

अपने ही घर में। 

बस जीवन तो घिसट रहा है हमारा। 

एक दिन सोचा इस नरक से 

कैसे छुटकारा मिले? 

मगर उसे ताश खेलने से फुर्सत कहां। 

घर खेत हाड़ तोड़ मेहनत और तान्ने । 

यही तो जिंदगी है हमारे जैसे 

करोड़ों युवक और युवतियों की 

भारत में। 

कभी-कभी जीवन लीला को 

खत्म करने का मन करता है । 

फिर ख्याल आता है कि इससे क्या होगा? 

किससे होगा? 

यही तो सवाल है सबसे बड़ा

 कि सही रास्ता क्या है?

 रणबीर


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62

ना इस जन्म में झूठ बोला 

ना कभी दुकान पे कम तोला 

फिर भी भगवान नाराज हुआ 

हार्ट अटैक मुश्किल इलाज हुआ 

मैंने पूछा मुझे क्यों कष्ट मिला 

बताया पिछले का सिलसिला 

इसका कब होगा मेरा हिस्साब 

अगले में मिलेगा तुम्हें जवाब 

पिछला ना कभी जान पाया 

नहीं अगला समझ में आया 

आज की बाबत नहीं बताते 

अगले पिछले में हमें फँसाते 

दम मारो दम मिट जाएँ गम

देवी देवता हमारे इनके हैं हम

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61

सहारे मत बना ए दिल सहारे रूठ जाते हैं 

ना किस्मत पेभरोसा कर सितारे टूट जाते हैं

साहिल पर आके ना समझो कि पार आ गए 

जरा सी लहर आयी तो किनारे छूट जाते हैं 

राज दरबारों में न जाना वहां पे क्या रखा है

पेट की खातिर ही तो वे उनके झूठ गाते हैं 

सच कहना अगर बगावत तो हम भी बागी

ज्यादा हवा भरने पर ये गुब्बारे फ़ूट जाते हैं

भगत सिंह के देश का फिर से देखा सपना

आखिरकार लूट के ये शिकारे डूब जाते हैं 

अमीर गरीब की खाई बढ़ा विकास करेंगे वो

एक न एक दिन झूठे जनता के बूट खाते हैं।

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60

बेमौसम की बरसात हुई है कैसा कहर ढाया है

गेहूं हुआ खराब खेत में मण्डी ने गुल खिलाया है 

मौसम हुआ ठंडा कहते मगर ठंडा हुआ किसान भी 

ख़राब पकी पकाई खेती ढह गए सब अरमान भी 

मन्दी की मार ने मारा आज बरसात ने हिलाया है

किसान कब तक सहे इसको मान किस्मत का खेल 

किस्मत नहीं ये सरमायेदारी ने बनाई उसकी रेल

ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते ये मौसम में बदलाव आया है

क्लाइमेट चेंज के दोषी ज्यादा अमीर देश  बताये हैं 

फार्म हाउस गैसों के अम्बार उन्ही ने लगाए हैं 

बेमौसम बादल हुए तो किसान पे संकट छाया है 

किस्मत की बात नहीं  सिस्टम का खेल समझ आया

सिस्टम असली दोषी छिपाये झूठ का प्रपंच फ़ैलाया 

किसान समझ रहा खेल सड़कों पे आके बताया है

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59

भारत देश है मेरा


जहां डाल डाल पर गरीब जनता का बसेरा

वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा

जहां झूठ और धर्म का पग पग पे अँधेरा

वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा

जहां की धरती पे लुटेरे जपें प्रभु की माला

तीजा बच्चा भूखा मारें जहां चौथी बाला

जहाँ नफरत ने डाला चारों तरफ है डेरा

वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा

जहाँ खड़े ऊंचे ऊंचे ये मंदिर और शिवाले

रोटी खातिर भटकें हैं या बच्चे भोले भाले

जहां जले है गुजरात गऊ नाम पे मरे कमेरा

वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा

बीच लुटेरों  की नगरी गरीब दुःख झेल रहे

मन्दिर मस्जिद पे जहाँ खूनी खेल खेल रहे

जहां नफरत की बंशी बजाये है मुरारी मेरा

वो भारत देश है मेरा वो भारत देश है मेरा


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58

बेजुबान पत्थर पे लदे  हैं करोड़ों के गहने मंदिरों में 

उसी दहलीज पे एक रूपये को तरसते  नन्हे हाथों को देखा है


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57

मानव बोम्ब

वह छात्रा डेरा परमुख की हत्या के लिए

मानव बम्ब क्यों बनी ?

मुस्लिम थी इसलिए

अमृतधारी थी इसलिए

किसी के बहकावे में आ गयी

ये नौजवान युवक युवतियां यहाँ तक

क्यों चले आते हैं ?

क्या सोचा है कभी ?

