उनकी बेटी एलिनोर बताती हैं कि फ्मार्क्स के सहपाठी उन्हें प्यार भी करते थे और उनसे भयभीत भी रहते थे - प्यार इसलिए क्योंकि मार्क्स लड़कों की शरारतों में शामिल होने को हमेशा तैयार रहते थे और भयभीत इसलिए क्योंकि वे चुभती हुई व्यंग कविताएँ लिखते थे और अपने विरोधियों का जमकर मखौल उड़वाते थे। जीवन भर कविता, कला और संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी बनी रही। होमर, दान्ते, शेक्सपियर, सर्वेन्टीज, बाल्ज़ाक, शेड्रिन, और पुश्किन उनके प्रिय लेखक थे। तत्कालीन जर्मनी के सभी क्रान्तिकारी कवियों - हाइने,
फ्रेलिग्राथ , और वीर्ह्ट से तो उनकी व्यक्तिगत मित्राता थी. मार्क्स ने उन्हें न केवल उनकी अनेक क्रान्तिकारी कविताओं के लिए प्रेरित किया था बल्कि जब वे हाइने के साथ पेरिस में थे तो अक्सर हाइने को अपनी कविताओं की पंक्तियाँ परिमार्जित करने में सहायता करते थे कभी-कभी तो किसी कविता के एक-एक शब्द को लेकर उनके बीच तब तक विचार-विमर्श चलता रहता था जब तक कि पूरी कविता ही स्पष्ट और परिष्कृत न हो जाये। मार्क्स लगभग आधा दर्जन भाषाएँ जानते थे और साहित्यिक प्ऱफेंच और अंग्रेज़ी तो मूल भाषा-भाषियों की
तरह लिख सकते थे विज्ञान की प्रगति में भी उनकी गहरी रुचि थी। लीबनेख़्त बताते हैं कि जब 1850 में बिजली का पहला इंजन प्रदर्शित किया गया तो मार्क्स कितने जोश से भर गये थे। एंगेल्स ने काप़फी ज़ोर देकर उस ख़ुशी का वर्णन किया है जो मार्क्स को तब होती थी जब सैद्धान्तिक विज्ञान के क्षेत्रा में कोई नयी खोज सामने आती थी. यद्यपि एंगेल्स आगे कहते हैं कि ये ख़ुशी उस उल्लास के सामने कुछ भी नहीं थी जो मार्क्स तब अनुभव करते थे जब ऐसी खोज तत्काल ही उद्योगों में प्रयुक्त भी होकर सामाजिक विकास में योगदान करने लगती थी। जब 1859 में डार्विन की ऑरिजिन ऑप़फ स्पेसीज़ प्रकाशित हुई तभी, बल्कि उससे पहले ही मार्क्स ने डार्विन के काम के युगान्तरकारी महत्व को पहचान लिया था और महीनों तक जर्मन प्रवासियों के बीच डार्विन के अतिरिक्त और किसी विषय की चर्चा ही नहीं हुई। ये उल्लेख हम मार्क्स के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के अतिरिक्त इस प्रचलित धारणा के खण्डन के लिए भी कर रहे हैं कि मार्क्स एक फ्रूखे-सूखेय् अर्थशास्त्राी भर थे। मार्क्स की कृतियों के बारे में हम आगे चलकर चर्चा करेंगे, पर यहाँ इतना तो कहा ही जा सकता है कि यद्यपि मार्क्स भी
अर्थशास्त्राीय विज्ञान को एकदम सरल तो नहीं बना सकते थे, फिर भी विषय के अपेक्षतया अधिक औपचारिक पहलुओं की चर्चा भी उन्होंने वैसे नीरस ढंग से नहीं की जैसे कि पुराने अर्थशास्त्रिायों ने। पूँजी तक के ऐतिहासिक अनुच्छेद भी मानवीय संवेदना और समझ से भरपूर हैं दृष्टान्त इतने उपयुक्त हैं, व्यंग इतना सहज और सटीक, कि औसत बुद्धिमत्ता और सामान्य प्राथमिक शिक्षा वाले किसी मज़दूर को भी उनकी रचनाओं के अध्ययन से घबराने की आवश्यकता नहीं हैबशर्ते कि उसमें एकाग्रचित्त होने की क्षमता और सीखने की लगन हो।