कहाँ फुर्सत है हमें दो पल की

की सोचें जरा जब क्या होगा

जब हमारी अपनी बेटी

डेरा परमुख की हत्या कर देगी


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56

ज़माने में क्यों आये क्या सोचा है कभी

हम क्या हैं कर पाए क्या सोचा है कभी

पैदा  हुए मगर खुद में ही महदूद रहे हम 

पड़े  हैं ये पेट  फुलाये  क्या सोचा है कभी---

बहोत बुरा जमाना आ गया बैठे कोस रहे

कौन इस को है घुमाये क्या सोचा है कभी---

भाड़ में जाये यह समाज हमारी बला से

क्यों काले बादल छाये क्या सोचा है कभी---

इन्सां और समाज का बहुत पुराना रिश्ता

इसको कौन बचाए क्या सोचा है कभी---

सोचने से ही परहेज तो दोष किसे देंगे

कोहलू के  बैल बनाये क्या सोचा है कभी---

खाने के भंडार भरे हैं मगर लाखों भूखे मरते

ये किसने खेल  रचाए क्या सोचा है कभी---

हर दरवाजे पर बीमार दवा का मोहताज

वो कैसे सेहत बचाए क्या सोचा है कभी---

अमीरों क़ि गफलत  ने इस ज़मीन पर

ये कैसे नाच नचाये क्या सोचा है कभी---


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55

**धरती हमारी हुई है बाँझ**

धरती हमारी हुई है बाँझ

किसान तपस्वी हुआ कंगाल

बणी सणी ख़त्म हो गयी

तथाकथित नेता रहे दंगाल

गाँव गाँव में दारू बिकती

घर घर में औरत पिटती

बैठे ये लोग ताश खेलते

महिला पर मजाक ठेलते

ना किसी से कोई काम है

कहता किस्में जयादा दम है

बदमाशों ने लंगोट घुमाया

राजनेता से हाथ मिलाया

भ्रष्ट पुलिस अफसर मिला है

भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट साथ खड़ा है

चारों क़ि दोस्ती अब तय हैं

एक दूजे क़ि बोलेन जय हैं

लगा रहे हैं जोर पर जोर

चारों तरफ देखो बढ़ा शोर

बेरोजगारी का उठा भूचाल

किसान होते जा रहे बदहाल

ऊपर से नेताजी भी पुकारे

उस पठे को मज्जा चखारे

आगे बढ़के गलघोट लगादे

कहाँ पे पड़ेगी चोट बतादे

आज उसे कल उसे पटकदे

सामने बोले जो उसे झटकदे

याद छटी का दूध दिलाना

मत इसे हमारा नाम बताना

बता रहे दाँव पर दाँव देखो

नेताओं में है कांव कांव देखो

कुरीतियों पर चुप रहे कमान

आनर किलिंग समाज में श्यान

मारना और फिर मरना होगा

नाम गाँव का तो करना होगा

जनता तक रही है सांसें थाम

बताओ यूं चलेगा ये कैसे काम

हम बिना शादी के घूम रहे हैं

वे गोतों के नशे में झूम रहे हैं

वाह निकले हैं नहले पर दहले

कौन बोलेगा वहां सबसे पहले

खूब हुई देखो वहां धक्का पेल

पंचायत ने वहां दिखाया था खेल

अहम् सबका माइक पे टकराया

फैसला खास वहां हो नहीं पाया

पाँच घंटे तक मार पर मार हुई

झड़प आपस में बारम्बार हुई

ना दहेज़ पर बोला कोई वहां

दारू पर बंद रही सबकी जुबाँ

महिला भ्रूण हत्या को भूल गए

बस गोत्र शादी में सब झूल गए


 - 24,  april , 2010


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54

DUSRI DUNIYA SAMBHAV HAI

फ़ूड के लिए जमीं हो या 

फ्यूअल के लिए जमीं हो 

सवाल अटपटा सा है यारो 

समझ में नही आ रहा है 

अपना पेट भरे इस जमीं से 

या फिर भूखे मरे सवाल यही है 

अपनी करों की टंकी भरने को 

अपने पेट पर लात मारना

कहाँ तक सही है इसमें बताओ 

समझने या दिशा भर्मित होने की 

कोनसी बात है ?

विकास के नाम पर विनास हो 

यह एक अहम् सवाल हो गया है

विकास के नाम पर विनास में 

हमारा दिल भी कही खो गया है

तभी तो हम भी अपनी आल्टो के 

पट्रोल की चिंता ज्यादा करते है 

मगर गरीब के पेट की चिंता तो क्या 

इसका तो जिकरा भी नहीं सुनते 

टिकाऊ विकास हो समाज का 

इस पर चर्चा चिंता कुछ तो हो 

टिकाऊ विकास का मतलब क्या 

यही ना की वातावरण फ्रेंडली 

हो यह विकास !

जेंडर फ्रेंडली की भी है आस

असमानता का भी हो विनास 

रेपलीकेबल भी हो विकास 

सोच ले हमे विकास चाहिए 

या फिर विनास ही चाहिए 

दूसरी दुनिया संभव है यारो 

एक बार उस तरफ अपनी 

नजर तो उठाइए !

उस दुनिया में निठल्ला पण 

नहीं चलेगा दोस्तों 

टीना सिंड्रोम के बारे रोजाना 

चर्चा करते हो 

कहते हो देयर इस नो अल्टरनेटिव 

मगर क्या कभी सुना है 

देएर इस पुपलज अल्टरनेटिव 

लेटिन अमेरिका ने हमको इस दौर में 

दूसरी दुनिया का ट्रेलर दिखाया है 

लोगो की पहलकदमी 

नए समाजवाद का सपना 

हकीकत बन पाया है !


********

53

17 अप्रैल 2014

दो   हजार   बीस     तक     

गाँव  कस्बों  को  ना देखिये  

बड़े बड़े शहरों की फ़ैली गंदी 

बस्तियों की तरफ ना देखिये 

पाश इलाकों में बनी ऊंची 

इमारतों को ही अब देखिये 

उनमें  रहने  वाले लोगों को 

देखिये तरक्की ही तरक्की 

नजर आयेगी  चारों तरफ 

हमारा कार्पोरेट सैक्टर देखो 

हमारा इन्डस टरी सैक्टर  देखो 

हमारा बिजनैस सैक्टर देखो 

हमारा फ़ौरन एक्सचेंज देखो 

कितने आधुनिक हो गये हम 

दुनिया की तीजी महाशक्ति की 

क्षमता हमारे अन्दर छिपी हुई

बड़ी ताकत के पास अटम बोम्ब 

होना चाहिए वह है हमारे पास 

चार छः लाख फ़ौज भी है देखो 

थोड़ा पैसा और हो और थोड़े से 

हथियार और हों तो बड़ी ताकत 

अमेरिका की तरह हम फिर बन 

ही जायेंगे दो हजार बीस तक तो 

तब तक गरीबी बढ़ती है तो वह 

बढ़ने से कौन रोक सकता है इसे 

अशिक्षा और बेरोजगारी ये तो 

देखो बढेंगी यह एक सचाई है 

भूख और बीमारी भी दोनों ही 

सुनो समझो बढेंगी ही लाजमी

विकास की कीमत तो चुकानी 

पड़ती है ना हम सबको  मिलके 

अपनी अपनी क़िस्मत के मुताबिक 

लेकिन इस तर्क में जनता कहाँ है ?

कीमत तो जनता ही देगी और फल 

उनकी क़िस्मत में ही लिखे रहते 

जो जनतंत्र का ढांचा खून पस्सीना 

बहाकर के हमने खड़ा किया था वह 

अब और नहीं बच पायेगा यारो 

बड़ी ताकत की बलि चढ़ जायेगा 

बड़ी ताकत बनने की बजाय हमें 

असली जनतांत्रिक बनने का जतन 

राज नीतिक और निजी जीवन में 

हमें खुशहाल बना  सकेगा यारो !!!!


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52

**नोट बंदी और आम जनता **

युद्ध के समय नहीं देखी ऐसी

आपातकाल में नहीं देखी ऐसी

अबकी नोट बंदी ज्यादा खतरनाक

मगर बगावत का माहौल नहीं था

लोग दिन रात लाइनों में खड़े खड़े 

दम तोड़ रहे थे

किसानों की खेती चौपट हो गई 

और मजदूर खाली हाथ घूम रहे

दुकानदार भी झेल रहे मार इसकी

हुए थे शिकार मंदी के किरयाने वाले

कर्मचारी भी झेल रहे थे इसकी मार

शादियां पोस्टपोन हो रही थी या फिर

करकरा के बस फेरे पूरे किये गए थे

विपक्ष पक्ष को कोस रहा था देखो 

तुगलक का अवतार बताया किसी ने

संसद नहीं चल पा रही थी इसके चलते

नितीश कुमार और अखिलेश की भाषा

अपने ही ढंग की लगती थी

उनको लगता था यह सब देश हित में 

किया गया काम है सरकार का 

ऐसा जनता लाइन में खड़ी सोच रही 

थी शायद!

काला धन खत्म करने का 

कारगर रास्ता बताया था

आतंक वाद खत्म करने का सही

कदम उठाया था

भ्रष्टाचार खत्म करने का रास्ता 

यही दिखाया था

कहा वास्तव में अमीरों पर पहली बार

नकेल कसी जायेगी पहली बार यहाँ

इस नोट बंदी ने काले को सफेद 

करने की कला हमको सिखलायी थी

जन धन योजनाओं में पिचहत्तर हजार

करोड़ कोई पूछे कहाँ से आया यह धन?

चार माह की छूट थी काले को सफेद की

पैंसठ हजार करोड़ ही आये थे कहते

जन धन खतों में रोजाना अरबों 

आ रहे थे

कोई पूछे क्या मजदूरों के पास 

काला धन था?

दो हजार का नोट लाये ही क्यों ?

काले धन की रेल तेजी से दौड़ने लगी 

मेरे देश भारत महान में 

आखिर यह खेल क्यों और किसलिए 

खेला गया था?

सोचना ही होगा बहन और भाईयो!

वो जो कहा वह बिलकुल भी न हुआ

तो हररोज कुछ न कुछ नया जुगाड़

भिड़ाती नजर आयी थी सरकार

हाथ पैर फूल गए थे 

जनता लाइनों में खड़ी खड़ी देख रही 

थी

किस दिन ये भूचाल बन जायेगा सरकार

भीतर ही भीतर बहुत घबराई हुई थी

बात पक्की है ये यारो दूसरे उन देशों से 

भी शिक्षा नहीं ली थी कि जिस देश ने 

नोट बंदी की वह बर्बाद ही हुआ कहते

इतिहास इसका गवाह बताया 

सोचने की बात तो फिर भारत कैसे बचेगा?

मगर सोचना हमने बन्द कर दिया है 

काला धन इस नगदी में तो एक प्रतिशत

ही बताया है बाकी का हिसाब क्या है?

बाकी तो सोने में, जमीन में, उद्योग में, डॉलर में स्विस बैंक में , भगौड़ों के पास, में बताया

इनमें से किसी पर हाथ डालकर तो 

दिखाओ जो चिंता काले की सच में 

मारो छापे उनके अड्डों पर 

नहीं जो इस सब की पोल खोल 

रहे हैं छापे उनपर डलवाये जा रहे हैं 

आर्थिक संकट घटा नहीं बल्कि बढ़ 

रहा है 

आने वाले दिन , आने वाला दौर और 

मुश्किल नजर आ रहा है 

जनता को गुमराह करने के तरीके भी 

तेज कर दिए हैं 

असली मुद्दे आर्थिक संकट के, बेरोजगारी के, महंगाई के, महंगी शिक्षा के, महंगे इलाज के , महिला उत्पीड़न के दलित उत्पीड़न के कावड़ यात्राओं में भुलाए जा रहे हैं ।

असमानताओं का संकट पूरी दुनिया में 

बढ़ रहा है?