फ्रेलिग्राथ , और वीर्ह्ट से तो उनकी व्यक्तिगत मित्राता थी. मार्क्स ने उन्हें न केवल उनकी अनेक क्रान्तिकारी कविताओं के लिए प्रेरित किया था बल्कि जब वे हाइने के साथ पेरिस में थे तो अक्सर हाइने को अपनी कविताओं की पंक्तियाँ परिमार्जित करने में सहायता करते थे कभी-कभी तो किसी कविता के एक-एक शब्द को लेकर उनके बीच तब तक विचार-विमर्श चलता रहता था जब तक कि पूरी कविता ही स्पष्ट और परिष्कृत न हो जाये। मार्क्स लगभग आधा दर्जन भाषाएँ जानते थे और साहित्यिक प्ऱफेंच और अंग्रेज़ी तो मूल भाषा-भाषियों की
तरह लिख सकते थे विज्ञान की प्रगति में भी उनकी गहरी रुचि थी। लीबनेख़्त बताते हैं कि जब 1850 में बिजली का पहला इंजन प्रदर्शित किया गया तो मार्क्स कितने जोश से भर गये थे। एंगेल्स ने काप़फी ज़ोर देकर उस ख़ुशी का वर्णन किया है जो मार्क्स को तब होती थी जब सैद्धान्तिक विज्ञान के क्षेत्रा में कोई नयी खोज सामने आती थी. यद्यपि एंगेल्स आगे कहते हैं कि ये ख़ुशी उस उल्लास के सामने कुछ भी नहीं थी जो मार्क्स तब अनुभव करते थे जब ऐसी खोज तत्काल ही उद्योगों में प्रयुक्त भी होकर सामाजिक विकास में योगदान करने लगती थी। जब 1859 में डार्विन की ऑरिजिन ऑप़फ स्पेसीज़ प्रकाशित हुई तभी, बल्कि उससे पहले ही मार्क्स ने डार्विन के काम के युगान्तरकारी महत्व को पहचान लिया था और महीनों तक जर्मन प्रवासियों के बीच डार्विन के अतिरिक्त और किसी विषय की चर्चा ही नहीं हुई। ये उल्लेख हम मार्क्स के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के अतिरिक्त इस प्रचलित धारणा के खण्डन के लिए भी कर रहे हैं कि मार्क्स एक फ्रूखे-सूखेय् अर्थशास्त्राी भर थे। मार्क्स की कृतियों के बारे में हम आगे चलकर चर्चा करेंगे, पर यहाँ इतना तो कहा ही जा सकता है कि यद्यपि मार्क्स भी
अर्थशास्त्राीय विज्ञान को एकदम सरल तो नहीं बना सकते थे, फिर भी विषय के अपेक्षतया अधिक औपचारिक पहलुओं की चर्चा भी उन्होंने वैसे नीरस ढंग से नहीं की जैसे कि पुराने अर्थशास्त्रिायों ने। पूँजी तक के ऐतिहासिक अनुच्छेद भी मानवीय संवेदना और समझ से भरपूर हैं दृष्टान्त इतने उपयुक्त हैं, व्यंग इतना सहज और सटीक, कि औसत बुद्धिमत्ता और सामान्य प्राथमिक शिक्षा वाले किसी मज़दूर को भी उनकी रचनाओं के अध्ययन से घबराने की आवश्यकता नहीं हैबशर्ते कि उसमें एकाग्रचित्त होने की क्षमता और सीखने की लगन हो।
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