सोचो मेरे देश भारत महान के बारे 

देर होती जा रही है ।

रणबीर


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51

गुर्दे का गुर्दा 

किडनी लगवाने वाले विदेशी मूल के

 किडनी देने वाले सभी देसी फूल थे 

बीच में एजेंट हैं साथ में डॉक्टर उसूल के  

जिसके गुर्दे फेल हो गए मरने को है 

दूसरा जीवन देना हम सबका फर्ज है 

गरीबी के चलते किडनियां फेल न हों

उनको भी बचाना मानवता के खाते दर्ज है 

जिसे गुर्दा चाहिए था उसे गुर्दा दिलवाया 

भूख के कारण दोनों गुर्दे मरने को थे 

उनमें से एक गुर्दा तो बचा ही दिया 

दानी गुर्दे से एक और मानव बच पाया

काफी लोगों को रोजगार मुहैया करवाया 

एजेंटों का जाल बिछा कर चुपचाप पुण्य किया 

गुर्दा लेने और देने का कानून सख्त इतना

इससे बचने का प्रयास करना पड़ता कितना

जरा सोचो तो सही दिमाग पर जोर देकर 

विदेशी को अपने ही देश में अपने लिए 

महज एक गुर्दा भी क्यों नहीं मिला 

भारत देश महान का गुर्दा उसे क्यों भाया 

पैसे का खेल है यहां पर मेरे यारों 

इसी कारण बदेशी देशी गुर्दा खरीद पाया 

इसके लिए नेता अफसर पुलिस के 

 बिक गए बस कीमत की बात थी यारो।


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50

चलते चलते जिन्दगी में मिला एक राहगीर मुझको।।

मिल बैठे कुछ बात हुई मन भाई तासीर मुझको।।

कुछ तो था पर क्या था उसमें अब तक सोच रही

दिमाग लगा कर देखा साफ नहीं तसवीर मुझको।।

उसका हंसना ही था शायद जिसने मुझको बांध लिया

याद आती उसके चेहरे की एक एक लकीर मुझको।।

भले कुछ रोज मिले हम अपने दिलों में झांक सके थे

दरिया दिल इन्सान मिला लगा बहुत गम्भीर मुझको।।

कुछ दूर साथ चले थे जुल्म सितम साथ झेले हमने

सम्ीाल के चलना यारो बता गया ये रणबीर मुझको।।


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49

होकर मायूस नहीं यूं श्याम की तरह ढलते ही रहिए 

जिंदगी एक भोर है सूरज की तरह निकलते रहिए 

 ठहरोगे एक पांव पर  पांव तो थक जाओगे यारो

धीरे-धीरे ही सही मगर लक्ष्य की ओर चलते रहिए


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48

इस दिल में और उस दिल में सिर्फ फर्क इतना है  

ये शीशा था जो टूट गया वो पत्थर था जो साबुत है

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47

मेरा कसूर

हमने दोनो ने मिलकर सोचा

जिन्दगी का सफ़र तय करेंगे

बहुत सुन्दर सपने संजोये थे

प्रेम का पता नहीं ये हरयाणा

क्यों पुश्तैनी दुश्मन बन गया

यह सब मालूम था हमको पर

प्यार की राहों पर बढ़ते गए

मेरे परिवार वाले खुश नहीं थेa

क्यों मुझे पता नहीं चला है

न तो मैंने एक गोत्र में की है

न ही एक गाँव में शादी मेरी

न ही दूसरी जात में की मैंने

तो भी सब के मुंह आज तक

फुले हुए हैं हम दोनों से देखो

प्यार किया समझा फिर शादी

ससुराल वाले भी खुश नहीं हैं

शायद मन पसंद गुलाम नहीं

मिल सकी जो रोजाना उनके

पैर छूती पैर की जूती बनकर

सुघड़ सी बहु का ख़िताब लेती

दहेज़ ढेर सारा लाकर देती ना

प्यार का खुमार काम हुआ अब

जनाब की मांगें एकतरफा बढ़ी

मैं सोचती हूँ नितांत अकेली अब

क्या हमारा समाज दो प्रेमियों के

रहने के लायक बन पाया यहाँ 

चाहे कुछ हो हम लोड उठाएंगे

मगर घुटने नहीं टिकाएंगे यारो

वो सुबह कभी तो आयेगी की

इंतजार में ये संघर्ष जारी रखेंगे

झेलेंगे इस बर्बर समाज के सभी

नुकीले जहरीले तीर छाती पर ही

जिद हमारी शायद यही है कसूर


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47

हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो कत्ल भी करें तो चर्चा नहीं होता!


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46

कैसे जांचें

कैसे जांचें कि कौन अच्छा है क्या  सिस्टम खस्ता है ॥ 

सबकी अपनी अपनी ढपली विकास का वही रस्ता है ॥ 

जनता के बल पर ऊँचाई पाने वाले हरेक बादल को 

मौसम रूख बदले तो फिर पानी पानी होना पड़ता है ॥ 

जनता का विश्वास बार बार टूटता है यहाँ पर फिर से 

कमाल की बात है कि यह बार बार से देखो उठता है ॥ 

आंधी आती है बड़े बड़े पेड़ उखड़ जाते हैं यहाँ पे यारो 

कई बार पत्ता भी हिलता है तो दिल कांपने लगता है ॥ 

मेरे अंदर एक मुखालिफ था जो मुझसे भी लड़ता था 

अब या तो वह चुप ही रहता है या हाँ में हाँ करता है ॥ 

जनता ने इतिहास रचे हैं वो ये जानते हैं बखूबी ये 

इसीलिए हमको वो बरगलाने का प्रपंच रचता है ॥


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45

आज का दौर हमको कहाँ लेजा रहा यारो ॥ 

बताओ तो सही नहीं समझ पा रहा यारो ॥ 

प्यार मोहब्बत नहीं बची मार काट छाई 

मानवता के रिस्तों पे बाजार छा रहा यारो ॥

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44

शोर गुल बहुत है नहीं आवाज सुनाई देती 

बनावटी ही बनावटी हर चीज दिखाई देती 

कैसे रहते आज लोग अंधेरों के दरम्यान यारो 

वहां की नहीं दिखाई हमको वह सच्चाई देती 

हमारे बदनों में खुद उतार करके खंजर यारो

पूछते हैं लोग हमें कि राहत कैसे दवाई देती 

जिद्द है ये तुम्हारी तो यही है जिद्द भी अपनी

हार ना मानेंगे यारो जीत की घण्टी सुनाई देती

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43

मुबारक आपका भेजना उनको सलाम यारो 

हमको लगता उनका हर कदम हराम यारो 

उनके दरबारों में मानवता का क्या खोजना 

वहां पर तो फेकू नेता बस्ते हैं तमाम यारो 

कल इनके जिम्मे था गांधी का कत्ल यहाँ 

आज इनके हाथों में देश की है लगाम यारो

अन्धविश्वासी और रूढ़ियों के भगत हैं जो 

आज लेकर आ रहे विकास का पैगाम यारो


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42

कहना बहुत आसान है मुश्किल चलना सच्चाई पर

लहर के उल्ट तैर कर ही पहुंचा जाता अच्छाई पर

बुराई की ताकत को यारो देख कर डर जाते हम

इसके दबाव में बहुत सी गलती भी कर जाते हम

आका बैठ के हँसते रोजाना फिर हमारी रुसवाई पर

मेहनत हमारी की अनदेखी रोजाना हो रही दोस्तो

चेहरे की लाली हम सबकी रोजाना खो रही दोस्तो

कहते वो हमको बेचारा जो जीते हमारी कमाई पर

बीज है खाद और खेत भी इससे फसल नहीं उगती

फसल उगती है तब यारो जब मेहनत हमारी लगती

महल बने देखो सभी तुम्हारे हम सब की तबाही पर

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41

समाज हमको हमारा ही आईना दिखाता है 

प्रतिगामी प्रगति कामी का अंतर जताता है 

पतन शीलता बढ़ती जा रही चारों तरफ यारों 

प्रगति कामी हर कदम पर रास्ता बताता है 

पता नहीं कहां छोड़ आए हैं हम अपनी पहचानें

 आज हर चेहरा अजनबी सा नजर आता है 

सभी मजबूर हुए अपने अपने अंदर यारो

 मोबाइल एक कमरे में अलग अलग बैठाता है 

मशीन बनते जा रहे इंसान समाज में  यारो

इंसानियत का बंद होता जा रहा क्यों खाता है


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40

सच

आज क्या हो रहा बिलकुल समझ नहीं पा रहा

एक कुछ कहता दूसरा कुछ कहता हुआ आ रहा

सच का साथ देने को यहाँ पे सब कहते हैं यारो

सच क्या है इस पे  हरेक अपनी ढपली बजा रहा

कहानी को माइथोलॉजी को इतिहास बताने वालो 

इतिहास और वैज्ञानिक नजर से सच  ढूँढा जा रहा


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39

आंधी चल रही ये नहीं थमीं यारो 

रात की गर्द मेरे चेहरे पे जमीं यारो 

कुछ ठूंठ खड़े हैं कहीं कहीं मेरे जैसे 

कुछ उखड़े पड़े हैं कहीं तुम्हारे जैसे 

हम सब बचें हैं इसके थपेड़े  खाकर 

तुम बैठ गये अपने महलों में जाकर  

यह आंधी आज किसे साल रही देखो  

झोंपड़ी इधर उधर उछाल रही देखो 

धर्म की आँधी चलने ही वाली यारो 

क्या गुल खिलेंगे उजड़ेगा माली यारो

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38

पुराना दौर 

तेरी कलम तो चली यही बहुत है मेरे लिए

तकरार अभी तो टली यही बहुत है मेरे लिए

तेरे अंदर का गुस्सा बरकरार है अभी भी

मेरी एक ना चली यही बहुत है मेरे लिए

मुझे मालूम है तेरा इंसां मर नहीं सकता

बात है कितनी भली यही बहुत है मेरे लिए

दो पल का साथ नहीं ये मालूम हम तुमको

सुबह हुई सांझ ढली यही बहुत है मेरे लिए 

मेरी चाहत मेरी इबादत है यही चाहत तुमको

फिर भी तुमको खली यही बहुत है मेरे लिए

कमी लाख सही आखिर इंसां हैं खुदा तो नहीं

मुरझाये ना खिलती कली यही बहुत है मेरे लिए

हमें मुआफ़ करो या न करो अखितयार तुम्हारे है

तुम्हारी आँखों में नमी यही बहुत है मेरे लिए

कुछ तो है जो बांधे है हमको आज तलक भी

आबाद रहे तेरी गली यही बहुत है मेरे लिए

पत्थर दिल माँ से बना ये है मालूम मुझको

पिंघली मोम की डली यही बहुत है मेरे लिए

29-08-1992

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37

आज का जमाना

तेज रफ़्तार ज़माने की समझां इसकी चाल हे||

नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे||

1

गफलत पडे छोड़नी करा हकां की रुखाल हे

अपना गम स्कूल अपना करें इसकी संभाल हे

म्हारे स्कूल कोलेजां पै टपकै बदेशिया की राल हे 

जनता एका करकै बनैगी या मजबूत सी ढाल हे

जात पात और धरम पै करां लड़न की टाल हे||

नासमझी मैं उतरै बेबे म्हारी सबकी खाल हे||

2

वैजानिक नजर के सहारे रचै नयी मिसाल हे

मानवता सिखर पर पहोंचे सजा पावें चंडाल हे

कार्य कारण की होवे फेर सही सही पड़ताल हे

क्या क्यों और कैसे बरगे उठें दिलों मैं सवाल हे

धार्मिक कटरता की हार होजयागी फिलहाल हे||

नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे||

3

संघर्ष करना बहोत जरूरी ठा हाथों में मशाल हे

मानवता की करें सेवा नहीं रहे कोई मलाल हे

एक दूजे का प्राणी राखै हमेश्या पूरा ख्याल हे

आए अकेले अकेले जाना बाकि सब जंजाल हे

प्रकर्ति गेल्यें करें दोस्ती पर्यावरण हो बहाल हे |।

नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे||

4

पानी की कमी नही रह्वै नहीं होंगे सुने ताल हे

भूखा कोए नहीं सोवैगा नहीं पडेंगे अकाल हे

समतावादी विचार सबके नहीं मचै बबाल हे 

इन सब बातां की हमनै करनी हो पड़ताल हे

रणबीर की कलम आज बयां करै ये हाल हे।।

नासमझी मैं उतरे बेबे म्हारी सबकी खाल हे||


********

36

निर्मला

मैं एक साधारण से परिवार में पली लड़की 

अपने जीवन को सार्थक बनाने चली लड़की 

अनगिनत सहन की है जीवन की ये कठिनाई

गांव के मेरी कोम वालों ने इज्जत लूटनी चाही 

खेतों में काम करते दलित वो थे दौड़े-दौड़े आए 

तभी मेरे में ऊपर से जुल्म के बादल छंट पाए

कालेज जाने लगी तो इन्होंने मेरा पीछा नहीं छोड़ा 

दूसरे गांव के लड़कों से सूत्र इन्होंने था जोड़ा 

घर पर बात बताई तो कहते बंद करो पढ़ाई 

कॉलेज में वूमेन सेल बात वहां भी न बन पाई 

आशा और निराशा के बीच एम ए पास किया 

अच्छे नंबर आए मेरे थोड़ा सुख का साथ लिया 

नेट भी पास कर लिया पर नौकरी नहीं मिलती 

मां कहती मेरे चेहरे पर क्यों हंसी नहीं खिलती 

कैसे खिले हंसी मुझे पंचायतियो बताओ तो सही 

क्या करूंआगे का राह पंचायतियो दिखाओ तो सही 

प्राइवेट स्तर पर मैंने बी एड भी कर लिया है 

मेरे रिश्ते ढूंढते ढूंढते घर वालों का जी भर लिया है 

ना कहीं नौकरी मिल रही ना शादी हो रही मेरी

क्या नहीं दिखती तुम्हें बर्बादी ये जो हो रही मेरी 

कई जगह बात चली दहेज को लेकर टूट गई 

मर जाने को दिल करता आस सभी छूट गई 

क्या करूं कहां जाऊं मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा  

बूढ़े मात-पिता हैं उनका दुख ना देखा जा रहा 

सुनील भाई भी एम ए पास पांव से पांव भिड़ा रहा

एकेली नहीं हूँ गांव में और भी लड़कियां भुगत रही

इकट्ठी हो मिल बैठ कर सोचें हो  नहीं ऐसी जुगत रही

आज नहीं तो कल सोचना तो हम सबको पड़ेगा 

बनायें युवा महिलाओं का संगठन जो बुराई से लड़ेगा

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35

हमने खोल के दिल से बातें करनी चाही 

गंदे विचार और गंदगी दिमाग से ताही

बहुत सोच समझ कर अपनाई ये राही 

मेहनत और ईमानदारी की की है बाही 


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34

पता नहीं 

पता नहीं आज का जमाना किधर को जा रहा है

सुबह कहीं शाम कहीं अगली सुबह कहीं पा रहा है

नई तकनीक ने कब्जा जमाया पूरे इस इंसान पर

आदमी आदमी को दिन दिहाड़े नोच नोच खा रहा है

दूसरों के कंधों पर पैर रखकर आसमान छू रहे हैं

गंदी फिल्मों का फैशन आज नई पीढ़ी पर छा रहा है 

दारू समाज के हर हिस्से में सत्यानाशी बनती जा रही 

अच्छा खासा हिस्सा आज दारु पी गाने गा रहा है

लालच फरेब धोखाधड़ी का दौर चारों तरफ छाया

नकली दो नम्बर का इंसान हम सबको भा रहा है

बाजार व्यवस्था का मौसम है मुट्ठी भर हैं मस्त इसमें

बड़ा हिस्सा दुनिया का आज नीचे को ही आ रहा है

भाई भाई के सिर का बैरी कत्लोगारत बढ़ रही है

पुलिस अफसर कोई बाएं दाएं से खूब पैसे बना रहा है

पूरे के पूरे सिस्टम को दीमक खाती जा रही देखो

आज भ्रष्टाचार चारों तरफ डंक अपना फैला रहा है

एक तरफ 

मॉल खड़े हुए दूजी तरफ टूटी हुई सड़कें देती दिखाई

तरक्की का यह मॉडल देखो दूरियां बहुत बढ़ा रहा है

अपने बोझ तले एक दिन मुश्किल होगा सांस लेना

तलछट की जनता जागेगी रणबीर उसे जगा रहा है


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33

जनता को दबाना दिन बी दिन मुश्किल होता जायेगा 

मिलट्री पुलिश सारा ढांचा उसके सामने डगमगायेगा 

तुमने ही ये हालत पैदा किये जनता को बाँटने के लिए 

यही हालत उसे एकता देंगे ये सिंघासन लड़खड़ायेगा


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32

ना इस जन्म में झूठ बोला 

ना कभी दुकान पे कम तोला 

फिर भी भगवान नाराज हुआ 

हार्ट अटैक मुश्किल इलाज हुआ 

मैंने पूछा मुझे क्यों कष्ट मिला 

बताया पिछले का सिलसिला 

इसका कब होगा मेरा हिस्साब 

अगले में मिलेगा तुम्हें जवाब 

पिछला ना कभी जान पाया 

नहीं अगला समझ में आया 

आज की बाबत नहीं बताते 

अगले पिछले में हमें फँसाते 

दम मारो दम मिट जाएँ गम

देवी देवता हमारे इनके हैं हम  


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31

जवाब दीजिए 

1 मैं खेलूं कहाँ?

2 मैं कूदूँ कहाँ?

3 मैं गाऊं कहाँ ?

4 मैं किसके साथ बात करूं ?

5 बोलता /बोलती हूँ तो मां को बुरा लगता है ।

6 खेलता /खेलती हूँ तो पिताजी खीजते हैं।

7 कूदता /कूदती हूँ तो बैठ जाने को कहते हैं।

8 गाता/गाती हूँ तो चुप रहने को कहते हैं।

9 अब आप ही कहिये कि मैं कहाँ जाऊं? क्या करूं?


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30

भुखमरी, बेरोजगारी और   भ्रष्टाचार


बढ़ते   ही जा रहे बिलकुल बेसुम्मार 


जात गोत इलाके और धर्म पे बांटा  


ऐस करते देश के  देखो साहूकार

********

29

तपती लू साईकिल  का सफ़र 

फेस बुक की बन गयी खबर 

न बर्फ का पानी न ही फ्रीज़  

बिजली का पंखा बिजली का 

बार बार कट बनी बात जबर

सारे दिन की दिहाड़ी सौ रुपे 

चले जा रहे है हम  अंधी डगर  

क़िस्मत में यही लिखा बताया 

सुन कर बस कर लिया सबर  


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28

मत कहो की तुम्हे हमसे प्यार  हो गया  

गर था तो इतनी जल्दी   कहाँ खो गया 

प्यार तो सोनी महीवाल का बताते यारो  

कचा  मटका भी उनके प्यार पे रो गया

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27

के करूँ 

क्या  ठीक है क्या  गलत है कौन समझाए 

क्या  करें  क्या  ना करें ये कौन बतलाये 

सही काम करके जीना चाहता हूँ मैं 

कहीं भी सही काम नहीं पाता  हूँ मैं 

बस  सर पकड़ कर बैठ जाता हूँ मैं 

सोचता हूँ कोई आकर के मुझे उठाये---------

काले काम काले धंधे बुला रहे हैं 

इनमे कई लोग खूब  कमा  रहे हैं 

मुझे भी यही रास्ता दिखा रहे हैं 

डर लगता है मुझको कोई ढाढस बंधवाये ------

मेरे जैसे बहुत काले अंधेरो में खो गए 

गलत रहो के आदि बहुत साथी हो गए 

परिवार भी बस दो चार बार रो गए 

बिना काले के हमारा पेट कैसे भर पाए -----


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26

आज   की जरूरत हम  नहीं जानते 

अपनी शकल को भी नहीं पहचानते 

मशीन  बन गया है आज  का इंसान 

इस सचाई को हम क्यों नहीं मानते

 

रणबीर


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25

जो धर्म हमें घृणा से पूरा भरदें

मनुष्य से मनुष्य को अलग करदें

आपस में हमको जो लडवाते हों

धर्म के ठेकेदारों  को बचाते हों

जो देशो  को ही बाँट कर धरदें

ऐसे धर्मों के बारे क्या कहूँ मैं  ?

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24

वायदे करके इनको पूरी तरह हमने निभाया है 

करके वायदे तोड़ दिए ये तुमने करके दिखाया है 

चलो कोई मजबूरी होगी वायदे नहीं निभा  पाये 

प्यार  तो तुम्हें हमसे था ही छिप नहीं पाया है 

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23

बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है।

तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है॥

वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ।

और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ॥

वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है।

यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है॥

यहाँ कोठी है बंगले है और कार है।

वहां परिवार है और संस्कार है॥

यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है।

वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है॥

यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ।

वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ॥मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है।

तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है॥

वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है।

चल आज हम उसी गाँव में चलते है.................. उसी गाँव में चलते है..... Akshay Ohlan

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22

अब हालत बदलने होंगे ग़म का बोझ उठाने वाले |

वरना देते ही जायेंगे दुःख दिन रात ज़माने वाले |

मजलूमों को बाँट रहे हैं परम्पराओं के बहाने करके 

इस साजिस ही में शामिल हैं वे नफरत फ़ैलाने वाले |

दुनिया पर कब्ज़ा है जिन का वो उस के हक़दार नहीं हैं 

उनसे अब कब्ज़ा छीनेंगे  सब का बोझ उठाने वाले |

पत्थर दिल लोगों से अपने जख्मों को ढांपे ही रखो

खुद को हल्का कर लेते हैं सबको जख्म दिखाने वाले |

कोई किसी का साथ निभाए इतनी फुर्सत ही किसको है 

अफसानों में मिल सकते हैं अब तो साथ निभाने वाले

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21

दर्द सबके एक हैं 

मगर हौंसले सबके अलग अलग है

कोई हताश हो के बिखर गया

तो कोई संघर्ष करके निखर गया !

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20

सोच सोच कर 

सोच सोच कर घबरा जाता हूँ मैं 

अपने आप को अकेला पाता हूँ मैं 

एक  नयी दुनिया का सपना मेरा है 

यहाँ क्या मेरा है और क्या तेरा है 

इंसानियत  पैदा की है समाज ने 

हैवानियत  पैदा की है दगा बाज ने 

हैवानियत ख़त्म हो है यही सपना 

इंसानियत बढे यही लक्ष्य अपना 

मनकी शान्ति की खोज में धर्मात्मा 

खोजते खोजते खोज लिया परमात्मा 

अपनी शान्ति पाई हमारी लूट पर 

हमारी शांति भगवन की छूट पर 

भगवान भी इंसान की खोज कहते 

हम तो भुगतें वो करते मौज रहते 

जिस दिन ये चालबाजी भगवान की 

समझ आयेगी तो मुक्ति इन्सान की 

 सोचता हूँ जितना उतना ही भगवान 

नजर आता है मुझको तो बस शैतान 

मेरे लिए तो मेहन त इमानदारी 

उनको लूट की दी उसने थानेदारी 

सबसे पहले होगी बगावत मेरी 

सामने  लायेगी उसकी हेरा फेरी

जग नहीं है सोता उसकी हाँ के बिना 

घोटाला कैसे होता उसकी हाँ के बिना 

मंदिरों में हजारों टन सोना जमा है 

यहाँ भूख से मौतों का लगा मजमा है 

लोगो ने चढ़ावा चढ़ाया है मंदिरों में 

चढ़ावे तेन मौज उड़ाया है मंदिरों में 

महिला को दासी बनाया है मंदिरों में 

गरीबों को गया भरमाया है मंदिरों में 

मन की  शांति नहीं मिली है मंदिरों में 

इंसानियत आज हिली है मन्दिरों में 

बुद्ध ने नया रास्ता खोजा मन शांति का 

भगवान को नाकारा दर तोडा भ्रान्ति का 

मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया था 

गरीब किया आदि हमें समझाया था 

पूंजी का खेल सारा है पूंजीवाद में 

इसका जवाब तो है समाजवाद में 

सोचता समाजवाद कैसा हो आज का 

क्या रिश्ता होगा चिड़िया और बाज का 

कई सवाल हैं जिनके ढूँढने जवाब 

महात्मा ने नहीं हमें ढूँढने जनाब 

रंग भरने हैं समाजवादी समाज में 

सब की हिस्सेदारी के सही अंदाज में  

"रणबीर "


*******

19

*पानी आकाश से गिरे तो........बारिश,*


*आकाश की ओर उठे तो........भाप,*


*अगर जम कर गिरे तो...........ओले,*


*अगर गिर कर जमे तो...........बर्फ,*


*फूल पर हो तो....................ओस,*


*फूल से निकले तो................इत्र,*


*जमा हो जाए तो..................झील,*


*बहने लगे तो......................नदी,*


*सीमाओं में रहे तो................जीवन,*


*सीमाएं तोड़ दे तो................प्रलय,*


*आँख से निकले तो..............आँसू,*


*शरीर से निकले तो..............पसीना,*


*और*


 *प्रभु के चरणों को छू कर निकले* *तो.........................चरणामृत*


*( आज विश्व जल दिवस पर समर्पित )*

 *Save Water💧Save Life।*                                  *💧💧पानी को जरूर बचाये💧💧*

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दिन आ गए अच्छे

पा के खाखी निकर कच्छे

बंदियां उत्ते गऊंआ बच्छे

गां दा मूत पिलाऊंदे ने

मुर्ख खूब बनाऊंदे ने


सानु बढदे फिरन पतंदर

दसदे हनुमान है बंदर

वोटां वेले राम दा मंदर

मुडके राम भुलाऊंदे ने

मुर्ख खूब बनाऊंदे ने


जाट आरक्षण ल्याके

रक्खे सारे लोक लडाके

भाईचारे नु तुडवाके

आपस विच लडाऊंदे ने

मुर्ख खूब बनाऊंदे ने


युग विज्ञान दा आया

ऐहना तर्क नु आ दबाया

आके गीता विच्च उलझाया

गीता सार पढाऊदे ने

मुर्ख खूब बनाऊंदे ने

डॉ०फूल सिह

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18

पैसा छाया चारों तरफ आज के संसार में 

रिश्ते नाते टूट रहे है आज के परिवार में 

भाई का भाई दुश्मन जहाँ में बना हुआ है

आरक्षण खाप का मसला आज तना हुआ है 

मानवता पीछे रह गई धर्म के प्रचार में ।

भाई चारा मेलजोल चीज विरली हो गई

सादगी सच्चाई जाणे कहाँ सब खो गई

सब कुछ बिक रहा आज इस बाजार में ।

सिस्टम हमारा ये बिलकुल खोखला हो रहा

अविश्वास के बीज हर जगह पर वो बो रहा 

बहोत से भ्रष्ट नेता छाये राज दरबार में ।

विषमता के हर तरफ ये अम्बार लगे हैं

खाईयां बढ़ रही हैं ये रिश्ता बेकार लगे हैं 

कितना अकेला हुआ मानव घर परिवार में।

किसान कर्ज में डूबा फांसी खाने को मजबूर

निठल्ला ऐश करे देखो सिस्टम का दस्तूर

अच्छे दिन आएंगे बीता समय इंतजार में ।


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दुनिया को बदलने का बहाना तुम्हारा 

अब समझ में  आ गया हमको यारो 

अपने वजूद के लिए ये जुमला अपनाया 

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दुःख होता है ये देख कर हमको यारो 

हमें जिन्होंने मार्क्सवाद सिखाया था

वही उदारीकरण में उदार हो गये देखो 

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15

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इंसानियत और मानवता का 

सही और असली रूप ढूँढते

ढूँढते समाजवाद के दरवाजे 

पर आ पहुंचे और बचा पाये 

कुछ हिस्सा अपनी मानवता का 

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14

यही रफ़्तार रही ज़माने की ताऊ

तो इंसानों की जगह होंगे ये हाऊ

खुदगर्जी चुगलखोरी खुसामद की 

मौज होगी हर चीज यहाँ बिकाऊ 

अमेरिका और कोर्पोरेट छाया देखो 

भारत बनाया इन्होंने बैल हिलाऊ


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13

दो   हजार   बीस     तक     

गाँव  कस्बों  को  ना देखिये  

बड़े बड़े शहरों की फ़ैली गंदी 

बस्तियों की तरफ ना देखिये 

पाश इलाकों में बनी ऊंची 

इमारतों को ही अब देखिये


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12

गरीब  परिंदा उड़ान में  है  

तीर अमीर की कमान में है 

है डराने को मारने को नहीं 

मरा तो अमीर नुकसान में है 

जिन्दा रख कर लहू चूसना 

अमीरों के दीन ईमान में है 

खौफ ही खौफ है जागते सोते 

लूट हर खेत खलिहान में है 

मरने न देंगे न जीने देंगे 

sajish poonjee mahan में है


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11

अपमान सहें जाओ रै पर बोलियो मतना।।

नाश करण लागरे थारा मूंह खोलियो मतना ।।

अपने अपने में मग्न हो चुप चाप झेल रहे 

गलत होंते देखें जाओ पर सोचियो मतना।।

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10

कुछ नए बन रहे  कुछ पुराने बने

हर कदम पर यहाँ कैदखाने बने

किस तरफ से चली गोलियां क्या पता

किन्तु हर बार हम ही निशाने बने

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9

था क्या हमने सोचा ये क्या हो गया

हमें क्यों इस चमन से गिला हो गया 

दिया जिसकी खातिर था हमने लहू

वही मौसमें गुल क्यों खफा हो गया

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8

गुनाह उनका  सजा हमें

उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले

ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले

नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये 

कैसे हम जैसों को  जीने की यहाँ फिजा मिले

तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत  कई बार ही

मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले

तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद

बताओ तो  कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले

हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं

न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले


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7

जीने की मुश्किल अब मेरी राह बहुत है 

जीता हूँ जीने की अब मुझे चाह बहुत है 

गम बहुत से हैं हमारे और तुम्हारे देखो 

उनपे मेरी टिकी अब निगाह बहुत है 

तुम कहो या न कहो पर मुझे मालूम है 

तुमको मेरी जीने की परवाह बहुत है 

कत्ल होके भी हम अमीरों  के गुनाहगार

झूठ नहीं शहर में हमारे गवाह बहुत है  

मुझे अपने दोस्तों  पर है पूरा एतबार

अहम् रणबीर उनकी सलाह  बहुत है

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6

मेरा रास्ता समझो तो सही  यही समझाता रहा

मकसद जीने का क्या हो इसपे बतियाता रहा 

एक ही जीवन है यहाँ इतना तो मान लो दोस्त

दोस्त चुप चाप दूसरा  रास्ता  बस  बनाता रहा 

 जाने वाले फिर नहीं आते मुडके  अगले जीवन 

इस हकीकत से  दोस्त  हमेशा ही कतराता रहा  

दोस्ती आगे नहीं बढ़ पाई मुझ पर कामरेड का

 देर सबेर लुके छिपे ठप्पा दोस्त वो  लगाता रहा

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5

हुए  किसी और के  फिर भी अपने से लगते हो

बहुत  प्यारे हसीन टूटे हुए सपने से लगते हो

कभी कभी यादों का एक हजूम सा आता है

अपनी बाँहों में  मुझे  तुम  कसने  से लगते हो

कभी अकेले में बैठ कर रोने को दिल करता है

मेरी हालत पे लगता है तुम हंसने से लगते हो

वो प्यार ही क्या जो करे पछतावा प्यार करके

प्यार किया हमने तुम मना करने से लगते हो

अब वो बात नहीं हमने रास्ता बदल लिया है

मग़र तुम जब मिलते हो तो डरने से लगते हो

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4

मेरा रास्ता समझो तो सही  यही समझाता रहा

मकसद जीने का क्या हो इसपे बतियाता रहा 

एक ही जीवन है यहाँ इतना तो मान लो दोस्त

दोस्त चुप चाप दूसरा  रास्ता  बस  बनाता रहा 

 जाने वाले फिर नहीं आते मुडके  अगले जीवन 

इस हकीकत से  दोस्त  हमेशा ही कतराता रहा  

दोस्ती आगे नहीं बढ़ पाई मुझ पर कामरेड का

 देर सबेर लुके छिपे ठप्पा दोस्त वो  लगाता रहा

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3

गुनाह उनका  सजा हमें

उनके गुनाहों की हमको किसलिए सजा मिले

ऐसा इंसाफ क्यों हो किसलिए ऐसी क़ज़ा मिले

नाहक ही हम बेकसूरों की क्यों जान चली जाये 

कैसे हम जैसों को  जीने की यहाँ फिजा मिले

तुम्हारे सताने से हम रोये बहुत  कई बार ही

मग़र अब ना रोयेंगे ताकि तुम्हें ना मजा मिले

तुम लूट कर हमें रहो सुख चैन से आबाद

बताओ तो  कसूर क्यों उल्टा हमें खिजा मिले

हमारी मेहनत पर रणबीर वे ऐश करते हैं

न्याय देखो हमें सुखी रोटी उनको पिज्जा मिले


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2

होंश में आना होगा 

अब नए संगठन को हमें अपनाना होगा ।।

जो भाई नहीं आएं उनको बुलाना होगा ।।

संगठन बनायें जो रजके रोटी खाना चाहते 

अपने बच्चों को हम शिक्षा दिलाना चाहते 

सब बराबर हों ऐसा समाज बनाना चाहते 

अब हमें क्रांति के गीतों को गाना होगा ।।

जो भाई  नहीं आएं उनको बुलाना होगा।।

वो क्यों अमीर हो गए इस पर विचार करें 

हम क्यों गरीब ही रहे इस पर ध्यान धरें 

अलग अलग बंटे हम एक दूजे से ही डरें

जात पात भूलके एक मंच पर आना होगा।।

जो भाई नहीं आये उनको  बुलाना होगा ।।

हरियाणा बुरी तरह जलवाया देख लिया 

जातों  को आपस में भिड़वाया देख लिया 

फूट डालो राज करो आजमाया देख लिया 

मेहनतकश को मानवता को बचाना होगा।।

जो भाई नहीं आये उनको बुलाना होगा ।।

महंगाई बढ़ती जा रही देखो आज यहाँ 

बेरोजगारी हमें खा रही देखो आज यहाँ 

प्याज भाव नहिं पा रही देखो आज यहाँ 

इन मुद्दों को मिलकर के उठाना होगा ।।


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1

साथ तुम्हारा इन्कलाब नारा इस कदर भा गया 

मकसद वीरान जिन्दगी का जैसे फिर से पा गया 

मोम के घरों में बैठे लोग हमारे घर जलाने आये 

जला दिए हमारे मग़र अपने भी ना बचा पाये 

तबाह कर दिया जहान को मुनाफा हमें खा गया 

रास्ता ही गल्त पकड़ा हमें भी उसी पर चलाया है 

स्वर्ग नर्क के पचड़े में तुम्हीं ने हमको  फंसाया है  

भगवान और बाबाओं का खेल समझ में आ गया 

आशा बाबू एक  प्रवचन के कई लाख कमाते हैं 

निर्मल बाबू नकली लोग पैसे दे कर के  बुलाते हैं 

भगवान की आड़ में मुनाफा दुनिया पर छा गया